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रेत समाधि : एक अपूर्व मानवीय गाथा

अलका सरावगी
अपने समकालीन लेखक के तौर पर गीतांजलिश्री का पाँचवाँ उपन्यास रेत समाधि मुझे अपनी विराट कल्पनाशीलता और समर्थ भाषा की ताकत से विस्मित कर गया। इस भाषा की किसी से कोई तुलना करना सम्भव नहीं क्योंकि यह अपनी ही गति-मति से चलती है। गीतांजलिश्री कथ्य और शिल्प के अपने प्रयोगों से पहले भी जानी जाती रही हैं, पर इस उपन्यास में कथा की जो सशक्त अन्तर्धारा प्रवाहित हो रही है, वह हमें उपन्यास के पहले खण्ड पीठ से ही अपनी गिरफ्त में ले लेती है।
यह संसार की ओर की हुई पीठ अस्सी साल की बूढी माँ की है, जो विधवा होने के बाद दुनिया से पीठ कर दीवार में जैसे धँसना चाहती है। पूरा परिवार उसे वापस उनकी तरफ मुख करने के लिए हलकान है, परेशान है। यहाँ एक परिवार की गाथा खुलती जाती है जिसमें बडा बेटा बडे है जो माँ की पीठ पलटने के लिए बेचैन है, उसकी कुछ रूखी-सी पत्नी है जो हमेशा रीबॉक के जूते धारण किए रहती है, उनका जवान होता बेटा सिड है, जो दादी को लौटाने की तरकीबें लाता रहता है.. और है उस पीठ की हुई माँ की बेटी, जिसका अपनी आजादख्याली के चलते भाई से अनबोला है। यह उपन्यास का पहला हिस्सा है , जिसकी कहानी में रिश्तों के इतने उलझे हुए धागे हैं, इतने आयाम हैं कि कोई समीक्षा उन्हें बता नहीं पाएगी। दरअस्ल ये ऐसी भाषा में लिखे गए हैं जो इन्हें बताने के लिए अपनी घानी में पेरी हुई भाषा है। शायद यह वह भाषा है जिसमें हम अपने अन्दर अपने से बातें करते हैं, एक लगातार चटर-चटर, जिसमें कोई कॉमा-फुलस्टॉप होता ही नहीं। गीतांजलिश्री के लिखे में यह भाषा अपनी लय में उडती है; उसके जो समानार्थी शब्द हैं यानी कि एक ही शब्द के कुछ भिन्न अर्थ वाले शब्द, उनमें ऐसे-ऐसे शब्द और ध्वनियाँ आती रहती हैं जो हमने-आपने सुनी तक नहीं होंगीं। आप चकित हो सकते हैं, पर कोई आपत्ति नहीं कर सकते, क्योंकि वे कहे को अपना अलग ही रंग देती हैं, आपको लुभाती हुई। जी हाँ, लुभाती हुई और अचरज में डालती हुई कि भई, इस लेखक के पास ये इतने नए शब्द आए किधर से और इसकी हिम्मत तो देखो, जो मन में आया, वह शब्द गढ लिया और लिख डाला!
