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सूरज पिघल रहा है

हरिप्रकाश राठी
जोधपुर शहर के ज्वाला विहार मोहल्ले में स्थित उस बगीचे में आज सुबह कुछ भी नया नहीं था। वही हरे मखमली कालीन की तरह बिछी दूब जिस पर पतली टाँगों वाले कुछ पक्षी यहाँ-वहाँ फुदक रहे थे, वही चारों ओर झूमते पेड जिनमें अधिकांश नीम के थे हालाँकि एक-दो पेड गुलमोहर, पीपल के भी थे, लेकिन जो बात जुदा थी वह यह कि बगीचे के चारों ओर बनी डेढ फुटी दीवार के दाँए कोने में बैठे बुड्ढों में चर्चा आज कुछ ज्यादा ही गरम एवं गम्भीर थी।
मॉर्निंगवॉक कर बुड्ढे अक्सर यहीं आकर बैठते। रोज किसी न किसी मुद्दे पर बात कर अपने मन की भडास निकालते एवं सूरज चढने के पहले अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान कर लेते। इनमें से अधिकांश सेवानिवृत्त एवं कुछेक व्यापारी भी थे। व्यापारी सेवानिवृत्त बुड्ढों से कभी-कभी इस बात पर रश्क करते कि नौकरी वाले तो सभी एक दिन रिटायर हो जाते हैं, व्यापारी सारी उम्र पिलते रहते हैं। तब सेवानिवृत्त बुड्ढों में से एकाध कह उठता नौकरी में रखा क्या है, सारी उम्र बँधी बँधाई तनख्वाह में पलो, सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली रकम बच्चों के ब्याह आदि में स्वाहा हो जाती है, असल चाँदी तो व्यापार में है। तब व्यापारी बुड्ढों के आँखों की चमक बढ जाती। व्यक्ति अपने समूह में ऊँचा उठकर कितना प्रसन्न होता है।
आज की चर्चा में सभी बढ-चढकर इसलिए भी भाग ले रहे थे कि यह मुद्दा देश की अस्मिता एवं स्वाभिमान से जुडा था। राष्ट्रभक्ति का नशा अफीम के नशे से भी बढकर होता है। होना भी चाहिए, जहाँ हम जन्मते हैं, मरते हैं, जहाँ की मिट्टी में पलते-बढते हैं, जहाँ का अन्न खाते हैं, जहाँ की फिजाओं में साँस लेते हैं उस देश के प्रति अनुराग, उस देश का हितचिंतन, वफादारी वहाँ के देशवासियों में नहीं होगी तो और कहाँ होगी? हाँ, यह बात अलग है राष्ट्रभक्ति के चिन्तन , स्वरूप यहाँ तक कि उसकी क्रियान्विति, निष्पादन के तरीके में भिन्नता हो सकती है। एक बगीचे में जैसे असंख्य फूल खिलते हैं , लोगों के चिन्तन भी जुदा होते हैं। आज की चर्चा का आगाज देवपुराजी ने किया एवं यह भी सच है बहुधा मुद्दा वे ही छेडते थे, अन्य सभी इसी की चर्चा के हिस्सेदार बनते। देवपुराजी जानते थे ज्ञानियों की ज्ञान-सरोवर में एक कंकरी फेंक दो, वर्तुल स्वतः बन जाते हैं। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ।
आजकल पाकिस्तान लगातार कुछ न कुछ हरकतें करता रहता है। कल ही सीमा पर बम फटने से हमारे बीस जवान शहीद हो गए। यह खबर सभी अखबारों की सुर्खियाँ बनी हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने भी उन्हें इसका माकूल जवाब देने की धमकी दी है। देवपुराजी की इसी बात से आज की चर्चा का प्रारम्भ हुआ। वे अभी-अभी मॉर्निंगवॉक पूरी कर नित्य की तरह दीवार के दाँए कोने में आकर बैठे थे। उनकी चाल अन्यों से तेज थी एवं वे बहुधा सबसे पहले वॉक पूरी कर यहाँ आकर बैठते, अन्य सभी फिर एक-एक कर उनके दोनों ओर बैठ जाते। देवपुराजी का कद लम्बा, रंग साँवला एवं नित्य कसरत करने के कारण शरीर चुस्त, फुर्तीला था।
