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रेत-समाधि : हंगामा है यूँ बरपा

हरीश त्रिवेदी
गीतांजलि श्री के उपन्यास- रेत-समाधि, उसके अनुवाद ञ्जश्ाद्वड्ढ श्ाद्घ स्ड्डठ्ठस्र और उसे मिले अन्तर-राष्ट्रीय बुकर सम्मान को लेकर हिन्दी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भी गहमागहमी है। यह हिन्दी के लिए ऐतिहासिक घटना है इससे किसी को शायद ही इनकार हो। उपन्यास की भाषा, कथ्य और महत्त्व को लेकर मन्थन अभी और चलेगा। प्रसिद्ध आलोचक-अनुवादक हरीश त्रिवेदी ने बुकर, पुस्तक, अनुवाद, पुरस्कार और चर्चाओं को समेटते हुए यह आलेख लिखा है, महत्त्वपूर्ण है और हिन्दी में बुकर परिघटना को मुकम्मल ढँग से समझने की कोशिश करता है। इस लेख की प्रतीक्षा थी। प्रस्तुत है - अरूणदेव*
जैसे किसी का अचानक घर लुट जाए उसका ठीक उलटा हिन्दी के साथ अभी-अभी हुआ है। दूर के विदेशी आसमान से छप्पर फाड कर यश और कीर्ति की जो सम्पदा बरस रही है वह हमारी हिन्दी की मढैया में समाये नहीं समा रही है। इंग्लैंड-अमेरिका में चारों तरफ धूम मची है, और भारत के अन्दर भी अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं व अन्य माध्यमों में हिन्दी का जो जलवा है वह पहले कभी देखा-सुना नहीं गया। कहा जा रहा है, और केवल विनोद में ही नहीं, कि यह तो गीतांजलि से गीतांजलि तक की यात्रा है। भावार्थ यह कि रवीन्द्रनाथ टैगोर को 1913 में जो नोबेल पुरस्कार मिला था उसके बाद किसी भारतीय भाषा के किसी भी लेखक को इतना बडा साहित्यिक सम्मान नहीं मिला जितना कि गीतांजलि श्री के पाँचवें उपन्यास रेत-समाधि को दिया गया यह इन्टरनेशनल बुकर पुरस्कार है, जो इस उपन्यास के टूम ऑफ सैंड नाम से डेजी रॉकवेल द्वारा किये गए अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर मिला है।
यह तो रही दुनिया-जहान की खबर, पर हिन्दी के अन्दर का मामला कुछ संगीन है। स्वाभाविक है कि बहुतों के मन में हर्षोल्लास है और समुचित गर्व है पर वहीं कुछ नकारात्मक, प्रश्नवाचक और अवमानना की आवाजें भी उठी हैं, खास कर सोशल मीडिया पर। यह शायद इस बात का भी प्रमाण है कि हिन्दी का लोक-वृत्त कितना व्यापक, बहुरंगी और मुखर है, और एक चालू किस्म की वाचालता तो शायद सोशल मीडिया की फितरत में ही शामिल है। जैसे कि एक सज्जन ने फेसबुक पर लिखा, दो आने की किताब, एक आने का इनाम। इसका क्या उत्तर हो सकता है सिवा यह कहने के कि इन भाई की गणित कुछ कमजोर लगती है जो अडतालीस लाख रुपये को एक आना बता रहे हैं, और इनका मुहावरा कुछ ढीला है क्योंकि पुस्तक को रद्दी ही कहना था तो दो आना भी बहुत है, शायद कौडी या फूटी कौडी कहना बेहतर होता। पर ऐसे ओछे आक्षेपों का उल्लेख करना भी उन्हें इज्जत बख्शना है।
इस पुरस्कार के माध्यम से हिन्दी में जो विमर्श छिडा है उसके तीन विशिष्ट पहलू हैं। एक तो यह विदेशी पुरस्कार और उसका महात्म्य, दूसरे यह पुस्तक और इसकी लेखिका, और तीसरे इस पुरस्कार के सम्भावित दूरगामी परिणाम। इस लेख में इन तीनों पक्षों पर क्रमशः कुछ कहने का प्रयास किया जाएगा, और बीच-बीच में अनेक आवंतर प्रसंग भी आयेंगे जिनका हिन्दी के बाहर के, लेकिन हिन्दी समाज और साहित्य से जुडे, कुछ मुद्दों से सम्बन्ध है।
यह पुरस्कार क्या है, कैसे मिलता है
मूल अंग्रेजी में ही लिखने वाले इंग्लैंड के या उसके भूतपूर्व उपनिवेशों (अथवा कॉमनवेल्थ) के उपन्यासकारों के लिए 1969 में स्थापित किया गया बुकर पुरस्कार भारत में पर्याप्त ख्याति पा चुका है, खास कर जब से यह 1981 में सलमान रुश्दी को मिला जो ऊपर से यानी नाममात्र से हमारे अपने लगते हैं लेकिन अन्दर से यानी शिक्षा-दीक्षा से, सम्वेदना से (और नागरिकता से भी) पक्के अँग्रेज हैं। उसके पहले भारत में शायद ही किसी ने इस पुरस्कार का नाम भी सुना हो, जबकि तत्पश्चात अरुंधती रॉय (1997), किरण देसाई (2006) और अरविन्द अडिग (2008) को भी मिल जाने के बाद हमारे देश में इसकी भैल्यू कुछ कम हो गयी है।
