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तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद सहसम्बन्ध

हरप्रीत कौर
भारतीय संविधान की स्वीकृत बाईस भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में यदि बात की जाए, तो इन बाईस भाषाओं से सम्बन्धित साहित्य अपने आप में तुलनात्मक है। रवीन्द्र टैगोर ने 1907 में विश्व साहित्य की बृहत अवधारणा प्रस्तुत की, जिसे हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में देख समझ सकते हैं। रवींद्र नाथ टैगोर यहाँ न केवल तुलनात्मक साहित्य के प्रति अपनी दृष्टि प्रस्तुत करते हैं बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय साहित्य,तुलनात्मक साहित्य, विश्व साहित्य को भारतीय उपनिवेशवादी समय और यूरोपियन और अमेरिकी परिदृश्य में व्याख्यायित किया है। भारत बहू-भाषिक बहुसांस्कृतिक देश है। यही बहुसांस्कृतिकता अन्तरानुशासनिक और अंतर-सांस्कृतिक अध्ययन के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। अनेक भाषाओं का एक भौगोलिक परिदृश्य में एक देश में अपने स्वरूप को प्राप्त करना और उसमें कोड मिश्रण के द्वारा एक-दूसरे को ग्रहण करना और नई शाब्दिक अभिव्यक्तियों का सहज स्वीकार यह सब अनेकता में एकता के संकेत हैं, यहीं से अनुवाद जैसा अनुशासन स्वरूप और सामग्री ग्रहण करता है। तुलनात्मकता भी द्विभाषिकता और बहुभाषिकता से अलग नहीं है। जहाँ-जहाँ तुलना है वहाँ-वहाँ द्वैत है जहाँ अनुवाद है, वहाँ भी द्वैत है, इसी द्वैतता के धरातल पर अनुवाद और तुलनात्मक साहित्य एक होते दिखाई देते हैं। जिस प्रकार तुलनात्मक साहित्य साहित्यों के अध्ययन की पद्धति है उसी प्रकार अनुवाद दो भाषाओं के मध्य एक सेतु का काम करता है जो पाठ को स्त्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा की तरफ ले जाने का काम करता है। इन दो पाठों में तुलनात्मक आधार पर अनूदित पाठ की प्रमाणिकता, मूलनिष्ठता, बोधगम्यता को जाँचा परखा जा सकता है। अनुवाद तुलना के लिए आधार सामग्री निर्मित करता है। तुलनात्मक अध्ययन के लिए निर्मित आधार सामग्री के आधार पर ही विश्व साहित्य का अध्ययन विश्लेषण सम्भव है। अनुवाद पर आश्रित हुए बिना विश्व साहित्य का गहन अध्ययन असम्भव है। तुलनात्मकता एक दृष्टि है जिसके द्वारा दो भिन्न-भिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, भौगोलिक परिदृश्य के साहित्य को तुलनात्मक आधार पर जाँचा परखा जाता है। तुलना के लिए भाषाई भिन्नता की कोई अनिवार्यता नहीं है। एक भाषा में लिखा साहित्य भी तुलना का आधार हो सकता है। हिन्दी साहित्य में कवि बिहारी और देव की तुलना इसका उदाहरण है। एक कालखण्ड के रचनाकार चाहे वे सूर-तुलसी हों या छायावादी, प्रयोगवादी, प्रगतिवादी अथवा आधुनिक कवि हों आपस में हमेशा तुलना का विषय रहे हैं। अनुवाद में यहाँ द्विभाषिकता अनिवार्य है वहीं तुलनात्मक साहित्य में भाषाई भिन्नता अनिवार्य नहीं है। लेकिन भाषाई भिन्नता को पूरी तरह से छोडा भी नहीं जा सकता। देश-काल की सीमाओं से परे अंतर्राष्ट्रीयता की संकल्पना के निकट जाते ही हमें तुलनात्मक अध्ययन के लिए भिन्न-भिन्न भाषाओं के साहित्य को आधार बनाना होगा। आज तुलनात्मक साहित्य राष्ट्रीय सीमाओं से परे साहित्य के अध्ययन की अन्तरसांस्कृतिक अवधारणा के साथ विकसित,पल्लवित पुष्पित हो रहा है। स्कूली