आप ठीक कहते हैं देवपुराजी! मुझे तो लगता है इन छोटे-छोटे झगडों के चलते कोई बडा युद्ध न हो जाए। देवपुराजी के कहते ही व्यासजी ने सुर मिलाए। आज हवा कुछ तेज थी एवं इसी के चलते उनके शर्ट की बाहें फर-फर उड रही थी। व्यासजी कद से मँझले, मितभाषी थे। जब बोलते नाप-तोल कर बोलते।
हमारे मरे हैं, तो उनके कौन से बच जाएँगे ? युद्ध तो किसी एक बहाने से प्रारम्भ हो जाता है, उसके बाद विनाश ही विनाश है। पिछले युद्धों की परिणति आप देख चुके हैं, भले हम जीते हों, जान-माल की दोनों ओर भारी हानि हुई। हमारे जैसे बॉर्डर स लगे शहरों का आलम और भयानक बन जाता है। देवपुराजी! याद हैं पिछले युद्ध के वे दिन जब रात के घुप्प सन्नाटों में शत्रु देश के विमान आते थे, हम सभी एक-दूसरे का हाथ पकडे एक कमरे में चुप बैठे होते, घर के किवाड ऐसे बजते जैसे कोई प्रेत इन्हें खडखडा रहा हो। उसके बाद खतरा टलने का साइरन बजता तो साँस आती। लडाई में लाडू कोनी बँटे सा। इस बार शर्माजी बोल रहे थे। वे गार्डन के चारों ओर लगे पेडों में बहुधा गुलमोहर के नीचे बैठते। उन्हें मानो इस पेड से मोहब्बत हो गई थी। शर्माजी भी देवपुराजी की तरह लम्बे कद के थे। पतले होने से और लम्बे लगते।
ठीक कहते हैं शर्माजी! युद्ध हारने वाला तो हारता ही है, जीतने वाला भी हार जाता है। व्यासजी ने शर्माजी के तर्क को पुरजोर किया।
हानि हो तो हो, हर राष्ट्र को अपने स्वाभिमान की रक्षा खुद करनी होती है। कोई आपको बार-बार उकसाएगा तो आप चुप थोडे बैठेंगे। शठे शाठ्यम् समाचरेत् यानी जो जिस भाषा को समझता हो उससे उसी भाषा में बात करनी चाहिए अन्यथा वह आपको कमजोर समझने लगता है। अब दत्ता साहब बोल रहे थे। उनका रंग काला, सपाट ललाट एवं शरीर से मोटे होने के कारण बोलते हुए अक्सर हाँफते। अपने निजी जीवन में भी वे टिट फॅार टेट अर्थात् जैसे को तैसा के सिद्धान्त में विश्वास रखते थे। बगीचे में जब भी बहस होती बहुधा ये चार लोग ही बोलते, अन्य चुपचाप सुनते , कभी-कभी इनमे से भी कोई बोल देता था।
पता नहीं संसार में युद्ध कब रुकेंगे? युद्ध पूर्व एवं युद्ध के पश्चात् के भय, अवसाद से स्त्रियाँ एवं बच्चे ही नहीं, आम आदमी यहाँ तक कि गर्भस्थ शिशु तक प्रभावित होते हैं। यह अवसाद लम्बे समय तक चलता है। इस बार चुप बैठे लोगों में से मि. छिब्बर बोल रहे थे। मि. छिब्बर का कद, शरीर सौष्ठव दत्ताजी जैसा ही था, पर उनका रंग गोरा था।
