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सृजन प्रक्रिया : कुछ नोट्स

- ब्रजरतन जोशी
सूजन एक मानसिक क्रिया है। प्रायः सृजन को निर्माण के सन्दर्भ से जोडा, देखा एवं समझा जाता है, पर निर्माण और सृजन में अन्तर यह है कि जहाँ सृजन के मूल में मौलिकता होती है, वही निर्माण के मूल में मौलिकता हो यह जरूरी नहीं है। निर्माण तो किसी ज्ञात ज्ञान से भी संभव है, लेकिन सृजन का सम्बन्ध अज्ञात से है। जिसे खोज की प्रक्रिया में ज्ञात करना होता है। सृजन का सम्बन्ध व्यैक्तिक प्रतिभा और निरन्तर प्रशिक्षण से जुडा है। यह संसार जिसमें जीवन अपनी उर्वरता से पल्लवित हो रहा है, का भी सृजन से गहरा सम्बन्ध है। क्योंकि कोईभी सृजन अप्रयोजनीय नहीं होता। अतः सृजन प्रक्रिया संसार के प्रांगण में विकसित होती संस्कृति और समाज से गहरी निबद्ध रहती है। संसार अपने आप में बडा पद है। संसार का शाब्दिक अर्थ है संसरति इति संसारः अर्थात् जो निरन्तर संसरणशील हो, गतिमान हो वही संसार है। सृजन भी एक निरन्तर चलने वाली गत्यात्मक प्रक्रिया है। भाषादर्शन की दृष्टि से संसार की जो व्याख्या की जाती है, उसके अनुसार यह संसार वाक और श्रुति के सम्बन्ध की अभिव्यक्ति है। नित्य जीवन में जिन दृश्यों को हम देखते हैं वे वाक और श्रुति की संयुक्त क्रिया का प्रत्यक्ष परिणाम होते हैं। अतः यह जो दृश्यता है वही रूप के निमित्त होकर हमारे सामने प्रकट होती है। दर्शन में इसी को रूप कहा जाता है।
वाक और श्रुति अपने रूप के साथ दृष्टि से युक्त होकर स्मृति को बनाते हैं। सामान्य व्यवहार में जिसे हम मन कहते हैं वह वाक, श्रुति और दृष्टि का संयुक्त परिणाम है। हमारी ज्ञान परम्परा में मन का एक पर्याय मति भी है। ध्यान रहे कि मन और मति दोनों की व्युत्पत्ति एक ही धातु से हुई है। इसी प्रक्रिया में मति तत्त्व के बाद हमारे अन्तर्लोक में धृति का उदय होता है। हालाँकि धृति भी मन के ही एक आयाम की अभिव्यक्ति है,लेकिन यह आयाम मन को गत्यात्मक बनाता है और इसी के सहकार से सृजन की प्रक्रिया में मन लक्ष्योन्मुक्त होता है।
अस्तु, हम कह सकते हैं कि सृजन की प्रक्रिया के समय हमारा मन मुख्यतः छह घटकों का एक संयुक्त क्षेत्र बन जाता है जिसमें क्रमशः वाक, श्रुति, दृष्टि, स्मृति, मति और धृति शामिल होते हैं। शब्द मन की साकार अभिव्यक्ति है। अतः स्पष्ट है कि मन को जानने-समझने की प्रक्रिया में हम अपने देखे, सुने को अपने स्मृति कोश में जमा करते हैं। सृजन में उसी को साझा किया जाता है। स्मृति में जो भी एकत्र होता है वह हमारा अपना ही देखा, जाना, सुना और समझा गया होता है। अपनी रचना प्रक्रिया के दौरान रचनाकार उसी में से चयन कर स्वयं के अर्जित अनुभव के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को हमारे साथ साझा करता है। इस प्रक्रिया में श्रुति और दृष्टि के पश्चात् स्मृति की निरन्तरता में सृजन प्रक्रिया गतिमान होती है।

यह तो हम जानते ही हैं कि साहित्य शब्द की व्युत्पत्ति धा से हुई है। धा यानी हित, धारण करना अर्थात् शब्द-अर्थ को सम्यक रूप से भाव रूप में धारण करना। हम यह भी जानते हैं कि साहित्य अपनी स्वभाव और प्रकृति से ही काल का अतिक्रमण करता रहता है और अपनी उदातता के चलते वह संवेदना के बल पर सार्वकालिक या सार्वभौमिक महत्त्व को अर्जित करता है। क्योंकि साहित्य न केवल अपने समय से संवाद ही करता है बल्कि उसमें हस्तक्षेप करते हुए जीवन का आलोचनात्मक परीक्षण करता है। इसी कारण साहित्य में समय-समय पर उठे प्रश्न, वेदनाएँ और चिन्तन निरन्तर जीवन्त बने रहते हैं और उनका महत्त्व भी सार्वकालिक बना रहता है।
