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सूक्ष्म अनुभूतियों की अभिव्यक्ति

गीता दूबे
एक साधारण मनुष्य के कथाकार बनने की यात्रा बहुत सहज नहीं होती। साधारण मनुष्य भी देखता- सुनता, बोलता-बतियाता है, लेकिन उसके देखने और समझने में वह सूक्ष्मता नहीं होती जो किसी कथाकार में होती है। कथाकार की अभिव्यक्ति आम आदमी की अभिव्यक्ति से काफी अलग होती है। संवेदना की सघनता जितनी अधिक बढती जाती है, अभिव्यक्ति में जितनी गहराई आती जाती है, कथाकार की परिपक्वता भी उसी मात्रा में बढती जाती है। एक कथाकार जब अपनी रचना यात्रा का आरम्भ करता है तो अपने आस- पास के परिवेश को न केवल बेहद कुतूहल से देखता है बल्कि सतह पर तैरते तथ्यों को उधेड कर उसके पीछे छिपी सच्चाई को जानने समझने की कोशिश भी करता है। उसके बाद तथ्यों को अपने या घटनाक्रम के अनुसार मोडना, उसमें कल्पना का रंग भरना लेकिन उसी सीमा तक कि यथार्थ का बोध बना रहे और कहानी की विश्वसनीयता भी। और इन सबमें महत्त्वपूर्ण है, कहन की शैली जो निश्चित तौर पर हर रचनाकार की अपनी अलग होती है जो उसे विशिष्ट बनाती है। अब यह कहन की शैली हो या भाषाई अन्दाज समय के साथ बदलता भी है और परिपक्व तो निस्सन्देह होता है। साथ ही घटनाओं को देखने और उन्हें बरतने का तौर तरीका भी कहानी दर कहानी या प्लॉट दर प्लॉट निरन्तर अधिकाधिक कौशल सम्पन्न होता जाता है। लेकिन इस कुशलता के साथ एक सहजता अपेक्षित होती है क्योंकि सहजता के बिना न तो जीवन में रस बचता है न कहानी में। अब यह तो लेखक पर निर्भर करता है कि अपने तमाम लेखकीय प्रयोगों या लटके- झटकों के बावजूद कहानी के कहानीपन के साथ ही उसकी सहजता को किस हद तक बचा पाता है। फिर अधिक सहज होने के अपने खतरे हैं। सहजता अगर सपाटबयानी में बदल जाए, तो कहानी और कहानीकार दोनों ही लिखते रहने और लिखे जाने के बावजूद बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर पाते। हमें अपने इर्द- गिर्द बहुत से ऐसे कथाकार मिल जाएँगे जिनके कोई दर्जन भर संग्रह प्रकाशित हो चुके होंगे, इसके बावजूद उनकी कहानियों में विषय, भाषा और ट्रीटमेंट किसी भी स्तर पर कोई नयापन नहीं मिलेगा क्योंकि उन्होंने लिखने का अभ्यास तो जारी रखा, लेकिन लगातार लिखने के बावजूद अगर उन्होंने अपने परिवेश को , दुनिया को लोगों को विशिष्ट दृष्टि से देखना नहीं सीखा तो भी लेखन में न गहराई आ पाती है ना परिपक्वता। वस्तुतः लिखते हुए आप एक ओर अपने बयान से दुनिया को कुछ दे रहे होते हैं, दूसरी ओर लगातार कुछ ग्रहण कर रहे होते हैं या सीख रहे होते हैं। आदान -प्रदान की यह प्रक्रिया जब तक सुचारू रूप से चलती है रचनाकार की रचनात्मकता भी उठान की ओर बढती है। जैसे ही वह अपनी आँखों पर सर्वज्ञता का चश्मा लगाकर अपने बैठक में कैद होकर पूरी दुनिया की व्यथा कथा बयान करने का भरम रचता है, उसकी कथा भी बस लफ्फाजी या साहित्यिक ऐय्याशी में बदलकर रह जाती है जिससे रचनाकार का अहम भले सन्तुष्ट हो जाए पाठक को न आनन्द मिलता है ना संतोष। वस्तुतः लिखना एक तरह से अपनी ओर अपने परिवेश की पुनर्खोज करना है। युवा कथाकार शर्मिला जालान के तीसरे कथा संग्रह माँ, मार्च और मृत्यु की कहानियों से गुजरते हुए न केवल ऐसा ही अनुभव होता है बल्कि शर्मिला भी अपने लेखकीय वक्तव्य में तकरीबन इसी तथ्य की पुष्टि करती हैं।
