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समाजवाद और अहिंसक व्यवस्था का लक्ष्य

कमल नयन चौबे
चर्चित पुस्तकों अहिंसक समाजवाद, अहिंसक अर्थव्यवस्था पर एकाग्र
प्रस्तुत आलेख में नन्दकिशोर आचार्य द्वारा लिखी गयी दो पुस्तकों अहिंसक समाजवाद और अहिंसक अर्थव्यवस्था के मुख्य तर्कों को आलोचनात्मक परीक्षण किया गया है। ये दोनों पुस्तकें अहिंसा-शान्ति ग्रन्थमाला के अन्तर्गत प्रकाशित हुई हैं। असल में, पिछले कईं दशकों में समाजवाद और अहिंसा के विचार को जबर्दस्त चुनौती मिली है। सोवियत यूनियन के पतन के बाद माक्र्सवाद के अन्तर्गत आने वाले समाजवाद के स्वप्न को गम्भीर झटका लगा। खासतौर पर, पूर्व-सोवियत यूनियन और चीन जैसे देशों से मानवाधिकारों के हनन की जो कहानियाँ सामने आईं, उन्होंने समाजवाद को व्यवहारिक रूप देने में लोकतान्त्रिक मूल्यों की अवहेलना के प्रति बुद्धिजीवियों और आम लोगों को सचेत कर दिया। यह माना जाने लगा कि एक विचार के रूप में समाजवाद आकर्षक है, लेकिन इसे हकीकत में हासिल नहीं किया जा सकता है। इसी तरह, अहिंसा के विचार को भी एक सुन्दर, किन्तु अप्राप्य आदर्श के रूप में माना जाने लगा है। अर्थव्यवस्था के एक ऐसे स्वरूप को पूरी दुनिया में अपरिहार्य मान लिया गया है, जिसमें बडे स्तर के उद्योगों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और मनुष्यों का विस्थापन, उपभोगवाद आदि अनिवार्य है। ऐसे में, नन्दकिशोर आचार्य की ये दोनों पुस्तकें वैचारिक रूप से समाजवाद और अहिंसक अर्थव्यवस्था के विविध आयामों और इनकी संभावनाओं पर गहराई से पडताल की गयी है।
अहिंसक समाजवाद की रूपरेखा
अहिंसक समाजवाद पुस्तक में भारतीय समाजवादी चिन्तन की दिशा की पडताल की गयी है। इसमें कुल छह अध्याय हैं, और इन अध्यायों में समाजवादी विचारों की पृष्ठभूमि, तत्त्वमीमान्सीय आधार, उत्पादन-शक्तियों के प्रश्न, स्वामित्व के स्वरूप, साध्य साधन के एकत्व और अहिंसक क्रान्ति के आयाम जैसे विभिन्न पहलुओं की विवेचना की गयी है। लेखक का मूल लक्ष्य भारतीय समाजवादी चिन्तन के अहिंसक चरित्र को सामने लाना और अहिंसक व्यवस्था के लिए वैचारिक भूमिका तैयार करना है। इस सन्दर्भ में लेखक ने सोवियत संघ के वैज्ञानिक समाजवाद तथा यूरोपीय देशों के लोकतान्त्रिक समाजवाद की गहरी समीक्षा प्रस्तुत करते हुए यह रेखांकित किया है कि दोनों तरह के विचारों में राज्य को माध्यम के रूप में अपनाया गया, जिसमें केन्द्रीकरण और अधिनायकवाद का खतरा रहता है, और इससे मानव स्वतन्त्रता को भी चोट पहुँचती है।
यह बात गौरतलब है कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के विकास के साथ समाजवाद का विचार अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। इसमें कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के लेखन से उभरकर सामने आने वाले दर्शन का विशिष्ट स्थान है, क्योंकि इन्होंने खुद को यूटोपियाई समाजवाद से अगल किया, और यह दावा किया कि वे वर्ग संघर्ष और क्रांति के माध्यम से एक साम्यवादी समाज की स्थापना की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत कर रहे हैं। बाद में, कई संशोधनों के साथ लेनिन और माओ-त्से-तुंग ने क्रमशः रूस और चीन में इन विचारों की सहायता से क्रांति को मूर्त रूप दिया। कई अन्य स्थानों पर विद्वानों ने हिंसा को समाजवाद की दिशा में बदलाव के लिए आवश्यक नहीं माना, और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अहिंसक और लोकतान्त्रिक तरीके से भी समाजवाद की स्थापना के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। नन्दकिशोर आचार्य जय प्रकाशनारायण के इस विचार को स्वीकार करते हैं कि समाजवाद के सभी रूपों में उसकी तीन चारित्रिकताएँ होती हैं - उत्पादन साधनों पर स्वामित्व, कल्याणकारी राज्य और समाजवादी संकल्प (अहिंसक समाजवाद, पृ. 