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गीतों पर तैरती कहानियाँ : कल की बात

अम्बुज कुमार पाण्डेय
एक रचनाकार से हमेशा एकरस, अद्भुत और काल्पनिक कृति की उम्मीद करना अतिरेक से अधिक कुछ नहीं। कईं बार पाठक अनचाहे ही अपनी पूर्व स्वादानुभूति की चाह में अच्छी कृतियों का आस्वादन नहीं कर पाता। वह भूल जाता है कि लेखक भी रोजमर्रा की जिन्दगी में मेट्रो में चढता और बसों में धक्के खाता है। वह नंगी आँखों से देख पाता है कि एक कार वाला एक साइकिल सवार को कितनी हिकारत से देखता है। उसका भी साबका सब्जी बेचने वाले और फेरी वालों से रोजाना होता है। यदा-कदा वह हमें मुतमईन होने देता है कि वह भी इसी भीड का हिस्सा है और अपनी सजग चेतना से चुपचाप सारा पर्यवेक्षण करता रहता है।
एक महँगी कार में बैठा धनवान व्यक्ति कितना भी अभिजात हो, लेकिन जब वह ट्रैफिक में फँसता है, तो सामने खडी ट्रक पर लिखी अनगढ शेर-ओ-शायरी दुर्निवार उसका ध्यान आकर्षित कर लेती है। ट्रक वाला भी हमारी ही दुनिया का हिस्सा है। उसका फक्कड और बेलौस अन्दाज हमें मुस्कराने के लिए बाध्य कर देता है।
तो दैनन्दिन जीवन की रेलमपेल को जब लेखक धँस कर परखता और सिरजता है तो इस स्वभाव को रचनाकर की वस्तुनिष्ठता और प्रामाणिकता का अनुमोदन ही समझना चाहिए। प्रचण्ड प्रवीर का पसारा बहुत बडा है। वो जितने करीने से चरित्रों को रचते हैं, उतनी ही तल्लीनता से परिवेश का वर्णन भी करते चलते हैं। गूढ दर्शन की मीमांसा और अन्वेषण के लिए उनके पास जितना धीरज है, उतनी ही सरसता से उनका रचनाकार हास्य-व्यंग्य में भी उतर कर हतप्रभ कर देता है। मनोविनोद के साथ ऋषभ की अन्तिम कहानी दिनकरजी का मछलीघर में दिनकरजी के व्यवहार और मनोविज्ञान का जो निदर्शन लेखक ने कराया है, वह अप्रतिम है।
किस्म-किस्म के साहित्य पढते वक्त बरबस हरिशंकर परसाई जी का अचूक व्यंग्य दवा का स्मरण हो आता है। इस कहानी में एक अनामदास साहित्यकार हैं जो अनाहूत कथाकार के गले पड जाते हैं। कथाकार उनके नव्य साहित्य प्रवर्तन को देखकर आतंकित हो उठता है। मूलतः वो कब्ज साहित्यकार हैं। उनके पास एक कविता संग्रह है। संग्रह की कविता -एक बीमार आदमी की स्वस्थ कविताएँ पढकर कथाकार हतप्रभ रह जाता है- तुम ऐसे/मुझे/मिल गयी हो/जैसे ईसबगोल मिल गया हो। कब्ज साहित्य के प्रति कथाकार की अनभिज्ञता और उपेक्षा देखकर अनामदास बिफर पडते हैं, तथ्य है कि दुनिया के बारह प्रतिशत लोग कब्ज से पीडित होते हैं। जब-जब मनुष्य कब्ज से पीडित होकर रचना करता है, वह सभी कुछ कब्ज साहित्य का भाग है। कब्ज साहित्य को वही समझ सकता है जो खुद कब्ज पीडित रहा हो। जाके पाँव न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। कब्ज साहित्य कब्ज पीडित लोगों का, कब्ज पीडित लोगों के लिए, कब्ज पीडित लोगों के द्वारा लिखा गया है।
किस्म-किस्म के साहित्य के माध्यम से साहित्य में रोज आ रहे नवाचारों पर करारा व्यंग्य किया गया है। साथ ही यह कहानी अपनी निरर्थक रचना को लेकर व्यामोह में फँसे आत्ममुग्ध साहित्यकारों पर तंज भी है।
