fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

अभी शेष है बेचैनी बीज में

स्वप्निल श्रीवास्तव
दिविक रमेश हिन्दी के महत्त्वपूर्ण कवि है , कविता के अलावा उन्होंने अन्य विधाओ में काम किया है जिसमें आलोचना और अनुवाद प्रमुख है लेकिन उनकी कीर्ति कवि के रूप में सर्वोपरि है । वे हिन्दी के उन कवियों में हैं जो सतत रचनाशील रहे है, उनकी पीढी के कई कवि अब लिखना बन्द कर चुके है। कविता लिखना कोई कैजुवल कार्य नहीं है, वह भी ऐसी स्थिति में जब लिखने की स्थितियाँ समाज में मौजूद हैं। हम जिस स्थिति का सामना कर रहे हैं उसमें लिखना भी एक तरह का प्रतिरोध है, जब रोम जल रहा हो, तो नीरो की तरह बाँसुरी बजाने से काम नहीं चलेगा। कविता लिखना एक सामाजिक कर्म है। कविता सिर्फ पाठकों को शिक्षित नहीं करती बल्कि हमारे जीवन के मूल्यों को बचाती है। कविता लिखना एक तरह से अपनी स्मृति को भी बचाना है। हमारे वर्तमान की जडे अतीत में फैली हुई है - वही से हम अपनी परम्परा को आगे बढाते हैं - जो उपयोगी नहीं है, उससे मुक्त होने की कोशिश करते हैं।
दिविक रमेश के संग्रह जब घुटती साँस आदमी की को पढते हुए यह बात याद आती है, वे अपने आसपास के जीवन और घटनाओं को अपनी कविता में व्यक्त करते है। उनकी अभिव्यक्ति की शैली अलग है, जिसमें कोई तामझाम और जटिलता नहीं है, वे कविता में किसी तरह का चमत्कार नहीं करते, न उसे शब्दजाल में बाँध कर किसी तरह के पाण्डित्य का प्रदर्शन नहीं करते। सहजता ही उनकी कविता की विशेषता है ।
दिविक ने बाल कविताएँ भी लिखी हैं, बच्चों के लिए कविता लिखना आसान काम नहीं है, उसके लिए बच्चों की बोली और भाषा में उतरना पडता है। कोई जटिल या बौद्धिक कविता तो लिख सकता है, लेकिन बच्चों के लिए कविता लिखना चुनौतीपूर्ण काम है । हिन्दी के बडे कवियों ने बाल-कविता लिखी हैं, हरिऔंध की कविता एक बूँद, उठो लाल अब आँखे खोलो या दिनकर की कविता-हठ कर बैठा चाँद एक दिन, सुभद्राकुमारी चौहान की कविता-खूब लडी मर्दानी, वह तो झाँसीवाली रानी थी, मेरे जैसे हिन्दी के पाठकों को अब तक याद है। दिविक रमेश की बाल कविताएँ- आओ महीनों आओ घर कविता में हर माह की विशेषता बताई गयी है जो बच्चों को याद रह जाती है। वे बाल-कविता को आधुनिक सन्दर्भ से जोडते हैं, यह कविता देखे-बडी हो गयी, अब तो छोडो / नानी गाय कबूतर उल्लू / अरे चलाती मैं कम्प्यूटर / मत कहना अब मुझको उल्लू।
उनकी कविताओं में यह बाल - सुलभता दिखाई देती है, वह कविता के लिए कोई लम्बा वितान या भूमिका नहीं बाँधते बल्कि अपनी बातों को सहज तरीके से व्यक्त करते हैं, इसके पीछे बाल- कविता लिखने का अनुभव काम करता है।
किसी कवि को जानने के लिए उसकी पृष्ठभूमि का जानना आवश्यक है, उसकी कविताओं के उत्स वही छिपे रहते हैं । दिविक दिल्ली के पास के गाँव किराडी में पैदा हुए थे, उन्हें दिल्ली में नौकरी मिली। इस तरह हम देखते हैं कि वे ग्रामीण और शहरी जीवन से बराबर परिचित रहे है, लोकजीवन के बिम्ब और प्रतीक उनकी कविताओं में मिलते हैं। दिल्ली में बहुत से लेखक कवि दिल्ली से बाहर कस्बों और छोटे शहरों से आए हुए है, यहाँ आकर वे सबसे पहले अपनी भाषा बदलते हैं फिर उनके भीतर संवेदना का लोप होता है, यह सब परिवर्तन उनकी