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जोसेफ डोक : बापू का पहला जीवनीकार

शंभु जोशी
रेवरेंड जोसेफ जॉन डोक एक इंग्लिश बेपटिस्ट चर्च पादरी एवं मिशनरी थे । इसके साथ ही वह एक बहुत प्रवीण लेखक एवं चित्रकार भी थे। 1903 में उनका परिवार न्यूजीलैण्ड से दक्षिण अफ्रीका आ गया। डोक कई कारणों से स्मरण किए जाते हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी की जीवनी एम.के. गाँधीः एन इण्डियन पेट्रियॉट इन साउथ अफ्रीका (1909) में लिखी थी जो गाँधी की पहली जीवनी थी। जोसेफ डोक के पुत्र क्लीमेंट मार्टेन डोक दक्षिण अफ्रीका के 20वीं शताब्दी के बडे विद्वान माने जाते हैं। इन दो महत्त्वपूर्ण कारणों से जोसेफ डोक न केवल दक्षिण अफ्रीका में अपितु विश्व में आज भी याद किए जाते हैं। उन्होंने दो उपन्यास द सीक्रेट सिटी : ए रोमांस ऑफ द कार्रो तथा द क्वीन ऑफ द सीक्रेट सिटी भी लिखे थे । 1911 में कुछ समयावधि के लिए वह गाँधीजी के अखबार इंडियन ओपिनियन के संपादक भी रहे।
डोक का जन्म 05 नवंबर 1861 को चडली (डेवनशायर) में हुआ था उनके पिता भी बैपटिस्ट पादरी थे । 17 वर्ष की उम्र में ही अपने पिता के पद से इस्तीफे के कारण इस पद पर उनकी नियुक्ति हुई। 1881 में उन्हें केपटाउन (दक्षिण अफ्रीका) भेजा गया । 1886 में उनकी शादी कुमारी बिग्ससे से हुई । कुछ समय बाद उन्हें ब्रिस्टल भेज दिया गया, जहाँ वह 1894 तक रहे । इसी बीच उन्होंने कईं देशों की यात्राएँ कीं जिनमें मिस्र, फिलिस्तीन, भारत आदि देश शामिल थे । 1894 में उन्हें न्यूजीलैण्ड भेज दिया गया। वहाँ प्रवासी चीनियों के लिए उन्होंने काफी काम किया । अपने पादरी के उत्तरदायित्व के साथ किए गए उनके कामों की काफी प्रशंसा हुई ।
1903 में ग्रैहम्सटाउन गिरजे की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई और वह पुनः दक्षिण अफ्रीका में काम करने लगे। यहाँ चार साल काम करने के दौरान उन्हें दक्षिण अफ्रीकी बैपटिस्ट यूनियन का प्रेसिडेन्ट चुना गया । 1907 में उन्हें सेंट्रल चर्च जोहानिसबर्ग का धर्माधिकारी बनाया गया जिस पर वह मृत्युपर्यन्त कार्य करते रहे । इस चर्च को ऋण अदायगी से उबारने के लिए उन्होंने अमेरिका एँव इग्लैण्ड की यात्राएँ भी कीं ।
1913 में अपने पुत्र (क्लीमेंट) के साथ पश्चिमोत्तर रोडेशिया में स्थित मिशन स्टेशन की यात्रा का निर्णय लिया इस यात्रा का सारा खर्चा उन्होंने अपने उपन्यास द सीक्रेट सिटी के प्रकाशन से प्राप्त राशि से किया था । क्लीमेंट को किसी कारणवश पुनः घर लौटना पडा। डोक ने अपनी यात्रा एवं प्रवास के उद्देश्य को बखूबी पूरा किया । इस क्षेत्र के निवासियों से मिले, दुभाषियों के जरिए उनसे चर्चाएँ की। यह अनुभव किया कि इस क्षेत्र में उनके जैसे कार्यकर्ताओं के लिए करने को बहुत कुछ है । 07 अगस्त को क्लीमेंट को घर के लिए रवाना कर वह उमतली नामक जगह की ओर चल पडे । वहाँ मिशनरी कार्यकर्ताओं से भेंटकर चर्चाएँ की । इस बीच उनका स्वास्थ्य बिगडने लगा । उन्हें ज्वर की शिकायत पर उमतली अस्पताल ले जाया गया । 15 अगस्त 1913 को आत्र ज्वर (इंटेरिक फीवर) रोग से उनका देहावसान हुआ । चूँकि उनका घर काफी दूर था अतएव 17 अगस्त 1913 को उमतली में ही उनका अन्तिम संस्कार किया गया ।
जोहानिसबर्ग में आने के बाद से ही डोक ने भारतीयों के प्रतिरोध को अपना समर्थन दिया। गाँधी के साथ मिलकर उन्होंने अन्यायपूर्ण रंगभेदी कानूनों की घोर आलोचना की। इस आन्दोलन की सच्ची झलक देने और इसके न्यायपूर्ण पक्ष को दक्षिण अफ्रीका एवं विश्व के अन्य देशों के सामने प्रस्तुत करने के लिए निरन्तर लेखन एवं यात्राओं के जरिये प्रयास किए । इसी कडी में गाँधीजी की पहली जीवनी लिखने का श्रेय इन्हें मिला।