कथा कहने के तरीकों पर उपन्यास आपसे बातें करता चलता है। उपन्यास में कई कथावाचक हैं, कई बार तो आपको समझने में देर लग सकती है कि कौन बोल रहा है; यहाँ कौवे भी कथा कहते हैं क्योंकि इन्हें साडियों के बारे में अपना ज्ञान बघारना है और कभी अपनी क्षमता का, कि कोई सरहद उन्हें रोक नहीं सकती। पुराने और समकालीन लेखकों के नाम यथा-संदर्भ बेरोकटोक चले आते हैं। कथा के साथ यह खिलवाड आपको आनंदित करेगा या चिढ पैदा करेगा, यह पाठक के मूड और उसके अपने अभ्यास पर निर्भर करेगा। इस नाचीज को किताब छोडने पर सारे दिन उसकी तलब लगी रही और यह ख्याल कोंचता रहा कि अरे भई, ऐसी किताब कोई कैसे लिख लेता है। यह लगा कि गीतांजलिश्री ने भी पक्का इसे बहुत बार छोडा और उठाया होगा कि अब साँस भरकर आगे की उडान पर चला जाए। गुजारिश है इस किताब को जल्दीबाजी में न पढा जाए। उसको फिर उठाने की तीव्र इच्छा का इंतजार किया जाए। इतने गूढ-गहरे-विस्तृत विवरण हैं विचारों के, भावनाओं के, जगहों के, कि उनका जादू देर तक बना रहना चाहिए।
यदि हम कहानी की ओर फिर वापस लौटें, तो पहले खण्ड के अन्त में बूढी माँ पीठ मोडकर वापस दुनिया की तरफ मुखातिब हो जाती है। अब वह अपना सारा सामान अडोसियों-पडोसियों में बाँट देती है और फिर एक दिन चौबीस घण्टे के लिए गायब हो जाती है। परिवार के लोगों की भीषण खोजबीन और व्यग्रता के बाद वह मिलती है। अब वह अपनी बेटी के पास रहने के लिए आती है। उपन्यास का दूसरा खण्ड एक माँ और बेटी के प्रेम और संग-साथ की अद्भुत गाथा है। पुस्तक पल-दर-पल पाठक को बेटी की प्रेम और जतन भरी देखभाल से बूढी माँ के वापस जिन्दगी में लौट आने की यात्रा करवाती है। ऐसा लगता है कि बूढी औरत के अन्दर वापस बचपन लौट रहा हो, और उसकी बेटी जो कि एक लेखक है, अपनी माँ से *यादा बुढाती जाती हो। बेटी बहुत मुश्किल से पाई हुई अपनी वैयक्तिक स्वतंत्रता को अपनी माँ के लिए त्याग देती है। माँ-बेटी का साथ का जीवन और माँ की रजा और रोजी का डबलरोल निभाते एक हिजडे के साथ दोस्ती की कथा पाठक को कभी विस्मय, तो कभी कौतुक में डुबाती चलती है। यहाँ कब्ज और पेट की गाँठों से लेकर आसपास के जीवन के ब्योरे कथा को जीवन से एक अलग ही स्तर पर जोडते जाते हैं।
रोजी उर्फ रजा टेलर की उसकी जमीन के लिए हत्या माँ को वापस उसी दुनिया से विमुख होने के अवसाद की ओर ले जाती है। कथा के कईं दृश्य, मसलन झोंपडपट्टी के पास की जलती हुई झील और पोस्टमार्टम के बाद रोजी का शरीर, ऐसे हैं कि बरसों बाद भी स्मृति में घूमते रह सकते हैं। माँ की हिंजडे का हमजोली होना अपने-आप में एक अपूर्व मानवीय गाथा है। माँ रोजी की अन्तिम इच्छा पूरी करने के लिए पाकिस्तान जाने की ठान लेती है।
