fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

आवारा मसीहा : आस्था और संवेदना की जुगलबन्दी

रमेश ऋषिकल्प
मैं अक्सर सोचता हूँ कि किसी महान व्यक्ति की जीवनी लिखने और पढने की सार्थकता क्या है? किसी भी की जीवनी क्यों पढी जाए? मैंने जब-जब भी किसी व्यक्ति की जीवनी पढी, तो पढते वक्त पाया कि मैं उस व्यक्ति की जीवनी से उन अनुभवों और उन अनुभूतियों से रूबरू हो रहा हूँ जो कहीं न कहीं हमारे सम्वेदन को पूण्र्ता प्रदान करती है। अनुभव अपने आप में एक एचीवमेन्ट या उपलब्धि होता है। मेरा मानना है कि किसी भी रचनाकार से अनुभव आने समय के साथ विशिष्ट रूप से किए गए प्रयोग होते हैं; ठीक वैसे ही जैसे कोई वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में प्रयोग करता है। रचनाकार के अपने समय के साथ किए प्रयोगों से जन्म लेने वाले ये अनुभव उसकी रचनात्मकता के स्रोत बनते हैं। इसीलिए किसी भी रचनाकार का जीवन उसकी रचनात्मकता को भी प्रमाणित करता है। शायद इसीलिए हम महान रचनाकार की जीवनी में दिलचस्पी रखते हैं। हम जानने को उत्सुक रहते हैं कि महान रचनाकार की रचना का उत्स क्या है? विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा लिखते समय इस प्रश्न को अपने ढँग से उठाया है। उन्होंने एक जगह यह प्रश्न उठाया भी है और उसका उत्तर भी दिया है। उन्होंने लिखा है कि - जीवनी क्या है? अनुभवों का श्रृंखलाबद्ध कलात्मक चयन इसमें वे ही घटनाएँ पिरोयी जाती हैं, जिनमें सम्वेदना की गहराई हो, भावों को आलोडित करने की शक्ति हो। घटनाओं का चयन लेखक किसी नीति, तर्क या दर्शन से प्रभावित होकर नहीं करता। वह गोताखोर की तरह जीवन-सागर में डूब-डूब कर मोतियाँ चुनता है। सशक्त और सच्ची सम्वेदना की हर घडी वही मोती है। यहाँ पर विचार करने वाली चीज यह है कि विष्णु प्रभाकर किसी के जीवन सागर में डूब कर जिस सच्ची सम्वेदना को हमारे सामने लाना चाहते हैं, वह उस रचनाकार की संवेदना है जो बंगला समाज के संवेदन और उसके अन्तर्द्वन्द्व को न केवल सही मायने में समझ पाया था बल्कि उसने उस समाज की तत्कालीन संरचना को भोगा भी था और तोडा भी था। आवारा मसीहा सिर्फ शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की जीवनी ही नहीं बल्कि तत्कालीन बंगला समाज, कई अर्थों में पूरे भारत के मूल्यबोध और इतिहास बोध का विशद् अध्ययन भी है। यह वह समय था जब भारतीय जीवन कईं स्तरों पर एक साथ करवट ले रहा था। बंगाल में उस समय एक तरफ रवीन्द्रनाथ टैगोर, बंगाली समाज की संवेदना को शब्द दे रहे थे, तो दूसरी तरफ शरत् बंगाली समाज की अन्दरूनी विकृतियों में से गुजर रहे थे। विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा को कला की दृष्टि से उतना नहीं लिखा जितना बंगाल की संवेदना और उसके साथ एक लेखक के रिश्ते को समझने के लिए