डोक नैसर्गिक सहयोगी एवं न्यायप्रिय व्यक्ति थे । हमेशा पीडित पक्ष के साथ खडे होते थे। भारतीयों के आन्दोलन के प्रति उनकी सोच थी कि भारतीय उचित माँग कर रहे है और ब्रिटिश नागरिक होने के नाते अपने नागरिक अधिकारों की माँग कर रहे थे। उन्होंने इसका समर्थन किया। बोअर युद्ध के समय ब्रिटिश राजभक्ति की लहर में भी उन्होंने यह रेखांकित किया कि इस संघर्ष का एक पक्ष यह था कि बोअर उत्पीडक नहीं बल्कि उत्पीडित थे। अपने से इतर प्रत्येक पीडित की सेवा को उन्होंने ईश्वर की सेवा समझा और व्यवहार में ढालकर प्रस्तुत किया।
गाँधी से पहली मुलाकात में ही दोनों एक-दूसरे को सहयोगी मानने लगे थे । पहली मुलाकात में हुई लम्बी बातचीत ने दोनों ने एक-दूसरे को अपना पूरक माना । उनकी दृष्टियाँ समान थीं । न्याय और सेवा का भाव दोनों में जबर्दस्त था । दोनों कार्य के प्रति समर्पित थे। दोनों की रुचि धर्म के सच्चे स्वरुप के प्रति थी और धर्म की मूल चेतना एवं तदनुसार आचरण उनकी विशिष्टता थी । उन्होंने अपने को धर्म से बाँधा और उससे परे जाकर मानवता के प्रति अपना कर्त्तव्य पूरा किया । दोनों नैतिक जीवन को महत्त्व देते थे। दोनों ने धर्मग्रन्थों के शब्दों के स्थान पर उसके भाव को ग्रहण कर आचरण किया । गाँधी और डोक के सम्बन्धों पर टिप्पणी करते हुए गुहा ने लिखा कि,डोक की दृष्टि में गाँधी के जीवन की सादगी और उनके क्रियाकलापों की सत्यप्रियता, न्याय के लिए मृत्यु को भी अंगीकार कर लेने की उनकी तत्परता ने गाँधी को ज्यादातर ईसाइयों की तुलना में नाजेरथ के उस यहूदी (ईसा मसीह) के ज्यादा निकट ला दिया था।
रामचन्द्र गुहा ने डोक के बारे में लिखा कि वे बैपटिस्ट मिनिस्टर थे। उन्होंने गाँधी से मिलने से और इस आन्दोलन से जुडने से काफी पहले भी हिन्दुस्तान का गहन दौरा किया था। वह बनारस, कलकत्ता और मुम्बई घूम चुके थे। डोक के अनुसार भारत, विरोधाभासों का देश है, मैं उसे समझ नहीं पाया। डोक के परवर्ती जीवन में गाँधी और उनके आन्दोलन में उनकी संलग्नता के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जिन विरोधाभासों का जिक्र वह कर रहे थे, सम्भवतः गाँधी ने उनके प्रति एक स्पष्ट दृष्टि बना ली थी और उसे आचरण में उतार चुके थे। इसलिए डोक का गाँधी के प्रति स्नेह और समर्पण अधिक प्रगाढ हुआ होगा।
श्री एवं श्रीमती डोक द्वारा महात्मा गाँधी की सेवा किए जाने पर वहाँ के सम्पूर्ण भारतीय समाज ने फरवरी 1908 में इस दम्पती को हार्दिक धन्यवाद दिया । इस सार्वजनिक सभा में भारतीय चीनी और यूरोपीय लोगों की उपस्थिति थी । चीनी समुदाय ने 23 मार्च 1908 को गाँधीजी की देखभाल के लिए अलग से सभा आयोजित कर इस दम्पती को धन्यवाद ज्ञापित किया ।ऐसे ही एक अवसर पर डोक के सम्मान में भाषण देते हुए गाँधी ने कहा कि, श्री डोक की भलमनसाहत और सादगी से बहुत-से भारतीय परिचित हैं ... उनके काम की जितनी भी प्रशंसा की जाए, उतनी ही कम है। स्वयं गाँधी ने अपने मित्रों को लिखे पत्रों में डोक दम्पती द्वारा की गई सार-सम्भाल की सराहना की। भारतीय एवं चीनी समुदाय के लोगों ने धन्यवाद के तार और फल व मेवे देकर कृतज्ञता ज्ञापित की ।
दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास में स्वयं गाँधी ने इस घटना व डोक दम्पती की सेवा की चर्चा की। डोक दम्पती ने लगभग दस दिनों तक गाँधी की अहर्निश सेवा सुश्रूषा की। गाँधी की सेवा सुश्रुषा के लिए एशियाई मूल के विभिन्न लोगों ने जो पैसे और उपहार इस दम्पती को भेंट किए, उनके बारे में इस दम्पती ने यह निर्णय लिया कि उसका प्रयोग भारतीय बच्चों की पढाई के लिए इंतजाम में करेंगे ।