पर इस विलायती सम्मान का ऐसा प्रताप है कि दो हिन्दी फिल्में बन चुकी हैं जिसमें हीरो महाशय यह बुकर पुरस्कार पाते दिखाए गए हैं, एक तो बागबान (2003), जिसमें लेखक के किरदार में अमिताभ बच्चन हैं, और दूसरी शब्द (2005) जिसमें यह कारनामा संजय दत्त ने कर दिखाया है। सन 2014 में इस पुरस्कार के दायरे को विस्तृत किया गया और अब यह किसी भी देश के अंग्रेजी भाषा में लिखने वाले उपन्यासकार को मिल सकता है। विवाद भी हुआ कि अगर अमेरिकी लेखकों पर भी विचार होने लगेगा तो फिर शायद खुद अँग्रेज लेखकों को भी इस पुरस्कार पाने के लाले पड जाए, तो देखिये कि अब अगले भारतीय लेखक का नसीब कब खुलता है।
जो इन्टरनेशनल बुकर पुरस्कार अब गीतांजलि को मिला है वह इसी नामी-गरामी बुकर पुरस्कार का भरत-सरीखा विनीत अनुज है। यह पुरस्कार 2005 में शुरू हुआ पर 2015 तक यह मूलतः अंग्रेजी में लिखने वाले लेखकों को भी मिल सकता था और अंग्रेजी में अनूदित लेखकों को भी; मुख्य पुरस्कार से अन्तर यह भी था कि यह पुरस्कार किसी सद्य प्रकाशित कृति के बजाय किसी लेखक को उसके संपूर्ण कृतित्व पर मिलना था। इसमें हमारे उपमहाद्वीप के दो बडे लेखक मनोनीत हुए, कन्नड के यू। आर। अनन्तमूर्ति और उर्दू के इंतजार हुसैन, दोनों एक साथ 2013 में, पर दोनों को ही यह पुरस्कार नहीं मिला।
सन 2016 से इस पुरस्कार के नियम बदले और अब यह पुरस्कार केवल अनूदित पुस्तकों को मिलने लगा तथा यह भी तय हुआ कि केवल विगत वर्ष में ही छपी पुस्तकों को मिलेगा। इसके पहले इंग्लैंड के दैनिक पत्र द इंडिपेंडेंट द्वारा विश्व की किसी भी भाषा से अंग्रेजी में अनूदित पुस्तक को पुरस्कार दिया जाता था जिसके संचालन में वहाँ के वारिक (Warwick) विश्वविद्यालय के तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद-शास्त्र विभाग की प्रोफेसर सूजन बैसनेट का बडा भारी योगदान था। अब यह प्रतिष्ठित पुरस्कार भी इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार में मिला लिया गया, और मुख्य बुकर पुरस्कार की छत्रछाया तो थी ही तो इसकी प्रतिष्ठा दुगुनी हो गयी।
इस बार गीतांजलि को जब यह पुरस्कार मिला तो वहाँ यह कहा गया कि हिन्दी से अनूदित किसी पुस्तक को यह पुरस्कार पहली बार मिला है, जबकि उचित होता यह कहना कि यह किसी भी भारतीय भाषा से पुरस्कृत होने वाली पहली पुस्तक है। द गार्डियन नाम के अखबार ने इससे भी बडी भूल करते हुए कहा कि यह हिन्दी से अनूदित होने वाली पहली पुस्तक है। इसका अर्थ यह हुआ कि जैसे गोदान, शेखर राग दरबारी, आधा गाँव, झूठा सच, आदि-आदि के अंग्रेजी अनुवाद हुए ही नहीं, जिनमें से सभी पेंगुइन इंडिया जैसे विदेशी नाम से अभिहित प्रकाशक ने छापे हैं।
पर यह भोली भूल नहीं है बल्कि कुटिल षड्यन्त्र है। वह ऐसे कि इस पुरस्कार के नियमों में यह भी है कि अनुवाद किसी भाषा से हो, उसे छपना तो इंग्लैंड (या आयरलैंड) में ही चाहिए, नहीं तो तुरन्त खारिज। इस शर्त से मुझे याद आया कि अंग्रेजों के भारत-शासन के उत्कर्ष काल में, 1860 के दशक में, जब सरकार ने किसी तरह हमारी यह माँग मानी कि भारतीयों को भी आई। सी। एस। परीक्षा में बैठने दिया जाए तो यह भी कहा कि परीक्षा तो केवल लंदन में होगी! यानी एक हाथ से उन्होंने जो दिया वह तुरंत दूसरे हाथ से जैसे छीन लिया, क्योंकि बहुतेरे मेधावी भारतीयों के लिए लंदन पहुंचना मुश्किल था और परीक्षा में पास होना अपेक्षाकृत सरल! लगता है कि इस तथाकथित उत्तर-उपनिवेशवाद के युग में वही औपनिवेशिक भेद-भाव अब भी चल रहा है। रस्सी जले जमाना हो गया पर ऐंठ और अकड नहीं गई, मानसिकता नहीं बदली। शायद यह भी मंशा हो कि अनुवाद वहाँ छपेगा तो बिक्री से पैसा तो वहीं का प्रकाशक बनाएगा।
