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बेगाने रिश्तों की अन्तर्कथा

कान्ता सोनी
प्रतिनिधि कथाकार, अनुवादक और विचारक जितेन्द्र भाटिया के उपन्यास रूणियाबास की अन्तर्कथा और कहानी-संग्रह रूकावट के लिए खेद है की कहानियाँ जीवन का यथार्थ चित्र है। रूणियाबास की अर्न्तकथा का कथानक न किसी समस्या के साथ शुरू होता है और न ही उपन्यास के अन्त में किसी तरह का कोई समाधान प्रस्तुत करता है। कहानी का आधार घटना नहीं अनुभूति है। उपन्यास की बुनावट व बनावट बडी ही दिलचस्प है।
उपन्यास की कथा की शुरूआत एक खोजी पत्रकार से शुरू होती है। डूँगरपुरा जाने का मुख्यमंत्री पर एक लम्बा चौडा फीचर तैयार करने के लिए जिसमें उनके व्यक्तित्व और पारिवारिक जीवन की एक अंतरंग तस्वीर पेश करने के लिए कहा गया था। इसी सिलसिले में नवहिन्द समाचार के संपादक बॉस पारीक साहब अपने योर्स फेथुफली को गाँव डुँगरपुरा भेजते हैं। यहीं योर्स फेथफुली नवहिंद समाचार पत्रिका में काम करता है जो अपने आप को कामचोर मातहत योर्स फेथफुली कहता है। यह पत्रकार इस इन्टरव्यू का कबडा कर देता है और वापस वह डूँगरपुरा से निकल जाना चाहता है। इसी बीच वह रामगोपाल चोरडिया यानी ओझल बाबा के लिए खोजी अभियान चलाता है। उस भूतहा खण्डहर में बची हुई सारी उम्र बिताने का निर्णय लेते समय रामगोपाल चोरडिया ने जिन्दगी की कौन-सी दुर्लभ सम्भावनाएँ देखी होगी? और ओझल बाबा का वह नाटक रच चुकने के बाद उसे आखिर कौन-सी सिद्धि हासिल हुई होगी? क्या उससे मिलकर इस सच्चाई का पता लगाया जा सकता था?
सम्पूर्ण उपन्यास में लेखक मन में लालसा महसूस करता रहता है कि रेगिस्तानी ढलान पर गुजरे उस बचपन से लेकर अब तक के पैंतीस सालों को क्या अलग, सिलसिले में दुबारा जिया जा सकता है? जहाँ लेखक हर बार अपने बचपन की तरफ लौटता है। वह अपने बचपन को फिर से जिना चाहता है। इस जीवन में जो उसने जिया उसको वह बदल देना चाहता है। सोच के इस मुकाम पर आकर मैंने हमेशा की तरह अपनी किस्मत को कोसा। इस दुनिया के तमाम नाकामयाब लोगों की तरह मुझे भी लगता है कि जिन्दगी ने अपना जायज हक मुझे नहीं दिया है। मुझे कहीं और होना चाहिए था। किसी दूसरे ही अप्राप्य ब्रह्माण्ड में, जहाँ रोज की इस घिस-घिस से दूर मैं कोई सलीके का काम कर रहा होता और अपने-आप में मुक्म्मल होता। मेरी वर्तमान जिन्दगी में किसी जरूरी तत्त्व की अपरिहार्य कमी है, जैसे कोई सब्जी में नमक डालना भूल गया हो। सम्पूर्ण उपन्यास में कहानी में एक वर्तमान है, तो एक में बीता हुआ उसका बचपन, जहाँ, बगीची, गुरुजी, गणित के अध्यापक, बादशाह की दुकान आदि हैं। तीस-पैंतीस साल के लम्बे वक्फे को फलॉग, अचानक याद आ जाने वाली किसी नामालूम घटना की तरह मेरा बचपन अचानक उस माहौल में शामिल होकर गडड्-मड्ड सा होने लगा।
उपन्यास में कहानी वास्तविक यथार्थ को दिखाती हुई ओझल बाबा की जादुई दुनिया के रोमांच को भी दिखाती है। जहाँ गाँवों में घर कर चुके अन्धविश्वासों का चित्रण भी है। सम्पूर्ण उपन्यास में मानो कोई जादुई, जासूसी, रोमान्चभरी फिल्म हमारी आँखों के सामने चल रही हो। मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ चित्रण है। कथानक छोटे-छोटे प्रसंगों के साथ आगे बढता है। बेरंग और सपाट जिंदगी के कारण पत्रकार (जिसका कोई नाम नहीं है इस उपन्यास में) भयानक उद्देश्यहीनता का शिकार है। वह खालीपन, ऊबाऊ बेमकसद जीवन में कुछ रोमान्चक चाहता है। इसलिए वह उस ओझल बाबा को ढूँढ निकालना चाहता है। कहानी में हास्य और व्यंग्य की स्थितियाँ बडी ही रूचिकर लगती है। जैसे- लेकिन उस नामुराद बाबा का कहीं अता-पता नहीं था। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस नाचीज द्वारा लाया गया चढावा उसके खान-पान के स्तर से काफी नीचे का हो या बाबा के चाहने वालों में भोजन की थाली का न्यूनतम मेनू निर्धारित किया जा चुका हो, जिसके बर्गर मन्नत अर्जी के बिना पढे ही खारिज कर दिए जाने का चलन रहा हो?