नियति के बहाने एब्सर्ड का रेखाचित्र है - नकली दाँत। एक सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर की कहानी जो अपने वार्धक्य के साथ अनुपयोगी और उपेक्षित हो चुका है। लेकिन अब भी उसे लगता है कि उसके जीवन और अनुभव का मोल है। उसने एक महत्त्वपूर्ण ओहदे पर काम जो किया है। उसके इस खोखले मान की दुखद परिणति होती है बेटे के अहमन्यतावाद में। वह बेटा जो जानता है कि उसके पिता के चन्द दिन ही शेष हैं, लेकिन वह उनके लिए चालीस हजार का नकली दाँत लगवाता है, ताकि अपनी पितृ-भक्ति का मुजाहिरा कर सके। इस कहानी में दाँतों के व्याज से लेखक ने मृत्यु की आहट का बडा रहस्यात्मक रूपक खींचा है, मैं देखता रहा। वो ढलती शाम। वो अचानक रोशनी का चला जाना। वो कमरे में अँधेरा हो जाना। उस अँधेरे में बैठा खामोश आदमी, जो कभी रोब-दाब वाला रहा होगा, जो अँधेरे से नहीं डरता। उस कमरे में एक आदमी जो कमजोर है, और अँधेरे से डर रहा है। इस डर की पृष्ठभूमि में चमक रही है नकली दाँतों की प्रतिकृति। वे दाँत तो मृत्यु के मुख के द्वारपाल हैं। वे दाँत जो यम के दूत हैं। वे दाँत जो सर्वभक्षी हैं। वे दाँत जो भयमुक्त और भयंकर हैं।
मैं डरकर कमरा छोडकर भाग खडा हुआ।
ऐसे ही नितान्त अलग भावभूमि की एक कहानी गान्धार में है - हथौडी का सौदा। यह कहानी पढकर पाठक सन्न रह जाता है। यह तंगहाल बंजारे की एक खुदगर्ज बेटी की कहानी है। जो नौ साल बाद भी राहगीर को पकडकर उसकी हथौडी लौटा देना चाहती है। यह देखना मूल्यवान है कि पढे-लिखे, सुसंस्कृत और संपन्न लोग हजार तरह के फरेब करते हैं, जबकि एक आदर्श समाज उनसे ऐसी उम्मीद नहीं करता। वहीं दूसरी तरफ एक अनपढ, लोक और देवी-देवताओं में विश्वास करने वाली बंजारन का अभावग्रस्त जीवन भी उसकी ईमानदारी और निश्छलता को दूषित न कर सका। वह कहती है,जो हम मोल लेकर बेच दिए हैं, उसको हम कैसे रखें? अंकल, हम बहुत साल आपका इंतजार किया। अब अमानत लिए बिना जाओगे तो विषहरी मैया का शाप लगेगा। यह कहानी अपने शिल्प, मितकथन और प्रस्तुतिकरण में बेजोड है।
पचास साल पुराने खत - प्रेम, सम्वेदना और काल प्रवाह में गल रही स्मृतियों की अनूठी दास्तान है। मितव्ययी कथाकार कबाडी के यहाँ पहुँचता, है जहाँ उसे शीशम की एक आकर्षक पुरानी मेज मिलती है। मेज शानदार थी। मेज को देखकर लेखक सोचने लगता है, पुराने फर्नीचर में अक्सर समस्या यह होती है कि अन्दर दीमक लगा होता है या कोई कीडा खा रहा होता है। अकेले जब जब अँधेरे में आँख लडाई जा रही हो, तभी नीरवता को तोडकर कर्कश आवाज आनी शुरू होती है कि तुम्हारे जीवन की तरह इस लकडी को भी कोई अनवरत खाये जा रहा है। उसी मनहूस आवाज में यह घोषणा उपहास करती है कि एक दिन तुम भी इसी तरह खोखले हो जाओगे। वह अनजान अदृश्य कीडा काल की तरह लकडी के पाये को खाता रहेगा।
मेज के बारे में कथाकार का यह स्वगत कथन पूरी अर्थदीप्ति के साथ खत और उसकी अंतर्वस्तु से एकाकार हो जाता है। और खत के माध्यम से ही उसके दो चरित्र पल भर में नमूदार हो जाते हैं। ये खत किसी फोटोग्राफर द्वारा अपनी प्रेयसी को लिखे गए थे। खत के पहले बन्द में प्रेमी का सम्बोधन है, मेरी अलका, मैंने तुम्हारी फोटोग्राफ डेवलप कर ली है। श्वेत श्याम तस्वीर में तुम अपने दोनों हाथों से सिर पर जूडा बाँधते हुए मुस्करा रही हो। ऐसा लगता है कि अपनी लटों को नहीं बल्कि काले नागों को छुपा रखा है। प्रूस्त ने कहा था कि फोटोग्राफ में कुछ ऐसी गरिमा होती है जो आमतौर नजर नहीं आती। जब यह कालान्तर में वास्तविकता के बिम्ब से भिन्न हो जाती है तब हमें वह नजर आता है जो मौजूद नहीं रहता।