और भी पुरस्कार हैं भारत में उस बुकर के सिवा
इंटरनेशनल बुकर के एक और पक्ष ने कुछ अधिक ही ध्यान आकर्षित किया है और वह है इसकी धनराशि। लेखक और अनुवादक के बीच बराबर बँट कर भी अडतालीस लाख का चौबीस-चौबीस लाख तो बनता ही है। यहाँ साहित्य अकादमी पुरस्कार 1954 के पाँच हजार से बढते-बढते अब एक लाख हो गया है, और ज्ञानपीठ 1969 के एक लाख से बढते-बढते अब ग्यारह लाख। वैसे सम्पूर्ण कृतित्व के लिए दिया जाने वाला श्रीलाल शुक्ल इफ्को पुरस्कार 2011 में शुरू ही 11 लाख से हुआ था।
इसके अलावा भारत में ही दिए जाने वाले दो और पुरस्कार हैं जो कई मानो में लगभग इस इंटरनेशनल बुकर के टक्कर के हैं, भले ही हम में से बहुतों को उनकी जानकारी न हो। ये दोनों पुरस्कार भारत से सम्बन्धित मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा दिए जाते हैं। एक है JCB Prize for Literature जो 2018 में स्थापित हुआ और 25 लाख रुपये का है। यह इंग्लैंड की वह कम्पनी देती है जो बुलडोजर जैसी बडी मशीनें बनाती है और जिसका यहाँ फरीदाबाद में प्लांट है और अच्छी बिऋी है। प्रसंगवश, नोबेल पुरस्कार जिन नोबेल नामक सज्जन ने शुरू किया था उनका डायनामाइट बनाने का धंधा था, और वैसे ही बुकर पुरस्कार के बुकर महाशय चीनी का व्यवसाय करते थे और तब से जब इंग्लैंड द्वारा शासित अनेक देशों में पहले अफ्रीका से गुलाम बना कर लाये गए और बाद में हमारे भारत से भी जबरदस्ती या फुसला कर ले जाए गए गिरमिटिया मजदूर गन्ना उगाने के काम में अमानवीय परिस्थितियों में लगाए जाते थे। दान-दक्षिणा कुछ अधिक ही करने वाले अनेक लोग इस भाँति अपने पुराने पापों का परिमार्जन करना चाहते हैं, उन्हें धो डालना चाहते हैं।
दूसरा ऐसा पुरस्कार है DSC Prize for South Asian Literature जो 2011 में सुरीना नरूला और उनके पति मनहद नरूला ने शुरू किया था जिनके अनेक प्रकार के व्यवसाय अफ्रीका और इंग्लैंड में हैं। इसकी राशि शुरू में तो 50,000 डॉलर थी पर फिर आधी कर दिए जाने पर भी 25,000 डॉलर तो है ही। छ्वष्टक्च और ष्ठस्ष्ट यह दोनों पुरस्कार मूल अंग्रेजी में लिखी पुस्तकों को भी मिल सकते हैं और भारतीय भाषाओं से अंग्रेजी में अनूदित पुस्तकों को भी जो चाहे भारत में छपी हों चाहे बाहर। बल्कि सिर्फ चार साल से चल रहा छ्वष्टक्च पुरस्कार तो तीन साल अनूदित उपन्यासों को ही मिला है और संयोग देखिये कि इन तीनों उपन्यासों की मूल भाषा मलयालम थी।
अभी वर्ष 2021 का यह पुरस्कार एम। मुकुन्दन नाम के लेखक को मिला उनके विशालकाय उपन्यास पर जिसका नाम अंग्रेजी अनुवाद में Delhi: A Soliloquy है। इसमें भाँति-भाँति के ऐसे मलयाली चरित्रों की गाथा है जो 1960 के दशक से दिल्ली में करोलबाग, सेवा नगर, विनय नगर, जंगपुरा, मयूर विहार आदि मोहल्लों के छोटे-छोटे घरों में रह रहे हैं और अपने सुख-दुःख अधिकतर अपनी ही बिरादरी के लोगों से बाँट रहे हैं। एक सरदारजी हैं जो नायक को जब भी देखते हैं तो बडे सौहार्द से पूछते हैं, तो क्या हाल है, मद्रासी भाई? एक लडकी जो दिल्ली में ही पली-पुसी है अपने परिवार के अन्य सदस्यों को अचम्भे में डालती हुई कहती है कि उसे मछली खाना बिलकुल नहीं अच्छा लगता, उसे तो गोभी पसंद है, और जब उसका बडा भाई उसे मलयाली में बाल-कथाएं सुनाता है तो कहती है कि हिन्दी में सुनाओ।