गाँधी ने अपनी सेवा-सुश्रूषा कर रहे श्री डोक से अपनी आशंका जताई कि वे एक हिन्दुस्तानी को अपने घर में पनाह दिए हुए हैं, यह उनके लिए नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि उनकी आजीविका बैपटिस्ट सम्प्रदाय के गोरों के गिरजाघर से ही चलती थी । इस पर डोक का दिया गया उत्तर इस पूरी किताब की महत्ता एवं प्रासंगिकता प्रकट करता है। डोक ने कहा कि मैं उस महापुरूष का अनुयायी हूँ, जो अपने धर्म के पालन के लिए सूलीपर चढा था और जिसका प्रेम इस विश्व जैसा ही विशाल था । जिन गोरों के बारे में अपको डर है कि वे मेरा त्याग कर देंगे, उनके सामने यदि मैं ईसा का प्रतिनिधित्व करने की थोडी भी अभिलाषा रखता हूँ, तो हिन्दुस्तानी कौम की लडाई में मुझे सार्वजनिक रूप में भाग लेना ही चाहिये; और ऐसा करने से मेरा मण्डल यदि मुझे त्याग दे, तो मुझे जरा भी दुःखी नहीं होना चाहिये । ... मै कोई हिन्दुस्तानियों पर मेहरबानी करने के लिए इस लडाई में शरीक नहीं हुआ हूँ । इसे अपना धर्म मानकर मैं इसमें शरीक हुआ हूँ। डोक ने अपने एक भाषण में कहा कि, भारतीय समाज ने सत्याग्रह की सच्ची लडाई लडी है। वह अपने नाम को इसी तरह निभाता चला जाएगा,ऐसी आशा है। यह स्पष्ट है कि डोक ने भारतीय समुदाय के इस आन्दोलन के जरिये एक आशा देखी थी और विश्वास किया था कि भारतीय अपनी लडाई में सत्याग्रह को नहीं छोडेगें। इतिहास ने उन्हें सही सिद्ध किया और इसी सत्याग्रह के कारण भारतीय अपनी लडाई में कामयाब हुए। आगे चलकर यह सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आधार बना।
वस्तुतः यही जो धर्मदृष्टि थी जो गाँधी को इस आन्दोलन को चलाए रखने की प्रेरणा दे रही थी। डोक ने भी अपने धर्म के जरिए ही यह जाना कि न्याय के लिए किए जाने वाला संघर्ष धर्म की ही सेवा है। अतएव दोनों ही मानवता के उन्नयन के लिए अपनी धर्मदृष्टि से परिपुष्ट दत्तचित्त हो कर एक न्यायसंगत लडाई में भागीदारी कर रहे थे। डोक के बारे में गाँधी ने उल्लेख किया कि, श्री डोक ने सत्याग्रह के पवित्र उद्देश्य की बहुत बडी और निर्भय सेवा की है... उनकी दृष्टि में यह केवल एक राजनीतिक युद्ध नहीं है, बल्कि एक धर्मयुद्ध - मानवजाति का मानवजाति के निमित्त युद्ध - है। (सम्पूर्ण गाँधी वाङमय, ख.ड 10, पृ. 167)
डोक ने एक अवसर पर भाषण (सम्पूर्ण गाँधी वांङमय, खण्ड 8, पृ. 144) में कहा कि, भारतीय समाज ने सत्याग्रह की सच्ची लडाई लडी है। वह अपने नाम को इसी तरह निभाता चला जाएगा, ऐसी आशा है। यह दर्शाता है कि डोक ने भारतीय समुदाय के इस आन्दोलन के जरिये एक आशा देखी थी और विश्वास किया था कि भारतीय अपनी लडाई में इस सत्याग्रह को नहीं छोडेगें। इतिहास ने उन्हें सही सिद्ध किया। तमाम झंझावातों और साजिशों के बावजूद भी सत्याग्रह को न त्यागने कारण ही भारतीय अपने उद्देश्य को पाने में सफल रहे ।
रेवरेंड डोक की जीवनी लिखने वाले विलियम ई. करसंस को गाँधी ने लिखा (रेड्डी, ई.एल. एवं गाँधी, गोपालकृष्ण (1993)। गाँधी एँड साउथ अफ्रीका 1914-1948. अहमदाबाद : नवजीवन पब्लिशिंग हाउस पृ. 47-49) कि उन्होंने भारतीय अप्रतिरोध आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन अन्तिम परिणति तक जीवित नहीं रह सके। भारतीय प्रश्न को अपना विषय माना। इस प्रश्न पर उपस्थित विभिन्न सामग्री को खंगाला, आत्मसात किया। इस आन्दोलन के बारे में लिखा और विषय विशेषज्ञ के रूप में अधिकारियों से सम्पर्क किया।