दूसरे खत में फोटोग्राफर को अलका का जवाब है। थोडी उलाहन के बाद वह कहती है, वो फोटोग्राफ जो तुमने खींचा था, बहुत अच्छा था। कल शाम बारिश हुई। मेरी खिडकी खुली हुई थी। बारिश के झोंकों से मेज पर पडा तुम्हारा खींचा फोटोग्राफ गल गया। ऐसी बारिश हुई कि सारे काले नाग न जाने कहाँ बिलों में छुप गये। मुझे बहुत अफसोस हुआ। तुमने जो प्रूस्त की किताब दी थी उसमें लिखा था - सुख भी एक तरह की फोटोग्राफी है। जब हम प्रिय के समीप होते हैं, तब केवल उसका नेगेटिव ही अपने पास रखते हैं। बाद में जब हम अकेले होते हैं तब हम अन्धेरे बन्द कमरों में उसकी तस्वीर डेवलप करते हैं। हमारे मन के अंदर के छुपे अँधेरे बन्द कमरे, जिसके प्रवेश पर ऐसा सख्त पहरा लगा है वहाँ हम खुद भी नहीं जा सकते जब तक कि हम और लोगों के साथ हों। तुम्हारा वो फोटोग्राफ मैंने ऐसे ही किसी अँधेरे बन्द कमरे में छिपा रखा है।
कथा के भीतर अर्थपूर्ण कथा का निर्वहन और दोनों में देहरी दीपक की तरह आलोकित करते सूत्र वाक्य की शैली में प्रचण्ड प्रवीर के वैशिष्ट्य और शिल्प को देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि यह मेज कभी उपयोगी रही होगी और घर की केन्द्रीयता में इसका योग रहा होगा। ये खत कभी स्पंदित रहे होंगे, इनमें प्रेम का संवेग रहा होगा, लिखने का उत्साह और जवाब पाने का कौतूहल रहा होगा, लेकिन आज ये सब उपेक्षित और निष्प्रयोज्य हैं।
एक औरत की कहानी हजार तरह से कही जा सकती है। उसके दुःख, उसके बन्धन, उसकी उपेक्षा और उसकी यंत्रणा के अनगिनत कथानक हैं। ये कथानक विश्वव्यापी हैं। घर के भीतर से लेकर बाहर तक। इसका लोक इतना सघन और सपाट है कि इसमें कल्पना के लिए कोई अवकाश नहीं। बहुधा इसकी एकरस पुनरावृत्ति भी होती रहती है जो मन पर छाप नहीं छोडती। लेकिन तीव्र अनुभूति और नाटकीय कौशल से सिरजा गया वही कथानक अपनी प्रभविष्णुता के साथ चित्त पर स्थाई रूप से अंकित हो जाता है।
श्मशान के समीप इसी नाटकीयता और कौशल से रची गयी कहानी है। मृत्यु के उपरान्त अपनी शेखी बघारते, आत्मश्लाघा में डूबे पुरूष प्रेतों को एक महिला प्रेत अपने भोले और सहज प्रश्नों से निरूत्तर कर देती है। वह जानना चाहती है कि पुरूषों के ऐश्वर्य, दान-धर्म, लोक कल्याण और धनार्जन में स्त्री का दाय कितना है, उसके योग का मोल क्या है? क्या उसका त्याग श्लाघ्य नहीं ? और हर जगह, हर उपलब्धि में वह अनुपस्थित क्यों है ?....
रूप की पराकाष्ठा श्रृँगार में, वाणी में, आचरण में दिखती है। मैं अभागी कभी ये सब न देख पायी। अगर जीवन का कोई इम्तिहान है तो मैं आप सबों से बहुत पीछे हूँ। समाज की सेवा करना, धन कमाकर लोगों के घर के चूल्हे जलाना, वादन-गायन के लिए समय निकाल पाना मेरे लिए कहाँ सम्भव था? मेरा सारा जीवन तो चूल्हा जलाने और खाना परोसने में निकल गया। पर मैं पूछना चाहूँगी उन लोगों से जिनको अपनी जिन्दगी से शिकायत नहीं है, आप जो रूपवान हैं - क्या आफ आराम के लिए मेरे जैसी कितनी औरतें लगी रहती थीं? आपकी माँ, बहन, पत्नी, नौकरानी। क्या उन सबको अपनी जिन्दगी से आपकी ही तरह कोई शिकायत नहीं ?