मुकुन्दन बरसों दिल्ली में रहे हैं, यहाँ फ्रेंच दूतावास में नौकरी करते थे, और हम में से कई के परिचित हैं। पुरस्कार समारोह में जब फिर मिले तो मैंने तुरन्त पूछा, तो क्या हाल है, मद्रासी भाई? दिल्ली के इन दशकों की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं (जैसे कि चीन से 1962 का युद्ध, या 1975-77 का आपातकाल) और विशेष आकर्षणों (जैसे लाल किला या 26 जनवरी की परेड) और इस शहर में चारों ओर विस्तार पाते नए परिवेशों को आत्मीयता से चित्रित करता इस तरह का कोई उपन्यास अगर हिन्दी में भी है तो स्मरण नहीं आ रहा।
एक अन्य उपन्यास का भी उल्लेख यहाँ संगत होगा जिसे ष्ठस्ष्ट पुरस्कार प्राप्त हुआ और जिसका हमारे हिन्दी-प्रदेश और यहाँ तक कि हिन्दी साहित्य से गहरा नाता है। यह पुरस्कार इधर दो कोरोना-ग्रस्त वर्षों से स्थगित है पर 2019 में इसके विजेता थे अमिताभ बागची जो आई। आई। टी। दिल्ली में कंप्यूटर विभाग में प्रोफेसर हैं। उनके मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे उपन्यास का शीर्षक है, Half the Night is Gone यदि यह शीर्षक सुन कर आफ उपचेतन से कोई काव्यात्मक प्रतिध्वनि तत्काल आई तो आप सचमुच संस्कारी जीव हैं। जी हाँ, यह हिन्दी से ही लिया गया है -
अर्ध रात्रि गइ कपि नहिं आयउ
अनुज उठाइ राम उर लायउ।
बडे फलक के इस उपन्यास के सभी चरित्र हिन्दी-भाषी हैं जो आगरा, दिल्ली और बनारस आदि स्थानों में रहते हैं। उनमें से एक संसार से विरक्त होकर भगत हो गए हैं, मानस पर व्याख्यान देते फिरते हैं, पर कैकेयी के प्रसंग में मानस की कुछ स्त्री-विरोधी लगने वाली पंक्तियों के बारे में कुछ स्त्री-श्रोता जब आवाज उठाती हैं तो गहरे असमंजस में पड जाते हैं। तभी एक और दोहे पर उनकी दृष्टि पडती हैर्‍
का न करै अबला प्रबल
इस उपन्यास में एक बडे मुशायरे का भी सजीव वर्णन हैं और एक चरित्र हैं जो स्वयं हिन्दी में उपन्यास लिखते हैं। अमिताभ बागची बताते हैं कि इस उपन्यास के प्रेरणा-स्वरूप तुलसीदास तो थे ही पर कृष्णा सोबती भी थीं, खास कर दिल-ओ दानिश वाली कृष्णाजी। गीतांजलि श्री की भी एक प्रमुख प्रेरणा-स्रोत कृष्णाजी थीं, बल्कि रेत-समाधि तो उन्हीं को समर्पित है। पर हिन्दी के घेरे के बाहर भी लेखक हैं जो हिन्दी पढते हैं और गुनते हैं इससे लगता है कि हमें कोई मतलब नहीं है। तो क्या आश्चर्य कि अमिताभ बागची की इस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद होने की बात तो दूर, इसकी इन तीन-चार वर्षों में शायद एक-आध समीक्षा भी हिन्दी में नहीं निकली। हम चाहते हैं कि पूरी दुनिया तो हमें और हिन्दी को तवज्जोह दे पर हिन्दी से बाहर की उस दुनिया में हमको ही लेकर क्या-क्या हो रहा है इससे हम बेखबर हैं। आतिश का शेर याद आता है,
सुन तो सही जहाँ में है तेरा फसाना क्या
कहती है तुझ को खल्क-ए-खुदा गाएबाना क्या
पुरस्कारों का यह प्रसंग समाप्त करते हुए यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि साहित्य में किसी एक लेखक को सर्वश्रेष्ठ ठहराते हुए पुरस्कार देना क्या वैसा ही नहीं है जैसा कि 100 मीटर की दौड में किसी का प्रथम आकर गोल्ड मेडल पाना। पर यहाँ तो सभी लेखकों की दौड फरक-फरक है, सब अपनी ही गति से चल रहे हैं, और शायद अलग दिशाओं में भी जा रहे हैं। ओलिंपिक खेलों की पुनर्स्थापना 1896 में हुई और 1901 में नोबेल पुरस्कार भी दिए जाने लगे तो यह क्या संयोग मात्र था? अगर साहित्य में किसी प्रकार के पुरस्कार का सच्चा महत्व है तो सम्पूर्ण जीवन के कृतित्व को दृष्टि में रख कर दिए जाने वाले पुरस्कार का, जैसे कि नोबेल हुआ या ज्ञानपीठ हुआ, या नियमानुसार ऐसा न होने पर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार हुआ जो वैसे तो किसी एक पुस्तक पर दिया जाता है पर बडी भाषाओं में अधिकतर सत्तर पार करने पर ही मिलता है। अमूमन एक कृति पर दिए जाने वाला कोई भी सालाना पुरस्कार कब किसको मिल जाए यह बता पाना मुश्किल है क्योंकि हरेक साल की फसल या खेप अलग होती है।
