fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

कैलाश वाजपेयी का समग्र विवेचन

शुभा श्रीवास्तव
अपने पाठ और पाठ्य बल में कैलाश वाजपेयी हमेशा अद्वितीय रहे हैं। तीसरा अँधेरा, भविष्य घट रहा है, सूफीनामा, हंस अकेला इत्यादि कविता संग्रहों के माध्यम से हिन्दी की अभूतपूर्व सेवा करने वाले कैलाश वाजपेयी पर कार्य करने का साहस डॉ. ओम निश्चल जैसे सुधी समीक्षक ने किया है। साहित्य अकादमी से प्रकाशित भारतीय साहित्य के निर्माताः कैलाश वाजपेयी डॉ. ओम निश्चल की सद्यः प्रकाशित पुस्तक(विनिबन्ध) है जो कैलाश वाजपेयी के व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व को सम्पूर्णता से देखती है। पहला अध्याय जीवन और कवि व्यक्तित्व कैलाश वाजपेयी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को कविता के रंगों में डुबोकर अभिव्यक्त करता हुआ उनका चित्र बनाता है, तो इसके बाद आठ अध्यायों में कैलाश वाजपेयी के कवि, गद्यकार और काव्यालोचक रूप में उनकी स्थापनाओं पर प्रकाश डालता है।
कैलाश वाजपेयी संस्कृति और परम्परा के गहरे बोध से जुडे रचनाकार रहे हैं, इसीलिए उन पर समय समय पर मृणाल पाण्डे, गंगाप्रसाद विमल इत्यादि लेखकों ने भी अपना दृष्टिकोण रखा है। इस दृष्टिकोण का सही व ससमय उपयोग ओम निश्चल करते हैं। मंगलेश डबराल के एक वक्तव्य को उदधृत करते हुए पुस्तक में कहा गया है कि आँख भी ना बन्द हो और यह दुनिया आँखों से ओझल हो जाए ऐसी कविता है जो मृत्यु और अस्तित्त्व के परदे से जीवन और अस्तित्व को देखती है और बाहरी से ज्यादा आन्तरिक जीवन का ध्यान करती है। इस कथन से प्रारम्भ करते हुए ओम निश्चल कैलाशजी के काव्य में दर्शन तत्त्व को इतनी खूबसूरती से पाठक के समक्ष प्रस्तुत करते हैं कि हर तत्त्व का भीतरी रेशा तक प्रत्यक्ष उपस्थित हो जाता है।
कैलाशजी ऐसे आधुनिक रहस्यवादी कवि रहे हैं जो आसानी से समझ नह आते हैं, जब तक पाठक उन्हें भारतीय परम्परा से उन्हें जोड कर न देखे। कवि की रचनाओं से गुजरते हुए ओम निश्चल के मन में भी अनेकानेक प्रश्न उठते रहते हैं। इन प्रश्नों को उन्होंने बडी खूबसूरती से पुस्तक में रखा है। वह कहते हैं कि क्या कारण है कि उनकी कविता जीवन यथार्थ को गहराई से आलोकित करने वाली नैराश्य, मृत्युबोध एवं कतिपय सन्दर्भों दुरबोध प्रतितियों से आवेष्ठित है और उसमें लालित्य पूर्ण अभिव्यक्तियाँ प्रायः अलक्षित रहीं इन प्रश्नों से गुजरने के साथ उस काव्याँश को व्याख्यायित भी करते चलना ओमजी का निजी वैशिष्ट्य है।
कैलाश जी की कविताओं को समझे बगैर उन्हें निषेध एवं अस्वीकार का कवि मान लिया गया था। उनकी सामाजिक अर्थवत्ता को समझे बिना हिंदी आलोचना हमेशा उनके बगल से गुजर गई। उनकी रचनाओं में अस्तित्त्ववाद आदि के कारण कविताओं का सम्यक मूल्याँकन नह हुआ, परन्तु ओम निश्चल की यह पुस्तक इस कमी को पूर्ण ही नह करती बल्कि बताती है कि की कैलाश वाजपेयी निषेध और अस्वीकार के कवि नह बल्कि जीवन और राग के कवि हैं।