14)। लेखक ने अपनी इस पुस्तक में पश्चिमी समाजवादी चिन्तन के बरक्स भारतीय समाजवादी चिंतन के वैशिष्ट्य को रेखांकित करने का प्रयास किया है। वे यह मानते हैं कि भारत में समाजवादी विचारधारा की प्रेरणा यूरोपीय समाजवाद की साम्यवादी और लोकतान्त्रिक समाजवादी धाराएँ रहीं, लेकिन इसके विकास की परिस्थितियाँ काफी अलग थीं। मसलन, यूरोप में समाजवाद का संघर्ष पूँजीवाद से था, किन्तु भारतीय समाजवादियों का संघर्ष स्वयं यूरोपीय साम्राज्यवादिया से भी था। भारत में व्यवस्थित से समाजवादी आन्दोलन की शुरूआत 1934 से मानी जाती है क्योंकि इसी वर्ष कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ था। इस संगठन ने कांग्रेस के भीतर ही ज्यादा रैडिकल विचारों को बढावा देना आरम्भ किया। इन्होंने खुद को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से असहज पाया क्योंकि उन्हें यह लगता था कि वह सोवियत संघ के औजार की तरह काम कर रहा है क्योंकि राष्ट्रीय आंदोलन को लेकर उसकी भूमिका सदैव ही विभ्रम का शिकार रही। नन्दकिशोर आचार्य भारतीय समाजवाद के मुख्य चिन्तकों में राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेन्द्र देव के साथ ही साथ समाजवादी धारा से जुडे कमलादेवी चट्टोपाध्याय, मधु लिमये, किशन पटनायक आदि नेताओं को भी सम्मिलित करते हैं। हालाँकि वे नेहरू और आम्बेडकर को इसलिए भारतीय समाजवाद की ज्ञात चिन्तन सरणि से अलग रखते हैं क्योंकि मशीनीकरण और उससे उत्पन्न होने वाले केन्द्रीकरण में इन दोनों की आस्था रही है। इसलिए आचार्य के अनुसार इन दोनों चिन्तकों को पश्चिम के लोकतान्त्रिक समाजवादियों के साथ रखा जा सकता है। इसके अलावा, वे विनोबा और एम. एन रॉय को ऐसे चिन्तक मानते हैं जो खुद समाजवादी नहीं थे, किन्तु उनके विचारों में समाजवादी संकल्प में अन्तर्निहित मूल्यों का समर्थन मिलता है (अहिंसक समाजवाद, पृ. 18-19)।
नन्दकिशोर आचार्य भारतीय समाजवाद की कुछ विशिष्टताओं को रेखांकित करते हैं। पहला, पश्चिम में यूटोपियाई समाजवाद, वैज्ञानिक समाजवाद (माक्र्सवाद) और लोकतान्त्रिक समाजवाद जैसी धाराओं ने आर्थिक आयामों को प्रमुखता दी। यूटोपियाई समाजवादियों ने एक ऐसी स्थिति की कल्पना की जहाँ संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों, लेकिन उन्होंने इस स्थिति तक पहुँचने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं बताया। माक्र्सवाद में क्रान्ति, सर्वहारा की तानाशाही और समाजवाद की अवस्था से गुजरते हुए साम्यवाद की प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया। लोकतान्त्रिक समाजवादियों ने लोकतान्त्रिक तरीके से समाजवाद के लक्ष्य को हासिल करने पर बल दिया। वैज्ञानिक समाजवादी और लोकतान्त्रिक समाजवादियों- दोनों ने ही राज्य की सत्ता के केन्द्रीकरण पर प्रश्न नहीं किया (हालाँकि वैज्ञानिक समाजवाद आखिर स्तर पर राज्य के धीरे-धीरे