अनेक बार तो लगता है मनुष्य ने यह कैसी सीमा रेखाएँ खींच दी हैं ? धरती तो एक ही है, हम धरती का, हमारी माँ का स्पन्दन , धडकन क्यों नहीं महसूस करते ? आज विश्वभर में पर्यावरण की बात चल रही है। क्या ऐसी परिस्थितियों में पर्यावरण सुरक्षित रह सकेगा? यह सीमारेखाएँ भी सदियों के इतिहास में बदलती रहती हैं । कुछ दशक पूर्व पाकिस्तान हमारा हिस्सा था, उसके पूर्व अफगानिस्तान हमारा था, अन्य कई देश भी हमारे अंग थे। तब इनके दिल के साथ हमारा दिल धडकता था। इनका दुःख हमारा दुःख था । आज यह अहसास भिन्न कैसे हो गया ? इस बार बोलते हुए देवपुराजी गम्भीर हो गए।
सच कहते हो देवपुराजी! आदमी इधर का हो या उधर का, सिपाही इधर का मरता हो अथवा उधर का, विधवा इधर की होती हो अथवा उधर की, रोती तो कहीं न कहीं मनुष्यता ही है। दर्द की सर्वत्र एक ही भाषा है। सीमा पर कोई घटना हो , कुछ लोग राष्ट्रवाद के नाम पर राजनेताओं को भडका देते हैं, मीडिया जले पर नमक छिडकता है एवं जनभावनाओं का प्रेरा प्रशासन भी युद्धोन्मादी बन जाता है। इस बार शर्माजी भी गम्भीर थे।
संसार आज युद्धों के दावानल में जल रहा है। कहीं सीमाओं को लेकर युद्ध हैं, तो कहीं धर्म को लेकर। अब तो बाजार को लेकर भी युद्ध होने लग गए हैं। राजनेता भी इतने सीधे नहीं हैं। उनकी स्वयं की महत्त्वाकांक्षा भी उन्हें युद्धोन्मादी बनाती है। इस बार बात बढाते हुए व्यासजी बोले। वे अब सत्तर पार थे।
सच कहा व्यासजी! मुझे तो लगता है जितना जुनून हम युद्ध करने में लगाते हैं , उससे आधा शान्तिवार्ताओं में लगाएँ तो इसके अनुकूल परिणाम मिलेंगे। युद्ध के बाद शेष क्या रह जाता है? इस बार उत्तर देते हुए देवपुराजी की आँखें नम होने लगी थी।
बिल्कुल ठीक कहा देवपुराजी! दो विश्वयुद्धों के दुष्परिणाम हमारे सामने हैं। इन युद्धों में लाखों लोग मारे गए। हिरोशिमा, नागासाकी की विनाशलीला आज भी आँखों के आगे प्रेत बनकर नाचती है। अब तो मनुष्य ने इससे भी भयानक अस्त्र इजाद कर लिए हैं। किसी ने कहा भी है कि अगर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो चौथे में लडने को कुछ न बचेगा, चौथा युद्ध लाठी-भाटों से होगा। शर्माजी ने अपनी बात कहकर देवपुराजी के सुर में सुर मिलाया।
शर्माजी ! आपने सही तथ्य बताए हैं। संसार के अब तक के युद्धों का विश्लेषण करें तो युद्धोपरान्त मनुष्य के पास हाथ मलने के अतिरिक्त कुछ नहीं रहता। हर युद्ध मनुष्य को निर्दयता से रौंदता है, हर युद्ध के अन्त में मनुष्यता कराहती नजर आती है। जीते अथवा हारें, युद्धोपरान्त वहाँ के निवासियों को एक लम्बे समय तक मानसिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक मोर्चे पर जूझना होता है। युद्धोपरान्त युद्ध करने वाले देशों में महामारियों का ताण्डव बन जाता है। भारत-पाक युद्ध हो अथवा भारत-चीन युद्ध अथवा फिर क्यूबा,लेबनान, वियतनाम, पनामा, अफगानिस्तान, ईरान अथवा अन्य कोई युद्ध हो, युद्ध के विनाश-परिणाम मनुष्यता को दहला देते हैं। युद्ध में मनुष्य से भी कहीं अधिक मनुष्यता भस्मीभूत हो जाती है। युद्धों में बलात्कार, लूटपाट भी आम है। अब तक जितने लोग बीमारियों एवं प्राकृतिक प्रकोपों से मरे हैं , उससे कहीं अधिक युद्धों की भेंट चढे हैं। कहते-कहते देवपुराजी भावुक हो गए।
