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माधव हाडा : सात्विक अनुभूति की अभिव्यक्ति

- ब्रजरतन जोशी
जहाँ विश्वविद्यालय या महाविद्यालय ज्ञान उत्पादन का केन्द्र होते है, वहीं पुस्तकें ज्ञान अनुशासनों के लिए एक बिजलीघर की तरह होतीं हैं जो जीवन और अस्तित्व को निरन्तर गतिमान बनाए रखने के क्रम में हमें ऊर्जस्वित करती रहतीं हैं।
पुस्तकों की आत्मीयता वाकई अद्भुत है। सामान्यतः जीवन व्यवहार में लेन-देन का बडा बोलबाला है, ऐसे में पुस्तकें केवल देना ही जानती है, लेना नहीं। श्रेष्ठ पुस्तकें हमारे ज्ञान, स्मृति और एकाग्रता के साथ आन्तरिक स्वास्थ्य को भी उत्तम बनाती हैं। इसलिए वे सभ्यता की आदि सहचर रही हैं। पुस्तकें पाठक की रूचि ही नहीं उत्पन्न करती, वरन् वे उसे और परिष्कृत भी करती है। इन अर्थों में पुस्तकें अस्तित्व का जीवन को मिला आशीर्वाद है।
प्रायः श्रेष्ठ प्रकाशक अपने व्यवसाय में व्यावसायिक हितों के साथ-साथ पाठक की दीक्षा का भी पूरा-पूरा ख्याल रखते हैं और इस क्रम में कुछ पुस्तकों/विषयों की श्रृंखलाएँ प्रकाशित करते हैं। इन श्रृंखलाओं का महत्त्व तब और बढ जाता है जब इनका सम्पादन कोई सुयोग्य, सहृदय, जागरूक अध्एता एवं मर्मी विद्वान करे।
राजपाल प्रकाशन की श्रृंखला कालजयी कवि और काव्य हिन्दी लेखन के प्रांगण में एक साहित्यिक महत्त्व की परिघटना है।
क्योंकि हमारा समय बहुत तेजी से बदलने की अपनी प्रक्रिया में जीवन के अनेक महत्त्वपूर्ण आयामों को विस्मृत करता या कहें छिटकाता हुआ आगे बढ रहा है। ऐसे में सुधी अध्एता माधव हाडा द्वारा सम्पादित इन छह पुस्तकों की श्रृंखला का आना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, जिनमें क्रमशः अमीर खुसरो, कबीर, रैदास, तुलसीदास, सूरदास और मीर शामिल हैं।
माधव हाडा ने अपने लेखन, सम्पादन और अनुसंधान कार्य से साहित्य में अपनी एक निजी पहचान अर्जित की है। वे भक्ति साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं। अतः अपने लेखन में वे सदैव ही भक्तिकाल की स्वाभिमानी और उच्च काव्यपरम्परा को अपने राजनीतिक इस्तेमाल के लिए उपयोग कर रहे लोगों पर तीव्र प्रहार करते हैं। इस सहस्राब्दी के प्रारम्भ से ही इस तरह के प्रयत्नों की गति और मति दोनों ही बढी है। हाडा ने अपने लेखन और अनुसंधान तथा आलोचना के माध्यम से समाज में औपनिवेशिक ज्ञान परम्परा के वर्चस्व को न केवल चुनौती ही दी है, बल्कि देशज आधुनिकता की राह को आसान बनाने का सुचिन्तित, वैज्ञानिक दृष्टिसम्पन्न और तार्किक कार्य सम्पन्न किया है। इनका लेखन सात्विक अनुभूति की अभिव्यक्ति है।
हाडा द्वारा सम्पादित कालजयी कवि और काव्य ने इसी कारण हिन्दी परिसर का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। यह हाडा के लेखन का तेज है कि उनका पाठक उन के साथ रचना की अन्तरर्लोक में न केवल प्रविष्ट ही होता है, बल्कि तलस्पर्शी गहराई से सम्पन्न भी होता है। उदाहरण के लिए वे खुसरो के हिन्दवी काव्य पर चर्चा करते कुछ इस किस तरह उनके समूचे लेखन को देखते हैं - खुसरो का अब तक का हिन्दवी काव्य तीन तरह का है। उनके पहले प्रकार का हिन्दवी काव्य प्रामाणिक फारसी काव्य में हिन्दी तत्त्व के रूप में मौजूद है। यह उनके दीवान गुर्रतुल कमाल, रूबाइयात-ए-पेशवरों और मसनवी तुगलकनामा में है। खुसरो का दूसरा हिन्दी काव्य वह है जो परवर्ती विद्वानों की किताबों में उद्धृत किया गया है। वजही, लक्ष्मीनारायण, शफीक आदि कईं विद्वानों को उद्धृत किया है। तीसरे प्रकार का हिन्दवी काव्य वो है जो सदियों से अपनी लोकप्रियता के कारण जन-साधारण द्वारा पीढी दर पीढी श्रुति परम्परा से हस्तान्तरित होता रहा है। यह काव्य शम्सुल्लाह कादरीकी, उर्दू-ए-कदीम, महमूद शीरानी की पंजाब में उर्दू और अमीनत कैब्बासी चिरैया को ही की जवाहर-ए खुसरवी सहित कईं और किताबों से संकलित किया गया है।