विलुप्त होने की बात करता है)। भारतीय समाजवादियों ने सत्ता के केन्द्रीकरण की बजाय विकेन्द्रीकरण पर बल दिया। वे यह चाहते हैं कि स्थानीय समुदाय या गाँव अपनी नियति के बारे में खुद फैसला करने में सक्षम हों। दूसरा, वैज्ञानिक समाजवाद और लोकतान्त्रिक समाजवाद- दोनों ने ही मशीनीकरण के माध्यम से उत्पादन को बढाने पर बल दिया। किन्तु भारतीय समाजवादियों ने सिर्फ उत्पादन के कुछ क्षेत्रों में ही बडे उद्योगों या मशीनों का समर्थन किया, उनका ज्यादा जोर स्थानीय स्तर पर कुटीर उद्योगों को बढावा देने पर है। तीसरा, वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक समाजवादियों के विपरीत भारतीय समाजवादी सिर्फ आर्थिक परिवर्तन से ही संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि वे जीवन के तमाम आयामों में सुधार करना चाहते हैं। भारतीय समाजवाद समानता की एक बहुआयामी अवधारणा को स्वीकार करता है। मसलन, भारतीय समाजवाद से जुडे चिन्तक आचार्य नरेन्द्र देव गणतन्त्र को सिर्फ राज्य व्यवस्था प्रबन्धन से सम्बन्धित मूल्य नहीं मानते थे, बल्कि वे इसे सामाजिक एवं वैयक्तिक-पारिवारिक जीवन में सामने लाना चाहते हैं। इसी तरह, लोहिया ने आर्थिक समानता के साथ-साथ नर-नारी समानता, जाति भेद की समाप्ति, रंगभेद की समाप्ति, अस्त्रों के क्षेत्र में गैर-बराबरी की समाप्ति तथा व्यक्ति और समाज तथा व्यक्ति और राज्य के बीच गैर-बराबरी को खत्म करने पर जोर दिया। इसी तरह, जयप्रकाश नारायण जिस सम्पूर्ण क्रान्ति की बात करते हैं, उसमें आर्थिक आयाम के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, मानसिक, नैतिक और शैक्षणिक आयाम भी सम्मिलित हैं। चौथा, भारतीय समाजवादियों ने सत्याग्रह या सिविल नाफरमानी के रास्ते को हिंसक रास्तों की तुलना में ज्यादा श्रेयस्कर माना।
स्पष्ट तौर पर, नन्दकिशोर आचार्य भारतीय समाजवाद को भारत की स्थितियों से उपजे विचार के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिस पर पश्चिमी समाजवादी विचारों के साथ-साथ गाँधी के विचारों का भी गहरा प्रभाव रहा है। भारतीय समाजवाद ने सिर्फ आर्थिक बदलाव के स्थान मनुष्यों के जीवन के सभी पहलुओं में आमूलचूल सकारात्मक परिवर्तन करने का लक्ष्य सामने रखा।
अहिंसक अर्थ-व्यवस्था का स्वप्न
अहिंसक-शान्ति ग्रन्थमाला के अन्तर्गत प्रकाशित एक अन्य पुस्तक अहिंसक अर्थव्यवस्था में नन्दकिशोर आचार्य ने समकालीन अर्थव्यवस्था के संगठन, उसमें उच्च किस्म के तकनीक की भूमिका, और इसके द्वारा मानव और प्रकृति पर किये जाने वाले अत्याचारों का परीक्षण करने के साथ ही साथ इसके विकल्प पर भी गहराई से विचार किया है। इस पुस्तक में उन्होंने मानव विकास की दिशा में अहिंसा की भूमिका, उत्पादन के वास्तविक प्रयोजन, उत्पादन की अहिंसक प्रत्रि*या, और अहिंसक स्वामित्व जैसे मसलों पर विचार किया है।
नन्दकिशोर आचार्य ने उत्पादन-वृद्धि को सभी समस्याओं का समाधान मानने की प्रवृत्ति को पूरी तरह से गलत माना है। आधुनिक दौर में उदारवाद-पूँजीवाद ने ही नहीं, बल्कि माक्र्सवाद के आधार पर निर्मित होने वाली सोवियत संघ जैसी व्यवस्थाओं में अत्यधिक उत्पादन को आदर्श समाज की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण माना गया। लेखक का यह तर्क है कि इस तरह की व्यवस्था ने मनुष्यों और प्रकृति के साथ हिंसा को बढावा दिया है। आधुनिक