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अमित कल्ला की कविताएँ

अमित कल्ला
गत-अनागत
पल्लवित प्रकाश
कमल-सा खिलता है
अन्तर-ज्योति
मध्य में स्थिर हो जाती
रक्तिम चन्द्रमा धीरे-धीरे
स्याह होकर गहराता
कहीं भीतर
विचार शून्य पताका
हवा संग फहराती
स्वप्न की गति
अपना मुकाम
सटीक ढँग से ठहराती
स्वतः प्रवर्तित सत
गत-अनागत।

शरण का विश्वास
जागृति में
शब्द कि प्रतिध्वनियाँ हैं
संचित प्रकाश का परिकर
विस्तीर्ण
है कितने अर्थ उपमाएँ
तल-अतल नापते
मानक मान्य
उस अनन्त आकाश के
अस्वीकृत सवालों के
गलियारों से गुजरती
साँस-साँस बीत जाती
स्वप्निल समाधि
शरण के विश्वास की।

अभी कितना कुछ
बाकी है देखना
लहरों से गुजरे समय संग
मनचाहे रंगों में तलाशना
अजाने ही निर्वाक हो जाना
अँधेरे को महसूस करना
अपनी गठरी खोलकर बैठ जाना
किसी के राख होने तक
विछोह को भुला देना
चुपचाप बेझिझक
सहते रहना
अभी भीतर उतरना
बाकी है

सुमधुर संवाद
हर स्वर के साथ
उदित होता जाता
उसके भीतर का मौन
जान-पहचानो से कितनी दूर
प्रतीक्षा पार उस उदार विश्वास संग
जिससे जुडी होती
वह तलाश
अखण्ड सत्ता के गहरे
आपूरित सम्बन्धों में
रचे-बसे
सुमधुर संवाद की।

बेझिझक
कल्पना और यथार्थ के बीच
अंश-अंश बिछडता जाता
जागता सपना
जीवन का सत्त्व बटोर लेता है
बेझिझक
भर लेता अपने भीतर
सुकोमल समरस
पी लेते आँखें बन्द कर
युगानुयुग खिलता जो चट्टानों-सा
बिता देती जिसे भीतर कि हर आकांक्षा
सही-सही
बतलाती अपना आप
सँवरी हुई सृजन कथा के सहारे कहीं
निरन्तर चलता क्रम उघाड देता आवरण
परत दर परत।

छू लेना कल्पना
हर चोट के साथ
फूल सारिका
खिलता और खिरता है पत्थर
बहने लगता किसी
जलप्रवाह जैसा
गिरने में जिसके उठना है
छू लेना कल्पना असल
बहने में बने रहना
भिगोकर
तरा देना है
कहीं दूर
कहीं भीतर तक।

सांझ सिमरन संसार
कितनी सहज होती
कविता
पानी-सी
बहने लगती
अपने सपनों-सी
भीतर मन में
आजीवन रहने लगती
रचता है समय जिसे
जो जैसा वैसा
कह देता
स्वीकार भी लेता उसे
अकिंचन आज
बदल दिया उसने अपना आप
दरकिनार कर सारे पूर्वाग्रह
स्वीकार किया
गहरा स्वप्न
सांझ
सिमरन
और
संसार 7
उसने दोहराया कोई राग
किसी ने जाना नहीं
कोई अन्य गाता भी नहीं
उसने इस बार चुना वीतराग
जगाया निर्गुण समभाव
उसने सब के सामने ही देख लिए
नए शब्द
अर्थ भरे सजीवन शब्द
पूरा समय जिससे जीवन जानकर
अजाना हो गया
वहाँ कुछ और नहीं
अब राग ही रह गया।

हुल्लास का गायन सुनकर
उसका अपना
रचा हुआ राग है वह
कहने को उसकी ही शैली में
निर्मल होने कि उपासना
अस्मिता से जुडी
पल-पल
जीवन सँवारती
सम्वेदनाओं कि अगुवाई में
गीति काव्य कहती
ठहरकर
सच कि प्रतीति में
सभ्यताओं कि
खुरदरी जमीन पर
उसका
अपना राग

दृश्य रूप
ठीक वैसा ही
अर्थ है उसका
जैसा अपने होने के
मायने की तलाश में
पा लेना किसी नए अक्षर को
निश्चित रूप से चमचमाते नहीं
चमका देते वे
अनायास
दृश्य रूप
स्वर छू लेने पर।

शिल्पकार हिम्मत शाह
अपने एकान्त को
गूँथ देते माटी में
अनन्त स्मृतियाँ
लहर दर लहर
तट पर टकराती
गहरे बिम्ब बनकर
चमकीली रेत पर
बिखरती है
तपता सूर्य
जलाकर जिसे
फिर
जल बनाता
कैसे अवकाश में
अवधान रचती
देखो कैसा पकता वह
पानी-सा गहरा हो जाता है
सारा का सारा आकाश उतरता
खुद-ब-खुद
उन आँकडों के अनुसार
किसी तन में ढलता आकारों में
लीन हो जाता माटी के अनुकीर्तन में।