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दृष्टि और सृजन का अंतर्पाठ

सतीश राठी
रचनात्मक समीक्षाओं को संकलित कर एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक सृजन का अन्तर्पाठ शीर्षक से सामने आई है। पुस्तक श्री बी.एल. आच्छा के द्वारा प्रस्तुत की गई है। सामान्यतया समीक्षा के कार्य को बहुत गम्भीरता से नह लिया जाता है, लेकिन इस पुस्तक में जो बहुआयामी समीक्षाएँ प्रस्तुत की गई हैं, वह समीक्षा के क्षेत्र में नए मानदण्ड स्थापित कर रही हैं। लेखक के स्वभाव में बहुत गम्भीरता और चिन्तन की तीव्रता है। यह पुस्तक रचना के भीतर घुसकर उसकी परत को उधेड कर उसके रस का आस्वादन करवाती है। समीक्षा के क्षेत्र में श्री बी.एल. आच्छा का लम्बा अनुभव है और जब कोई लेखक लगभग 2000 पृष्ठ का समीक्षा कर्म कर लेता है, तो उसकी भाषा की कसावट और उसका चिन्तन उसकी समीक्षाओं में रचना की सूक्ष्म पडताल के रूप में सामने आता है। इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ महत्त्वपूर्ण समीक्षा आलेख संकलित हैं।
पुस्तक का पहला समीक्षा आलेख राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक घुमक्कडशास्त्र पर लिखा गया है। लेखक ने लिखा है कि, घुमक्कडशास्त्र किसी शास्त्रीय किस्म की रचना नह है फिर भी विश्व के महान घुमक्कडों की प्रेरणाओं, अनुभवों, उद्देश्य, मार्ग बाधाओं और विश्व मानवता के लिए उनके प्रदेयों से लक्षित एक नवीन रस घुमक्कड रस का परिपाक भी है। यद्यपि ऐसी स्थापनाएँ उसके केन्द्र में कहीं परिलक्षित नह होती, फिर भी इन निबन्धों से यह लगता है कि अमोघ जिज्ञासा का सत्य संधान ही घुमक्कड रस का स्थाई भाव है।
पुस्तक में जनभाषा का-सा प्रवाह है । बोली की भी सहजता है। यह शास्त्र जिज्ञासु युवाओं के लिए घुमक्कड होने की प्रस्थान प्रेरणा है, इसलिए भाषा में भी वही रवानी है जो एक महान घुमक्कड की क्रियाशीलता में संचारित होती है। पुस्तक का दूसरा आलेख भगवतशरण उपाध्याय के उपन्यास कालिदास पर केन्द्रित है। विश्व कवि कालिदास के जीवन वृत्त व्यक्तित्व काव्य चेतना और युगीन इतिहास को आख्यायित करने वाला यह पहला उपन्यास है। कालिदास को वैसे कई लेखकों की कलम ने उकेरा है, लेकिन इस पुस्तक में कालिदास की सर्जनात्मक चेतना का आख्यान पूरी तन्मयता के साथ किया गया है।
पुस्तक के विभिन्न अंशों को अपनी समीक्षा में शामिल कर पुस्तक के प्रति पाठक की उत्सुकता जगाने का कार्य लेखक ने किया है और शायद समीक्षा का उद्देश्य भी यही होता है कि पुस्तक के उदात्त बिन्दुओं को समीक्षा के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाया जाए, ताकि पाठक उस पुस्तक के बारे में न सिर्फ अपनी राय तैयार कर सके, अपितु उस पुस्तक को पढने के लिए भी उत्प्रेरित हो।
अनामदास का पोथा हजारी प्रसाद द्विवेदी की बहुचर्चित पुस्तक रही है। इस पुस्तक की कलात्मकता सर्वत्र चर्चित रही है और लेखक ने अपनी समीक्षा का भाव भी उसी तरह का रखा है। उनके विचार में यह मनुष्यता के उत्कर्ष और नियति के आख्यान की कहानी है। अपनी समीक्षा में लेखक ने लिखा है कि, आचार्य द्विवेदी के उपन्यासों की गद्य संरचना इतिहास के रंगों और उसके स्थापत्य को रचने में इतनी कारगर है कि भाषा स्वयं इतिहास रच देती है। अनामदास का पोथा में भाषा सरलीकृत है। शब्द व्युत्पत्ति तदयुगीन शब्दावली और तत्त्व चिंतन परक संवादों की भाषा के माध्यम से उपनिषद युग को रचने में अनामदास का पौथा की भाषा सक्षम है।
मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास कुरु कुरु स्वाहा पर एक छोटी-सी समीक्षा पुस्तक में चौथे पाठ के रूप में शामिल है। इस समीक्षा में उत्तर आधुनिकता और शिल्प के संकेत मुखर हैं। रस की जो अन्तर्धारा यहाँ तक निरन्तर बह रही है।