संग्रह की पहली कहानी तलाश में भी इसी लेखकीय उहापोह या अन्तर्द्वन्द्व को दर्शाया गया है कि किसी व्यक्ति पर आखिरकार कहानी कैसे लिखी जा सकती है। कहानी लिखने के लिए डिटेल्स की आवश्यकता पडती है या कल्पनाशीलता की या फिर दोनों की ही। एक लेखक की मानसिक जद्दोजहद के साथ ही सामाजिक वर्गभेद को भी यह कहानी सूक्ष्मता से चिह्नित करती है जहाँ किसी कम हैसियत या रूतबे वाले आदमी से दोस्ती करना उसे मुँह लगाना या सिर चढना समझा जाता है। इस कहानी को पढते हुए मुक्तिबोध की कहानी जंक्शन दिमाग में अनायास कौंध गई हालाँकि जंक्शन का कथ्य और भी तीखा है जो पाठकों को झिंझोड कर जगा देता है और उसकी तथाकथित करुणा या नैतिकता पर सधे ढँग से प्रहार करता है। लेकिन आलोच्य कहानी लेखकीय दृष्टि के साथ समाज के तथाकथित सम्पन्न वर्ग के लोगों के मानसिक उथलेपन को हौले से पाठकों के सामने रखते हुए दबे- कुचले लोगों के आत्माभिमान को भी सौम्यता, लेकिन दृढता के साथ सामने रखती है। यह शर्मिला की कहानियों की खूबी है कि लाउड हुए बिना वे अपनी बात बडी सहजता से पाठकों तक पहुँचा देती हैं। आज के वाचाल समय में यह सौम्यता काफी समय तक लोगों को नजर भले नहीं आती, लेकिन जब इस पर अचानक दृष्टि पडती है तो आप इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। शर्मिला हौले -हौले बिना किसी नाटकीयता या लफ्फाजी के सरल भाषा और सहज शैली में अपनी कहानियाँ बुनती हैं जिन्हें पढते हुए ऐसा लगता है मानो कोई हौले- हौले आफ कानों में सरगोशी कर रहा हो जिसकी अनुगूँज भले ही देर से सुनाई दे लेकिन शब्द जब गूँजते हैं, तो मन पर उनकी छाप पडे बिना नहीं रहती।
शर्मिला लम्बे समय से सृजनरत हैं और निरन्तरता बनी हुई है, जिसका प्रमाण हमें उनके तीन कहानी संग्रहों और एक उपन्यास के माध्यम से ही मिलता है। उनकी कहानियों का परिवेश हमारे और आफ द्वारा देखी चीन्हीं हुई दुनिया का है और पात्र भी इतने पहचाने लगते हैं मानो हमारे आस- पडोस में रहनेवाले लोग किरदारों में ढल कर कहानियों में शामिल हो गए हैं। उनसे हमें परिचय बनाने की आवश्यकता नहीं पडती वे खुद ब खुद हमसे गुफ्तगू करने लगते हैं। यही वजह है कि इन कहानियों को पढने और समझने के लिए किसी शब्दकोश या कुंजी की आवश्यकता नहीं पडती न ही अतिरिक्त विद्वता या मगजमारी की। साधारण पाठक भी शर्मिला की कहानियों में रमने और समझने की पात्रता रखता है बशर्ते उसमें संवेदनशीलता के साथ जिन्दगी की जद्दोजहद और जटिलताओं को परत दर परत उधेडने और समझने की क्षमता हो।
संग्रह की कहानियों को तीन उपशीर्षकों में विभाजित किया गया है, तलाश, माँ, मार्च और मृत्यु और उन्नीसवीं बारिश। पहले में आठ और दूसरे में नौ और तीसरे में सिर्फ शीर्षक कहानी ही संकलित है। पहले उपशीर्षक का नामकरण पहली कहानी के नाम पर तलाश किया गया है जिसकी चर्चा मैं पहले ही कर चुकी हूँ। इसके बाद की कहानी चोर एक अद्भुत कहानी है। आज का दौर जिस तरह सन्देह और आशंकाओं से घिरा हुआ है, जिसमें हम किसी पर भी यकीन नहीं करते, अपनी परछाई