लिखा है। भले ही माध्यम शरत्चन्द्र का जीवन ही रहा हो। उन्होंने इस बारे में स्पष्ट रूप से कहा भी है कि नहीं जानता कि आवारा मसीहा इस कसौटी पर कितना खरा उतरेगा? किन्तु एक बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मैंने कला को भले ही खोया हो, आस्था को नहीं खोया और निरन्तर सशक्त और सच्ची सच्ची सम्वेदना की घडियों को खोजने का प्रयत्न किया है। विष्णु प्रभाकर की इस कृति के बारे में एक बात यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि आवारा मसीहा शरत् के जीवन की घटनाओं का ब्यौरा भर नहीं है, बल्कि उनके जीवन में घटनाएँ क्यों घटित हो रही थीं, इस प्रेरणा को समझने की कोशिश है। कईं बार घटनाएँ जिस रूप में दिखायी देती हैं, वह उस रूप मे सत्य नहीं होती जब तक कि हम घटनाओं के पीछे की प्रेरणाओं को ठीक से न समझें। शरत् के जीवन की सबसे बडी विडम्बना यह रही कि बंगाल का अधिकांश समाज उनके जीवन की घटनाओं को ही देखता रह और उन घटनाओं के आधार पर ही काफी लोग शरत् को कुत्सित समझते रहे, उनका अपना और तिरस्कार करते रहे। मेरा मानना यह है कि समाज हमेशा ही घटनाओं में जीता तो है, पर क्या वह घटनाओं के कारणों तक पहुँचने की कोशिश करता है? उसके इतिहास बोध को जानने की कोशिश करता है? वह अपने समय के मूल्यों के आगे प्रश्नचिह्न लगता है? अच्छा जीवनी लेखक भी वही होता है जो जीवनी के नायक के साथ-साथ उसके समय का भी जीवनी में उद्घाटन करे। एमिल लुडविग ने नेपोलियन की जीवनी लिखी, तो उसमें सिर्फ नेपोलियन ही नहीं है, बल्कि नेपोलियम के साथ-साथ नेपोलियन का समय भी है और उस समय में जीने वाला पूरा फ्रांस और यूरोप भी है। विष्णु प्रभाकर आवारा मसीहा में उस शरत्चन्द्र को खोजकर लाते हैं जो बंगाली समाज को कभी उपलब्ध नहीं हुआ। यहाँ तक कि अथक प्रयास से खोजा है। मुझे हमेशा ही यह लगता है कि शरद ने अपने साहित्य में अपने को छिपाया है, जो शरद न अपने साहित्य में मिलता है और न अपने बंगाली समाज में मिलता है, उसी वास्तविक और नदारद शदतचन्द्र को हम आवारा मसीहा में पाते हैं। यह बहुत कठिन कार्य था। विष्णु प्रभाकर ने लिखा है कि शरच्चन्द्र ने अपने साहित्य में ही अपने को नहीं छिपाया, वास्तविक जीवन में भी निरन्तर अपने को छिपाने का प्रयत्न किया है। प्रसिद्धि से वे सदा पराङ्मुख रहे। लिखते रहे, पर प्रकाशन का आग्रह उनकी ओर से कभी नहीं आया। यदि उनके स्वार्थी मित्र अनजाने ही उन्हें अन्धकार से बाहर खींच न लाते और तब उनकी प्रतिभा तत्कालीन साहित्य जगत को आलोडित कर देती, तो वे रंगून में ही अपने निर्वासित जीवन का अन्त कर देते। असल में हर बडा रचनाकार अपने समय में और अपने समाज में अपने को अकेला पाता है, क्योंकि वह सामाजिक संरचना से असहमत हो रहा होता है। यह बसहमती सबसे पहले तो उसके जीवन जीने के स्तर पर ही शुरू