डोक की मृत्यु पर इण्डियन ओपिनियन के लिए विशेष रूप से लिखित संस्मरण में गाँधी ने बताया कि, उनके लिए प्रत्येक मुनष्य मित्र और बन्धु था... उनका जीवन मानो, कर्मयोग का उपदेश था। ... हमें उनके जीवन से सभी मनुष्यों से प्रेम करनेकी सीख मिलती है। (सम्पूर्ण गाँधी वाङमय, खण्ड 12, पृ. 160-166)
डोक द्वारा लिखित एम. के. गाँधीः एन इण्डियन पेट्रियॉट इन साउथ अफ्रीका 1909 में पहले आलेखों की श्रृँखला के रूप में द लंदन इण्डियन क्रानिकल में प्रकाशित हुई थी तथा बाद में इसका प्रकाशन पुस्तकाकर में किया गया। इस किताब का पहला भारतीय प्रकाशन अप्रैल, 1919 में जी ए नटेसन, मद्रास द्वारा प्रकाशित किया गया था । इस जीवनी की खासियत है कि यह उनके महात्मा बनने के पहले की जीवनी है। यह उनके संघर्षों की साथी है । उनकी हमसफर की तरह उनको बयाँ करती है। यह जीवनी स्तुतिगान नहीं है । यह एक न्यायोचित संघर्ष की और उसके अगुआ की सम्यक विवेचना है।यह जीवनी उन्हें सफलता के बडे दावों में नहीं तौलती है । बल्कि उस संघर्ष एवं उसके नेता के तर्कों की विवेकपूर्ण अभिव्यक्ति है। यह उस समय की घटनाओं को सामने रखती है जब स्वयं गाँधी 39 बरस की उम्र में विश्व के सबसे ताकतवर साम्राज्य एवं सबसे क्रूर प्रशासन के सामने अपने अहिंसक तरीके से न्यायपूर्ण लडाई लड रहे थे । गुहा ने डोक की इस पुस्तक को लिखने के बारे में उनके निहित उद्देश्य को संकेतित करते हुए लिखा कि डोक, त्याग और बलिदान की वो कहानी लिखना चाहते थे जिसमें विजय सुनिश्चित थी। (गुहा,पृ. 330) डोक अपने आँखों देखा हाल और गाँधी द्वारा बतायी गयी कहानी के आधार पर जीवनी लिखना चाहते थे।
डोक इस पुस्तक को लिखने से पहले लगभग एक से डेढ वर्ष पूर्व ही गाँधी से मिले थे। डोक ने इस पुस्तक को लिखने के लिए गाँधी से कई बार मुलाकात की और उन लोगों से भी मिले जो इस आन्दोलन के सहभागी थे। डोक ने उनके पूर्वजों, जन्म, बचपन, पोरबन्दर सहित अन्य रियासतों की राजनीतिक उठापटक को भी लेखनी का विषय बनाया । डोक ने स्पष्ट किया कि यह आन्दोलन ट्रांसवाल को प्रान्तीय सरकार द्वारा लाए गए एशियाटिक लॉ अमेंडमेंड आर्डिनेस के विरोध में प्रारम्भ किया गया था । इसमें उल्लेख था कि प्रत्येक एशियाई को हर समय पहचानपत्र लेकर चलना होगा। यह एक तरह से इस समुदाय के प्रति असम्मान का भाव दर्शाता था। उन्हें ब्रिटिश शासन के प्रत्येक नागरिक के अधिकारों से वंचित करता था । इस पूरे आन्दोलन की माँग ब्रिटिश प्रजा होने के भारतीय के नागरिक अधिकारों को उन्हें पुनः प्रदान किए जाने की थी ।
इस पुस्तक की भावना दक्षिण अफ्रीका में जारी अहिंसक प्रतिरोध और उसके नेता के दर्शन को विशेषकर यूरोपीय लोगों तक सही रूप में पहुँचाने की रही है । एक ईसाई पादरी द्वारा लिखी गयी पुस्तक इस आन्दोलनको ईसा के संदेश से प्रेरित मानकर प्रेम के जरिये महारोचक है कि ईश्वर का साम्राज्य (प्रेम का साम्राज्य) स्थापित करने के रूप में देखती है । पृ. 7 अनुवाद)