तक पर नहीं बल्कि बहुत बार तो अपने बेहद करीब लोगों को भी सन्देह की नजर से देखते हैं, ऐसे में एक घरेलू नौकर पर सन्देह न करना थोडा-सा अविश्वसनीय अवश्य लगता है लेकिन इस अमानवीय होते दौर में अगर यह स्थिति मानवीय संवेगों में हमारा विश्वास बनाए रखती है, तो इसे स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। भोला का भोलापन भी कहीं न कहीं आशवस्त करता है जो भले ही मनोहर के बहकावे में आकर अपनी मालकिन का घर लूटकर चम्पत हो जाना चाहता है, लेकिन उसकी परेशानियों के सामने उस चोर का मन भी पसीज जाता है और कहानी मानवीय संवेगों की एक खूबसूरत कहानी में ढल जाती है।
प्रेम एक ऐसा विषय है जिस पर बहुत बार अलग -अलग ढँग से लिखा गया है, लेकिन प्रेम के साथ जुडे कुछ मिथक भी हैं जो फिल्मों और साहित्य ने गढे हैं। प्रेम को अक्सर विद्रोह से भी जोडा जाता है क्योंकि जहाँ भी प्रेम का विरोध होता है, विद्रोह वहाँ स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है, लेकिन विद्रोह कहानी में न तो प्रेम का मिथकीय स्वरूप है न ही विद्रोह का स्वर बल्कि प्रेम घटित ही नहीं होता, वह तो एक साधारण घटना की तरह जीवन में लाया जाता है और गायब हो जाता या विस्मृत कर दिया जाता है। लेकिन प्रेम भले ही विसर्जित या विस्मृत हो जाए, स्नेह की डोर अवसाद की गहराई में उतरकर सख्य का मोती ढूँढ ही निकालती है। यह सख्य उम्र का बँधन नहीं मानता और प्राइवेट स्पेस को भी नहीं स्वीकारता। एक-दूसरे के गोपन रहस्य भी नहीं बचते और अपराध बोध के लिए भी जिद नहीं रहती।
शर्मिला के कथा संसार में बहुत-से पात्र अनायास ही खरामा- खरामा चलते हुए शामिल हो जाते हैं या फिर वह उन्हें सहजता से शामिल कर लेती हैं। ऐसे लोगों में जिल्दसाज जैसे साधारण, लेकिन सहज, स्वाभाविक और मानवीय पात्र भी शामिल हो जाते हैं और पाठकों के मन मस्तिष्क पर एक धुँधली ही सही छाप जरूर छोड जाते हैं। उनके भीतर की इंसानियत का आलोक नीरा के अन्दर ही नहीं, उतरता पाठकों को भी आलोकित कर देता है। ऐसी ही साधारण-सी लडकियाँ हैं, पुतुल और मुतुल जिनके सपने भी बेहद साधारण हैं। आम निम्नमध्यवर्गीय लडकी के सपनों की तरह और इन्हीं सपनों की रोमांटिक दुनिया में खोई रहती है मुतुल जिस पर टिप्पणी करती है, भाभी-यह लडकी कैसी है। बस ऐसी ही है। (पृ. 54) दूसरा दिन कहानी की पारूल भी एक ऐसी ही साधारण सी लडकी है जो माँ के कहने पर शिवलिंग पर कच्चा दूध चढाती है ताकि उसकी शादी जल्दी हो सके और उसके बाद छोटी बहन लतिका को भी दूल्हा मिल सके। यौवन की दहलीज पर खडी साधारण-सी लडकी की दृष्टि से देखी गई दुनिया शर्मिला की कहानी में जीवन्त हो उठी है। लगता है कि हम कहानी नहीं पढ रहे, मानों अपने बेहद परिचित परिवेश की सैर कर रहे हैं। यह शर्मिला की खूबी है कि वह रोजमर्रा के जीवन को बडी सहजता के साथ अपनी कहानियों में उतार देती हैं। हालाँकि ये साधारण-सी नजर आनेवाली कहानियाँ हमेशा बेहद साधारण होती हैं, ऐसा नहीं है। उसमें ब्योरे होते हैं, छोटे- छोटे, जिज्ञासाएँ होती हैं, बिल्कुल आम आदमी की जिज्ञासाओं की तरह जो अपने पडोसी के जीवन के भेद को ही नहीं भेदना चाहता है बल्कि उसके नजदीकी रिश्तेदारों