कलिंग युद्ध में कलिंग की हार के बाद अशोक ने युद्धस्थली का निरीक्षण किया तो घायल सैनिकों की चीत्कार एवं मरे सैनिकों के शव देखकर वह भीतर तक दहल गया। ओह, इस युद्ध में मैंने क्या पाया? वह प्रायश्चित से भर गया एवं बुद्ध की शरण में चला गया। इस बार चुप बैठे लोगों में से एक अन्य ने बात को गति दी। उसे इतिहास का विशेष ज्ञान था।
ठीक कहते हो ब्रदर! इन युद्धों से पूर्व हुए पौराणिक युद्धों की भी यही कथा है। राम-रावण युद्ध में युद्धोपरांत लंका में सर्वत्र विधवा-विलाप था ? महाभारत युद्ध में भी अन्त में आंसू, रुदन, विलाप के अतिरिक्त क्या बचा था ? ऋषि उत्तंक इसीलिए तो कृष्ण पर कुपित हुए थे। अब पुनः शर्माजी बोल रहे थे। उन्हें धर्मग्रन्थों का विशेष ज्ञान था।
यह कौन-सी कथा है बंधु? यह कथा तो अब तक नहीं सुनी। आश्चर्यचकित देवपुराजी बोले।
आश्चर्य! तुम थार प्रदेश के होकर भी इस महान कथा को नहीं जानते ? कृष्ण-उत्तंक संवाद आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था। शर्माजी के इतना कहते ही सभी उनकी ओर ऐसे देखने लगे जैसे कथा प्रारम्भ होने के पूर्व सभा में उपस्थित श्रोता कथा-वाचक की ओर देखते हैं। शर्माजी की आँखों की चमक बढ गई। वे कुछ क्षण रुके, आँखे मूँदी तत्पश्चात्त आँखें खोलते ही अपनी बात प्रारम्भ की।


भाग - 2
अपनी कुटिया में ध्यानकर ऋषि उत्तंक भुवनभास्कर को अर्घ्य देने बाहर आए, तब तक सूर्य ऊपर उठ आया था। नित्य ब्रह्ममुहूर्त में ही वे ध्यान पर बैठ जाते थे। वे तपोधनी , जनरंजक एवं परदुःखकातर तो थे ही , मरूभूमि में उनका प्रभाव भी दूर-दूर तक फैला था। सूर्य मकरगत हुए बीस दिन बीते होंगे, लेकिन वातावरण में अब भी हल्की ठण्ड का अहसास था। सुबह की भीनी-भीनी बयार से उत्तंक की लम्बी सफेद दाढी एवं दुपट्टा हवा में लहरा रहा था। यहाँ-वहाँ वैरागियों की तरह खडे नीम , खेजडी एवं पीपल के पेडों पर बैठे पक्षी अब चहकने लगे थे। भृगुवंशी उत्तंक के मुख एवं आँखों का तेज देखते बनता था। उनका व्यक्तित्व आकर्षक, कद ऊँचा तथा शरीर वृद्ध एवं कृश होने के कारण कन्धे आगे की ओर झुके थे। ललाट पर त्रिपुण्डी, सिर के पीछे बँधे सफेद बालों के जूडे एवं बाहों पर रमायी भस्म उनके तेज को और निखारती। पाँवों में खडाऊ पहनते, हाथ में कमण्डल रखते जो ध्यानस्थ अवस्था में भी उनके आसन के समीप रखा होता। उनकी कुटिया मुख्य राजमार्ग से थोडी अन्दर थी एवं इसी के चलते अनेक बार प्रजाजन ही नहीं , सुदूर क्षेत्रों के राजे-महाराजे, सन्त-तपस्वी उनके दर्शनार्थ आते रहते थे। यह राजमार्ग आर्यावर्त का अहम राजमार्ग था जो द्वारका से हस्तिनापुर होते हुए और आगे तक जाता था। ऋषि यहाँ कुटिया में अकेले ही रहते थे, यद्यपि उनके अनेक शिष्य उनके संग रहने को लालायित थे पर उनकी तपस्या निर्भंग चले। अतः उन्हें एकान्त अधिक पसन्द था।