कविताओं में साफ दिखाई देता हैं। जो शहर में रहते हुए अपनी जडों से जुडे रहते हैं ,उनके भीतर यह बदलाव नह दिखाई देते। हिन्दी के कईं कवियों की भाषा अनुवाद की भाषा लगती है, दिविक ने अपनी इस चेतना को बचाया है। महानगर के हाहाकार में रहते हुए आदमी किस तरह तब्दील हो जाता है, यह उसे भी पता नहीं चलता, राजधानियों का तो यही चरित्र है, वे नागरिकों को अपनी तरह गढ लेती है। राजधानियाँ राजनेताओं, दलालों, उठाईगीरों, माफियों की भी जगहें होती हैं, उसके प्रभाव से हम बच नहीं सकते- लेखन भी इसका कम शिकार नहीं होता। बडी जगहों पर रहते हुए लोगों की महत्त्वाकांक्षाएँ भी बडी होने लगती हैं ।बडे शहरों के कौतुक कम नहीं होते ,इसलिए अपने को बचाने के साथ कविता को बचाना है, यही कवि का अभीष्ट है
दिविक रमेश शहर में रहते हुए शहर के नागरिक नहीं लगते वरना वह गेहूँ घर आया है ,जैसी कविता नहीं लिखते, उसकी कुछ पंक्तियाँ देखे - कर्ज का ही सही /घर आया तो है गेहूँ / गृहणी खुश है / आज लीपा है पूरे उछाह से आँगन।
जो किसानी जीवन से परिचित है, उन्हें अनाज की कीमत का पता है, लेकिन अभिजात वर्ग इसके महत्त्व को नहीं जानते, उसे यह नहीं मालूम कि जो रोटी थाल में आती है , उसके पीछे कितनी यातना छिपी हुई है । बडे शहरों में एक ऐसा वर्ग रहता है जिसे हाड - तोड मेहनत के बाद रोटी नसीब होती है , उसकी तरफ कम कवियों की दृष्टि जाती है। कवि उन मजदूरों के बारे में कविता लिखता है जो शहरों का कारोबार चलाते है। हम जानते है किसी शहर की आधी आबादी उन लोगों की है जो रोजी- रोटी की तलाश में शहर आए हुए है, वे हमारे घर बनाते हैं, लेकिन खुद बेघर रहते हैं। मजदूरों की यंत्रणा कवि की इन पंक्तियों मे दर्ज है- पेट में जो ढोने लगता है ईटें /पेट में जो मथने लगता है गारा / पेट में जिसे सिखा दिया गया हो सलाम बजाना /पहले ही दिन से खुद जिसने / शुरू कर दिया हो कमाना।
समाज के हाशिये पर रहनेवालों की यही ट्रैजिडी है। आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद उनके जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ है, लेकिन एक वर्ग ऐसा भी जों निरन्तर धनाड्य होता जा रहा है। दिविक रमेश की कविताओं में ऐसे कई विवरण मिल जाएगे जिससे हमें कवि की प्रतिबद्धता का पता लग जाएगा। कवि का विजन ही कवि के लिए जरूरी होता है, वह कविता को प्रासंगिक बनाता है। वे कहते हैं- अभी मरा नहीं है पानी / हिल जाता है जो भीतर तक / सुनते ही आग / अभी शेष है बेचैनी बीज में। बेचैनी कवि का मूल भाव है , बिना बेचैन हुए हम कविताएँ नहीं लिख सकते-सुविधाजनक स्थिति में रहते हुए अच्छी कविताएँ नहीं लिखी जा सकती हैं, लिखने के लिए यंत्रणा आवश्यक है-वही तो कवि का पाथेय है।
दिविक रमेश के यहाँ सामाजिक रिश्तों की अनेक कविताएँ मिल जाएगी, समय के साथ सामाजिक रिश्तों में बदलाव हुआ है , सम्बन्धों के समीकरण बदले हैं। उदारीकरण के बाद रिश्ते औपचारिक हुए हैं, उनकी गहनता नष्ट हुई थी, आर्थिकी ने एक नया व्याकरण गढा है। आपसी सम्बन्धों का ताप खत्म हुआ है। इन सारे सम्बन्धों के बीच हमारी पीढी में माँ का रिश्ता बचा हुआ है, लेकिन उसके बीच शहर और गाँव तनाव है। माँ को शहर रास नहीं आते और जो शहर में नौकरी करते हैं। वे गाँव नहीं रह सकते, इस भाव को कवि ने इस तरह से व्यक्त किया है- चाहता था / आ बसे माँ भी यहाँ इस शहर में / पर माँ चाहती थी / आए गाँव भी थोडा साथ में / जो न शहर को मंजूर था /न मुझे ही -