स्पष्ट है कि उनकी कविताओं में भारतीय और पाश्चात्य विचारधारा, आर्ष ग्रन्थों, मिथकों और अख्यायिकाओं का विपुल अध्ययन चिन्तन समाहित है। जितना वह परम्परा की धारा से जुडे हैं उतना ही वह वर्तमान और आगामी समय के चिन्तन को भी सामने रखते हैं। संक्रांत संग्रह की व्याख्या करते हुए ओम निश्चल इनकी अग्रगामी सोच को सामने रखते हैं और कहते हैं कि -सांप्रदायिकता के आधार पर विभाजित इस देश में दो तरह का विधि विधान आगे की वर्षों में कितनी जटिल समस्या बन जाएगा इसकी उन्होंने कल्पना भी नह की होगी। साठोत्तरी मोहभंग के जरिए यथार्थ की पडताल कैलाश वाजपेयी ने अपने संग्रह देहांत से हटकर में की है। देश एक शोक गीत इस संग्रह की श्रेष्ठ रचना है। ओम निश्चल कहते हैं कि कैलाश वाजपेयी के यहाँ वर्तमान सत्ता व शासन के विरुद्ध पैदा होते हालात की अभिव्यक्ति एक साथ है। जाहिर है कि ओम जी की दृष्टि संग्रह की मूल संवेदना की ओर गई और एक ही वाक्य में संग्रह की विशेषता को बता दिया। समीक्षा और समीक्षक का यह गुण सराहनीय है।
कवि अपने जीवन में अनेक लोगों से प्रभावित होता है। विदेशी कवियों का कैलाश वाजपेयी पर बहुत प्रभाव रहा है। संत्रास, अजनबी, ऊब, अकेलापन जैसी स्थितियाँ उनकी कविताओं में बहुत दिखते हैं। दहशत नामक कविता इसका श्रेष्ठ उदाहरण है वह कहते हैं कि -
रोज एक गाँधी सुकरात और ईशा के
वध से भयभीत मैं
बृहन्नला भीड में
किसको आवाज दूँ
जो मेरी आँतों में घाव करती है
ऐसी रोटी का क्या करूँ
कवि की यथार्थ दुनिया के साथ ही एक ऐसी दुनिया होती है जो उसकी कल्पना में होती है। तीसरा अँधेरा कविता इसी का पर्याय है। ओम निश्चल कहते हैं कि-तीसरा अँधेरा सहित अनेक कविताएँ ऐसी हैं जिनमें तीसरी दुनिया के भीतरी अक्स मिलते हैं। विवाहिता, वह 21वीं शताब्दी, पाप और परम्परा आदि अनेक कविताएँ इसी प्रकार की हैं। आखिरी कविता नामकरण उन बुद्धिजीवियों की कलई खोल कर रख देती है जिसका काम था सिर्फ ताली बजाना।
भारतीय दर्शन और चिन्तन तथा पाश्चात्य वैचारिकी में निपुण कैलाश वाजपेयी भारतीय संस्कृति को एक छाया के रूप में देखते थे और सूफी मिजाज भी उनके भीतर विद्यमान रहता था। सूफीनामा में अपने इन तत्त्वों के साथ ही वे समसामयिक मुद्दों से नियत और सार्वभौमिक सत्य की ओर जाते हैं। जीवन और प्रकृति अद्यतन सत्य है। इसका विनाश प्रत्येक व्यक्ति की चिन्ता में समाहित है। कैलाश वाजपेयी भी उन्हीं चिन्तापुर लोगों में शामिल है। जो कहते हैं कि -
ईमान धर्म तो कोई था नह
छेद किए हमने लाखों सुराख आसमान में
हमें कोई हक नह तेरा कहलाने का
कवि की पीडा के साथ ही वर्तमान समय की पीडा को ओम निश्चल ने बखूबी पहचाना है और कविता की पडताल करते हुए बताते हैं कि - कवि को साफ दिख रहा था कि मनुष्य का भविष्य यांत्रिक मशीनीकरण और अणु बम के आविष्कार के युग में अच्छा नह है। वह दिनों दिन घट रहा है, मूल्यों का क्षरण हो रहा है किंतु इसका समाधान एक आशावादी नोट के साथ कैलाश वाजपेयी करते हैं और कहते हैं कि
होकर निबद्ध फिर फिर उतर आएगा
पृथ्वी बच जाएगी
मैं रहूँ न रहूँ फर्क क्या
भविष्य घट रहा है संग्रह के ब्लर्ब में भी लिखा हुआ है कि यांत्रिकता और मनुष्यता के बीच भासमान विद्रूप को रेखांकित करती उनकी रचनाओं में भवितव्यता का संकेत भी विद्यमान थे। कहना न होगा कि लय,ध्वनि और व्यंजनों की अर्थ गरिमा से संपन्न कैलाशजी की इस संग्रह की कविताएँ अपने ही बनाए औजारों से आहत एक नितान्त अजनबी जीवन जीने के लिए अभिशप्त आज के आदमी की सर्वहारा छटपटाहट का दस्तावेज हैं। कैलाश जी के दार्शनिक चिन्तन को देखते हुए ओम निश्चल ने उनके महत्त्वपूर्ण पदों और प्रत्ययों के आधार पर उनकी तुलना उन्होंने कबीर और संत परम्परा से की तथा इसके साथ ही उनकी सूची में एतदविषयक जाँच की व्यापक चर्चा यहाँ भी विद्यमान है।