होती है। समाज अपने टेबू*ा के साथ जीता है और रचनाकार के अन्दर का व्यक्ति उन टेबूज को तोडा है। जीवन के स्तर पर भी और रचना के स्तर पर भी। इसलिए वह अपने समय में अपने को प्रकाशित करने से बचता है, उसे अनावश्यक समझता है। काफ्का भी अपने साहित्य को प्रकाशित नहीं करना चाहता था। उसके मित्र मैक्स ने ही उसकी मर्जी के विरूद्ध उसके बाद उसको प्रकाशित करवाया, क्योंकि काफ्का भी अपने समाज और अपने समय से असहमत था और अपने आप को छिपाना चाहता था। इस छिपे हुए रचनाकार के व्यक्ति को जीवनी लेखक के लिए खोज पाना आसान काम नहीं है। विष्णु प्रभाकर सम्भवतः इस कार्य में इसलिए सफल हो सके क्योंकि वह स्वयं एक आधुनिक सम्वेदनशील रचनाकार थे और उन्होंने इस कार्य को लेखन की अपेक्षा या आलोचक की अपेक्षा एक श्रद्धापूर्ण शोध कार्य के रूप में लिया। इसे उन्होंने टेबल वर्क के रूप में न लेकर एक पुरातत्त्वेक्ता के रूप में लिया। जहाँ तथ्य और सत्य दोनों को अनिवार्यता दी जाती है। उन्होंने इसे कला कार्य से ज्यादा वैज्ञानिक कार्य के रूप में लिया। इसलिए आवारा मसीहा को प्रस्तुत करने में उन्हें पूरे चौदह-पन्द्रह वर्ष लग गए। इस विषय में उन्होंने स्वयं लिखा है कि जिसे समझना बहुत महत्त्वपूर्ण है। वे लिखते हैं कि मैंने इतना समय इसलिए लगया कि मैं भ्रान्त और अभ्रान्त घटनाओं के पीछे के सत्य को पहचान सकूँ , जिससे घटनाओं से परे जो वास्तविक शरच्चन्द्र है उसका रूप पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा सके। यह सब कैसे और किस प्रकार हुआ, यह मैं नहीं बता सकूँगा। जिसे सिक्स्थ सेंस कहते हैं, शायद वही मेरी सहायक रही। मैं अधिक से अधिक उन व्यक्तियों से मिला जिनका किसी न किसी रूप में शरच्चन्द्र से सम्बन्ध था। उन सभी स्थानों पर गया जहाँ वे या उनके उपन्यासों के पात्र रहे थे। उस वातावरण में रमने की कोशिश की जिसस में वे जिये थे। शायद इसी प्रयत्न के फलस्वरूप मैं एक ऐसी तस्वीर बनाने में यत्किंचित सफल हो सका, जो शरीर-रचना-विज्ञान (एनोटॉमी) की दृष्टि से भले ही सही न हो, पर उसके पीछे जो चेतन तत्त्व होता है उसको समझने में अवश्यक सफल हुई है। विष्णु प्रभाकर का यह वक्तव्य जिसमें उन्होंने सिक्स्थ सेंस की बात की है, मेरे मन में एक और सवाल को जन्म देता है। वह सवाल यह है कि जब कोई व्यक्ति किसी की जीवनी लिखता है, तो क्या वह स्वयं भी उस जीवनी में विचरण करता है? क्योंकि हम किसी भी रचनाकार को सबसे पहले अपने स्तर पर ही उसे ग्रहण करते हैं और फिर उसके जीवन को अपने ढँग से स्वीकार करते हैं। शरच्चन्द्र की जीवनी के साथ भी यह प्रश्न जुडा हुआ है। हम शरच्चन्द्र को किस प्रकार अपना ग्रहण करते हैं? हमारे अपने जीवन मूल्य क्या है? जीवन के प्रति हमारा अपना नजरिया क्या है? क्यों शरच्चन्द्र के बारे में विष्णुजी ने यह कहा