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मेरे पंख ! मेरे पंख !!

राजाराम भादू
वह उदयन वाजपेयी के काव्यसंग्रह पर केन्द्रित
वह- अध्येता और कवि उदयन वाजपेयी का ऐसा कविता- संकलन है, जो अपनी प्रकृति और अन्तर्वस्तु में अलग खडा जैसे समकालीन काव्य- विमर्श को एक चुनौती दे रहा है। श्रृँखला- बद्ध कविताओं के इस सिलसिले को कोई सतही तौर पर प्रेम- कविताओं के बडे खाने में डाल सकता है जो इधर पहले से ही अँटा हुआ है। लेकिन उस अर्थ में ये केवल प्रेम- कविताएँ भर नहीं हैं। चूंकि कविताएँ प्रेम- पात्र की मृत्यु के पश्चात लिखी गयी हैं- जो कि पत्नी प्रतीत होता है, उसके दो छोटे बच्चों का भी उल्लेख आता है- इसलिए इन्हें शोक से जोडकर देखा जाना स्वाभाविक है। अंग्रेजी में शोकगीतों (ऐलेजी) की समृद्ध परम्परा रही है। हिन्दी में भी कुछ उत्कृष्ट शोक- कविताएँ हैं। किन्तु ये कविताएँ उनसे भी भिन्न है। ऐलेजी में गहन विषाद- भाव और तीव्र भावावेग होता है जबकि इन लगभग निरावेग कविताओं में विषष्णता विरल और विश्रृंलित है। इन कविताओं का विशिष्ट तत्त्व अधिभौतिक अथवा पराभौतिक वस्तु- विन्यास है जो अंग्रेजी की जान डन वाली मेटाफिजीकल कविता की याद जरूर दिलाता है लेकिन उसकी धार्मिक रहस्यवादी परम्परा से दूर है। हिन्दी में मुझे फिलहाल तो पराभौतिक अभिलक्षण वाली कोई एक कविता भी याद नहीं आ रही।
उदयन पाठकों की किंचित मदद के लिए संकलन की शुरूआत में एक संक्षिप्त पौराणिक प्रसंग का उल्लेख करते हैं : जब नग्नजीत ने परलोक पर विजय प्राप्त कर ली, ब्रह्मा ने उससे कहा, मैं मृतक को उसी देह में पृथ्वी पर वापस नहीं भेज सकता। तुम उसका चित्र बनाओ, मैं उसमें प्राण फूँक दूँगा। नग्नजीत इस तरह अपने राज्य में असमय मरे हुए बच्चे को चित्र में जीवित करके वापस पृथ्वी पर लौट आया। इसके बाद उदयन वाजपेयी लिखते हैं- ये कविताएँ भी उसे शब्दों में दोबारा जीवित करने का प्रयास हैं। प्रेयसी के इस पुनर्जीवन को सम्भव करने में कवि ने स्मृति- बिम्बों, प्रतीतियों और छायाभास का सहारा लिया है। इन प्रयुक्तियों की गतिशीलता के बिना एक जीवन्त स्पंदनशील प्रतिसंसार की सर्जना सम्भव नहीं थीं। यहीं इस संकलन की सह-रचनाकार चित्रकार ऐश्वर्या शंकरनारायम का उल्लेख जरूरी है जिन्होंने इस सृजनात्मक उपक्रम में अपने अद्भुत रेखांकनों के जरिए संगत की है। इस तरह यह युगलबन्दी शब्द और रेखाओं की सामर्थ्य और संभावनाओं का अनूठा सन्धि- स्थल है। जो लोग उदयन और उनके कुछ साथी- संगियों को अशोक वाजपेयी के कलावादी स्कूल से जोडकर उन पर अमूर्तन के आरोप लगाते रहे हैं, उन्हें इस विपर्यय को जरूर लक्षित करना चाहिए।