यह रोचक है कि एक ब्रिटिश पादरी द्वारा लिखित जीवनी का प्राक्कथन ब्रिटिश साम्राज्य के भारत के वायसराय रहे लार्ड एम्पाथिल ने लिखी। यह जीवनी उस व्यक्ति की जीवनी थी जो उनके साम्राज्य को विरूद्ध प्रतिरोध कर रहा था । एम्पाथिल ने लिखा कि उनके नजरिये से इस पुस्तक में दी गयी जानकारी प्रामाणिक और उसका मूल्यांकन (अनुवाद पृ. 9) सही है । वह स्पष्ट करते हैं कि गाँधी और उनके आन्दोलन का गन्तव्य ब्रिटिश साम्राज्य के अपने हितों और आर्थिक लाभ के लिए उपयोगी (अनुवाद पृ. 10) है ।अपने प्राक्कथन में लार्ड एम्पाथिल इस आन्दोलन को नैतिक प्रश्न की तरह प्रस्तुत करते हैं और उनके अहिंसक प्रयास को औचित्य प्रदान करते हुए कहते हैं, वे किसी कराधान का स्वार्थपूर्ण विरोध नहीं कर रहे हैं और न किसी नयी राजनीतिक सुविधा के लिए अविचारित लडाई लड रहे हैंर्‍ वे केवल उसे पुनः प्राप्त कर लेने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनसे छीन लिया गया है- अपने समाज का सम्मान। (अनुवाद पृ.10)
वह इस बात को रेखांकित करते हैं कि साम्राज्य की बेहतर उसके प्रजा की बेहतरी से ही सम्भव है । वह बार-बार सुझाते हैं कि ब्रिटिश शासन उदारतापूर्वक इस समस्या का समाधान कर सकता है और उसे ऐसा करने के लिए हठधर्मिता छोडकर आगे आना चाहिए। (अनुवाद पृ. 10-11) वह इसे अंग्रेजों- प्रकारान्तर से ब्रिटिश शासन के - सच्चे उदारवादी सिद्धांतों से विचलन (अनुवाद पृ. 11) के रूप में देखते है और साथ ही आगाह भी करते हैं कि यदि इस तरह के अन्यायों को अनदेखा किया गया तब यह मान लेना चाहिए कि साम्राज्य के शासन की हमारी प्रतिभा के पतन की शुरूआत हो चुकी है। साथ ही इसके दूरगामी परिणामों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि यदि भारत - क्रुद्ध, दमित और अपमानित भारत - साम्राज्य के महान सरोकारों में एक अनिच्छुक और अडियल सहभागी हो जाए : निश्चय ही यह साम्राज्य के अन्त की शुरूआत होगी। (अनुवाद पृ. 11-12) लार्ड एम्पाथिल के इन वाक्यों में आगे आने वाले इतिहास की झलक हम देख सकते हैं। वह सुझाव भी देते हैं कि इस सवाल को सिद्धान्त की अवहेलना करने वाली व्यावहारिकता की तात्कालिक तस्वीर से नहीं बल्कि हमारी जाति की नैतिकी के बुनियादी सिद्धान्तों के आधार पर सुलझाया जाना जरूरी है। (अनुवाद पृ. 12)।
यह गौरतलब है कि लार्ड एम्पाथिल अपने प्राक्कथन में ब्रिटिश साम्राज्य को बनाए रखने के लिए इस समस्या का समाधान चाहते हैं, परन्तु वह राजनीति और रणनीति के बजाय जिन नैतिक तर्कों और न्याय के सिद्धान्तों को आधार बनाकर इसे हल करने का प्रस्ताव करते हैं, वहीं बात इस प्राक्कथन को महत्ता प्रदान करती है।
डोक प्रारम्भ में ही इस लडाई को सभी एशियाईयों को एक अपराधी समुदाय मान लेने के सिद्धान्त पर आधारित एशियाई विधि संशोधन कानून के विरोध के रूप में बताते हैं और स्पष्ट करते हैं कि, उसके नेता के सौभाग्य से, तोलस्तोय का एक बहुत सुसंस्कृत, सभ्य, साहसी शिष्य होने के कारण इस आन्दोलन का चरित्र निष्क्रिय प्रतिरोध का है । (अनुवाद पृ. 16) । डोक कई स्थानों पर निष्क्रिय प्रतिरोध और कईं स्थानों पर सत्याग्रह का प्रयोग करते हैं जबकि स्वयं गाँधी इन दोनों में अन्तर स्पष्ट करते हैं ।
यह पुस्तक गाँधी के संघर्ष को अभिव्यक्त करती है। एक महामानव के बनने की प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण है । गाँधी के विभिन्न आत्मसंघर्षों, विपरीत परिस्थितियों में फँसने की कथा बताते हुए यह साथही साथ स्वयं गाँधी द्वारा उनसे बाहर निकलने की प्रक्रिया का भी उल्लेख करती है। मसलन बचपन में माँसाहारकी घटना के बीच भी इस कपटजन्य स्वतंत्रता के दौरान उनका सत्यप्रेम (अनुवाद पृ. 34-37) जिसने उन्हें बदतर पापों से बचाए रखा । यह शैली पूरी किताब में देखने को मिलती है । इस व्यक्तित्व के गुणों को प्रस्तुत करते हुए या तो वे गाँधी के कथन को उद्धृत करते हैं या उनके साथ बातचीत का उल्लेख करते और कहीं-कहीं स्वयं उस बात की व्याख्या करते हैं । लेखक के अनुसार गाँधी-गाँधी बनते हैं, एक सामान्य इन्सान की तरह जीवन जीते हुए उसी की तरह समस्याओं का सामना करते हुए परन्तु वे समस्याओं से जिस जीवन दृष्टि के सहारे उबरते है, उनका समाधान ढूँढते हैं और अपने आचरण में क्रियान्वित करते है, यही बात उन्हें अनुपम बनाती है, नायक का दर्जा दिलाती है ।