गीतांजलि श्री और रेत-समाधि की अनुवादिका डेजी रॉकवेल
पुस्तक और लेखिका
इतनी बडी भूमिका और व्याख्या के बाद अब पुस्तक पर कुछ कहने का प्रारंभ हो रहा है तो इसलिए भी कि इन दिनों पुरस्कार के हंगामे और अफरा-तफरी के माहौल में पुस्तक कुछ ओझल-सी हो गयी है। वैसे रेत-समाधि छपे अब साढे-तीन साल हो गए तो अब तक तो बस पुस्तक ही थी हमारे सामने। जैसा कि राजकमल द्वारा इस पुस्तक के बुकर की लॉन्ग-लिस्ट में आने पर आयोजित एक समारोह में अपने वक्तव्य में मैंने कहा भी, इस उपन्यास का फ्रेंचानुवाद और आंग्लानुवाद होने के पहले से ही हिन्दी में इसका गुणानुवाद तो होता ही रहा है। छपते ही इसने ध्यान आकर्षित किया, राजकमल के अशोक माहेश्वरी को स्वयं लगा कि कुछ बडी चीज आ गयी है, तो उन्होंने 2018 में ही इस अकेली पुस्तक पर एक गोष्ठी का आयोजन किया जिसमें प्रयाग शुक्ल बोले, रवींद्र त्रिपाठी बोले और मैं भी बोला।
पुस्तक की कई प्रशंसात्मक समीक्षाएँ भी तब छपीं जिनमें इन दो वक्ताओं के अलावा अलका सरावगी ने भी इस उपन्यास की भाषा की मुक्त-कण्ठ से तारीफ की, जब कि उनका अपना भाषा-प्रयोग भी कम विशिष्ट नहीं है। बल्कि उपन्यास के अन्दर खडे हो कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाला वाचक या नैरेटर जैसे उनकी कलिकथा वाया बाईपास में था कुछ वैसे ही रेत-समाधि में भी है। एक कहानी अपने आपको कहेगी, यह पहला वाक्य है रेत-समाधि का जिसके पीछे खडा वाचक सामने भी नहीं आ रहा है और छिप भी नहीं रहा है और जो कह रहा है उसका ठीक उलटा कर रहा है और मजे ले रहा है। (अब आप चाहें तो जोड सकते हैं कि वह कहानी अपने आप को कह लेने के बाद अपने आप को अंग्रेजी में अनूदित भी करेगी और अपने आप बुकर पुरस्कार भी जीतेगी।)
अनुवाद के पहले ही हिन्दी में रेत-समाधि की बढती हुई ख्याति के दो और उदाहरण पर्याप्त होंगे। जनवरी 2019 में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस पुस्तक पर एक सत्र हुआ जिसमें गीतांजलि ने मेरे साथ इस पुस्तक पर चर्चा की और उपन्यास के कुछ अंश भी पढे।
तद्भव के ताजा अंक में गीतांजलि का साक्षात्कार छपा है जिसमें इस एक उपन्यास के बारे में ही नहीं बल्कि अपने जीवन और सभी अन्य कृतियों के बारे में उन्होंने विस्तार में बात की है। जो पाठक पेरिस रिव्यू में छपने वाले विस्तृत साक्षात्कारों से परिचित हैं उन्हें यह साक्षात्कार भी कुछ वैसा ही लग सकता है।
पर इस उपन्यास में (ऐसा) है क्या? अच्छा तो यही हो कि सभी जिज्ञासु इसे स्वयं पढें और अपनी-अपनी राय बनाएँ। मेरी तुच्छ मति में इसकी तीन प्रमुख विशेषताएं हैं। पहले भाग में अस्सी वर्ष की आयु की अभी हाल में विधवा हुई माँ के अवसन्न अनमनेपन का मार्मिक चित्रण हुआ है और उस शालीन परिवार में चलती प्रच्छन्न पारिवारिक कलह का भी एक लम्बा मनोरंजक वृत्तान्त है जिसमें हर व्यक्ति सोचता है कि हम तो इतना करते हैं जो कोई नहीं देखता, बल्कि दूसरे अपनी शेखी बघारते रहते हैं कि करते तो वे ही सब कुछ हैं। दूसरे भाग में माँ अपने बेटे के घर से बेटी के घर चली जाती हैं जो अपनी इच्छा से अविवाहित ही बनी हुई है और अपनी जीवन-शैली में कुछ सजग रूप से स्वच्छंद है। यहाँ माँ-बेटी के बीच एक नए संकोच-विहीन सखी-भाव का उदय होता है और एक नया ही रिश्ता बनता है। पुस्तक के इस भाग में एक हिंजडे का भी प्रवेश होता है जो अरुंधती रॉय के पिछले उपन्यास The Ministry of Utmost Happiness में चित्रित हिंजडे (या उभयलिंगी) से सौ गुना अधिक जीवन्त है। वह पहले रोजी नाम से स्त्री-वेश में आती है और बाद में रजा टेलर-मास्टर के रूप में पुरुष वेश में भी आता है। उसकी लगभग अकारण और अकस्मात ही बडी दर्दनाक मौत हो जाती है, शायद इसलिए कि इस अधिक ही मोहक चरित्र से दामन छुडा कर उपन्यास आगे तो बढे।