के जीवन के गोपन रहस्यों से भी रूबरू होना चाहता है। और ऐसा वह किसी षडयन्त्र या दुरभिसंधि के तहत नहीं करता बल्कि सहज कुतूहल से भरकर करता है। साथ ही रिश्तों में आए बदलावों को देखकर आहत भी होता है। हर संवेदनशील और जिज्ञासु व्यक्ति में एक मनौवैज्ञानिक भी छिपा बैठा होता है जो मानव सम्बन्धों में आए बदलावों का विश्लेषण करता है और यह भी चाहता है कि प्रेम और स्नेह का कल्याणकारी भाव जो तलछट में चला गया है वह फिर से मानव सम्बन्धों और जीवन को अपनी ऊष्मा से भर दे। तभी हर संवेदनशील व्यक्ति सोचता है और कहानीकार उसे शब्दों में ढालती है, यह प्रार्थना किससे करूँ कि वह सब बना रहे जो मन को सँभाल कर रखता है। जिसे शायद प्रेम कहते हैं। (पृ. 67)
माँ, मार्च और मृत्यु शीर्षक के अंतर्गत कुल नौ कहानियाँ संकलित हैं। पहली कहानी में शीर्षक के अनुरूप माँ को याद करते हुए कल्याण बाबू अपने पूरे जीवन को टुकडों-टुकडों में याद करते हैं। जर्रा-जर्रा अपने को उधेडते हुए, अपने परिवार में छाए हुए अवसाद और उस अवसाद के बीच संतुलन साधकर जीवन को सकारात्मकता और दृढता से जीती हुई माँ के प्रति श्रद्धावनत भी होते हैं। यह कहानी जीवन और समाज की बहुत सी उलझनों की ओर संकेत करती हुई उन्हें सुलझाने की तो नहीं समझने और समझाने की कोशिश जरूर करती है, वह चाहे आत्महत्या हो या पलायन, प्रेम हो या पागलपन। गुत्थियाँ कल्याण बाबू या तपन की जिन्दगी की हों या देश की राजनीति की, शर्मिला हौले से उन तमाम बिन्दुओं को छूकर उसकी तह में पहुँच जाना चाहती हैं जैसे एक्यूप्रेशर चिकित्सा में शरीर के बिन्दुओं पर दबाव डालकर दर्द को पहचानने और उसे दूर करने की कोशिश की जाती हैं। इन बिन्दुओं को छूते हुए ढेरों सवाल दिमाग को मथने लगते हैं -प्रेम क्या होता है? क्या होती है मृत्यु! क्या प्रेम कभी मरता है? लगता है ये सवाल लेखिका के भी हैं और पाठकों के भी। अपने पाठकों के साथ मिलकर मानो शर्मिला इन सवालों के जवाब तलाश करने की कोशिश करती हैं और जवाब हर किसी के लिए एक सा नहीं होता। नियति के प्रति एक विवश स्वीकार भी इस कहानी में है जैसा आम जिन्दगी में होता है। जन्मपत्री कहानी में भी एक है माँ और दूसरा है बेटा। एक दूसरे अभिन्न। बेटे की ढेरों जिज्ञासाएँ, देह की, जीवन की और सपनों की। साथ ही माँ को समझने की भी कोशिश। माँ बेटे के सम्बन्धों की खूबसूरत कहानी को शर्मिला ने बेहद काव्यात्मकता से उकेरा है। प्रायः हर रचनाकार अपनी रचना यात्रा की शुरुआत कविता लेखन के साथ करता है और कविता लम्बी लेखन यात्रा में भले पीछे छूट जाए, लेकिन वह विस्मृत नहीं होती बल्कि कईं मर्तबा भाषा और शैली में चुफ से छिपकर बैठ जाती है और गाहे बगाहे कलाकार की कलम को अपनी इच्छानुसार चलने को बाध्य कर देती है। तभी तो सुरमई जैसी कहानियाँ लिखी जाती हैं। सदियों पुरानी कथा, स्त्री से किए गए छल की कथा, अमानुषिक अत्याचार की कथा, स्त्री के दुख से पथरा जाने की कथा, अवसाद के गहरे सागर मे डूब जाने की कथा जहाँ से बाहर आने का पता वह भूल चुकी है लेकिन कहन का ढँग जुदा है और समाधान भी अलग। इस पुरानी कहानी से अलग नयी कहानी लिखने की पहल करने का हौसला है जो लेखिका से लिखवाता है -सुरमई मौन है। सुरमई बोल नहीं रही। वह चुप है। वह चुप नहीं होती थी। उसे बुलवाना होगा। कैसे बोलेगी। कोई कथा गढनी होगी। (पृ. 98)