डोक ने अपनी पुस्तक में लगातार गाँधी के नामक के रूप में बढने की बात कहीं उसके पीछे के गुणों को स्पष्ट रूप से बताया । वे थे - सत्यनिष्ठा, विश्वस्त मजबूती, महान हृदय एक पारदर्शी ईमानदारी, निःस्वार्थता (देखे पृ. 18-21); स्पष्टता, सरलता और आग्रहशीलता (पृ. 53)। इन सबसे आगे बढकर अपने उद्देश्य के प्रति आत्म बलिदान होने की उत्कट अभिलाषा(पृ.86)। इन्हीं गुणों के आधार पर गाँधी का सार्वजनिक व्यक्तित्व निर्मित हुआ। लोगों के बीच उनकी विश्वसनीयता कायम हुई। वचन और कर्म की एकता ने लोगों के बीच उनकी छवि दृढ नायक की बनी जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में उन्हें नहीं छोडता और जेल जाने, जुर्माना भरने के लिए पीछे नहीं हटता और ऐसा करते हुए अपने लक्ष्य को अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देता। इसी कारण लोगों के अटूट विश्वास ने इस अहिंसक आन्दोलन को कभी कमजोर नहीं होने दिया और आगे चलकर यह आन्दोलन अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सका।
लेखन पुस्तक में कई जगहों पर गाँधी की आगामी भूमिका और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बारे में अपनी टिप्पणियाँ करते हैं। वह टिप्पणियाँ आज के समय में उनकी दूरदर्शिता का पर्याय कही जा सकती हैं। मसलन गाँधी से चर्चा के दौरान वह कहते हैं मुझे लगता है कि हम अभी जो कुछ कर रहे हैं, वह एशियाई सवाल का मामूली हिस्सा है- इस सवाल के साथ हमारा संघर्ष उस बडे संघर्ष का केवल एक हिस्सा मात्र है, जिसे एक बडे पैमाने पर लडा जाना है। सम्पूर्ण साम्राज्य में ब्रिटिश भारतीयों की हैसियत के सवाल को हल किया जाना है और इस बडी समस्या के समाधान में आपकी भूमिका बहुत बडी होगी। (अनुवाद पृ.23)
लेखक ने गाँधी की प्रविधि को सूक्ष्मता से रेखांकित किया है। उनकी विचार-सरणि को अपने शब्दों में प्रस्तुत किया। उन्होंने दर्शाया कि गाँधी अपने समुदाय को बहुत बारीकी से जज्ब कर चुके थे। उनके बीच जागृति लाकर वे उन्हें इस खुद ओढी गुलामी से मुक्त करना चाहते थे, लेकिन स्वयं को अवतार के रूप में प्रस्तुत करके नहीं बल्कि लोगों को जागरूक और दृढ व्यक्तित्व बना कर। वे इस प्रक्रिया का श्रेय स्वयं नहीं लेकर समुदाय को देने के इच्छुक थे। लोगों के बीच जागृति हो, वे स्वयं के प्रति अन्याय के खिलाफ मुखर हो, तभी आन्दोलन सफल हो सकेगा। डोक लिखते हैं, गाँधी समझ रहे थे कि गुलामी में डूबे हुए भारतीय समुदाय को जगाने के लिए इस प्रकार की जागृति आवश्यक है। ... कुछ असाधारण अपवादों के सिवा उनमें न तो उच्च सिद्धांत थे, न महत्वाकांक्षाएँ, मानवतत्त्व की चेतना भी नहीं, जिससे वे औपनिवेशिक कानूनों के बढते जाते दमन का प्रतिरोध कर सकें। वे अपनी गुलामी-सी जिंदगी से सन्तुष्ट थे। यह उदासीनता गाँधीजी को बहुत भयानक लगती थी। वह उनके सामर्थ्य से परिचित थे, पर देख रहे थे कि वे दूसरी दिशा की ओर उन्मुख हैं, इसलिए गाँधीजी ने अपनी पूरी शक्ति के साथ उन आन्तरिक और बाध्य तत्त्वों का प्रतिरोध करने का दृढनिश्चय किया, जो इस अपमानजनक स्थिति के लिए जिम्मेदार थे। (अनुवाद पृ.51)
