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मिट्टी की सौंधी-सी महक लिए सुगढ कहानियाँ

गोपाल माथुर
हिन्दी और राजस्थानी ने विख्यात कथाकार श्री श्याम जांगिड के कहानी संग्रह मेरी चयनित कहानियाँ शीर्षक से ही स्पष्ट हो रहा है कि ये लेखक की चयनित कहानियाँ हैं, अतः पढने पूर्व ही यह भूमिका स्वतः ही बन गई थी कि मुझे उनकी बेहतरीन कहानियाँ पढने को मिलने वाली हैं। जैसे जैसे आगे बढता गया, यह धारण पुष्ट होती चली गई। श्याम जांगिड एक बेहतरीन कथा शिल्पी हैं। उनका कहानी कहने का अपना ढंग है, जो उन्हें लकीर से हट कर खडा कर देता है। वे छोटे बडे सभी उन विषयों पर अपनी कलम चलाते हैं, जो मनुष्य के आन्तरिक संवेदनाओं से गहरे जुडे होते हैं। सामान्यतः तेजी से बदलते घटनाक्रम से उन्हें कोई विशेष दिलचस्पी नह है, जबकि वे साधारण सी महसूस होने वाली घटना को अपनी कलम के जादू से असाधारण बना देते हैं। इस प्रकार का लेखन कोई आसान काम नह होता, जब कहानी कथ्य के भार से मुक्त होकर भी कही जा सके।
उनकी भाषा में आंचलिकता का गहरा पुट है। वे सीधे जमीन से जुडी हुई हैं। आलंकारिक भाषा के स्थान पर वे भावों को प्रधानता देते हैं। उनकी कहानियों में माटी की सौंधी महक बसी हुई है। पढते ही इन कहानियों में पाठक से कनेक्ट हो जाने की अद्भुत तासीर गुँथी हुई है। वे अपने आस-पास घटित घटनाओं को अपनी कहानियों का कथ्य बनाते हैं। परिचित परिवेश ही वह कारण है जो कहानियों को दूसरी नह होने देता। सहज अभिव्यक्ति इन कहानियों का एक बडा गुण है, जो इन्हें अलग से रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है। किसी भी प्रकार के मानसिक व्यायाम से दूर ये कहानियाँ आफ अपने अनुभव होने का पुख्ता सबूत प्रस्तुत करती हैं।
श्यामजी की कहानियों में कथा का प्रवाह अद्भुत बन पडा है। किसी पहाडी झरने-सी वे स्वतः बहती चलती ही नह हैं, वे अपने साथ पाठक को भी बहा ले जाने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। लेखक शिल्पगत प्रयोगों के झमेले में पडे बिना अपनी बात इतनी सहजता और खूबसूरती से कहते हैं, मानो वह कहन उस कहानी के लिए ही बना हो। कहानियों का प्रभाव बहुत दूर तक महसूस किया जा सकता है। एक बार पढने के उपरान्त इन्हें आसानी से भुलाया नह जा सकता।
ये कहानियाँ जीवनानुभवों के रूपान्तरण हुई सुन्दर कथाएँ हैं, चाहे वह प्रेम हो, वेदना हो, गहरा सौन्दर्यबोध हो या और कुछ। श्यामजी अनेक अहसासातों के बीच छूटी हुई स्पेस ढूँढने के एक सिद्धहस्त कथाकार हैं। वे प्रायः उन स्थानों पर अपनी अँगुली रखते हैं, जिन्हें हम जीवन की आपाधापी में खो देते हैं। वे गम्भीर, दार्शनिक बातें कहने में अधिक विश्वास नह रखते, बल्कि ठीक इसके विपरीत रोजमर्रा की सामान्य-सी प्रतीत हो रही घटनाओं को अपनी कहानियों में कहना पसन्द करते हैं। दुरूहता से दूर-दूर तक उनका कोई वास्ता नह है। बल्कि एक सुगमता है, जो पढने वाले को मन्त्रमुग्ध कर देती है।
उदाहरण के लिए पिकनिक कहानी में एक चिडा चिडी का रूपक नायक नायिका और उनके बच्चों से सीधे जुडा हुआ है। तिनकों घौंसलों से प्रारम्भ हुई यह कहानी का निर्वाह लेखक ने अन्त तक इतनी सुन्दरता से किया है कि स्वतः ही मुँह से वाह निकल पडता है। माता-पिता हों या चिडा-चिडी, घर हो या घौंसला, बच्चे हों या चूजे, संवेदनाएँ सबमें समान और नैसर्गिक रूप से उपस्थित होती हैं। लेखक ने यही अभिव्यक्त करने का सुन्दर प्रयास किया है।