निर्मल वर्मा की कहानियों आंतरिक उर्जस्विता और शिल्प की चालक शक्ति है। पुस्तक कव्वे और काला पानी पर समीक्षक की नजर बहुत पैनी है। अपनी समीक्षा में उन्होंने लिखा है कि, निर्मल वर्मा की कहानियों में अनुभव के रचना लोक को रचाने बसाने का अपना एक तंत्र है। समय के किसी अक्स पर जीवन अनुभवों को स्मृतियों के पंखों को छितरा देने की अपनी रचना प्रक्रिया है। देश-विदेश की परिधियों में अबाधित मानवीय सम्बन्धों/ स्थितियों को महसूसने/ परखने और कहने का खास अंदाज है। निर्मल वर्मा अपनी कहानियों में मानवीय सम्बन्धों के बीच जिस परतदार कोहरे को चुनते हैं कहानियों का रूप भी उसका मायावी संवाहक बन जाता है। वे शब्दों को इतना हलका,तरल और संवेदनशील बना देते हैं कि हमें लगता है कि नीचे आकाश में नवम्बर के सफेद हल्के बादलों की तरह यह शब्द हमें छूकर निकल रहे हैं ,बाहर से भीतर तक और भीतर से बाहर तक आर पार होते हुए। उनकी बिम्ब रचना की बडी तारीफ समीक्षा में की गई है। सत्येन कुमार की कहानियों के संदर्भ में वह लिखते हैं कि यथार्थ के कलात्मक रचाव का सत्येन का अपना तंत्र है, अपनी ट्रिक्स है। एक दिन कहानी में ही कथा विन्यास में अलग-अलग पात्रों व्रत्तों को इंटरफ्यूज कर देने की ट्रिक यथार्थ को नई अर्थवेत्ता दे जाती है। पदमा शर्मा के कहानी संग्रह की संप्रेषणीयता पर उन्होंने विस्तार से बात की है।
उनका एक महत्त्वपूर्ण आलेख पारस दासोत की किन्नर जीवन के संघर्षों और आकांक्षाओं को वर्णित करती लघुकथाओं पर केन्द्रित है। इन लघुकथाओं में किन्नरों की शारीरिक मानसिक पीडाओं का संवेदनशील चित्रण हुआ है। उनके भीतर भी स्त्री पुरुष जैसी आकांक्षाएँ हिलोरें लेती हैउनके भीतर भी मातृवत्सलता की चाहत होती है। इन सारे बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा करने के कारण यह इस पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण आलेख बना है। धर्मपाल अकेला के नाट्य कर्म पर एक विस्तृत आलेख पुस्तक में समाहित है और इसमें लेखक की समीक्षा दृष्टि चमत्कृत करने वाली है। साहित्य की विभिन्न विधाओं पर इतनी उत्कृष्टता के साथ समीक्षा करने का कार्य जब किसी समीक्षक के द्वारा किया जाता है, तो वह पुस्तक समीक्षा जगत के लिए एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक के रूप में प्रस्तुत हो जाती है। ललित निबन्धों के क्षेत्र में नर्मदाप्रसाद उपाध्याय का नाम सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाम है उनकी नवीन पुस्तक आस्था और अमृत पर एक उत्सव पूर्ण टिप्पणी समीक्षक महोदय के द्वारा की गई है। उन्होंने लिखा है कि उपाध्याय जी के यह निबन्ध हमारी सांस्कृतिकता के अन्तरंग प्रकाश के चितेरे हैं। इनमें जितना भावात्मक इतिहास अपने चैतन्य को बिखेरता है समसामयिक चेतना से उनका सरोकार भी उतना ही गहरा होता है । यह निबन्ध अर्थ की उन तहों से निर्मित हैं जिनमें पौराणिक ऐतिहासिकता छिटक कर आती है। शब्द रंगों के रसायन से शब्द चित्र लिपि में आकार लेते हैं, स्थूल अर्थ दर्शन की ओर ले जाते हैं, संस्कृति नदी के प्रवाह की तरह आदि तीर्थ से तरंगायित होते हुए समकालीन यथार्थ का परस करती हैं। आँचलिक राग रंगों के साथ संस्कृत वाङमय की तत्समता जीवन दर्शन से गठबन्धन करती है। प्रतीक और मिथक नई व्याख्याओं के ललित भाव को स्पंदित करते हैं।
पिलकेन्द्र अरोरा और शशांक दुबे के व्यंग्य संग्रहों पर समीक्षा टिप्पणियाँ भी इस पुस्तक में शामिल है। सैयद अमिर अली मीर के खण्डकाव्य बूढे का ब्याह पर एक विस्तृत आलेख पुस्तक में शामिल है। धर्मवीर भारती की कनुप्रिया पर एक विस्तृत दृष्टिकोण पुस्तक में शामिल है। स्वर्गीय कुंजबिहारी पाण्डेय के मंचीय हास्य व्यंग्य पर एक यथार्थ परक टिप्पणी मंच की कविताओं पर एक विस्तृत दृष्टि के रूप में अभिव्यक्त होती है। समीक्षक महोदय की राय में यह कविताएँ लोक पीडा, लोक जीवन और सांस्कृतिक अनुराग से पगी हैं जिनमें