कोई भी प्रबुद्ध पाठक इस पूर्वपीठिका को पढकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गाँधी की भूमिका और उनके प्रयासों/साधनों के बारे में आसानी से जान-समझ सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह आन्दोलन की जमीन पर ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सूत्र बो दिए गए थे। हालाँकि स्वयं गाँधी इस समय तक अंग्रेजी शासन से विमुख नहीं थे, उनकी न्यायप्रियता पर विश्वास करते थे। वस्तुतः 1920 के बाद गाँधी का भारत में वही रूप देखने को मिलता है जो दक्षिण अफ्रीका में आन्दोलनरत गाँधी से काफी मिलता है।
लेखक ने बार-बार इस बिन्दु का उल्लेख किया कि इस आन्दोलन की नींव नैतिक पक्ष पर रखी गयी है। यह नैतिक पक्ष था - भारतीयों को ब्रिटिश शासन में नागरिक अधिकारों की प्राप्ति। इसलिए लेखक के अनुसार इस आन्दोलन के जरिए गाँधी का उद्देश्य, भारतीय समुदाय का ट्रांसवाल उपनिवेश के उपयोगी अंश की तरह समावेशीकरण तथा उसके सदस्यों को साम्राज्य के निष्ठावान नागरिकों की तरह पहचान स्थापित करना था। नागरिकों के अधिकारों के प्रतिकूल कोई भी बात,जो उन्हें पृथक, विलग या निष्क्रिय अंश बना देती, गाँधीजी के अनुसार,उनके चरित्र की अवमानना, एक राष्ट्रीय चोट और ब्रिटिश न्याय का मखौल था। वह चरम सीमा तक इस नीति का प्रतिरोध करने के लिए कृत संकल्प थे। (अनुवाद पृ.71) इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर गाँधी ने ब्रिटिश न्यायपूर्ण व्यवस्था के दावे को चुनौती देते हुए अपने तर्कों को प्रस्तुत किया कि विभाजनकारी नीति ब्रिटिश व्यवस्था के दावे को झुठलाती है इसलिए इसे वापस लिया जाना चाहिए।
डोक ने जिस विभेदकारी कानून को इस अहिंसक आन्दोलन के मूल में बताया, उसके साथ यह भी जिक्र किया कि इन कानूनों कोलागू करने वाली उपनिवेशी व्यवस्था भी नस्लीय पूर्वग्रह (पृ.88) से ग्रसित थी। इस व्यवस्था के एशियाई विभाग में आधिकारिक अयोग्यता (पृ.88) भी इस समस्या का स्रोत थी। यह उल्लेखनीय है कि गाँधी का सामना एक विभेदकारी कानून के साथ-साथ विभेदकारी उपनिवेशी व्यवस्था से भी था। गाँधी ने अपने अहिंसक आन्दोलन के माध्यम से इन दोनों के प्रति प्रतिरोध की नीति अपनायी थी। लेखक गाँधी की योग्यता को उजागर करते हुए लिखते हैं कि, भारतीय समुदाय समझता था कि अधिकारी वर्ग की यह कार्यप्रणाली स्वाभाविक थी। इस वर्ग के सामने यह स्पष्ट था कि इस समुदाय में उच्च चरित्र वाला एक स्पष्ट कानूनी दिमाग है, जो भारतीयों को पशुओं की तरह हाँके जाने या उनके साथ घृणास्पद व्यवहार को अधिकारी-वर्ग के लिए नामुमकिन कर देगा। (पृ. 70) डोक का यह विश्वास सच साबित हुआ। व्यक्ति से परे जा कर घृणास्पद नस्लीय पूर्वग्रह को दूर करने के आन्दोलन के प्रयासों ने दक्षिणी अफ्रीकी उपनिवेशी शासन व्यवस्था को आगे चलकर अपनी नीतियाँ बदलने को बाध्य कर दिया।
लेखक ने गाँधी के कुशल संवादकर्ता के पक्ष को भी उजागर करते हुए इण्डियन ओपिनियन के बारे में विस्तार से लिखा और इस आन्दोलन में उसकी भूमिका को बताया। उन्होंने उल्लेख किया कि इस समाचार पत्र के माध्यम से गाँधी का उद्देश्य, सम्पूर्ण दक्षिण अफ्रीकी उपनिवेशों में रहने वाले भारतीयों से निरन्तर संवाद (पृ. 77) था। इसके माध्यम से वह अपना सपना पूरा करना चाहते थे और इस समुदाय में जागृति लाना चाहते थे।