अब यहाँ गौर करने लायक एक अहम तथ्य यह भी है कि श्रेष्ठ साहित्य या कहें उदात्त दृष्टि सम्पन्न साहित्य चूँकि अपनी प्रकृति में उपदेशपरक नहीं होता बल्कि वह संकेत कर के हमारे संवेदन तन्त्र को झंकृत कर देता है। अपनी संरचना में विचार और लय की अद्भुत व्याप्ति और संगति के चलते वह भाव लालित्य से सम्पन्न होकर सर्वजन संवेद्य बन जाता है। यह सर्वजन संवेद्य होना ही सर्जनात्मकता है। यानी सर्जनात्मकता साहित्य का सर्वोपरि और अहम लक्षण होकर हमारे सामने प्रकट होता है। सृजन की इसी प्रक्रिया से हमें यह भी विदित होता है कि लेखन और सृजन में पर्याप्त अन्तर है। अर्थात् हम समस्त लेखन को सर्जनात्मक साहित्य की श्रेणी में नहीं रख सकते।
सर्जनात्मकता अगर साहित्य का प्राथमिक लक्षण है, तो संवेदना दूसरा महत्त्वपूर्ण लक्षण है। कोई भी सृजक अपनी अनुभूति की प्रक्रिया से उपजे विषयबोध और मर्म का निरन्तर मनन करता है और मनन की इस प्रक्रिया में फिर वह बुद्धि को शामिल करते हुए अनुभूति के अनन्त बीहड से कुछ झिलमिल करते अनुभव पजों को व्यवस्थित अभिव्यक्ति के रूप में हमारे सामने अपने कला माध्यम के जरिये अभिव्यक्त करता है। कोई भी विचार जब तक भाव स्पर्श से तरंगित नहीं होता, तब तक वह पूर्ण नहीं हो पाता। यह पूर्णता ही संवेदना है।
सृजन प्रक्रिया के दौरान समानुभूति का भी महत्त्व निर्विवाद है। रचनाकार का संवेदनशील और विवेकवान मन इसी समानुभूति से असंख्य अनुभवों में से कुछ को चुनता है और कुछ को छोड देता है। यह समानुभूति ही है जो सृजन की प्रक्रिया में रचनाकार के व्यैक्तिक सत्य को सार्वजनिक सत्य में रूपान्तरित कर देती है। यह प्रक्रिया ही किसी श्रेष्ठ सृजन को कालजयी बनाती है। इसके अभाव में रचा गया लेखन तो हो सकता है, पर सृजनात्मक लेखन नहीं माना जाता।
हर श्रेष्ठ रचनाकार अपने अनन्त आत्मभूगोल में डूबकी लगाता है और प्रयत्न करता है कि वह तलस्पर्शी गहराई को प्राप्त करे। उसके सामने मूर्त और अमूर्त दोनों ही तरह के परिक्षेत्र खुले होते हैं। वह अपनी रचनात्मक प्रक्रिया में अपने आत्म को नए अनुभव से सम्पन्न करने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता है, लेकिन उसकी रचनात्मक प्रक्रिया अपनी पूर्ण परिणति तक तभी पहुँचती है जब वह वहाँ अपने अनुभव को भाषा की सीमा और सीमान्त से परे जानकर अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया को भली-भाँति पूरा नहीं कर लेता। अगर वह ऐसा करने में कामयाब होता है, तो वह एक कालजयी या कहें उदात्त साहित्य की सृष्टि में सफल होता है, जिसकी सार्थकता निरन्तर बनी रहती है। लेकिन किन्हीं कारणों से वह इस प्रविधि को पूर्ण नहीं कर पाता, तब भी जो अनुभव कण उसके परिक्षेत्र में आते हैं उनके माध्यम से वह एक सार्थक सृजनात्मक सृजन की ओर उन्नमुख होकर अपने प्रयत्नों को ठोस दिशा में ले जा सकने में समर्थ होता है।
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यह हिन्दी के लिए उत्सव का क्षण है कि एक सुदीर्घ अन्तराल के बाद हिन्दी के निमित्त विश्व पटल पर भारतीय लेखन की गरिमामय उपस्थिति लक्षित की गई है। पिछले दिनों गीतांजलि श्री के हिन्दी उपन्यास रेत समाधि के अनुवाद टूम ऑफ सैण्ड को अन्तरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2022 मिला। समस्त भारतीय उपमहाद्वीप के लिए यह एक अविस्मरणीय और ऐतिहासिक परिघटना है। अपने पाठकों के लिए हम इसी अंक में गीतांजलि श्री को मिले पुरस्कार और लेखन पर कुछ विशेष सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। इस हेतु हम प्रो. हरीश त्रिवेदी, अलका सरावगी, प्रियदर्शन और अरुणदेव जैसे सुख्यात साहित्य मर्मझों के आभारी हैं, जिन्होंने अत्यल्प समय में हमारे आग्रह की रक्षा की। इसके अतिरिक्त इस अंक में हमेशा की तरह आपकी सुरूचि के अनुकूल विविध प्रकार की सामग्री का संयोजन किया गया है। आशा है कि सामग्री आपको पसंद आएगी। कृपया कोविड अनुरूप व्यवहार का पालन करें और समय-समय पर राज्य एवं केन्द्र द्वारा जारी निर्देशों की पालना कर अपने नागरिक विवेक का परिचय दे। आफ मंगल भविष्य की कामना के साथ-
- ब्रजरतन जोशी