तकनीक के कारण जहाँ मनुष्यों के पास काम की कमी हुई, वहीं, इसने प्रकृति के अन्धाधुन्ध दोहन को भी बढाया। लेकिन लेखक यह स्वीकार नहीं करते हैं कि हमें हर प्रकार की तकनीक को त्याग देना चाहिए। उन्होंने शूमाकर और अन्य विद्वानों द्वारा किए गए औजार और मशीन के बीच के अन्तर को स्वीकार किया है। उनके अनुसार औजार मानव-श्रम और उसकी सृजनात्मकता में सहायक उपकरण होता है, जबकि मशीन मानव-श्रम को- और इस प्रकार स्वयं मानव को ही प्रतिस्थापित कर देती है। (अहिंसक अर्थव्यवस्था, पृ. 41)। इनके अनुसार, उत्पादन प्रक्रिया राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदि सभी आयामों को परिभाषित करती है। आचार्य माक्र्सवाद के भीतर मौजूद आधार-अधिरचना (बेस-सुपरस्ट्रक्चर) के विचार का आलोचनात्मक परीक्षण करते हैं। जहाँ आधार उत्पादन प्रणाली और इसके विविध आयामों से सम्बन्धित हैं, वहीं अधिरचना राजनीतिक व्यवस्था, कानून, शिक्षा, कला आदि से जुडी हुई है। माक्र्स यह मानते हैं कि कई बार अधिरचना में भी स्वायत्त विकास हो कसता है, लेकिन आखिरी रूप में आधार ही किसी व्यवस्था के स्वरूप को तय करती है। नन्दकिशोर आचार्य यह मानते हैं कि सोवियत संघ और अन्य कम्युनिस्ट देशों में आधार यानी उत्पादन प्रणाली में बदलाव करने के स्थान पर सिर्फ अधिरचना को बदलने पर ही ध्यान दिया गया। आर्थिक प्रणाली पूँजीवाद के उत्पादन के तौर-तरीके से ही आगे बढती रही। इसका नतीजा यह हुआ कि कोई वास्तवविक बदलाव नहीं हो पाया। हालाँकि आचार्य यह भी मानते हैं कि माक्र्स ने विच्छेद (अलगाय या एलियेनेशन) के अपनी अवधारणा में तकनीक आधारित उत्पादन प्रक्रिया में लगने व्यक्ति की स्थिति का वर्णन किया है। गौरतलब है कि माक्र्स इसे पूँजीवाद का नतीजा मानते हैं, किन्तु आचार्य इसे उत्पादन प्रक्रिया का परिणाम मानते हैं (अहिंसक अर्थ-व्यवस्था, पृ. 48)।
आचार्य ने बडी मशीनों के प्रयोग को एक हिंसक अर्थव्यवस्था के रूप में कई बिन्दुओं को रेखांकित किया हैर्‍ पहला, इससे उत्पादन का केन्द्रीकरण बढता है, जो संसाधनों के केन्द्रीकरण को बढाता है। इसका नतीजा सत्ता के केन्द्रीकरण के रूप में सामने आता है, क्योंकि अधिकांश संसाधन एक छोटे समूह के हाथों में केन्द्रित हो जाते हैं। इसके कारण लोकतान्त्रिक समाज में भी लोग विविध प्रकार के दमन का सामना करते हैं। दूसरा, इस तरह की अर्थव्यवस्था संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर आधारित होती है, और इससे पारिस्थितिकी का संकट पैदा होता है। भारत सहित दुनिया के तमाम देषों में इस तरह की स्थिति देखी जा सकती है। कई बार वन संसाधनों के अत्यधिक दोहन के साथ-साथ लाखों लोगों के विस्थापन की परिघटना भी सामने आती है। तीसरा, बडे मशीनों पर आधारित हिंसक अर्थव्यवस्था ने एक ऐसी स्थिति को जन्म दिया है, जिसे तकनीकी नियतिवाद की संज्ञा दी जा सकती है। अर्थात् यह माना जाता है कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए तकनीक को अपनाना ही सबसे बेहतर विकल्प है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी यह एक तरह की निर्भरता को जन्म देता है क्योंकि विकसित देश हमेशा ही तकनीक के मामले में पिछडे या विकासशील देशों से आगे रहते हैं, और पिछडे देष अधिकांश मौकों पर विकसित देशों के पिछलग्गु बनने के लिए मजबूर रहते हैं। चौथा, इससे मानव श्रम की महत्ता कम होती है, बेकारी बढती है, और कई दफा यह समाज में अत्यधिक हिंसा का कारण भी बन जाती है।