कि क्यों इतना परेशान होते हो, दो-चार गुण्डों का जीवन देख लो, शरच्चन्द्र की जीवनी तैयार हो जाएगी। असल में मुझे लगता है कि हम अच्छी और सच्ची जीवनी उसी की लिख सकते हैं जिसके जीवन में हमारी रूचि हो और हम अपने को भी उसके साथ किसी न किसी स्तर पर जोड सकें। विष्णु प्रभाकर तभी आवारा मसीहा लिख पाए, जब वो किसी न किसी स्तर पर अपने को शरच्चन्द्र से जोड पाए। यह जुडना एक प्रकार का साझा करना होता है संघर्षों का, स्थितियों का और मानसिकताओं का भी। आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर और शरच्चन्द्र के बीच मुझे एक रिश्ता बनता हुआ दिखाई देता है और यह रिश्ता जहाँ एक ओर रचनात्मकता का रिश्ता है वहीं दूसरी ओर जीवन दृष्टि और जीवन संघर्ष का है। इसीलिए सम्भवतः आवारा मसीहा के शरच्चन्द्र तर्कसंगत और न्याय संगत ढँग से हमारे सामने आते हैं, जिनसे पाठक का उनके साथ रिश्ता एक मनुष्य और एक रचनाकार दोनों के रूप में बनता है। रचनाकार शरच्चन्द्र को तो काफी हद तक हम उनकी रचनाओं से जान सकते हैं, पर मनुष्य शरच्चन्द्र को जानना आसान नहीं था। मनुष्य शरच्चन्द्र की प्रकृति बहुत जटिल थी। साधारण बातचीत में वह अपने मन के भावों को छिपाने का प्रयत्न करते थे और उसके लिए कपोलकल्पित कथाएँ गढते थे। कितने अपवाद, कितने मिथ्याचार, कितने भ्रान्त विश्वास से वे घिरे रहे। इसमें उनका अपना योग भी कुछ कम नहीं था। वे पहले दर्जे के अड्डेबाज थे। घण्टों कहानियाँ सुनाते रहते। जब कोई पूछता कि क्या यह घटना स्वयं उनके जीवन में घटी है, तो वे कहते न-न, गल्प कहता हूँ, सब गल्प, मिथ्या एकदम सत्य नहीं (आवारा मसीहा) ऐसे जटिल मनुष्य शरच्चन्द्र को जीवन में प्रस्तुत करना निश्चय ही विष्णु प्रभाकर के लिए एक चुनौती थी कि रंगून के एक सज्जन ने मुझसे कहा था, वे एक स्त्री के साथ रहते थे। उनके पास बहुत कम लोग जाते थे। मैं उनका पडौसी था, लेकिन उनके कमरे में कभी नहीं गया। वे अफीम खाते थे और शराब पीते थे। वे एक निकृष्ट प्रकार का जीवन बिता रहे थे। मैं उनसे हमेशा बचता था। विष्णु प्रभाकर को ऐसे बहुत से लोग मिले जो शरच्चन्द्र को निकृष्ट कोटि का व्यक्ति मानते थे। हम सोच सकते हैं कि लोगों की दृष्टि में इस निकृष्ट कोटि के व्यक्ति के अन्दर छिपे अच्छे और सच्चे मनुष्य को खोजना कितना कठिन था। यहाँ हमें विष्णु प्रभाकर के अन्दर छिपे अच्छे और सच्चे मनुष्य को भी पहचानना चाहिए जिसने शरच्चन्द्र के अन्दर छिपे अच्छे मनुष्य को ढूँढ निकाला और बताया कि शरच्चन्द्र तो समाज के सबसे अच्छे और सच्चे मनुष्य थे जो जीवन को एक नया मुहावरा दे रहे थे। समाज जिन्हें हिकारत की निगाह से देखता था, शरत् का मनुष्य वहाँ करूणा, दया और मानवीयता को प्रमाणित कर रहा था। शरच्चन्द्र को परम्परा से घृणा नहीं थी, पाप और अनाचार से घृणा थी। वे मनुष्य को