रूसी दार्शनिक व्लादिमीर सोलोव्योव के विचार हमें इस कृति को समझने में मदद कर सकते हैं। अपनी पुस्तक- मीनिंग आफ लव- में वे जीवन में प्रेम की भूमिका और उसके प्रतिफलनों पर गहन विचार करते हैं। उनके अनुसार प्रेम दो अनित्य प्रदत्त प्रकृतियों के ऐसे मिलन की अपेक्षा करता है, जो उनसे एक परम् आदर्श व्यक्तित्व की रचना कर सके। एक सच्चा मानव अपने आदर्श व्यक्तित्व की संपूर्णता में, स्पष्टतः, केवल पुरुष अथवा केवल स्त्री नहीं होता, बल्कि उसमें दोनों का उच्चतर एकत्व होना अनिवार्य है। पवित्र बाइबिल में इसी के बारे में कहा गया है- वे एक शरीर होंगे अर्थात् एक वास्तविक अस्तित्व होंगे। ऐसे में, युगल में से जब कोई एक अनन्त की यात्रा पर चला जाता है, तो भी शायद वह पूरा नहीं जाता, पहले के एकत्व में वह काफी कुछ रहा आता है।
ये कविताएँ एक विस्तीर्ण आख्यान प्रस्तुत करती है। इसमें अमूर्तन का- अँधकार सोख लेता है कामनाओं से उनकी पारदर्शिता। हमारे यहां प्रेमी युगल को हंस या कपोत के जोडों के सादृश्य में देखा जाता रहा है। उनमें से अक्सर एक अनन्त की यात्रा पर निकल जाता है। एक कविता में प्रेयसी अनन्त उडान के लिए अपने पंख माँग रही है, जैसे कोई वस्त्र और उसे वह दे दिए जाते हैं। लेकिन क्या वह चली जाती है-
अँधेरी रात में वह खटखटाती है
एक खाली देह के
वे सारे द्वार जो भीतर से बन्द हैं
और प्रेमी के स्वप्न में धीरे- धीरे उसकी अंतहीन परछाईं झरती हैं। उसके सामने एक शून्य है जो अपनी ही आहट से अपने में तिरोहित होता रहता है निरन्तर।
चूँकि प्रतीति या दृश्याभास, वास्तव में, दृष्टा और दृश्य के बीच एक सम्बन्ध या पारस्परिकता होती है, और इसलिए यह उनके निजी चरित्र के अनुसार निर्धारित होती है-
उसकी देह में दुबके है दो शिशु।
यह एक स्मृति- बिम्ब है। बाद में मातृ- विहीन शिशुओं के विषष्ण चेहरे एक कठोर वास्तविकता -
वह अपने बच्चों की करुण आँखों में निःसंग तैर रही है।
यहाँ शेष रह गयी स्पर्श-आभा कविता में जगह पाती है। कविता इस तरह भौतिकता का अतिक्रमण कर उसके परे चली जाती है-
आकाश में हम रहते थे, आकाश में हम रहते हैं...
सरोवर में लहरों- सा तैरता है हमारा प्रेम...
वह दृश्य में विन्यस्त वृक्षों से उनकी परछाइयों- सी रोज नीचे उतरती है। मैं दृश्यों में लगातार बीतता वृक्षों से वृक्षों पर अन्तहीन फिसलता हूँ।
वह अपने नाम पर बैठी है।
वह धीरे- धीरे उठती है
और अपने नाम में समा जाती है।
व्यक्ति के जीवन में उसके कर्म उसकी इयत्ता से जुडते जाते हैं जो उसके नाम से द्योतित होती है। उसके न रहने पर उसकी स्मृतियाँ उसके नाम में समा जाती है। लेकिन प्रेम के एकत्व से उत्पन्न पारदर्शी चाहना फिर भी रहती है।
सोलोव्योव कहते हैं : प्रेम की शक्ति, विश्व में से गुजरते हुए तथा बाह्य संवृत्ति के रूप का रूपान्तरण और आध्यात्मीकरण करते हुए, हमारे सम्मुख अपनी निरपेक्ष शक्ति प्रकट करती है और उसके बाद वह हमारी जिम्मेदारी हो जाती है। हम स्वयं इस प्राकट्य को समझते और उसका लाभ उठाते हैं, ताकि वह किसी रहस्य की केवल अल्पकालिक और प्राहेलिक कौंध होकर न रह जाये। इन कविताओं में प्रेयसी का आभासिक प्रकाट्य और विलयन एक सम्पूर्ण प्रेमिल परिवेश रचता है जिसका प्रतिबिम्ब हम ऐश्वर्या के आकृतिमूलक रेखांकनों के रूपाकारों और उनकी गतिमय लय में देखते चल सकते हैं। कभी इस तरह की नीरवता और विरलता चकित कर सकती है-

वह अदृश्य में निःशब्द टहल रही है।...
