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चन्द्रकुमार की कविताएँ

चन्द्रकुमार
सात
स्वप्नदृष्टा - कालयात्री


सोच रहा होता हूँ
प्रेम के बारे में
या होता हूँ तुम्हारे साथ
जब भी
स्वप्नदृष्टा हो जाता हूँ


यात्रा करता हूँ
बन कर काल-यात्री
हो जाता हूँ ध्यानस्थ
जैसे साधना करता है योगी

प्रेम -

क्या कुछ नहीं बना देता हमें
स्वप्नदृष्टा - काल-यात्री - योगी
और एक बेहतर मनुष्य
जो सिर्फ प्रेम करता है ।


कविता और आलोचना

मेरे साथ रहती है
कविता
मेरे बाद भी रहेगी
- अगर हुई किसी लायक

किसी से क्या शिकवा
भले ही करे मेरी
या कविता की आलोचना

मध्यस्थ की दरकार ही कहाँ !

क्या है कविता

संगीत है वह
अल्फाजों में जो भाव भरे
अकेले अल्फाज
कभी जो बयाँ न कर सके

कविता है वह संगीत
अल्फाज की चुप्पियों को
- समय की आहटों सहित
कवि चुपचाप दर्ज करे!

गुनगुनाते है जिसे हम
अपना बना कर।


सिरहाने रखे ख्वाब

जद्दोजहद खुद ही से है
किसी और से उलझूँ -
कहाँ इतना समय पाता हूँ।

खुद से लडते-लडते ही अक्सर
थक हार कर मैं सो जाता हूँ।

ख्वाब कोई दस्तक भी दे
मेरी नींद में तो कैसे?
मैं सिरहाने अपने
अधूरे ख्वाब रख कर सोता हूँ!





लौटने का सपना

हर कोई लौटता है
वहीं -
जहाँ से शुरू हुआ था उस का सफर

फूल के गर्भ में जन्में बीज
टहनियों पर फैली पत्तियाँ
लौटती है सूख कर
जमीन-जडों की तरफ
पूरा करते हुए जीवन चऋ

क्या कभी लौट पाऊँगा
अपनी जडों के पास
मैं जो ठूँठ हूँ
धरती की छाती पर शूल जैसा
सूखा-नाकारा
पल-पल खिरता, बिखरता, टूटता ?


जडता

बेलिबास होती है
प्रकृति
ढाँप लेती है फिर
रंग-बिरंगें पत्तों से, फूलों से
- खुद को
हर बरस बदलती है
कुछ इसी तरह!

आदमी अपना लबादा
ढोता है ताउम्र
साँस लेता
चलता - फिरता
जड हुआ जाता प्राणी!

कैसे मरते हैं पहाड

पहाड की बीत चुकी उम्र
बता देते हैं वैज्ञानिक
कितने सालों लेकिन
यूँ ही तन कर खडा रहेगा पहाड
कोई नहीं जानता

नहीं मरते हैं पहाड
अपनी मृत्यु
उन्हें भी इन्सानों द्वारा
किया जाता है कत्ल
- तन कर जो खडे है वह
उसके सामने!

सम्पर्क - 505, एमरॉल्ड-यूडीबी
नन्दपुरी अण्डरपास, अशोक विहार
मालवीय नगर, जयपुर - 302017
मो. 9928861470