इस खण्ड की कहानियों में उदासी की गहरी छाया है। जिन्दगी में हर आदमी की अलग- अलग समस्याएँ होती हैं। परिवार के बीच रहते हुए भी लोग अकेले होते हैं, जाह्नवी की तरह जो अवसादग्रस्त माँ और गैरजिम्मेदार पिता के कारण अकेलेपन का शिकार हो जाती है। बारिश की बून्दे आसमान से ही नहीं बरसतीं, कभी- कभार उसकी आँखों से भी अनायास बरस पडती हैं। एक लम्बी उदास धुन की तरह बारिश में कहानी पाठकों के अन्तर्मन को उदासी से भर देती है। एक ऐसी उदासी जिसमें एकतरफा प्रेम की उदासी है तो बेवफाई का जहर भी जो कैन्सर बन कर नसों में बहता है और जिन्दगी दूभर कर देता है। ऐसी ही उदासी या व्यथा मणिकर्णिका के आस पास में भी है जिसने परिधि के जीवन को, उसके सपनों को विषाक्त कर दिया है। उसकी उम्मीदों के पंख को क्षत -विक्षत कर दिया है और यह सब किया है, उसके नितांत अपनों ने। घर- परिवार की तथाकथित सुरक्षित दुनिया कभी-कभार बच्चों के लिए कितनी निर्मम और असुरक्षित बन जाती है, इसकी गहराई को परिधि जैसे बच्चों के तकलीफदेह अनुभवों से गुजरकर ही समझा जा सकता है। पीडा का आतंक उम्र भर उसका पीछा करता है, यहाँ तक कि मृत्युपरान्त उसकी आत्मा भी उस दर्द के बोझ से मुक्त नहीं हो पाती। और समाज की निर्ममता और दोगलापन तो देखिए कि वह भुक्तभोगी को ही अपराधी के कटघरे में खडा करता है लेकिन अपराधियों की निशानदेही करने से कतराता है। असुरक्षा का यही संताप इस खण्ड की कहानियों के स्त्री पात्रों के मन को सन्तप्त करता है। अवसाद और पीडा के साथ इन कहानियों में मृत्युबोध भी है और उसकी छाया पात्रों के साथ पाठकों के मन को भी अवसाद से भर देती है। इनमें प्रेम का दंश भी है जो क्षण भर के लिए भले ही जीवन में उल्लास के रंग बिखेरता है, लेकिन उसकी परिणति पीडा जन्य अवसाद मे होती है। प्रेम जीवन को कोमलता से भर देता है, लेकिन सामाजिक नियमों और आचार संहिता की कठोरता इस प्रेम के नवांकुरों को बेदर्दी से नोंचकर फेंक देती है और मन को कभी ना भरनेवाला घाव दे जाती है। कहानियों में स्त्री की सदियों पुरानी पारम्परिक नियति को भी बडे दर्द के साथ पिरोया गया है। वही नियति जो उसे या तो अश्रिता बनाती है या आम्रपाली अर्थात् हर हाल में पुरूष तन्त्र की दासता के लिए तैयार करती, गढती हुई मनमुताबिक जीने की इजाजत नहीं देती, सपनों के झूले पर सवार होकर ऊँची पेंग भरने से रोकती है, लेकिन कब तक रूकी रहेंगी आन्या और तान्या जैसी लडकियाँ। उनकी पीडा और संघर्ष को, व्यवस्था के प्रहार और व्यथा के ताप को शर्मिला जैसी रचनाकार पूरी शिद्दत और रचनात्मकता के साथ अपनी कहानियों में पिरोती हैं। ये कहानियाँ पारिवारिक सम्बन्धों की कहानियाँ हैं जो माँ और संतान के आपसी अन्तर्संबन्ध को बडी ही संवेदनशीलता से उकेरती हैं। माँ की अनुभूतियों, उसके संघर्ष और दर्द की गहराई को उसकी सन्तान ही महसूस कर सकती है, वह चाहे माया हो या स्नेहा जिस के समक्ष माँ अपने जीवन की एक अनकही कहानी कहकर, आत्मस्वीकार के माध्यम से मोक्ष या मुक्ति की कामना करती है। वह प्रेम