देवता नहीं। मनुष्य के रूप में ही देखना चाहते थे और उनका मनुष्य करूणामय चित्त का मनुष्य है। आवारा मसीहा में विष्णु प्रभाकर ने शरत् को आवारा मसीहा के रूप में ही खोजा है, जो आवारा भी है और मसीहा भी। इन्होंने जीवनी लेखन में शरच्चन्द्र को तीन आयामों में खोजने की कोशिश की है। पहला आयाम है उसका बचपन जिसमें शच्चन्द्र के मन की संरचना का निर्माण होता है और वह उस परिवेश के रसायन को आत्मसात् करता है, जो बचपन में उसके आस-पास है जिसमें शरच्चन्द्र पैदा होते हैं और उगते हैं। हम देखते हैं कि यहाँ परिवेश संघर्ष नहीं बनता है बल्कि भरपूर रस लेकर जीने की एक रसमयी प्रक्रिया बनता है जिसने आगामी शरत् के संवेदन का निर्माण किया। यहाँ मित्र हैं, शरारते हैं और एक ऐसा खुला जीवन है जिसमें प्रकृति के रहस्य को जानने की उत्सुकता है। विष्णु प्रभाकर ने बहुत कुशलता से इस परिवेश को पुरातात्त्विक दृष्टि से उत्खनन किया है। हाँ, मैं इसे उत्खनन ही कहूँगा क्योंकि विष्णु प्रभाकर ने उन जगहों पर जाकर, उस स्थान और उस परिवेश को खोजा है, जहाँ शरच्चन्द्र ने इसको जिया था। दूसरे शरच्चन्द्र हमें तब दिखायी देते हैं, जब वह युवा है और उनका यौवन अपने लिए अर्थ पाना चाहता है, पर सब हगह या तो अभाव है या टकराहट है। देश छोडकर विदेश रंगून चले जाते हैं, पर कहीं जीवन को अर्थ नहीं मिल पाता है। मुझे कभी नहीं लगा कि शरच्चन्द्र नौकरी पाने के लिए या व्यवस्थित जीवन के लिए भटकते रहे। मुझे हमेशा महसूस हुआ शरत् जीवन का मतलब समझना चाहते थे। जीवन को अर्थ देना चाहते थे और अपने लिए एक ऐसी दुनिया तलाशना चाहते थे जिसमें भावना समादरित होती हो। यानी इस व्यवहारिक दुनिया से भावनाओं से एक भरा हुआ मनुष्य टकरा रहा और यह दुनिया उसके टुकडे-टुकडे कर देना चाहती थी। अन्ततः शरच्चन्द्र को जीवन का अर्थ मिला साहित्य रचना में और फिर इसी अर्थ को लेकर वो दुबारा कलकत्ता लौटना और शब्द के साथ उनका प्रगाढ रिश्ता बनना। जहाँ शब्द उनके जीवन को वह अर्थ देने लगा जिसे वो बचपन से खोज रहे थे। उन्होंने अपने कथा साहित्य में उन सब पात्रों को समझने की कोशिश की है जो वास्तव में उनके जीवन में आए थे। उनके अधिकांश पात्रों के साथ उनका वास्तविक रिश्ता था और उस रिश्ते को शरच्चन्द्र ने साहित्य में सार्थक ढँग से समझने की कोशिश की। विष्णु प्रभाकर ने आवारा मसीहा में इस सभी आयामों को प्रस्तुत किया है। यहाँ व्यक्ति शरच्चन्द्र भी है, उनका परिवेश भी है, उनकी स्थितियाँ भी है और वो देश भी है जिसमें शरच्चन्द्र पैदा हुए और पूरे भी हुए। इन सभी आचारों पर आवारा मसीहा शरच्चन्द्र की एक महत्त्वपूर्ण जीवनी सिद्ध होती है और जीवनी लेखन को एक नयी परिभाषा भी देती है।

सम्पर्क - 521- पॉकेट-2, पश्चिम पुरी, नयी दिल्ली- ११००६३
मो. ०९८१०८१०६१९,
ई-मेल rameshrishikalp@gmail.com