डोक ने गाँधी को स्वप्नदृष्टा (पृ. 77) बताते हुए उनके सपने के बारे में लिखा कि गाँधी दक्षिण अफ्रीका में ऐसे भारतीय समुदाय की आकांक्षा रखते थे जो सुशिक्षित, भारतीय प्राचीन सभ्यता का योग्य उत्तराधिकारी, सर्वनिष्ठ आदर्शों से बँधा हुआ, भारतीय रहेतु हुए दक्षिण अफ्रीका में ऐसा कार्य करें कि उन्हें गर्व हो तथा प्रत्येक ब्रिटिश नागरिक को प्राप्त सुविधाएँ अधिकार उन्हें प्राप्त हो सकें। गाँधी इसी सपने को पूरा करने के लिए अपने रचनात्मक प्रयासों में लगे हुए थे। इण्डियन ओपिनियन, आश्रम जीवन आदि भी इसे के हिस्से थे। यहाँ यह स्पष्ट है कि वे अपने स्वप्न में ब्रिटिश नागरिक के अधिकारों की माँग तो करते है, परन्तु साथ ही प्रत्येक भारतीय को अपनी परम्परा और संस्कारों से जोडे रखने, अपनाने की सलाह भी देते हैं ताकि वे अपनी कर्मभूमि (दक्षिण अफ्रीका) में आदर्श हो सके।
यह पूरी पुस्तक सामान्य जीवनी की तरह नहीं लिखी गयी है। वस्तुतः यह गाँधी के आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में उनके जीवन के उल्लेखों और उनके संघर्षों की गाथा है। इस पुस्तक के माध्यम से वह दक्षिण अफ्रीका और अन्य देशों के लोगों को गाँधी और अहिंसक आन्दोलन के बारे में बताने के लिए ज्यादा उत्सुक हैं। इसलिए इसमें जीवन के क्रमिक विकास पर कम और गाँधी के वैचारिक विकास, आत्मसंघर्षों का उल्लेख अधिक किया गया है। उनके धार्मिक विचारों (पृ. 98-102) का उल्लेख करते हुए उन्हें हिन्दू धर्म का अनुयायी बताते हुए सभी धर्मों की श्रेष्ठता के प्रति आग्रहशील की तरह प्रस्तुत करते हैं। इसी अध्याय में डोक इस आन्दोलन में निहित तत्त्व को समझने में चर्च असफल हुए है, उसे लेकर एक बहुत सुन्दर बात कहते हैं, मैं समझता हूँ कि हम निष्क्रिय प्रतिरोध आन्दोलन की अन्तर्मुखता को पहचानने में विफल रहे हैं; इन लोगों ने हमारी स्पष्ट उदासीनता को पूरी तरह महसूस किया है। वस्तुतः यह कोई व्यापारिक झगडा नहीं, न कोई राजनीतिक कदम ही है। यह एशियाईयों में अपने मानवत्व के बोध का संकेत है- यह संकेत कि अब वे हमारे समाज में किसी गुलामी या निम्नतर स्थिति में रहने को तैयार नहीं हैं। (पृ.102) मानवीय पीडा के बोध को गाँधी ने अपने धर्म से समझा और डोक ने अपने धर्म से। दोनों ने धर्म को आचरण से जोडा और चहारदीवारों से बाहर उसे सार्वजनिक जीवन में साझा किया। यही उन्हें विशिष्ट बनाती है और अन्य लोगों से पृथक करती है।
इस किताब में बहुत ऐसी चीजें हैं जो दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास तथा सत्य के मेरे प्रयोग-आत्मकथा के साथ पढने पर कुछ छूटी हुई-सी लगती हैं । मसलन पिताजी की सेवा करते हुए विभिन्न धर्मावलम्बियों के मिलने,दाय माँ रंभा, बम्बई के वकालत के अनुभव आदि का उल्लेख नहीं किया गया है जिनका उल्लेख गाँधी अपने परवर्ती लेखन में करते हैं।
सारतः यह कहा जा सकता है कि डोक द्वारा लिखित यह पुस्तक गाँधी के विचार और जीवन को समझने में हमारी बहुत मदद करती है। यह उन प्रारम्भिक दिनों का दस्तावेज है जब गाँधी स्वयं खुद को गढ रहे थे और साथ ही एक प्रचण्ड शक्तिशाली शासन से संघर्ष भी कर रहे थे। यह पुस्तक तत्कालीन राजनीतिक, कानूनी चालाकियों के बीच मूल मानवीय मूल्यों के दृढ बने रहने, शक्ति के बरअक्स आत्म बलिदान को रेखांकित करती है। यह पुस्तक गाँधी के जरिये हमें बाध्य करती है कि हम सोचें कि हमारी शासन व्यवस्था,धर्म और कानून कैसे मानव को अमानवीय परिस्थितियों में ले जाते हैं और किस तरह एक अहिंसक संघर्ष हमें अवसर देता है कि हम इस भूल को सुधारें। स्वयं डोक इस आन्दोलन की परिणति तक जीवित नहीं रह सके, परन्तु इस पुस्तक के माध्यम से मानवता में उनका विश्वास सत्य साबित हुआ। यही पुस्तक की भी प्रासंगिकता है।

- सम्पर्क - डी-2, टीचर्स क्वाटर्स, गाँधी हिल्स, पोस्ट- हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा-४४२००१ (महाराष्ट्र) मो. ९९७०८-६५९८७