उपन्यास में राजस्थान की प्राकृतिक छटा है, यहाँ कीकर, डांसरी, जंगली पौधे, आदि का चित्रण है। यहीं से मिट्टी की एक बेढंगी दीवार शुरू हो गयी है जिसके दूसरी ओर यहाँ वहाँ, नागफनी की क्षत-विक्षत बाड थी। सम्पूर्ण उपन्यास में हमारे समय के ढेर सारे सवालों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। लेकिन दिक्कत यह थी कि इस सारी गहमागहमी से भरी जिन्दगी के भीतर फैला खालीपन धीरे-धीरे बाहर आने लगा था। जैसा कि मैं शुरू में ही कह चुका हूँ, तमाम दूसरे तमाशों की तरह यह खेला भी अब मुझे उबाऊ और बेमकसद लगने लगा था। अपनी दौडभाग से भीर जिन्दगी से गुजरते हुए अक्सर मेरे मन में किसी फिल्म के टाइटल सांग की तरह रह रहकर सवाल उठता है कि सारी उठा-पटक का कुल जमा हासिल आखिर क्या है और कब तक हम अपने-आपको यूँ ही बेवकूफ बनाते रहेंगें? उपन्यास में लोक भाषा के संवादों की सहजता है। जै हो ओसल बाबा ..... थाराई गीगला, ...किरपा हुकम उपन्यास में विवरणात्मक ब्योरे अधिक हैं। पाठक इस उपन्यास को जल्दी-जल्दी पढकर आगे बढ सकता है। उपन्यास में कहीं भी ठहराव या पाठक को सोचने जैसी जगह उपन्यासकार नहीं रखता है। पाठक जहाँ रूककर सोचे मन्थन करे। यही इस उपन्यास की एक सीमा है। सम्पूर्ण उपन्यास में पाठक के लिए रोमान्चक कल्पना की सामग्री है जो उपन्यास को पढने के लिए बाध्य करती है।
रूकावट के लिए खेद है कहानी संग्रह में कुल सात कहानियाँ है। अधिकांश कहानियाँ बडी-बडी हैं। सभी कहानियों में मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और जीवन के यथार्थ का स्वाभाविक चित्रण है। पहली कहानी अन्धों का देश है। कहानी खुशहाल चन्द की है, जो मालान की खोयी हुई घाटी में लाहौलियों के गुमनाम कुनबे आज भी रहते हैं। उनकी पुरी नस्ल अन्धों की नस्ल कही जा सकती है। यहीं उसकी भेंट जीवों से होती है जीवों को वह अपनी दुनिया के बारे में बताता है मैंने उसे किताबों के बारे में बताया कि कैसे दुनिया की तमाम बारीकियों की समझ उन हर्फी में कैद हो जाती है और कैसे हम उन हर्फी की तसवीर को अपनी आँखों में उतारकर उन सारे अनुभवों तक पहुँच जाते हैं, जिनका जिक्र उन किताबों में होता है। इस कहानी से किताबों की यह व्याख्या नवीन है। सम्पूर्ण कहानी दो प्रकार की दुनिया का चित्रण है। एक नेत्रहीनों की दुनिया है, जहाँ मनुष्य कायम है और एक ऐसी नुनिया है जहाँ एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को मारने-काटने पर आमाद है। सम्पूर्ण कहानी मार्खेज के उपन्यास एकान्त के सौ बरस की याद दिलाता है, जो अयथार्थ में यथार्थ की तरह चलती है। कहानी फिल्मी अन्दाज की तरह शुरू और अन्त होती है। वह गुमनाम शहर यूटोपियाई दुनिया दिखाता है।
उनकी रूकावट के लिए खेद है व झूलसे हुए चेहरों के अक्स कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ चित्रण है। गाउस बडी शरारत भरी नजर से उस आदमी के कमरे, उसमें टँगे कपडों एक अदद ट्रांजिस्टर, चाय के सामान और पेरीमेसन की किताबों को देखता रहा। रूकावट के लिए खेद है से अव्वल तो वह रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजों को लेने या अपने जरूरी कामों को निपटाने की अनिवार्यता को भरकस टालता रहता था। उस पर भ अपने किसी मँहगी चीज को खरीदना उसकी