ऋषि अघ्र्य देकर मुडने ही वाले थे कि उन्हें दूर एक रथ आता हुआ दिखाई दिया। रथ ज्यों-ज्यों नजदीक आया उस पर लगी भगवा रंग की पताका स्पष्ट दिखने लगी। रथ में दिव्य सफेद घोडे जुते थे एवं इसे चलाने वाले व्यक्ति का तेज भी उतना ही अनुपम था। रथ जब कुटिया के पास आकर रुका, तो उत्तंक आने वाले को देखकर दंग रह गए। ओह! यह तो आर्यावर्त में अपनी लीला-कथाओं से जन-मन को रससिक्त करने वाले, आततायी कंस का वध कर अपने माता-पिता को कारागार से मुक्त करने वाले अमित तेजस्वी कृष्ण हैं।
कृष्ण जब उनके सम्मुख आए तो उनका रूप-लावण्य देखकर ऋषि क्षणभर के लिए सुध-बुध भूल गए। ओह, उनकी कुटिया पर आज वह अतिथि बनकर आया है जिसके दर्शन पाने की लालसा में सिद्ध, योगी तक अहर्निश तप, साधना करते हैं। कृष्ण पीतवस्त्र पहने थे, उनके सिर पर रत्नों से जडा मुकुट था एवं उसी मुकुट में मोरपंख भी लगा था जो सवेरे की हवा के साथ ऊपर से हिल रहा था। ललाट पर वैष्णवी तिलक लगा था एवं वे कानों में कुण्डल पहने थे। उनकी आँखों का सम्मोहन देखते बनता था।
प्रणाम ऋषिवर! कृष्ण ने चरणों में लेटकर उन्हें प्रणाम किया तो ऋषि चौंके।
आयुष्मान भव! स्वागत है द्वारिकाधीश! आपको यूं अचानक मेरी कुटिया पर देखकर मैं आश्चर्यचकित हूँ। ’’ ऋषि उत्तंक की प्रसन्नता देखते बनती थी।
ऋषि उन्हें भीतर लेकर आए। अघ्र्य, पान एवं स्वागत के पश्चात् दोनों आमने-सामने बैठे थे।
वासुदेव! यकायक आपका इधर आगमन कैसे हुआ? उत्तंक ने वार्ता प्रारम्भ की।
महातेजस्वी ऋषिवर ! मैं द्वारिका से चला हूँ एवं हस्तिनापुर जा रहा हूँ। मार्ग में आफ दर्शनों का लोभ सँवरण नहीं कर पाया, इसी हेतु इधर आया हूँ। कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया। उत्तर देते हुए उनके गुलाबी होठों के पीछे श्वेत दंतपंक्ति मोतियों-सी चमक उठी। उनका स्मितहास कामदेव की शोभा को भी पस्त कर रहा था।
इतनी लम्बी यात्रा क्या किसी विशेष प्रयोजनार्थ है? वहाँ सभी कुशल तो हैं? इस बार बोलते हुए उत्तंक के चेहरे पर विस्मय फैल गया।
ऋषिवर ! हस्तिनापुर में राज्य प्राप्ति के लिए युद्ध के हालात बन गए हैं। आपको तो पता ही है धृतराष्ट्र के अन्धे होने की वजह से पाण्डु का राज्याभिषेक किया गया, उनके वनगमन के कारण धृतराष्ट्र को प्रतिनिधि राजा बनाया गया। अब वन में पाण्डु के निधन के पश्चात धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने स्वयं को राज्य का वंशज घोषित कर दिया है, वह पाण्डवों को कुछ भी नहीं देना चाहता। इसी समस्या का निवारण करने मुझे वहाँ मध्यस्थता हेतु बुलाया गया है। वस्तुतः यह राज्य तो पाण्डवों का है पर दुर्योधन इसे अपना मान बैठा है। उत्तर देते हुए कृष्ण ने अपने कन्धे से नीचे आ रहे दुपट्टे को व्यवस्थित किया।