पाठयक्रम से बाहर निकलकर विश्व साहित्य के स्वरूप को सांस्कृतिक, राष्ट्रीय, संस्थागत वातावरण में देखना अनिवार्य हो जाता है। आज हम यूरोकेन्द्रीयकरण के तहत हर चीज को देखने के आदी हो गए हैं। जिसमें हर अच्छी चीज की जन्मस्थली यूरोप को मान लेते हैं। इसका सबसे बडा लाभ अकादमिक जगत के लिए यह है कि वे भारतीय इतिहास में जाने से बच जाते हैं। शिक्षा जगत का हर नया ज्ञानानुशासन हर नई विधा चाहे वह स्त्री अध्ययन, दलित अध्ययन हो या अन्य वैचारिक डिसकोर्स यूरोकेंद्रीय है। इसी यूरोकेंद्रीय आलोचना के चलते तुलनात्मक साहित्य को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने समझने की दृष्टि विकसित नहीं हो पाई जबकि भारत जैसे बहुभाषी देश में तुलनात्मक साहित्य के लिए अपार संभावनाएँ हैं। साहित्यिक तुलनात्मकता इस प्रश्न का सीधा और स्पष्ट उत्तर है कि विश्व साहित्य को समझने के लिए हमें किस शब्द का प्रयोग करना चाहिए? और एक व्यक्ति अपने जीवन काल में कितनी पुस्तकें पढ सकता है और कितनी भाषाओं में पढ सकता है। इस प्रश्न का उत्तर साहित्य में अनुवाद की भूमिका की ओर संकेत करता है। तुलनात्मक साहित्य को उसकी एतिहासिक परिधि में भी अनुवाद से अलगाया नहीं जा सकता। तुलनात्मक साहित्य का इतिहास और उसकी सैद्धांतिक पृष्ठभूमि अनुवाद से नाभिनालबद्ध है। एक तरफ यहाँ अनुवाद ज्ञानानुशासन के रूप में समृद्ध हो रहा था वहीं दूसरी तरफ तुलनात्मक साहित्य अनुवाद की सैद्धान्तिकी को निर्मित करने में पहला उपकरण रहा। विभिन्न भाषाओं के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन उनकी सांस्कृतिक और समाज-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को जानना अनुवाद के बिना असम्भव है।
विश्व साहित्य,तुलनात्मक साहित्य विकास-क्रम- विश्व साहित्य वर्ल्ड लिटरेचर शब्द का हिन्दी अनुवाद है गोयथे ने वेल्टलिटरेचर 1827 नामक पुस्तक में लिखी जिससे प्रेरणा ग्रहण कर इस शब्द का प्रयोग प्रचलन में आया। 1827 में जर्मन चिन्तक गोयथे और 2003 में डेविड डेमरोश ने विश्व साहित्य के प्रति अवधारणात्मक चिन्तन प्रस्तुत किया। इस से पूर्व रवीन्द्रनाथ टैगोर 190। में विश्व साहित्य के अवधारणात्मक विकास पर चर्चा कर चुके थे। साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन की पद्धति का प्रारम्भ 1816 cours de literature comparee पुस्तक में है। उसके बाद में 1848 में जर्मनी के प्रसिद्ध कवि मैथ्यू अर्नाल्ड ने तुलनात्मक अध्ययन के महत्त्व का उल्लेख किया। 19 वीं श्ताब्दी आलोचना को लेकर काफी सक्रिय रही दुनिया भर के साहित्य को यदि देखा जाए, तो आलोचना धीरे-धीरे हुई है। 21वीं शताब्दी में बदलते विश्व के साथ आलोचना की दृष्टि भी बदली। तुलनात्मक साहित्य शोधपरक आलोचना का एक हिस्सा है। बासनेट के अनुसार The field of comparative literature has always claimed the studies on translation as a subfield, but now, when the last ones are establishing themselves, for their part, firmly as a discipline based on the inter-culture study, offering as well a methodology of a certain rigor, both in connection with the theoretical work and with the descriptive one, the moment has come in which comparative literature has not such an appearance to be a discipline on its own rather to constitute a branch of something else.