कल्पना से बाहर था। पात्र वास्तविक दुनिया के हैं। सम्पूर्ण कथा में सूक्ष्म मन का चित्रण है। पात्रों के सुख-दुःख पाठक को प्रभावित करते हैं। प्राकृतिक और मनुष्य द्वारा निर्मित विपदाएँ आज भी हमारी सामाजिक, प्रशासनिक, नाकामियों को उजागर करती दिखाई देती है। इनकी अन्य कहानी दुःस्वप्न में घर में काम करने वाली नौकरानी श्यामला की है जिसे इस घर में आए मुश्किल से दस दिन हुए हैं और जो परसों से बुखार में तपती फर्श पर पडी है। जिसे लेकर घर के मालिक व मालकिन के मन में अनेक सवाल और अनेक मुश्किलें आने वाली है जिसका सामना कैसे करेंगे, इस डर का चित्रण है। समाज में आज की मानसिकता तथा संवेदहीनता को उजागर करने वाली कहानी है जो सीधी-सपाट भाषा के माध्यम से लेखक रखते हैं। बगल के कमरे में, जहाँ बच्चे लड रहे हैं, नीचे फर्श पर मैला-कुचैला कम्बल ओढे श्यामला लेटी है। कमरे में अपनी प्रिय आरामकुर्सी पर बहारी तौर पर तफरी ही मुद्रा में बैठे आप उक्तायी हुई आँखों से टीवी पर चल रहे क्रिकेट मैच का जायका ले रहे हैं, लेकिन आफ भीतर गजब की उथल-पुथल है।
जहर मोहरा इस कहानी को लेखक विज्ञान की कहानी कहता है, क्योंकि सम्भावनाओं की पडताल का दूसरा नाम ही तो विज्ञान है। यह कहानी व्यक्ति के मनोविज्ञान पर आधारित है। व्यक्ति मन के एक-एक कण को खोलकर रख देने वाली कथा। आज के जीवन, जगत की कथा।
शहर की आँखें, ख्वाब इक दीवाने के कहानियों में लेखक को चिन्ता इस बात की है कि आधुनिक मानव अपनी जडों से दूर होता जा रहा है। वह जिस रफ्तार से सीमित दुनिया से आधुनिक दुनिया की तरफ बढ रहा है वही रफ्तार अपने-आपको पूरी तरह खत्म कर चुकने के आखिरी क्षण तक इन्सान चैन से नहीं बैठता। लेकिन फिर भी कुछ है जो बदल गया है उसे लोगों से मिलते हुए एक अनकहा जोखिम महसूस होने लगा है। पहले सारी दिक्कतों के बावजूद वह कभी-कभी हँसता था। अब नजदीक के साथियों के बीच भी डर लगता है।
सम्पूर्ण कहानियों में आधुनिक दौर के महानगरों का परिवार, समाज, प्रेम, द्वन्द्व व भागदौड दिखाई देती है। आधुनिक समाज, परिवार को बाँटती दिखाई देती है। आधुनिक जीवन में सब अलग-अलग और बेगाने होते जा रहे हैं। इस भागदौड भरे जीवन ने हमें तनहा व एकान्त जीवन जीने को मजबूर कर दिया है। कहानियों में कल्पना, अनुभूतियों की मात्रा अधिक है। कथा चरित्रों और मन के बची में जडता का पर्दा नहीं है। आधुनिक मानव की पीडा, संवेदनहीनता का मनोवैज्ञानिक चित्रण है। कहानियाँ जीवन के बहुत निकट हैं। शैली प्रवाहमयी, रोचक है। सभी कहानियों में उनकी गूढता नहीं सरलता दिखाई देती है। जितेन्द्र भाटिया के उपन्यास व कहानी संग्रह पढकर लगता है इनमें शहर ही नहीं गाँव के लोगों में घुल-मिल जाने की कला में बहुत दक्ष हैं। इस कला में हम (पाठक) सभी उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।
पुस्तक का नाम : रूणियाबास की अर्न्तकथा
लेखक : जितेन्द्र भाटिया
प्रकाशक : सम्भावना प्रकाशन, हापुड
मूल्य : 250, पृष्ठ 173
संस्करण : 2021
पुस्तक का नाम : रूकावट के लिए खेद है
लेखक : जितेन्द्र भाटिया
प्रकाशक : संभावना प्रकाशन, हापुड
मूल्य : 200, पृष्ठ 161
संस्करण : 2021
विधा : कहानी

सम्पर्क - क्वार्टर नं- एल-7जी, झालाना मोड कैम्पस, जयपुर-३०२००४, राजस्थान
मो. 8619113806