इसी प्रकार उसका खत भी एक बेहतरीन कहानी है, जिसमें नायिका अपने पति के खत की प्रतीक्षा बेसब्री से किया करती है। वह नह जानती कि उसके पति को जिहादी बना दिया गया था। डाकिया रोज आता है, पर उसके महबूब का खत नह आता। एक दिन पता चलता है कि उसे मानव बम बनने के लिए जबरन बाध्य किया गया था। अब उस टेकरी पर कोई नह रहता जो डाकिए से पूछे कि उसका खत आया कि नह ! यह कहानी मानवीय करुणा को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत करती है और वह भी बिना भावनाओं के अतिरेक के। घाटी में पसरी दहशतगर्दी का संकेतों में इस कहानी में बहुत मार्मिक चित्रण किया गया है। एक संवेदनशील पाठक का मन भिगोने के लिए यह कहानी पर्याप्त है।
संग्रह की पहली कहानी तुम कहाँ हो प्रिय अपनी तरह की एक अलग ही कहानी है। महज कुछ पलों की कथा, जिसमें दो अलग अलग दिशाओें में जाती ट्रेनों के बीच रेल्वे प्लेटफॉर्म पसरा हुआ है। उन दो ट्रेनों में नायक नायिका बैठे हुए हैं, जिनका दूर से क्षणिक, धूमिल सा साक्षात्कार होता है। घटित कुछ भी नह होता, लेकिन दोनों के बीच एक तार सा जुड जाता है, जिसे पाठक भी शिद्दत से महसूस करते हैं। एक लगभग कथाविहीन कथानक पर यह कहानी अपने पूरे वैभव के साथ खडी हुई है।
यदि यहाँ मैं प्रेम गीत का आखिरी अन्तरा का जिक्र नह करूँगा, तो यह एक प्रकार की हिंसा होगी। यह एक बेहतरीन प्रेम कथा है, जो बिना विस्तार लिए, बिना लम्बे चौडे घटनाक्रम के प्रेम की प्राणप्रतिष्ठा करती है। यदि इन्सान में संवेदनाएँ मर जाएँ, तो वह इन्सान ही क्या हुआ ! नायिका विवाह के वर्षों बाद भी अपने पुराने आत्मीय प्रेमिल सम्बन्धों को मान देती है, और वह भी नायक पर बिना कोई अहसान जताए ! यह मन में चल रहे अन्तर्द्वन्द्वों की एक श्रेष्ठ कथा कही जा सकती है।
दुविधा भी अपनी तरह की एक अलग कहानी है। आज के विचित्र समय में, कौन सास-सुसर अपने बेटे की परित्यक्ता पत्नी और पोते का साथ देता हैं ! लेकिन इस कहानी में ऐसा ही है। यह कहानी मानवीय रिश्तों को एक अलग ही धरातल पर स्थापित करती है, जहाँ अर्जित किए रिश्ते खून के रिश्ते पर भारी पड जाते हैं। और वह भी इतने स्वाभाविक तरीके से कि पाठक को कुछ भी विचित्र नह लगता। इस कहानी का फलक अन्य कहानियों की तुलना में विस्तृत है, जो एक कालखण्ड से पसर कर दूसरे, तीसरे कालखण्ड तक चला गया है। यह एक स्मृति में ठहर जाने वाली कहानी है।
इन कहानियों के अतिरिक्त मेम साहब, दूसरी बार और नाटक कहानियाँ भी गहरा प्रभाव छोडती हैं। श्याम जी अपनी सधी भाषा में पात्रों को जिस सहजता से उकेरते हैं, वह विन्यास चकित कर देता है। उनकी कहानियाँ कई स्थलों पर चौंकाती भी हैं, पर हतप्रभ नह छोडतीं। लेखक को मर्म पर अपनी अँगुली रखना अच्छी तरह आता है। और जहाँ वे अँगुली रखते हैं, ठीक उसी जगह पाठक की संवेदना भी साँस ले रही होती है। यही कारण है कि ये कहानियाँ पाठक को अपने अनुभवों के इर्द गिर्द महसूस होती हैं।
श्यामजी ने उन घटनाओं को अपनी कहानियों का विषय बनाया है, जिन्हें प्रायः हम नोटिस भी नह लेते, जैसे प्लेटफॉर्म के दोनों ओर दो ट्रेनों में महज कुछ पलों के लिए दो यात्रियों का एक-दूसरे को देखना, खत की प्रतीक्षा में बेकली, घर के सामने से गुजर रही गाडी में बैठी महिला के अप्रतिम सौन्दर्य से अभिभूत हो जाना।।। लेखक कहानियों के प्रचलित कथ्यों से पूरी तरह परहेज करते हैं और उन कथ्यों पर अपनी कलम चलाते हैं, जो सामान्यतः अछूते हैं। इन कहानियों की पठनीयता गजब की है। यह एक चमत्कार सा लगता है कि अपरिचित भूमि पर हल चला कर ऐसी फसल उगा दी जाए, जो पहले कभी संसार में थी ही नह !

पुस्तक का नाम : मेरी चयनित कहानियाँ
लेखक : श्याम जांगिड
प्रकाशक : श्रीसाहित्य प्रकाशन, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2022
मूल्य : 450/-
विधा : कहानी संग्रह
सम्पर्क - जी-111, जी ब्लॉक, माकडवाली रोड,
अजमेर- ३०५००४
मो. ९८२९१८२३२०