एक बिल्ली दोनों ओर देखने के बाद धीरे-धीरे सडक पार करती है।...
वह अपनी छाया में खडी है।...
प्रेम की दुर्बोधता और जटिलता को लेकर सोलोव्योव कहते हैं : बाहरी मिलन- पार्थिव और विशेषतः शारीरिक मिलन - का प्रेम से कोई विशिष्ट सम्बन्ध नहीं होता। उसका अस्तित्व प्रेम के बिना भी रहता है और प्रेम का अस्तित्व उसके बिना। वह प्रेम के लिए आवश्यक है, लेकिन उसकी अपरिहार्य शर्त और स्वतन्त्र साध्य के रूप में नहीं, बल्कि केवल उसके अन्तिम अनुभव के रूप में है ; यह अनुभव, यदि प्रेम के आदर्श सरोकार से परे, अपने में एक साध्य हो जाता है तो यह प्रेम को तबाह कर देता है। किसी भी बाहरी कर्म या तथ्य का अपने में कोई मूल्य नहीं है; प्रेम का अभिप्राय या विचार मानव व्यक्तित्व के एकत्व अथवा अखंडता की पुर्नस्थापना है, एक परम वैयक्तिकता का सृजन। प्रेम से जुडे बाहरी कृत्यों और तथ्यों का महत्त्व उनके अपने में नहीं, बल्कि इस बात से उनके सम्बन्ध द्वारा निर्धारित होता है कि प्रेम की रचना कैसे होती है और उसकी अन्तर्वस्तु क्या है। इन कविताओं का प्रेमी एक अकेले पक्षी की तरह डोलता है-
वह मेरे अभाव में वास करती है। मैं उसके अभाव में उसे खोजता भटकता हूँ। ...
मैं उसे प्रकट होने वाक्य देता हूं, वह मुझे तिरोहित होने अन्तराल।
वह अपनी मृत्यु में प्रवेश करती है जैसे पक्षी अपनी उडान में...सभी मानव मर्त्य हैं - यह सही है कि बहुत- से लोग आत्मा के अमरत्व में विश्वास करते हैं, लेकिन यह केवल प्रेम की भावना ही है, जो इस अमूर्त विश्वास की अपर्याप्तता को सबसे बेहतर रूप में प्रदर्शित करती है। एक देहहीन आत्मा मानव नहीं, बल्कि दिव्य होती है; हम लेकिन मानव को प्रेम करते हैं- समग्र मानव वैयक्तिकता को- और यदि प्रेम इस वैयक्तिकता के प्रबोधन और आध्यात्मीकरण का प्रारम्भ है, तो निश्चय ही वह उसकी सुरक्षा, उसके शाश्वत यौवन तथा उस विशेष मानव, एक दैहिक रूप में इस जीवन्त मूर्त आत्मा के अमरत्व की अपेक्षा करता है। एक दिव्य अथवा शुद्ध आत्मा को किसी प्रबोधन या आध्यात्मीकरण की आवश्यकता नहीं होती; केवल हाड-माँस के शरीर का ही प्रबोधन और आध्यात्मीकरण किया जाता है और वही प्रेम का अनिवार्य पात्र है। एक व्यक्ति जैसा चाहे चित्रित कर सकता है, लेकिन प्रेम जीवित और मूर्त से ही किया जा सकता है, और वास्तव में उसे प्रेम कर सकने को सम्भवतः नश्वरता के विश्वास के साथ समंजस नहीं किया जा सकता। सोलोव्योव के अनुसार, सच्चा प्रेम वह है जो हमें मृत्यु की अपरिहार्यता से बचाता तथा हमारे जीवन को परम् अन्तर्वस्तु से भर देता है। जीवन का देवता और मृत्यु का देवता- एक ही और समरूप है। मृत्यु, सामान्यतः कहें तो, एक प्राणी का विघटन है, उसके घटन तत्त्वों का पृथक्करण। लेकिन जब दो प्राणियों का प्रेम में एकत्व हो चुका हैं, तो किसी एक के दैहिक रूप से न रहने पर भी वह खत्म नहीं होता है और इसकी चाहत बनी रहती है। चूँकि प्रेम जीवित और मूर्त से ही किया जा सकता है, इसलिए इन कविताओं में प्रेयसी के संमूर्तन और उसे जीवन के कार्य- व्यापारों में सक्रिय रखने के अनेक- विध उपादान सामने आते हैं।