जो जीवन को ऊर्जावान बनाता है, सामाजिक स्वीकार्यता के बिना निषिद्ध या निंदनीय बन जाता है और प्रेमलता जैसी स्त्रियाँ आजीवन उस तिरस्कार को, अपनों के आऋोश को झेलने को बाध्य होती हैं। प्रेम के आत्मस्वीकार का साहस उन्हें राहत देता है और मुक्ति भी। ये कहानियाँ पारम्परिकता की परिपाटी को तोडते हुए माँ और बेटी के बीच स्नेह और ममत्व का सम्बन्ध ही नहीं बनाती बल्कि सख्य की डोरी भी बुनती हैं। सम्बन्धों की यही गहराई होने का अर्थ कहानी मेँ भी है। माँ और बेटी के बीच की अनकही बातों का आख्यान। साथ ही देव और माधवी या स्त्री और पुरूष के बीच का आदिम सम्बन्ध जो क्षण क्षण बदलता, नये रूप में ढलता, हर क्षण नूतन होता है। काव्यात्मक भाषा- शैली में रची गई कथा अन्तर्सम्बन्धों की बात ही नहीं करती शाश्वत सवालों में चन्द नये सवाल भी जोडती है।
संग्रह की अन्तिम कहानी में संवेदनाओं की सपनीली दुनिया रची गई है। हालाँकि इसके पहले की कहानियों में भी अत्यन्त सूक्ष्म जीवनानुभवों को चिह्नित किया गया है, लेकिन यह कहानी एक उन्नीस वर्षीय युवा लडकी की नजर से दुनिया को देखने और दिखाने की कोशिश करती है, जैसे एक कैमरामैन अपने कैमरे में दृश्यों को कैद करते हुए अदृश्य को भी पकडने की कोशिश करे। फिल्मकार उस दृश्य और अदृश्य को मिलाकर एक कला फिल्म बनाने की कोशिश करे। साठ साल की माधवी अपने उन्नीसवेँ बरस की वर्षा, धूप, अनुभवों, माँ के साथ गुजारे गए क्षणों को पुनसृजित करना चाहती है। अपने विगत पर रोमानियत भरी आलोचकीय नजर डालती हैं। उन्नीस साल की लडकी के सपनों, आकांक्षाओं, सवालों और जिज्ञासाओं को यह कहानी बखूबी कैद करती है। साथ ही उस स्पेस को भी कैद करती है जो दिखाई भले ही नहीं देता लेकिन महत्त्वपूर्ण है। माँ और बेटी के बीच न कहे गये संवाद, प्रेमी-प्रेमिका के बीच का अबोला क्षण और साथ ही युवा पीढी का वह छद्म भी जिसके तहत वे अपनी भावनाओं को छिपाने और दिखाने का खेल खेलते दिखाई देते हैं। प्रेम हो या आधुनिकता, दिखाई तो देती है, लेकिन होती नहीं। तितलियाँ जो मन में ही जन्म लेती हैं, लेकिन पंख पसारने के पहले ही दम तोड देती हैं। सवाल जो अनुत्तरित रह जाते हैं और जवाब जिसकी प्रतीक्षा में मन की कोमल भावनाएँ मुरझा जाती हैं। उम्र कभी एक जगह पर नहीं ठहरती, लेकिन उस विशेष उम्र में अनुभूत क्षण जरूर मन के कैमरे में कैद हो जाते हैं, अभिव्यक्ति की प्रतीक्षा में।
एक ऐसी रूमानियत आलोच्य संग्रह की कहानियों पर हावी दिखाई देती है जिसमें यथार्थ का पथरीलापन चुभने नहीं पाता। उदासी की चादर मन को ढँक लेती है और जमीनी हकीकत छिप-सी जाती है। मन के मसलों के बीच जिन्दगी की लडाई के अक्स झाँकते तो हैं, लेकिन उतने तीखेपन से नहीं उभरते। काव्यात्मक शैली में सृजित इन कहानियों को पढना निस्संदेह अच्छा-सा लगता है, लेकिन उदास भी करता है।

पुस्तक का नाम : माँ, मार्च और मृत्यु
लेखक : शर्मिला जालान,
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन,
संस्करण : प्रथम
सन् : 2019,
मूल्य : 175/-
विधा : कहानी
सम्पर्क - 58ए/ प्रिंस गुलाम हुसैन शाह रोड,
यादवपुर, कोलकाता-700032,
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