भारतीय चिन्तन और कैलाश वाजपेयी को इस पुस्तक के सर्वश्रेष्ठ अध्याय के रूप में देखा जा सकता है। कैलाश वाजपेयी के तत्त्व चिन्तन की चर्चा करते हुए उपनिषद, दर्शन, भक्ति, अस्तित्त्व इन सबके समावेशन के आधार पर कैलाश की कविता के मूल तत्त्व को ओम निश्चल में विस्तार से व्याख्यायित किया है। उनके निबन्धों में भी यह तत्त्व विद्यमान है। ओम निश्चल मानते हैं कि कैलाश जी की जडें जितनी परम्परा में हैं उतनी ही आधुनिकता में भी हैं । कैलाशजी के निबन्धों में आयुर्वेद के प्रणेता धनवंतरि, तुलसीदास, पाणिनि, सरहपा, गोरखनाथ इन सब का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसीलिए ओम निश्चल कहते हैं कि- कैलाश वाजपेयी की गति और मति भारतीय प्रज्ञा के पारंपरिक और सनातन स्रोतों में थी। भारत सदियों से विश्व गुरु रहा है। कम से कम धर्म, अध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र में इसकी प्रभुत्व असंदिग्ध है।
कहना न होगा कि वाजपेयी ने न केवल भारतीय वाङमय को साधा बल्कि विश्व के विपुल साहित्य का भी अध्ययन किया था । विश्व के अनेक दार्शनिकों ने भी उनका मन छुआ। उन पर स्थितवादी विचारधारा का कवि होने का लेबल भी लगाया जाता रहा है। किन्तु भारतीय विश्व चिन्तन के सारे मूलभूत तत्त्व उनके संगी हैं, विचारों का मधुसंचय हैं। उनकी कविताओं में जो टूटे हुए अक्षरों का विलाप ध्वनित होता है, दम तोडती शताब्दी नजर आती है, वह कहीं ना कहीं उन्हें इस समय का द्रष्टा कवि बनाता है।
ओम निश्चल यह जानते हैं कि कैलाश जहाँ अपनी परम्परा में गहरे से जुडे हुए हैं वही आधुनिकता से भी आप्लावित है। नया से नया चिन्तन वह ग्रहण करते थे। ओम निश्चल बताते हैं कि कैलाश वाजपेयी उस पीढी के कवि हैं जो मूल्यों की लीक पर चलने वाली है। इन मूल्यों के संधान के लिए वाजपेयी को मिथकों की राह अपनानी पडी तथा पृथ्वी का कृष्ण पक्ष और डूबा-सा अनडूबा तारा जैसा काव्य रचा। कैलाश वाजपेयी की कविता की राह कोई रोमाँटिक और लालित्य का पथ बुहारने वाली न थी उसमें माक्र्स भी समा सकते थे और गाँधी भी, सार्त* भी और कणाद भी, बुध भी और जे कृष्णमूर्ति भी। एक कवि और चिन्तक के रूप में हिंदी में उनकी एक अविस्मरणीय जगह है। निसंदेह कैलाशजी के मूल कर्म पर ओम निश्चल की यह टिप्पणी कैलाश के सम्पूर्ण व्यक्ति के साथ ही कृतित्त्व को भी पाठकों के समक्ष खोल कर रख देती है।
कैलाश वाजपेयी एक चिन्तक के रूप में भारत की अस्मिता को प्रस्तुत करने वाले लेखक के रूप में जाने जाते हैं। भारत की अस्मिता नामक लेख में उन्होंने नदियों के लिए एक पूरा का पूरा मंगलाचरण प्रस्तुत किया है। भारत के सन्दर्भ में कैलाश वाजपेयी कहते हैं कि यह देश हठीला नह लचीला है, तोडने नह जोडने का पक्षपाती है, विविधता में एकता है। लगभग 20 भाषाएँ बोलता है यह देश और सैकडों बोलियाँ, 56 तरह के स्वाद हैं और यह 64 प्रकार की कलाएँ, सैकडों तरह की पोशाके पहनता है और हजारों तरह के खेल खेलता है। फिर ध्यान, धारणा, आसन. प्रत्याहार करता हुआ योग साधना देता है। जाहिर-सी बात है भारतीयता के मूल तत्त्व से गुजरते हुए कैलाश वाजपेयी का व्यक्तित्व ऐसे विरल कवि चिन्तक का है जो समय और समाज को उसके मूल और उद्गम से देखते हैं, परायेपन के अहसास के साथ नह। ऐसे कवि पर पुस्तक लिख कर ओम निश्चल ने निश्चय ही हिंदी की आलोचना परम्परा को आगे बढाया है।

पुस्तक का नाम : भारतीय साहित्य के निर्माताः कैलाश वाजपेयी
लेखक : ओम निश्चल
प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 50 रूपये
विधा : निबन्ध

सम्पर्क - गुरुकृपा, आश्वीं निकुन्ज,
शि0 3/1-एस-ए-25, विश्वनाथ कॉलोनी,
मीरापुर बसहीं, शिवपुर, वाराणसी(उप्र)
फोनः 9455392568