वासुदेव! आपकी बात सुनकर मैं चिन्ता में पड गया हूँ। अगर यह युद्ध हुआ तो भारी मारकाट मचेगी, क्योंकि दोनों पक्ष के योद्धा दिव्यास्त्रों से सम्पन्न हैं। कहते हुए भार्गव उत्तंक के माथे पर बल पड गए एवं ललाट पर चिंता की रेखाएँ उभर आई।
आप धर्म के ज्ञाता हैं ऋषिवर! आप मुझे मार्ग सुझाएँ। ऐसी विषम परिस्थिति में मेरे लिए क्या निर्देश हैं? कृष्ण ने इस बार हाथ जोडकर उनके आगे शीश झुकाया।
आपकी मध्यस्थता इतनी कुशल हो कि युद्ध किसी स्थिति में न हो। आप तेजस्वी, बुद्धिमान ही नहीं, प्रखर कूटनीतिज्ञ एवं समाधान-कौशल से परिपूर्ण हैं। आप इस मध्यस्थता में शान्ति के सेतु बनो। संसार का इतिहास युद्धोन्मादी नहीं, संसार के शान्तिदूत लिखते हैं। यही मेरी आज्ञा है एवं यही तुम्हारा कर्तव्य भी। स्मरण रहे, आप वही करोगे जो मैंने कहा है। आपको शान्तिदूत बनना है युद्धदूत नहीं। इतना ही नहीं ,आप लौटते हुए मुझे बताकर जाएँ कि वहाँ क्या हुआ? कहते हुए उत्तंक का चेहरा गम्भीर हो गया।
जी ऋषिवर! मेरी यात्रा बहुत लम्बी है,अब आज्ञा चाहता हूँ। कृष्ण अब जाने की अनुमति माँग रहे थे।
कृष्ण की बात सुनकर उत्तंक उन्हें कुटिया के बाहर तक छोडने आए एवं उन्हें तब तक देखते रहे जब तक वे आँखों से ओझल नहीं हो गए। तत्पश्चात् कुटिया के भीतर आकर वहीं लगे आसन पर बैठकर पुनः ध्यानस्थ हो गये।
महाभारत के युद्ध में खून की कीच मच गई। दोनों ओर के असंख्य योद्धा काल-कवलित हुए। युद्ध में भीष्म, द्रोण, अभिमन्यु एवं कर्ण सरीखे वीरों तक को काल ने लील लीया। युद्ध जीतने के लिए धर्म की सारी मर्यादाएँ ढह गईं। अपार छल-बल का प्रयोग हुआ। युद्ध अट्ठारह दिन तक चला। सर्वत्र घायल सैनिको का चीत्कार मचा था। युद्ध इतना वीभत्स था कि वहाँ असंख्य गिद्ध एवं नरभक्षी पशु-पक्षी घायल सैनिकों को नोचने लगे थे। अंत में दुर्योधन भीम के हाथों मारा गया। ऐसी विनाशलीला पहले कभी नहीं देखी गई। कुरूक्षेत्र में सर्वत्र स्त्रियों एवं बच्चों का विलाप रह गया। युद्धोपरान्त दोनों ओर के लाखों सैनिकों में पाण्डव पक्ष में पाँच पाण्डव , कृष्ण एवं सात्यकि तथा कौरव पक्ष में मात्र कृपाचार्य, कृतवर्मा एवं अश्वत्थामा जीवित शेष रहे।
हस्तिनापुर से द्वारिका लौटते हुए कृष्ण ने पुनः उत्तंक के दर्शन किए। उन्हें देखते ही उत्तंक बोले, कृष्ण! क्या तुमने मध्यस्थता का वैसा ही परिणाम पाया जैसा मैने कहा था? क्या तुम सफल शान्तिदूत बन सके ? क्या तुमने मेरी आज्ञा का अक्षरशः पालन किया? उत्तंक मध्यस्थता का परिणाम जानने को उत्सुक थे।