पर तीसरा भाग तो सचमुच (सर)हद से आगे बढ जाता है क्योंकि माँ-बेटी अब बिना वीजा के पाकिस्तान में घूमती पाई जाती हैं। बताया जाता है कि माँ 1947 के बंटवारे के पहले उधर ही रहती थीं, वहाँ उनकी एक मुसलमान से शादी भी हो चुकी थी और अब साठ साल बाद उन्हें याद आई तो अपने उस शौहर को ढूंढती हुई वे यहाँ आई हैं। (यानी कि जैसा फिराक साहेब ने कहा,
मुद्दतें गुजरीं तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
माँ-बेटी पकडी जाती हैं, पूछ-ताछ होती है, और फिर माँ को जब गोली मार दी जाती है तो किस्सा खत्म हो जाता है।
लेकिन यह सार-संक्षेप तो बस कथानक का हुआ। कथन तो यहाँ और भी बुलंद है। गीतांजलि की भाषा कभी चैन से नहीं बैठती, सीधी राह नहीं चलती, बल्कि पग-पग पर तरह-तरह की कलाबाजियाँ खाती और करतब दिखाती आगे बढती है। यहाँ यमक, वहाँ श्लेष, यहाँ लय, वहाँ तुकबन्दी और यात्रा-तत्र सर्वत्र गीतांजलि के अपने गढे हुए शब्द- क्या नहीं मिलता यहाँ, और लगातार ऐसी चमत्कारी नयी व्यंजना और लक्षणा और भाषाई मनमौजीपन कि पाठक कहिये कथा के बजाय कथन में अधिक रमने लगे।
तो इस पुस्तक की अंग्रेजी अनुवादिका डेजी रॉकवेल के सामने चुनौतियों की कोई कमी नहीं थी। वैसे उन्हें अनुवाद का पर्याप्त अनुभव है। उन्होंने उपेन्द्रनाथ अश्क का अनुवाद किया है जिन पर शिकागो विश्वविद्यालय से उनकी पीएच। डी। है, और भीष्म साहनी और कृष्णा सोबती का अनुवाद भी किया है। अब यह उनकी बदकिस्मती कि रेत-समाधि के शीर्षक का ही जो अनुवाद उन्होंने किया, टूम ऑफ सैंड (Tomb of Sand), उसमें समाधि के बजाय किसी मकबरे का बिम्ब अधिक उभरता है, यानी जिन्होंने अभी अनुवाद पढना शुरू नहीं किया है उनको भी लगता है कि प्रथमग्रासे मक्षिकापातः मेरा तो विचार है कि जब बुकर की शोभायात्रा गुजर जाए और गुबार छँट जाए तो चार-छह महीने बाद ठण्डे दिमाग से इस लम्बे उपन्यास और अनुवाद दोनों को आराम से मिला-के पढने का सही वक्त आएगा।
रहीं गीतांजलि, तो उनको तो अनेक हिन्दी पाठक बीस-तीस साल से पढते रहे है। पहले उपन्यास माई (2000) से ही उनकी अलग पहचान बन गयी और उसका भी अंग्रेजी अनुवाद हुआ और उसे भी पुरस्कार मिला। एक और उपन्यास अपना शहर उस बरस चर्चा में आया क्योंकि उसमें दिखाया गया था कि हिन्दी-मुस्लिम वैमनस्य हमारे समाज के सभी तबकों में और उदार शिक्षित-वर्ग में भी कितने गहरा धँसा हुआ है। आजकल रेत-समाधि की पठनीयता के बारे में जो प्रश्न उठाये जा रहे हैं वे संभवतः उसकी पचनीयता से भी सम्बन्धित हों। यह तो सही है कि गीतांजलि को सरपट नहीं पढा जा सकता था और न पढना चाहिए। सिनेमाई भाषा में तो कहें तो वे कुछ-कुछ मणि कौल और श्याम बेनेगल के तरह की लेखिका हैं। उनको अंतर्मुखी कहा जा रहा है जिसका एक बडा कारण यह भी हो सकता है कि वे न स्नड्डष्द्गड्ढश्ाश्ाद्म पर हैं और न व्हाट्सऐप पर ही अधिक दिखती हैं, तो चाहने पर भी उनको लाइक या फॉरवर्ड करना मुश्किल है। आजकल के जमाने में तो इसको शायद समाधिस्थ होना भी कहा जा सकता है। जो लोग उन्हें जानते हैं उनको लगता है जैसी उनकी विनोदी, खिलंदडी, और सतत प्रयोग-प्रिय भाषा-शैली है कुछ वैसा ही उनका स्वभाव भी है।
यहाँ यह कह देना आवश्यक लगता है कि मैं स्वयं उनको बरसों से जानता हूँ। कब और कैसे उनसे पहली बार मुलाकात हुई यह भी याद है, जो उनके कारण कुछ कम और नामवर जी के कारण कुछ ज्यादा है। सन 1980 के दशक के उत्तरार्ध में किसी वर्ष नयी दिल्ली के नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (तीन मूर्ति) में आयोजित एक संगोष्ठी में एक युवा इतिहासकार ने प्रेमचन्द पर एक आलेख पढा; ये गीतांजलि थीं। बाद में जब सब लोग चाय के लिए बाहर निकले तो मैंने नामवर जी की तरफ देखा और उन्होंने मेरी तरफ। (तब तक प्रेमचन्द- कलम का सिपाही का अंग्रेजी अनुवाद मैं कर चुका था तो मुझे भी प्रेमचन्द की कुछ तमीज आ गई थी।) मैंने कहा, इनका तेवर कुछ ज्यादा ही तीखा नहीं था?, तो नामवरजी ने पीक सटकते हुए गालिब का शेर सुनाया-