यूँ तो इस उपन्यास में सरहदों का विमर्श और वर्णन घुला हुआ है और इन सरहदों की हदें पार करने की इच्छा और तरकीब भी, चाहे वे बूढे होते शरीर की हों या जमीन की, चाहे वे स्त्री और पुरुष के बीच की हों या वर्गों की हों। और तो और, परिवार के बीच के आपसी रिश्तों की हदें भी यहाँ बार-बार प्रकट होती हैं और इन्हें मिटाने की बारीक छटपटाहट भी। एक परिवार के रिश्तों के तनाव यहाँ महाकाव्यात्मक आयाम लेते दिखते हैं: माँ और बेटे के बीच, पति और पत्नी के बीच, भाई और बहन के बीच और दो पोतों के साथ दादी के रिश्ते जिनमें एक ऑस्ट्रेलिया में बस गया है। गीतांजलिश्री की अव्याहत भाव से बहती, अपने रास्ते बनाती भाषा और स्वयंभू उपमानों के बिना परिवार का ऐसा आधुनिक महाभारत लिखा जाना असम्भव ही था।
उपन्यास का तीसरा खण्ड अगरचे एक अविश्वसनीय -सी कथा है जिसमें यह बूढी हिन्दू माँ विभाजन के समय बिछुडे अपने मुस्लिम प्रेमी से पाकिस्तान में बिना वीजा के घुसकर मिलती है और मिलिटरी की गोली से मारी जाती है, तो इससे कथा-यात्रा कोई कम अविस्मरणीय नहीं हो जाती। मतलब यह है कि बिना बन्धन के लिखी कथाएँ अपना रास्ता तय कर लेती हैं और इससे फर्क नहीं पडना चाहिए कि कथा अन्त में कहाँ पहुँचती है और वह अन्त विश्वसनीय है या नहीं। रेत समाधि को पढना एक साधारण दुनिया में प्रवेश कर उसकी तमाम अन्तर्कथाओं से गुजरते हुए रिश्तों के अन्दर के नहीं, तनावों और उससे भी सूक्ष्म प्रेम को जानना है। यह भी जानना है कि जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने की इच्छा और हिम्मत जिंदगी को कैसे अर्थ देती है। अर्थ के अन्दर के अर्थों को उघाडती भाई-बहन के अनबोले वार्तालाप की तहें यहाँ इस उद्धरण में देखिए -
कहना चाहिए परिवार को जब कि कहते हैं महाभारत को। कि जो दुनिया में वो उसमें, और जो उसमें नहीं, वो कहीं नहीं। कवि के तसव्वुर में भी नहीं। यानी भूला भटका आतंकवादी, गरमा भरमा वामपन्थी, नारीवाद और नारी, हर-वादी और जीती हारी, सब परिवार में। या महाभारत में, जिसे जैसे रुचे पचे।
महाभारत में दुनिया, दुनिया परिवार में, और इसलिए परिवार में महाभारत। जो रो*ा रो*ा के हंगाम, हरेक एक महाभारत।
इसलिए परिवार के हर सदस्य को पता है कि जो मुझमें वह किसी में नहीं और जो मुझमें नहीं वह होने लायक नहीं।
और ये कि मेरे पास दिमाग है, औरों के पास पैसा।
और ये कि मेरा फायदा उठाया सबने, अब हम नहीं, बाकी करें।
और ये कि हम दूर रहके भी रहमदिल, तुम वहीं हो पर कितने बेरुखे। और ये कि हमेशा हम ही देते हैं, और आप हमेशा लेते हैं।
और वाह आपकी सूझ जिसमें आप तो मिलन सार, हम वही तो मतलबी यार। आप चुप तो विनयशील, हम चुप तो काईयाँ।
आप करें सो शिष्टाचार, वही हम रकें तो लल्लोचप्पो।
आप कहें तो साफगोई, हम कहें वहीं तो बदतमी*ा।
हम मूछ लें तो अश्लील जिज्ञासा, आप पूछें तो हमदर्दी।
हम करें तो हमारी सुविधा, आप करें तो आपकी कृपा।
हम करें तो कंजूस, आप करें तो किफायती।
हम चुप तो घमण्डी, आप चुप तो शर्मीले।
हम तो बडे सीक्रेटिव पर आप तो बस रिजर्व्ड।
और हमारे फैशनेबल कपडे नकल, आफ जमाने से कदमताल।
और हमरा गया तो हुंह ऐसा क्या बवाल, आपका गया तो लुट गए हाय हाय।