एक श्रेष्ठ सम्पादक का दायित्व यह है कि वह अपने पाठक के अध्ययन, स्वाध्याय और सृजन चेतना के की राहों को आसान बनाए और उसकी जागरूकता बढाए। इसके लिए आवश्यक है कि वह न केवल विविध विषयों पर न केवल अपनी गहरी पकड रखता हो, बल्कि विषयों के अध्ययन की नई राहों का अन्वेषी भी हो। खास बात यह है कि इस श्रृंखला में माधव हाडा किसी अकादेमिक विद्वान की तरह पेश नहीं आते, वरन् वे अपनी आलोचनात्मक प्रज्ञा के साथ एक सर्जक का मन लिए हुए हमारे सम्मुख होते हैं। परिणामस्वरूप हम देखते हैं कि वे अपने चयनित लेखक की व्यक्तित्व की बनावट और बुनावट दोनों पर केन्द्रित रहते हैं। उनकी दृष्टि साफ और स्पष्ट है। इसलिए इस श्रृंखला में प्रत्येक पुस्तक की लगभग 20-22 पृष्ठों की भूमिका में वे अपने पाठक को कवि मन के साथ तादात्म बैठाने की गम्भीर और सार्थक कोशिश में सफल होते हैं।
इस क्रम में वे अपने चयनित कवियों पर पूर्व में हुए लगभग सभी तरह के अध्ययनों का जरूरी ब्योरा देते हुए उनकी रचनात्मक महत्त्व और प्रक्रिया को हमारे साथ साझा करते हैं।
उनकी लिखी भूमिकाएँ आकार में अधिक विस्तृत नहीं है, पर वे कवि के सम्बन्ध में एक दिशाबोध और गहरे धँसने के लिए अपने पाठक को निरन्तर प्रेरित करती है। प्रामाणिक सन्दर्भों, ग्रंथों से सम्पन्न उनका यह अध्यवसाय अपने पाठक को प्रामाणिक पाठ की जानकारी और अद्यतन शोध से भी जोडता है। उनके समूचे लेखन से गुजरते हुए हम कह सकते हैं कि वे अपने कार्य के प्रति प्रतिबद्ध, सर्वश्रुत अन्वेषी है। भारतीय परम्परा और ज्ञान के प्रति स्वाभिमान के साथ पश्चिम के श्रेष्ठ का स्वीकार और उसके साथ सहभाव उनके लेखन का केन्द्रीय तत्त्व है। इसलिए उनके यहाँ कोई आत्मप्रवंचना नहीं है। अपने निजी अनुभव को ठीक-ठीक कहूँ, तो मुझे उनके लेखन में एक गुनगुनापन महसूस होता है। उनका लेखन नई पीढी को नई फसल का नया अनाज देने की चाहना से भरपूर है। इसी कारण हम यह भी पाते हैं कि उनका लेखन हमारे लिए एक साथ काँच और दर्पण का काम करता है। वे अपनी पारदर्शिता के रसायन से काँच को दर्पण को बदलने वाले लेखक है।
उनके रचना संसार में विशुद्ध साहित्यिक दृष्टि तो है ही, साथ ही समीपवर्ती विषयों और चिन्तन प्रणालियों को भी उन्होंने अपनाया है। इसी सहजता और विवेक के तेज से उनके लिखे अक्षर भरोसे के अक्षर कहे जा सकते हैं। उनका लेखन अपनी पारदर्शिता के ज़रिए पाठक की धमनियों में प्रवेश कर उसके ज्ञान कोश को सम्पन्न करने की अचूक कोशिश करता है। इसीलिए उनकी भूमिकाओं को पढते वक्त हम पाते हैं कि वे विषय का विवेचन और परिमार्जन करते हुए तथ्यों की गहरी जाँच परख कर ही अपना मत रखते हैं। उदाहरण के लिए तुलसी के बारे में वे लिखते हैं - तुलसी के समय में दोहा-चौपाई वाली कडवक शैली का प्रचलन खूब था। यह परम्परा प्राकृत-अपभ्रंश से चली आती थी। इसका उपयोग प्रेमाख्यानक सूफी कवियों ने भी किया। तुलसी ने रामचरितमानस में यही शैली अपनायी। यह धारणा निराधार है कि इसके लिए वे जायसी और दूसरे प्रोमाख्यानक कवियों के ऋणी है।
इसी क्रम में उनका अन्वेषी चित्त सूर-साहित्य की मनोरम गलियों में रमते-रमते कविकुलगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर तक चला जाता है। जिनका मानना था- सूर की कविता में प्रेम और उसके दुख की अर्न्तवृत्तियों की सघन और एन्द्रिक मौजूदगी अभिभूत करने वाली है।
माघव हाडा अपनी भूमिका में इस पर लिखते हैं- उन्होंने सूरदास के किसी सुन्दर युवती के सौन्दर्य पर मुग्ध -अभिभूत होकर आँखें फोड देने वाली जनश्रुति को आधार बनाकर सूरदासेर प्रार्थना नामक कविता में लिखा -सच बताओ वैष्णव कवि, तुमने यह चित्र कहाँ पाया? यह विरहतप्त गान तुमने कहाँ सीखा? किसकी आँखें देखकर राधिका की आँसू भरी आँखें याद आई थीं?