आचार्य का जोर इस बात पर है कि उत्पादन तकनीक सिर्फ उत्पादन प्रक्रिया तक ही सीमित नहीं है, इसकी परिधि में वितरण, संचार, और परिवहन, बैंकिंग, विज्ञापन आदि से जुडी तकनीक भी आ जाती है। उनके अनुसार, अब शिक्षा, मनोरजंन, चिकित्सा, तथा सांस्कृतिक जीवन सब-कुछ इसके दायरे में आ गया है। इस पूरी प्रक्रिया का मानवीय सत्त्व पर नकारात्मक प्रभाव पडा है। किसी भी दार्शनिक दृष्टि से देखने पर मानव-सत्त्व एक नैतिक परिघटना के रूप में प्रकट होता है, जिसका आधार जीवन का एकत्व अथवा उसका व्यवहारिक रूप अहिंसा है (अहिंसक अर्थ-व्यवस्था, पृ. 51-52)। कई बार यह आपत्ति की जाती है कि यदि अहिंसा या एकत्व ही जीवन का नियम है, तो मानव इतिहास में हिंसा क्यों घटित होती है। लेखक इसका जवाब देते हुए कहते हैं कि आपत्तिकर्त्ता यह भूल रहे होते हैं कि नियम का अतिक्रमण यह सिद्ध नहीं करता कि नियम अप्रासंगिक है (अहिंसक अर्थ-व्यवस्था, पृ. 52)
इस पुस्तक में अहिंसक अर्थ-व्यवस्था के लिए वैकल्पिक तकनीक के पहलू पर भी गहराई से विचार किया गया है। बहुत से विद्वानों ने इस रूप में वैकल्पिक तकनीक की परिकल्पना की है जिससे शक्ति का केन्द्रीकरण न हो, मनुष्यों की बेकारी न बढे, संसाधनों के स्वामित्व में गहन असमानता न हो तथा पर्यावरण का संतुलन भी बना रहे। आचार्य इस संदर्भ में जॉन टोड, रोबिन क्लार्क और शुमाकर जैसे विचारकों के प्रस्तावों का उल्लेख करते हैं। वे यह मानते हैं कि महात्मा गाँधी की स्वदेशी की अवधारणा में वैकल्पिक तकनीक के विभिन्न प्रस्तावों अन्तर्व्याप्त देखा जा सकता है। महात्मा गाँधी के उत्पादन सम्बन्धी विचारों में स्वदेशी केन्द्रीय अवधारणा के रूप में व्याप्त है। इससे उनका तात्पर्य केवल देश में हुआ उत्पादन नहीं है, बल्कि अपनी जरूरतों, अपने संसाधनों और अपने तरीकों से किया गया उत्पादन है। गाँधी ने मशीन युग की सीमाओं को दर्शाया, और यह कहा कि मशीन युग का ध्येय मनुष्य को मशीन में परिवर्तित कर देना है, वहीं गाँधी यह चाहते हैं कि मशीन बना हुआ मनुष्य अपनी मूल स्थिति में पुनःप्रतिष्ठित हो जाए। इस सन्दर्भ में गाँधी ने मशीन को उसकी स्थान पर बिठाने पर भी जोर दिया। इसका अर्थ यह है कि वे उन सब मशीनों को स्वीकार कर लेते हैं, जो मनुष्य और प्रकृति के प्रति हिंसक या विनाशकारी नहीं होती, वे राज्य के स्वामित्व में उपयोगी सेवाओं के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीनों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। लेकिन वे उन मशीनों को स्वीकार नहीं करते हैं जो उत्पादन का केन्द्रीकरण करती हैं, अनावश्यक रूप से मानवीय श्रम की महत्ता को कम करती हैं और पर्यावरण के लिए घातक होती हैं। गाँधीजी के अनुसार, स्वदेशी प्रेम या अहिंसा का ही रूप है, जिसका तात्पर्य है कि स्वदेशी तकनीकी अहिंसक तकनीकी है। इस सन्दर्भ में गाँधीजी ने ऐसी विकेन्द्रीकृत आर्थिकी पर जोर दिया, जो आस-पास के संसाधनों पर आधारित हो- अर्थात् स्थानीय जरूरतों के लिए स्थानीय संसाधनों और स्थानीय तकनीक से किया गया उत्पादन। गौरतलब है कि चरखा गाँधीजी के लिए स्वदेशी का प्रतीक है, लेकिन वे चरखे के उद्योग का भी केन्द्रीकरण नहीं करना चाहते हैं क्योंकि वह स्वदेशी की भावना से अलग होगा। स्पष्ट तौर पर, महात्मा गाँधी की योजना में कुछ बहुत आवश्यक उद्योगों को स्वीकृति दी गयी है, लेकिन वे यह मानते हैं कि किसी भी समाज का मूल आधार स्वेदषी तकनीक पर आधारित ग्रामोद्योग हो सकते हैं (अहिंसक अर्थ-व्यवस्था, पृ. 60)।