और हमने किया तो क्या किया, और आपका इरादा वो भी किया।
यानी हम वो जो हमने किया, आप वो जो आपने सोचा।
और हमने कहा तो कटाक्ष, आपने कहा तो मजाक।
और हमने अपनी बताई तो मियाँ मिट्ठू, आपने बताई तो सहज सत्य।
और हमने पा लिया तो हथियाया, आपने कहा तो आप तो हैं ही सही।
और हम गुस्साए तो ह्मूमर की कमी, आप गुस्साए तो आत्मसम्मान।
और हम कर गए तो कर्तव्य था, आपने किया तो बडप्पन हुआ।
और हम सफल तो आपका सहरा जो मिला, और आप असफल तो हमने अडंगे जो डाले।
और जी हम रह गए तो हम काहिल, आप रह गए तो आप त्यागी।
और जी हम न समझे तो पैदल, आप नहीं तो भोले।
और जी आपको हमसे वैर तो हम इसी लायक, हमको आपसे वही तो हम ईर्ष्यालु।
और जी हमने किया तो स्वार्थ, आपने वही तो परमार्थ।
और गर हम न करें तो बेपरवाह, मगर आप न करें तो मजबूरी।
और हमने जितना किया सो कम, आपने जरा भी सो ज्यादा।
और हमारी नाक टेढी तो बदसूरत, आपकी आऊख टेढी तो कलात्मक।
और जी अपनी तस्वीर अच्छी तो फोटोग्राफर माहिर, आपकी अच्छी तो आप सुन्दर।
और जी हम गोरे तो छिली बटेर, आप सफेद तो आप तो विलायती लगें।
हम काले तो बैंगन भट्ट, आप काले तो ब्लैक इज ब्यूटीफूल।
हम मोटे तो खाऊ पेटू, आप मोटे तो रौनक चमक।
हम दुबले तो सूखी लकडी, आप सींक तो सैम्य सजिल।
और हम चलायें ए.सी. तो अय्याश, आप चलायं तो सेहत नाजुक।
हम लियें तो शराबी, आपने पी तो डॉक्टर की हिदायत।
हमारी जबाद अंग्रेजी तो शो ऑफ हम, आपकी तो शिक्षित आप।
अच्छा, आपकी जरूरत तो हम एक परिवार, हमारी जरूरत तो आप अलग और अकेले।
हम शरीफ तो मुलम्मा, आप वही तो खानदानी।
हम अपनी मेहनत की खाएँ तो फूहड पंसारी, आप जोंक सा लग जाएँ पर संस्कारी।
और जी आपका काम काम और हमारा काम तमाम।
हमको परिवार और हमारी नेकी खा गये, वर्ना हम भी होते आपकी तरह डाइरेक्टर, प्रोफेसर, अफसर।
अच्छा तो तुम हम नहीं क्योंकि तुम हम होना नहीं चाहते पर हम तुम नहीं चुँकी हम तुम हो ही नहीं सकते।
हम तो जिम्मेदार, कर्तव्यपरायण, धार्मिक।
हमारी नगरी सदियों से सुसंस्कृत, आप आज के गुंडों की कह हमारे शहर की बिगाडोगे पहचान?
अजी एक बार तो हम हो गए कूट-कूट महानतम, तो बारम्बार हम हो गए कोटि कोटि स्वच्छंदतम।
जहाँ गार्गी ने याज्ञवल्क को हराया और मंडल मिश्र को पत्नी ने शंकराचार्य को, वहाँ रोते हो औरत के तिरस्कार, बलात्कार, बहिष्कार की बनाके बकवास?
जहाँ राधा नाचीं, शिवजटा से गंगा उतरीं, वहाँ गू गोबर तुम्हें है दीखता? ये स जी, नो जी, हम जी, तुम जी, और हम और तुम और तुम और हम अम्मा और इतना हमने किया और तुम साथ होके न देखते और बेचारी बुढा गयी और पडी रही और अकेली और जानती भी नहीं क्या कर रही है और नाम भी गलत सलत दे रही है और दिमाग पर है असर और सब के सब दौड पेडे।

* यह समीक्षा 2019 में अंग्रेजी पत्रिका द बुक रिव्यू के लिए लिखी गई थी। यह उसका हिन्दी रूपान्तर है।
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