नहीं ऋषिवर! मैं आफ आदेश का पालन नहीं कर पाया। मैं पाण्डवों के लिए तमाम राज्य के स्थान पर मात्र पाँच गाँव लेने पर राजी हो गया, परन्तु हठी दुर्योधन तब भी नहीं माना, अतः युद्ध अपरिहार्य हो गया। इतना ही नहीं, उसने भरी सभा में मुझ शान्तिदूत को जंजीरों से बाँधने का दुस्साहस किया। उत्तर देते हुए कृष्ण ने महाभारत युद्ध का सम्पूर्ण वृत्तांत बताया तो लोकपालक उत्तंक की भोंहे खिंच गई, वे आगबबूला हो उठे।
जर्नादन! आफ होते हुए यह अनर्थ क्यों हो गया? बुद्धिमानों की बुद्धि का फिर क्या प्रयोजन? आप जैसे समस्त कलाओं में प्रवीण, सर्वसमर्थवान चाहते, तो युद्ध टाल सकते थे? यह आपने क्या कर दिया? युद्ध की विनाश-लीला मेरी आँखों के आगे मण्डराने लगी है। मेरी दृष्टि में इसका कारण आप एवं मात्र आप हैं। आपने मेरी अवज्ञा की है। अब मैं आपको कठोर शाप दूँगा, आप इसे ग्रहण करने को तत्त्क्षण तैयार हो जाएँ। उतंक के ऐसा कहते ही पृथ्वी हिलने लगी, आकाश में असमय बादल उमड आए एवं यत्र-तत्र बिजलियाँ चमकने लगी।
महातेजस्वी ऋषिवर! किंचित रुकिए! मेरे तर्क को पुनः सुनिए। आपने यह शक्तियाँ कठोर तप कर प्राप्त की हैं, इन्हें यूं व्यर्थ नष्ट न करिए। कृष्ण ने शाप अभिमुख उत्तंक से अनुरोध किया।
शीघ्र कहो! मैं तुम्हें अन्तिम अवसर देता हूँ। ऋषि अब भी क्रोध में थे। उनके नथुने फडक रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो उनके क्रोध की नदी सब कुछ बहा ले जाएगी।
ऋषिवर! मैं पुनः कहता हूँ मैंने अन्तिम क्षण तक युद्ध टालने का प्रयास किया। इससे आगे युद्ध रोकना असम्भव था। अगर यह युद्ध न होता, तो संसार में धर्म नहीं, अधर्म की विजय का इतिहास लिखा जाता, धर्म की फिर कैसी दुर्गति होती इसका आकलन आप स्वयं कर सकते हैं। यह कहकर कृष्ण उत्तंक के आगे शान्तभाव से इस तरह खडे हो गए जैसे तमाम प्रयास करने के पश्चात दावानल रोक पाने में असफल व्यक्ति स्वयं को अग्नि की शरणागत कर देता है।
कृष्ण का शान्त, सौम्य रूप देखकर उत्तंक इस बार संयत हुए, लेकिन वे अब भी गम्भीर थे।
वासुदेव! धर्म-अधर्म की व्याख्या करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया? यह व्याख्या मध्यस्थ का धर्म नहीं हो सकती। आगत पीढियाँ अब धर्म की निजी व्याख्या कर अपने उन्मादी निर्णय समाज पर थोप देगी। ओह, तब कितना विनाश होगा। उत्तंक की आँखें अब भी लाल एवं वाणी गाम्भीर्य से ओत-प्रोत थी।
ऋषिवर! मैं मानता हूँ मध्यस्थ का धर्म हर हाल में शान्तिवार्ता प्रशस्त करना है। मैं यह भी मानता हूँ युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। आपकी पीडा लोकपीडा है एवं निश्चय ही स्तुत्य है। भावी पीढियाँ जब मेरी मध्यस्थता की असफलता पर चिन्तन करेंगी तो उसमें मरूभूमि में आज हुए कृष्ण-उत्तंक संवाद की भी चर्चा होगी। युद्ध टालने हेतु आपकी विकलता आगत संसार की शान्ति का अग्रदूत बनेगी। मेरा वचन मिथ्या नहीं होगा। इस महाविनाश एवं युद्ध में