नन्दकिशोर आचार्य इस बात को एक अविचारित पूर्वग्रह की संज्ञा देते हैं कि आधुनिक तकनीक के बिना उत्पादन की समस्या हल नहीं हो सकती है। इसके अलावा, वे अहिंसक स्वामित्व की धारणा के रूप में गाँधी की न्यासिता के सिद्धांत का समर्थन करते हैं, जो विकेन्द्रीकृत स्वामित्व की धारणा है। वे मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र को विश्लेषण करते हुए यह इंगित करते हैं कि असल में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अहिंसक अर्थव्यवस्था की निर्मिति के लिए विकेन्द्रित आर्थिक व्यवस्था की ओर बढना आवश्यक है।
इस पुस्तक में भारतीय समाजवाद शीर्षक से एक अध्याय सम्मिलित है, जिसे अहिंसक समाजवाद और अहिंसक अर्थव्यवस्था के संयोजन बिन्दु के रूप में देखा जा सकता है। लेखक इस बात पर बल देते हैं कि भारतीय समाजवादी चिन्तन का लक्ष्य अहिंसक संघर्ष, लोक शिक्षण और सामाजिक पहल के माध्यम से एक अहिंसक समाज की स्थापना करना है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वराज में रह सके। उनके अनुसार, पश्चिमी अवधारणा में समाजवााद एक राजनीतिक आर्थिकी की विचारधारा है, जबकि भारतीय विचारक इसे एक जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं (अहिंसक अर्थ-व्यवस्था, पृ. 84)। इनके विचारों में एक अहिंसक अर्थव्यवस्था की स्थापना के सूत्र मौजूद हैं।
आलोचनात्मक परीक्षण
नन्दकिशोर आचार्य की दोनों ही पुस्तकें बहुत ही सारगर्भित तरीके से विभिन्न विचारों और उनके जटिल आयामों को हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। आचार्य गाँधी के विचारों से मूल तत्त्व ग्रहण करने वाले भारतीय समाजवादी धारा को एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हालाँकि ये पुस्तकें काफी गहराई से अपना विश्लेषण प्रस्तुत करती है, किन्तु फिर भी पुस्तक की कुछ सीमाओं को निम्नलिखित बिन्दुओं में रेखांकित किया जा सकता हैः
पहला, अहिंसक समाजवाद पुस्तक में कुछ खास तरह की श्रेणियों के बीच में अन्तर स्पष्ट नहीं किया गया है। यह याद रखने की आवश्यकता है कि माक्र्सवाद के भीतर समाजवाद और साम्यवाद के बीच अन्तर किया जाता है। समाजवाद में हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम करेगा, और उसे अपने काम के अनुसार वेतन मिलेगा। इस अवस्था में राज्य का अस्तित्व कायम रहता है, और वह उत्पादन के साधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित करके कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभाता है। दूसरी ओर, साम्यवाद के बारे में यह माना जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम करेगा, और उसे अपनी आवश्यकता के अनुसार (संसाधन) मिलेगा। इस स्तर पर राज्य धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा, और निजी की सम्पत्ति की संस्था भी नष्ट हो जाएगी। लेखक ने माक्र्स के भीतर मौजूद समाजवाद और साम्य के बीच के इस अन्तर का कहीं विश्लेषण नहीं किया है।
दूसरा, यह पुस्तक माक्र्सवाद के भीतर मौजूद अलग-अलग तरह के विचारों की उपेक्षा करती है। इसके कारण, माक्र्सवाद के बारे में इसका वर्णन काफी सरलीकृत हो जाता है।