मैंने मजनूँ पे लडकपन में ‘असद’
संग उठाया था कि सर याद आया
वो जमाना कब का गया और गीतांजलि इतिहास छोड कर उपन्यासकार बन गईं। हम दोनों दिल्ली में रहते हैं, उसी पडोस में भी रहें हैं, तो अनेक सन्दर्भों में मिलते रहे हैं। उनका अंग्रेजी पर उतना ही अधिकार है जितना हिन्दी पर या शायद कुछ सिवा ही, उनका विश्व-साहित्य से सम्यक परिचय है, और वे कभी फेलोशिप पर और कभी लेखन-वृत्ति (writers residency) पर बरसों से विदेश आती-जाती रही हैं। तो अभी हाल में बुकर सम्मान की घोषणा वाले समारोह में जब वे लन्दन पहुँची होंगी तो सुदामा की भाँति रह्यो चकि-सो बसुधा अभिरामा वाली स्थिति उनकी नहीं हुई होगी, और जब पुरस्कार मिल गया होगा तब भी वे तुरन्त फूल के कुप्पा नहीं हो गईं होंगी। न उनको क्षण भर के लिए भी गुमान हुआ होगा कि उनकी कृति अकस्मात् कालजयी हो गयी है या वे अब हिन्दी के समकालीन लेखकों में सहसा सर्वप्रथम हो गयी हैं। न ही उनमें यह भाव जगा होगा कि यह क्या ढोल गले में आ पडा जो अब उन्हें बजाते ही रहना होगा। पुरस्कार मिलने के ठीक बाद के कुछ दिनों में लंदन से ही उनके जो ईमेल मेरे पास आते रहे हैं उनसे मेरे इस आकलन की सर्वथा पुष्टि होती है। अगर किसी हिन्दी लेखक के आशियाने पर यह बिजली गिरनी ही थी या किसी के सर यह बला आनी ही थी तो गीतांजलि से ज्यादा संतुलित और सुलझा हुआ सुपात्र शायद ही मिलता। याद आता है कि राजकमल के उस लॉन्ग-लिस्ट के उपलक्ष में आयोजित समारोह में वे मुस्कराते हुए मेरे पास आयीं और बोलीं, मेरा बुकर तो हो गया!
अब आगे?
लेकिन फिर वे दो पायदान और ऊपर चढीं और (एक और मुहावरा आजमायें तो) सहसा-अर्जित महा-ख्याति की ओखली में उन्होंने अब सर दे ही दिया है। उनके बारे में अब तरह-तरह की राय बनेगी और अच्छी या कम अच्छी बातें भी कही जाएंगी। यही आशा की जा सकती है कि इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व अवसर पर हिन्दी-जगत अपने सामूहिक विवेक का परिचय देगा और कुछ ऐसा नहीं कहा-सुना जाएगा जिसका कोई तार्किक आधार या औचित्य ही न हो। इसका मतलब यह नहीं कि रेत-समाधि की अब जो भी आलोचना आये या उस पर टिप्पणी हो तो वह उस पुस्तक की तारीफ में ही हो। पिछले साढे-तीन वर्षों में खुद मेरी और गीतांजलि की जब भी बातचीत हुई है तो मैंने खुद उनसे कहा है कि सुनो, उपन्यास का यह प्रसंग मुझे ज्यादा नहीं जमा या यह तो निगलना कुछ मुश्किल है। इस गिले-शिकवे और नोक-झोंक के दौरान उन्होंने कई प्रसंग अपनी दृष्टि से मुझे कभी धैर्यपूर्वक और कभी ताना मारते हुए समझाए हैं और कई मैं अब भी नहीं समझा! समय आयेगा तो शायद इस पर भी वे कुछ लिखना चाहें कि यह उपन्यास लिखते वकत उनके मन में क्या था और इसे औरों ने कैसे (या कैसे-कैसे) पढा और समझा।
कुछ प्रश्न मेरे मन में अब भी अकुला रहे हैं जिनको मैंने सार्वजनिक रूप से संक्षेप में व्यक्त तो किया है। लेकिन जिन पर कुछ और मनन आवश्यक है और जिन पर कुछ समय बाद यह उपन्यास दुबारा-तिबारा सघन पाठ (close reading) करके, या अन्य पाठकों से बात कर के और अन्य आलोचकों का लिखा हुआ पढ कर, मेरी समझ में कुछ और इजाफा होगा। आप सब के भी विचारार्थ मैं ऐसे तीन प्रश्नों का यहाँ उल्लेख भर करता हूँ जो मेरे मन में आये हैं।
एक, यदि भाषा खिलंदडी है तो क्या उससे कथ्य की गम्भीरता पर आँच नहीं आएगी?