(Bassnett, 1998-101) सुसेन बासनेट ने तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा तुलनात्मक साहित्य संस्कृति की सीमा से परे पाठ का अध्ययन करता है जो अपनी प्रकृति में अंतःविद्यावर्ती है और जो साहित्य में उन पैटर्नों को ढूँढता है,जो देश और काल की सीमाओं से परे होता है। इस परिभाषा में बासनेट के अनुसार तुलनात्मक साहित्य अन्तर विद्यावर्ती अध्ययन है यह विशुद्ध साहित्य का अध्ययन नहीं है साहित्य से इतर का भी अध्ययन है। साहित्य का अध्ययन संस्कृति,देश और काल की सीमा में बद्ध होता है। जबकि तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन संस्कृति से परे पाठ का अध्ययन है। साहित्य का कोई भी अध्येता किसी रचना का अध्ययन करते समय उस समय काल-परिवेश वातावरण का भी अध्ययन करता है जिसमें कि वह रचना लिखी गई है। तुलसीदास के अध्ययन के लिए उस समय विशेष काल विशेष का अध्ययन भी आवश्यक है। कबीर के आक्रोश को मीरां के कुल की कानि प्रेमचन्द के होरी की पीडा को किसी भी रचना को समझने के लिए उस समय के समाज को समझना जरूरी होगा। चाहे प्रयोगवादी काव्य हो चाहे छायावादी जिस समय में वह रचना अस्तित्व में आई,उस समय को जाने समझे बिना रचना का अध्ययन सम्भव नहीं साहित्य के सामान्य अध्ययन में यह आवश्यक है। बासनेट तुलनात्मक साहित्य में इसे छोङने की बात कहते हैं। तुलनात्मक साहित्य के शुरुआती दौर में तुलनात्मक साहित्य के अध्येताओं ने कहा कि एक ही भाषा के दो लेखकों की तुलना तुलनात्मक साहित्य का हिस्सा नहीं हो सकती। ऐसे देखा जाए तो कवि बिहारी और देव की तुलना तुलनात्मक साहित्य का हिस्सा नहीं कही जा सकती। इसके अतिरिक्त कलागत, विधागत, इतिहासगत समानता की अनिवार्यता भी तुलना में आवश्यक नहीं है।
तुलनात्मक साहित्य का प्रादुर्भाव उस समय हुआ जब यूरोप के देश आपस में युद्धरत थे। फ्रांस और इंग्लैण्ड के बीच टकराहट थी। पुर्तगाल, स्पेन, लेटिन अमेरिका में टकराहट थी ऐसे समय में विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक साहित्य अनुशासन के रूप में अस्तित्व में आया। युद्धरत देशों के साहित्य में समानता के बिन्दु तलाशे गए। सुसैन बासनेट ने चार्ल्स फिलारे को रेखांकित किया। हर व्यक्ति एक-दूसरे को प्रभावित करता है इसी प्रभाव की प्रतिक्रिया स्वरूप हम कुछ ग्रहण करते हैं कुछ प्रदान करते हैं। इंग्लैण्ड में शेक्सपीयर युरोप का सबसे बडा लेखक है। यह सिद्ध करने में उन सब तुलनात्मक अध्ययनों अथवा अध्येताओं को देखा जा सकता है जिन्होंने शेक्सपीयर को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में अहम भूमिका निभाई। रवीन्द्रनाथ टैगोर का सारे भारतीय साहित्य पर प्रभाव दिखाई देता है, तो क्या रवीन्द्रनाथ किसी के प्रभाव से अछूते थे? इसी साहित्यिक-सांस्कृतिक लेन-देन का अध्ययन तुलनात्मक साहित्य करता है। फ्रांस-इंग्लैंड 19 वीं शताब्दी के युद्धरत देश थे, फ्रांस में तुलनात्मक साहित्य पर सबसे पहले अध्ययन हुआ। फ्रांस और इंग्लैण्ड के साहित्य में तुलनात्मकता के सूत्र तलाशे गए कि कैसे एक देश दूसरे देश से प्रभाव ग्रहण करता है। इसी समय में अनुवाद ने भी अपनी वैश्विक भूमिका निभाई। तुलना की बहुत-सी पद्धितयाँ जैसे व्यतिरेकी विश्लेषण आदि अस्तित्व में आए सैनिक जब दूसरे देश में युद्ध के लिए जाते, तो वहाँ की भाषा सीखने के लिए व्यतिरेकी विश्लेषण का उपयोग करते हुए भाषा शिक्षण के साथ-साथ अनुवाद और तुलनात्मकता के लिए नये रास्ते खुले।