संयुक्त परिवार के टूटने के बाद चीजें आश्चर्यजनक रूप से बदली है, एकल परिवार पैदा हो गए है, उनकी अपनी अलग संस्कृति है जिसमें बहुत स्पेस बचा है। माता -पिता शहर में नहीं रह सकते, जो शहर में काम करते है, वे सुदूर गाँव के रहनेवाले है ,उनकी नौकरी इतनी जटिल है वे गाँव में आसानी से आवाजाही नहीं कर सकते । हिन्दी कविता में इस तरह के अनुभव पर बहुत कम कविताएँ लिखी गयी हैं, लेकिन साठ के बाद की हिन्दी कहानी का यह वर्ण्य विषय है। माँ अगर गाँव से शहर में आती है तो वह परिवार के लिए असुविधाजनक बन जाती है। भीष्म साहनी की कहानी चीफ की दावत को याद कीजिए। आजादी के बस सिर्फ सत्ता नहीं बदली है, समाज में बहुत से बदलाव हुए हैं, अजनबीपन बढा है । दिविक की यह पंक्ति देखें - माँ के पंख नहीं होते /कुतर देते हैं उन्हें /होते ही पैदा खुद उसी के बच्चे।
यह आज के समय की कारूणिक पंक्ति है , आज के आधुनिक समय में हमे इसे भयावहता के साथ देख रहे हैं । बहुत सारी दारूण कहानियाँ हम अखबारों या सोशल मीडिया में देख रहे है। इस पूँजीवादी समय में मूल्यों का पतन किस स्तर तक पहुँचेगा इसका अनुमान लगाना कठिन है। हमें जिस तरह का जीवन मिला है, उसमें बिडम्बनाएँ बहुत ज्यादा हैं- यथार्थ कम भयानक नहीं है, इन्हीं स्थितियों के बीच कवि को अनेक भूमिकाओं का निर्वाह करना पडता है। ऐसे में संवेदन पर संकट आ जाता है, दिविक समय की विपरीत स्थितियों में जीवन की छोटी-छोटी चीजों को कविता में लाकर बचाते हैं। उनकी एक कविता पंख की याद आती है - दरवाजा / शायद खुला रह गया है / इसी राह से आया होगा उडकर / यह खूबसूरत पंख /खिडकियाँ तो सभी बन्द हैं / शायद सामनेवाले पेड पर / कोई नया पक्षी आया है ।
किसी महानगर में रह कर इस तरह का दृश्य देखना और उस पर कविता लिखना, यह बताता है कि कवि की संवेदना का स्रोत अभी सूखा नहीं है। कवि के भीतर बचपन और जिज्ञासा बची हुई है और वह अनेक स्तरों पर प्रकट होती रहती है। जिस कवि का अवलोकन गहरा होता है, उसकी अभिव्यक्ति स्वाभाविक होती है। हिन्दी में इधर बलात् कविताएँ लिखी जा रही हैं, उसमें जीवन के नकली अनुभव दिखाई देते हैं। मसलन जिन्होंने गाँव नहीं देखा है वे गाँव पर कविताएँ लिख रहे हैं, जिन्होंने दुख नहीं झेला है, वे अपनी कविताओं में दुख उडेल रहे है - यह अस्वाभाविकता जगह-जगह चमक- दमक के साथ मौजूद है।
दिविक रमेश की कविता का दायरा विस्तृत है, उसमें कई रंग और अनुभव की कविताएँ हैं। बहरहाल उनकी छोटी-सी कविता से इस लेख को खत्म कर रहा हूँ - तुमने पूछा / वह सडक कहाँ तक जाती है / और मुस्करा दी /मैनें कहा / वहीं / और मुस्करा दिया / हम कितनी दूर निकल आएँ हैं / साथ - साथ।
किसी कवि के जीवन का सफर उसकी कविता का भी सफर है ।
पुस्तक का नाम : जब घुटती है साँस आदमी की
लेखक : दिविक रमेश
प्रकाशक : प्रलेख प्रकाशन प्रा.लि.
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 200
विधा : कविता


सम्पर्क - 510 - अवधपुरी कालॉनी,
फैजाबाद - 224001
मोबाइल -9415332326