तीसरा, नन्दकिशोर आचार्य अपनी इस पुस्तक में भारतीय समाजवादी धारा के अनूठेपन को बहुत ही गहन और सहज रूप में पेश करते हैं, किन्तु उन्होंने इसकी सीमाओं पर विचार नहीं किया है। मसलन, लोहिया या जयप्रकाश की समाजवादी धारा भारत में हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ के खतरे को ठीक से नहीं भाप पायी, और उन्होंने जाने-अनजाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैधता के दायरे को बढाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चौथा, अहिंसक अर्थव्यवस्था पुस्तक में लेखक ने सही ही वैज्ञानिक तकनीक और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर आधारित अर्थव्यवस्था की आलोचना प्रस्तुत की है। लेकिन इस तरह की उत्पादन प्रक्रिया में भरोसा रखने वाली विचारधाराओं के भीतर ही पर्यावरण के सन्दर्भ में चिन्ता पैदा हुई है, जिसमें तकनीक और प्रकृति के दोहन पर आधारित उत्पादन प्रक्रिया की कमियों को दर्शाया गया है। मसलन, उदारवाद के भीरत के पर्यावरणीय चिंतन और माक्र्स के भीतर पारिस्थितिक-माक्र्सवाद के उदय को इसके उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। नन्दकिशोर आचार्य ने अपनी पुस्तक में इन पहलुओं की उपेक्षा की है, और उनकी कोई चर्चा नहीं की है।
पाँचवाँ, आचार्य इस तर्क को बहुत गम्भीरता से नहीं लेते हैं कि बढती जनसंख्या का भरण-पोषण करने के लिए उत्पादन प्रक्रिया को बढाने की आवश्यकता होती है, और उसमें वैज्ञानिक तकनीक और बडी मशीनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वे इस पूरे तर्क को पूर्वग्रह की संज्ञा देकर आगे बढ जाते हैं।
कुल-मिलाकर, दोनों पुस्तकें भारतीय समाजवाद के वैचारिक अनूठेपन को रेखांकित करती हैं। भारतीय समाजवाद की महत्ता के बारे में गहरा विश्लेषण करने के बावजूद लेखक इस बात पर विचार नहीं करते हैं कि आखिर पिछले तीन-चार दशकों में समाजवादी विचारों की धारा ने अहिंसक समाजवाद या अहिंसक अर्थव्यवस्था को आगे बढाने के लिए कौन-सा नवीन सूत्रीकरण दिया है।

निष्कर्ष
उपरोक्त आलोचनात्मक बिन्दुओं के बावजूद इसमें कोई संदेह नहीं है कि ये पुस्तकें अहिंसक समाजवाद और अहिंसक अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित विभिन्न आयामों काफी स्पष्टता से पाठकों के सामने रखती है। अहिंसक समाजवाद पुस्तक कुछ चुनिन्दा पश्चिमी विचारकों तथा समाजवादी धारा के विभिन्न भारतीय विचारकों के बीच संवाद के माध्यम से कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्र प्रस्तुत करती है। इसी तरह, अहिंसक अर्थव्यवस्था पुस्तक विकेन्द्रीकृत और स्वदेशी की अवधारणा पर आधारित मानवपरक अर्थव्यवस्था की तरफदारी करती है। दोनों ही पुस्तकों का संयोजन बिंदु भारतीय समाजवाद का विशिष्ट चरित्र है, जिसे लेखक अहिंसक तरीके से समाज को बदलने, मानव जीवन के तमाम पहलुओं में सकारात्मक बदलाव करने और आर्थिक व्यवस्था को शोषणरहित बनाने के एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
सन्दर्भ
नन्दकिशोर आचार्य (2021), अहिंसक समाजवाद, अहिंसा-शान्ति ग्रन्थमाला, प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर.
नन्दकिशोर आचार्य, (2021), अहिंसक अर्थव्यवस्था, अहिंसा-शान्ति ग्रन्थमाला, प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर.


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