युरोप में जब राष्ट्रवाद चरम पर था अपने-अपने राष्ट्र के साहित्य का गुणगान करने वालों ने अपने-अपने राष्ट्र के साहित्य को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयास में दूसरों से ग्रहण करने से इनकार कर दिया। रेने वेलेक ने इसकी आलोचना की। औपनिवेशिक समय में एक देश के साहित्य का दूसरे देश के साहित्य पर प्रभाव पडा। यहीं से यह प्रश्न सामने आया कि क्या गुलाम देश के साहित्य की शासक देश के साहित्य से तुलना सम्भव है? यहीं हम उस श्रेष्ठता बोध के बीज देखते हैं जिसमें यूरोपीय लोग अपने राष्ट्र को श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे दिखाई देते हैं। वैश्विक साहित्य के अनुवाद में भी राष्ट्रवाद के अंतर्गत अपने साहित्य का अधिकाधिक अनुवाद करके प्रचारित प्रसारित करने के प्रयास दिखाई देते हैं। तुलनात्मक साहित्य के बारे में शुरुआती अध्ययनों में यह बात सामने आई कि तुलनात्मक अध्ययन केवल पाठ का होता है। मौखिक साहित्य का नहीं हो सकता इस तरह की स्थापनाएँ सामने आईं। मौखिक साहित्य से लिखित पाठ को श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयास भी इस दौरान दिखाई दिए, लेकिन भारतीय सन्दर्भ में खासकर लोक साहित्य,भक्ति साहित्य के मौखिक स्वरूप के प्रयाप्त अध्ययन विश्लेषण प्राप्त होते हैं। कबीर के कितने ही पद कितनी भाषाओं में प्राप्त होते हैं। लिखित और मौखिक पाठ के इस तरह के तुलनात्मक सन्दर्भों में श्रेष्ठता और हीनता के प्रश्न भी सामने आए। और पिछडे समाजों के अधिकांश साहित्य को इस पैमाने पर अस्वीकार कर दिया गया कि उनका लिखित पाठ उपलब्ध नहीं है। तुलनात्मक साहित्य के अध्येता मौखिक पाठ पर विचार नहीं करते। इसका दूरगामी प्रभाव यह पडा कि लम्बे समय तक भारतीय मौखिक साहित्य उपेक्षा का शिकार रहा और इस तरह से साहित्य का एक बहुत बडा हिस्सा इस अध्ययन की सीमा से परे चला जाता है। तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन करने वाले विद्वानों का यह कहना है कि तुलनात्मक साहित्य अध्ययन करने वाले विद्वानों का यह कहना है कि तुलना करने वाले अपनी भाषा को श्रेष्ठ सिद्ध करता है। मनुष्य की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति स्वंय को श्रेष्ठ सिद्ध करने की है। कोई भी मनुष्य अपनी भाषा अपने साहित्य को श्रेष्ठ सिद्ध करने में गौरव महसूस करता है। यही प्रवृत्ति तुलनात्मक साहित्य के सन्दर्भ में दिखाई देती है। यात्रा साहित्य में तुलनात्मक साहित्य के बीज दिखाई देते हैं। वास्कोडीगामा तथा कोलम्बस ने अन्य संस्कृतियों को समझने का प्रयास किया। इन यात्रियों के यात्रा वृत्तान्तों में साम्राज्यवादी स्वर दिखाई देते हैं। अतः इस तरह तुलनात्मक साहित्य अपनी यात्रा पूरी करते हुए अनुवाद का सहचर बने हुए आज अपने विस्तृत रूप में हमारे सामने है।
सन्दर्भः
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3.Short, Michael H. (1986). Literature and Language Teaching and The Nature of Language. In T. D.
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सम्पर्क - महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,
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