इसी क्रम में मीर पर उनके लेखन को देखें, तो उनका अध्ययन, स्वाध्याय विस्मित करता है। वे मीर का महिमामण्डन या स्तुतिमण्डन नहीं करते, उनका लेखन संवादधर्मी है। संवाद निरन्तर उनके लेखन का बीज सूत्र है। उनकी इतिहास दृष्टि अतीतबोध से सम्पन्न है। वे राग-द्वेष से परे प्रामाणिकता और ईमानदारी के मार्ग पर आगे बढते हैं। इसीलिए हम देखते हैं कि मीर साहित्य के सम्बन्ध में व्याप्त अन्तर्द्वन्द्वों की गाँठों को खोलते हुए उनसे कोई डोर टूटती-छूटती नहीं। वे एक-एक रेशे को आसानी से सुलझाते हैं। उदाहरण के लिए मीर के वैशिष्ट्य का निरूपण करते हुए वे लिखते हैं - मीर की कविता उनके समकालीन सन्तों-भक्तो से बहुत अलग एवं खास किस्म की है। उनकी कविता में जगत जीवन का निषेध उस तरह से नहीं है जैसा अन्य मध्यकालीन सन्तों-भक्तों के यहाँ है। उनकी कविता में दृश्य और मृत का उत्साहपूर्ण आग्रह है।
अस्तु, माधव हाडा का सम्पादन केवल संकलन नहीं है, वरन् एक जिम्मेदार सर्जक का रचनात्मक उद्यम है जो अपनी पूरी तन्मयता और मन से अपने विषय में रमा है। जो विषय में गहरे पैठकर अपने पाठक के लिए नित्य ही कुछ नवीन और अद्वितीय लाता रहता है। इसी कारण उनका लेखन सुधी पाठकों, शोधार्थियों और आलोचकों के साथ साहित्य रसिकों के लिए रचनात्मक ऊर्जा एवं उत्साह का संचार तो करता ही है, साथ ही ठहर कर ठिठक कर अपनी देशज परम्परा की आँख से वह सब साफ और स्पष्ट दिखाता है जिसे अक्सर हम देख कर भी नहीं देखते।
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इस अंक के विशेष स्मरण में सुभाष सिंगाठिया ने राजेन्द्र यादव पर पूरे मनोयोग से लिखा है। कविता कॉलमें आफ लिए हमने इस बार परिदृश्य के समर्थ कवियों नन्दकिशोर आचार्य, राजेश जोशी के साथ मीठेश निर्मोही व मनोज शर्मा की कविताएँ प्रस्तुत हैं। लेख कॉलम में कुल नौ लेख हैं, जो कस्तूरबा और नेहरू के संस्कृत प्रेम के साथ विविध विषयों के दृष्टिसमपन्न आलेख हैं। सूर्यनारायण रणसुभे का मणिपुर संस्मरण हृदयस्पर्शी बन पडा है। कहानी कॉलम में इस बार बाबू राज के नायर, भगवान अटलानी के साथ अनुवाद में राजस्थानी से स्थापित कहानीकार मदन सैनी की कहानी फुरसत का हिन्दी अनुवाद भी है। इसके अतिरिक्त चार पुस्तकों की प्रभावी समीक्षाएँ भी इस अंक को समृद्ध बनाती हैं। शेष कॉलम यथावत है। अंक के आवण का आकल्पन चर्चित चित्रकार संजू जैन ने किया है।
अंक पर आपकी प्रतिक्रियाओं का इन्तजार रहेगा।
मंगलमय जीवन की आकांक्षा के साथ -
- ब्रजरतन जोशी