असल में एक स्पंदित देह का कोई स्थानापन्न नहीं है। कविता अपनी कल्पना से उसकी एनोटामी रचती और उसे प्राणवान करती है। उसमें मौन के रूपक हैं जिसमें वह होने न होने के बीच विचरती है। वह मृत्यु की तरह बीत रही है। लहरें जैसे कुछ कहने- कहने को हों। वह कहीं न दिखते हुए भी हर जगह दिखने- दिखने को है।
वह जाकर भी नहीं जा रही।
वह आकर भी नहीं आ रही।
इस तरह इन कविताओं में अनेक रूपाकृतियाँ अनवरत् बनती और विलुप्त होती रहती हैं।
इनमें कवि के अकेलेपन का विवरण है। लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण प्रेयसी का पीछे छूटा सामान है - उसके कपडे, शाल, किताब, श्रृंगार की चीजें, मेज- कुर्सी और खिडकी वगैरह। जैसे स्त्री से जुडी कोई वस्तु, उसके केश या पाँव, एक स्त्री- देह का अंग- मात्र होते हैं, उसी तरह, यह देह, अपनी समग्र संरचना में, एक स्त्री के अस्तित्व का एक अंश मात्र है। प्रेम में, सोलोव्योव मानते हैं, अंश भी पूर्णता का स्थानापन्न है। क्या ऐसा हो सकता है कि हाथ या पाँव पूरी देह के बजाय कम सतही है ? ऐसी खण्डों में देखने की मान्यता देह को भी आत्मा से विलग कर देती है। वे कहते हैं कि प्रेमी का प्रेयसी के एक सीले वस्त्र के प्रति आकर्षण स्वाभाविक और संदेह से परे सच्चा है क्योंकि उसके पीछे किसी प्रकार के अप्रामाणिक हेतु की तलाश सम्भव नहीं है।
इन कविताओं में कभी सृष्टि आकार लेती है, कभी लोप होती है और मृत्यु मरने के बाद भी अक्षुण्ण बनी रहती है। प्रेयसी की आह कवि में निर्शेरष है जो उसके जीवित रहे आने तक बनी रहनी है। काल की यह फिसलन एक अनिवार्य नियति है। अंत में भी मुझे सोलोव्योव की यह टिप्पणी बहुत समीचीन लग रही है सच्चा आध्यात्मिक प्रेम कोई दुर्बल अनुकरण और मृत्यु की प्रत्याशा नहीं, बल्कि मृत्यु पर विजय होता है। वह मर्त्य से अमर्त्य का, शाश्वत से अल्पकालिक का विलगाव नहीं, बल्कि मर्त्य का अमर्त्य में रूपान्तरण, अल्पकालिक की शाश्वत में स्वीकृति होता है। मिथ्या आध्यात्मिकता देह का निषेध होती है, सच्ची आध्यात्मिकता देह का पुनर्जन्म है, उसकी मुक्ति, मृत से उसका पुनर्जीवन।
व्लादिमीर सर्गेयेविच सोलोव्योव ( 1853-1900) एक बडे रूसी विचारक थे जिन्होंने अपने समकालीन व परवर्ती रचनाकारों को एक सीमा तक प्रभावित किया। तथापि अपनी मृत्यु के समय वह बेघर और पूरी तरह कंगाल थे। सोवियत सत्ता में उनकी रचनाएँ नेपथ्य में चली गयी, जिन पर अब जाकर लोगों का ध्यान गया है। मीनिंग आफ लव उनकी तीन प्रमुख किताबों में से है। प्रेम का अभिप्राय शीर्षक से कवि- चिंतक नंदकिशोर आचार्य ने प्राकृत भारती अकादमी जयपुर के लिए इसका अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद किया है।

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