हुए भीषण छल-बल का मैं भी कहीं अपराधी हूँ। इसके लिए मैं आपसे क्षमायाचना करता हूँ। आप मुझे क्षमा करें ऋषिवर ! मैं पुनः आपको शाप न देने का अनुरोध करता हूँ। कृष्ण अब भी ऋषि के सम्मुख हाथ जोडे खडे थे। इस बार कृष्ण के मधुर वचनों से उत्तंक का ऋोध इस तरह शांत हुआ मानो किसी ने उफनते दूध में जल के शीतल छींटे डाल दिए हों। ऋषि लेकिन अब भी गंभीर थे। परदुःखकातर ऋषि के मस्तिष्क में अब एक नई योजना आकार लेने लगी थी। वे कृष्ण की ओर देखकर बोले -
ठीक है, अगर श्राप नहीं लेना चाहते हो, तो आपको मुझे यहीं, इसी मरूभूमि में, उस विराट, दिव्यस्वरूप के दर्शन देने होंगे जो आपने कुरूक्षेत्र में अर्जुन को दिए थे। उतंक का क्रोध अब अनुरोध में रूपान्तरित हो चुका था।
ऋषि उत्तंक के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें वहीं, उसी विराटस्वरूप के दर्शन दिए जिसे देखकर चकित अर्जुन ने कहा था- ओह, आज सहस्त्रों सूर्य एक साथ उग आए हैं।
ऋषिवर ! आप और क्या चाहते हैं? कृष्ण अब मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे। वे जानते थे उनके सच्चे भक्त उनके दर्शन एवं जनपीडाशमन के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहते।

हे विश्वेश्वर! मरुप्रदेश में वर्षा बहुत कम होती है। इसी के चलते यहाँ का जन-जीवन त्रस्त रहता है। आप किसी ऐेसे समाधान को उद्घाटित करें जिससे इस विकट समस्या का समाधान हो। इस बार उत्तंक का अनुरोध पुतलियों में उतर आया।
यहाँ के निवासी जब भी मुझे घनश्याम नाम से पुकारेंगे, मैं उत्तंक बादल बनकर बरसूंगा। मेरा वचन मिथ्या नहीं होगा। यह कहते हुए कृष्ण कुटिया के बाहर आए एवं रथ पर सवार होकर द्वारिका की ओर चल दिए।
उन्हें विदा देते हुए उत्तंक की आँखों से आँसुओं की अजस्र धारा बह गई।
भाग - 3
क्या खूब कथा सुनाई, शर्माजी! सदियों से इस देश के सन्तों , तपस्वियों ने युद्ध रोकने की ही बात कही। वे महान संत परदुःखकातर तो थे ही , विश्वशान्ति के अग्रदूत भी थे। कहते-कहते देवपुराजी भावुक हो गए।
सच कहते हो मित्र! वसुधैव कुटुम्बकम् हमारा सर्वकालिक नाद है। हमने सदैव देश, काल, निजधर्म से ऊपर उठकर सर्वहितकारी चिन्तन किया है। बात आगे बढाते हुए शर्माजी बोले।
आप उचित कहते हैं शर्माजी ! युद्ध दोतरफा सकारात्मक चिन्तन से ही मिटगे। विश्वशान्ति की दिशा में यह अहम कदम होगा। आज विश्वभर में इसीलिए तो जगह-जगह शान्ति वार्ताएँ हो रही हैं। अब व्यासजी बोल रहे थे।
जब युद्ध के बाद भी सारे समाधान, निर्णय टेबल पर होने हैं तो यह कार्य पहले ही क्यों न कर लें। इस बार कईं देर से चुप छिब्बर साहब बोले।
हाँ मित्र! हम आशान्वित रहें। सूरज पिघल रहा है। शर्माजी का अन्तिम वाक्य सुनकर सभी मित्र वहाँ से उठे एवं अपने-अपने घरों की ओर प्रस्थान किया।

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