कहना न होगा, उत्तरायण और दक्षिणायन का गम्भीर पारायण करा चुके प्रचण्ड प्रवीर सहसा कल की बात में बिलकुल नये अवतार में दिखते हैं। एकदम गैर-शास्त्रीय, हमारे बिलकुल आसपास। जैसे लम्बी उडान भरने के बाद विहग तरोताजा होने धरती पर उतर आया हो।
प्रचण्ड प्रवीर का मन फिल्मी गीतों में पूरी तरह पगा हुआ है। खासकर पचास और साठ के दशक का सिनेमा तो उनके व्यक्तित्व का अविभाज्य हिस्सा लगता है। उनके पास फिल्मी गीतों की अन्तहीन श्ाृं*खला है। कभी-कभी तो अनसुने और नितान्त अनूठे गीत चौंका भी जाते हैं। सीमित शब्दों में संश्लिष्ट कथन जहाँ रचनाकार के अनुशासन का द्योतक है, वही गीत और शेर-ओ-शायरी का अर्थपूर्ण प्रयोग उसकी समायोजन प्रतिभा से परिचित कराती है। श्रृंखला के उपशीर्षक षड्ज, गान्धार और ऋषभ उनके संगीत प्रेम की बानगी हैं। एक सौ चौदह कहानियों के इस त्रिपिटक में गौर करने वाली बात यह है कि सिर्फ ऋषभ में आधा दर्जन ही ऐसी कहानियां हैं जिनमें कोई गीत या शेर नहीं है, वरना प्रत्येक कहानी गीत, शेर और फिल्मी प्रेरणा से संवलित है। छोटी-छोटी कहानियों को ये गीत न केवल त्वरा प्रदान करते हैं; बल्कि मुकम्मल अभिव्यंजना तक पहुँचाकर सम पर लौट आते हैं। जीवन की व्यस्तताओं और जद्दोजहद का ब्योरा देता लेखक अपने संगीत प्रेम को कदापि नहीं छोड पाता।
कल की बात श्रृंखला की प्रत्येक कहानी आत्मवक्तव्य से शुरू होती है। कहानी सुनाने वाला नौकरीपेशा है, और उसके पास आकर्षक कथाओं और रोचक घटनाओं की पिटारी है। ऑफिस, माल, पार्क, मेट्रो, बस स्टैण्ड, घर, सोसायटी और रेस्तराओं में वह जहाँ भी जाता है, एक कीमियागर की तरह अपने लिए कुछ न कुछ कहने लायक चुन लेता है। जब वह इन जगहों पर नहीं होता तो बैंग-बैंग या लिटिल मरमेड के साथ होता है। बैंग-बैंग और लिटिल मरमेड दो मासूम बच्चियाँ हैं। इनकी बालसुलभ जिज्ञासा को सुलझाने और अल्हड कौतुक में लेखक पूरी तरह डूब जाता है। हर तीन या चार कहानियों के बाद बैंग-बैंग और लिटिल मरमेड की अपरिहार्य और आवश्यक आवृत्तियाँ हैं। संग्रह का तीस-चालीस फीसदी हिस्सा जैसे इन नन्हीं परियों ने आरक्षित करा रखा हो। लेखक ने इन बच्चियों पर खूब वात्सल्य न्यौछावर किया है। यदि इन कहानियों का अलग संग्रह तैयार किया जाए तो वह बालोपयोगी हो सकता है।
कल की बात पठनीयता के लिहाज से एक उत्सव है। सीमित शब्दों की एक ऐसी क्रीडा-स्थली, एक ऐसा लोक जैसे पाठक सागर की लहरों का आवर्तन देख रहा हो। हर तरंग - अलग आस्वाद, अनुभूति और विषय की नवीनता के साथ उपस्थित होती है और अपनी रौ में बहा ले जाती है।
व्यस्तता और भागदौड की जीवन शैली ने प्रत्येक क्षेत्र की तरह पाठकों की सुरूचि और स्वभाव को भी गहरे प्रभावित किया है। आज का पाठक लम्बी कहानी और विस्तीर्ण उपन्यास को अविकल पढने की तुलना में छोटे आकार की साहित्यिक रचनाओं में ज्यादा रूचि दिखाता है। वृहदाकार उपन्यास, महाकाव्य और लम्बी कहानियों पर समय का निवेश करने वाले पाठक दिन-ब-दिन घट रहे हैं। यह परिवर्तन साहित्य और मनोरंजन के साथ ही अन्य कलात्मक विधाओं में देखा जा सकता है।
नवाचार के इस बदलते परिदृश्य में कल की बात अपनी तरह का पहला गम्भीर, मौलिक और सुचिंचित प्रयास है।

पुस्तक का नाम : कल की बात
(षड्ज, ऋषभ, गान्धार)
रचनाकार : प्रचण्ड प्रवीर
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, नोएडा
प्रकाशन वर्ष : नवम्बर 2021
विधा : लघुकथा, तीन कडियों में संकलित
सम्पर्क - सहायक आचार्य, हिन्दी विभाग, के.बी.पी.जी. कॉलेज, मीरजापुर,
उत्तरप्रदेश - 231001
मोबाइल नम्बर- 9451149575
ई-मेल- mailtoambuj@gmail.com