लोकतांत्रिक मूल्यों और आम आदमी की ताकत को परोसा गया है। कविताओं का यह मंचीय रूप अपने समय और जीवन का ऐतिहासिक प्रतिबिंब ही नह बना है, उनमें आज का प्रतिबोध भी मौजूद है। जयकुमार जलज, प्रकाश उप्पल एवं दुर्गा प्रसाद झाला के काव्य संसार पर तीन विस्तृत टिप्पणियाँ पुस्तक में शामिल हैं । यह तीनों कवि समकालीन साहित्य के महत्त्वपूर्ण कवि हैं और इनकी कविताओं पर समालोचनात्मक आलेख को पढना उन कविताओं से रूबरू होना है। उनके भीतर जो शिल्प छुपा हुआ है वह पाठक के समक्ष इन आलेखों के माध्यम से उजागर होता है। देवेंद्र दीपक और कृष्ण कमलेश भी अपने कालखण्ड के महत्त्वपूर्ण कवि के रूप में सामने आए हैं। उनकी कविताओं पर भी लेखक ने चर्चा की है और उनकी पुस्तक की समीक्षा की है। समकालीन समय में इन पाँच कवियों की कविताओं पर एक साथ पढना अपने आप में एक अनूठा अनुभव है।
वीणा पत्रिका के संपादक राकेश शर्मा का कविता संग्रह स्त्री और समुद्र सामने आया है और उस संग्रह के ऊपर विस्तार से लिखा गया है। इन कविताओं में सांस्कृतिक चेतना और आधुनिक कविता का स्पंदन स्पष्ट रूप से महसूस होता है।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी कविताओं को जीवन से जोडा है, वहीं बालकृष्ण शर्मा नवीन की कविता क्रांतिकारी सोच और राष्ट्रीय अस्मिता की कविता है । कवि प्रदीप अपने साहित्य गीतों के माध्यम से नवीन युगबोध की झंकार प्रस्तुत करते हैं। कविताओं की इस त्रिवेणी पर तीन महत्त्वपूर्ण आलेख पुस्तक में शामिल हैं जो कविता की तीन दिशाओं को इंगित करते हैं। बटुक चतुर्वेदी भी अपने कालखण्ड के महत्त्वपूर्ण कवि रहे हैं और उनकी कविताओं पर भी एक विस्तृत आलेख पुस्तक में शामिल है।
डॉ. देवराज उपाध्याय, डॉ.कृष्ण कुमार शर्मा के व्यक्तित्व और कृतित्त्व पर दो महत्त्वपूर्ण आलेख पुस्तक में शामिल हैं। यह दोनों समालोचक अपने समय के वैज्ञानिक समालोचना करने वाले व्यक्तित्व रहे हैं और इन पर पुस्तक में आलेख शामिल कर सृजन के अन्तर्पाठ को समग्रता प्रदान की गई है।
हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के व्यंग्य संसार पर दो महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ पुस्तक में शामिल हैं जो दो विभिन्न व्यंग्य दृष्टियों पर विस्तार से पाठक को जानकारी प्रदान करती है। मालवा के सहृदय कथाकार और बहुआयामी लेखक सूर्यकांत नागर के व्यक्तित्व और उनके कथा साहित्य पर एक महत्त्वपूर्ण आलेख पुस्तक में शामिल कर मालवा के परिदृश्य पर विस्तार से कहने का काम किया गया है एक साक्षात्कार डॉ शिवसहाय पाठक से किया गया था जो इस पुस्तक में शामिल है। हिंदी के साथ हिंदुस्तानी लय के और मालवी आबोहवा के तरक्की पसन्द शायर महमूद जकी पर आलेख शामिल कर हिंदी गजल और उर्दू गजल के बीच की तहजीब पर विस्तार से बात की गई है जो इस पुस्तक को समग्रता प्रदान करने का काम महसूस होता है।
सारी समीक्षाएँ कृति केंद्रित हैं। अनेक विधाओं की कृतियों को पुस्तक में शामिल किया गया है। महावीर प्रसाद द्विवेदी के काल से लेकर समकाल तक की कृतियों से समीक्षा का कालमान साहित्य यात्रा के बदलावों को रेखांकित करता है। समालोचनाओं को एक स्थान पर लेकर आने वाली यह पुस्तक बहुआयामी पुस्तक है तथा इसमें आरोप लगाने के नजरिए के बनिस्बत पुस्तक के सृजन अनुभव पर लिखा गया है जो उसके मूल्यवान होने की ओर इंगित करता है। इन समीक्षाओं में जीवन के अनुभव और समाजशास्त्र के प्रति लेखक का दृष्टिकोण सामने आता है। समीक्षाओं की भाषा बहुत प्रांजल है और पाठक इनको पढने में आनंद महसूस करता है।

पुस्तक का नाम : सृजन का अन्तर्पाठ (रचनात्मक समीक्षा) :
लेखक : बी एल आच्छा
प्रकाशक : रचना प्रकाशन चांदपोल बाजार, जयपुर 302001
प्रकाशन वर्ष : 2021
विधा : समीक्षा
मूल्य : 109/-
सम्पर्क - आर 451, महालक्ष्मी नगर,
इन्दौर 452010
मो .9425067204