दो, यदि सहज प्रवाह में बहती और एक कसी हुई और चुस्त कथा कहने के बजाय यह उपन्यास अलग-अलग घरों या देशों में घटित होती और नए-नए चरित्रों को शामिल करती तीन कहानियाँ कहता है जो एक दूसरे से ढीली डोर से ही बँधी लगती हैं तो उससे इसका प्रभाव बढता है कि बिखरता है?
और तीन, यदि किसी प्रकार की सीमा पार करने का साहस दिखाने पर पात्रों का अन्त-काल ही आ जाता है, जैसे कि रोजी का आया या माँ का भी, तो इसका अर्थ क्या निकला?
सम्भव है कि आफ मन में भी कुछ अलग ही प्रश्न उठ रहे हों तो अगले कुछ महीनों में, आओ विचारें बैठ कर हम ये समस्याएँ सभी। हिन्दी लेखन ने अभी एक बडा किला फतेह किया है, तो आइये इसी बहाने और लगे हाथ हम हिन्दी आलोचना की सामर्थ्य, विविधता और गरिमा बढाने का भी प्रयास करें।
भारतीय साहित्य के बडे दायरे इस में पुरस्कार का एक बडा प्रभाव तत्काल यह पडा है कि हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति लोगों की धारणा निश्चय ही बदली है। जैसे टैगोर के नोबेल के बाद बंगाली अन्य भारतीय भाषाओं से कहीं आगे बढी हुई मान ली गयी थी उसी तरह का कुछ आदर-भाव अब हिन्दी के प्रति भी जगा है। अनेक अन्य भाषाएँ हैं, उदाहरणार्थ मराठी, कन्नड, या मलयालम, जिनके बोलने वाले हिन्दी की तुलना में एक चौथाई भी नहीं हैं पर जहाँ आम लोगों में साहित्य का संस्कार कहीं अधिक विकसित है। इस पुरस्कार के बाद शायद पढने-लिखने वालों का एक अधिक व्यापक समुदाय बने और न केवल उसमें हिन्दी का समुचित स्थान हो पर हम भी अन्य भाषाओं से कुछ सीखें।
इसी तरह अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से यह सम्मान हिन्दी को मिला है तो शायद हम हिन्दी-वालों का अंग्रेजी के प्रति रुख भी कुछ बदले। अनुवादक की भूमिका का यह प्रश्न टैगोर को नोबेल मिलने के अवसर पर नहीं उठा था क्योंकि टैगोर अपनी बंगाली कविताओं के अनुवादक स्वयं ही थे, भले ही उनकी अंग्रेजी अनुवादों की पाण्डुलिपि कई अँग्रेज लेखकों ने सुधारी-संवारी हो जिनमें स्टर्ज मुअर और विलियम रॉथेंस्टाइन जैसे लोग तो थे ही पर महाकवि डब्ल्यू, बी। येट्स ने भी डट के हाथ लगाया था और पुस्तक की तारीफ में लिखी अपनी भूमिका में तो कलम ही तोड दी थी।
गीतांजलि श्री की अंग्रेजी टैगोर की अंग्रेजी से उन्नीस तो नहीं ठहरेगी पर पुस्तक का अनुवाद उन्होंने स्वयं नहीं किया, डेजी रॉकवेल ने किया है, दोनों के बीच कुछ परामर्श भले हुआ हो। डेजी ने अपने अनुवादकीय नोट में यह भी ध्यान दिलाया है कि उनके अनुवाद में हिन्दी के अनेक शब्द वैसे ही जडे हुए हैं जैसे कि गीतांजलि की हिन्दी में अनेक अंग्रेजी के शब्द विद्यमान थे। हो सकता है कि यह अनुवाद/पुरस्कार प्रसंग हम सब में हिन्दी और अंग्रेजी के बदलते संबंधों की एक नई चेतना जगाये और दोनों भाषाओं के बीच कुछ नयी तरह की आवाजाही और पारस्परिकता का प्रस्थान-बिन्दु बने।
कोई अनुभव नितांत एक का नहीं होता, निजी से निजी भी।
गीतांजलि ने अर्पण कुमार को दिए साक्षात्कार में कहा है, और यह पुरस्कार भी बस निजी नहीं है, इसके अनेक व्यापक और सार्वजनिक अर्थ भी खुलते रहेंगे।
अंत में एक और प्रबल संभावना तो भविष्य के गर्भ में है ही। पूरी उम्मीद है कि गीतांजलि अभी पांच-सात उपन्यास तो और लिखेंगी और हम सबको उन्हें पढने का सुख देंगी। हो सकता है कि भविष्य के अध्येता उनके संपूर्ण कृतित्व को दो भागों में विभाजित करें, पहला तो पुरस्कार-पूर्व काल और दूसरा पुरस्कारोत्तर काल। अभी तो हुआ ही क्या है। उनके लिए और हिन्दी के भविष्य लिये भी (गालिब की तर्ज पर) हम कह सकते हैं-
आता है अभी देखिए क्या क्या मिरे आगे
* समालोचन से साभार।

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