fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

राजेन्द्र यादव होना हर किसी के बूते की बात नहीं है

सुभाष सिंगाठिया
राजेन्द्र यादव होना साहित्य, विचार और प्रतिरोध की दृष्टि से हर किसी के बूते की बात नहीं है। सत्ताधीशों से लेकर अपने समकालीन साहित्यकारों, विचारकों, आलोचकों, समीक्षकों और यहाँ तक कि संपादकों के हर समय निशाने पर रहने वाले राजेन्द्र यादव की अपनी मौलिक स्थापनाएँ और सुरक्षा कवच थे। वे बिना किसी की परवाह किए वह सब स्थापित करते चले गए जिसकी स्थापना और दखल या कहें कि हस्तक्षेप सामाजिक न्याय और समाज को खूबसूरत और बेहतर बनाने के लिए जरूरी मानते थे- फिर चाहे वह हजारों सालों से प्रताडना झेलते आ रहे दलितों के साथ खुलकर खडा होना हो या स्त्री के हक और हुकूक और उसके हिस्से की जमीन और आसमान के लिए लडाई लडनी हो। या फिर समाज को प्रतिक्रियावाद की ओर धकेलने वाली कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ अपनी तोप का मुँह खोलना हो... इस लडाई के लिए उन्होंने किसी परिणाम की परवाह किए बगैर अपनी बौद्धिक जोर-आजमाइश और तर्कों से अपने विरोधियों के मुँह बन्द किए। शायद यही कारण रहे कि उनकी शख्सियत हमेशा विवादों से भरी रही। मगर यह भी सत्य है कि काल के भाल पर जब आपको कुछ कालजयी और अमिट रेखांकित करना हो तब अपने विचारों और प्रतिरोध की स्थापना करना भी आना ही चाहिए और राजेन्द्र यादव में यह हुनर ही उन्हें अपने समकालीनों से अलग खडा करता था।
उनके रहते हुए पिछले ढाई दशक दिल्ली में साहित्यिक पत्रकारिता और साहित्यिक गतिविधियों का एक गढ हंस था। या यूँ कहें कि देश की साहित्यिक सत्ता के केन्द्र हंस और राजेन्द्र यादव थे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। गौरतलब है कि तमाम मतभेद, विरोध, वैचारिक असहमति और दो राय के बावजूद साहित्य और वैचारिक कर्म से जुडा बडे से बडा आलोचक, विचारक और साहित्यकार इस सत्ता के वजूद को महसूस करता रहा, भले ही किसी का अहम यह स्वीकारने में उनके आडे आता रहा हो। राजेन्द्र यादव का लेखन- सम्पादकीय, उद्बोधन और साहित्यिक और साहित्एतर बहसें उनकी बौद्धिकता के जीते-जागते प्रमाण हैं। दलित और स्त्री-विमर्श के साथ-साथ साहित्य की वैचारिक अभिव्यक्ति के लोकतांत्रिकरण का जो रोपण और पोषण उन्होंने हंस के माध्यम से किया वह वर्णनातीत है। हंस के ऐसे सैकडों अंक होंगे जो यह साबित करते हैं कि असहमति के लिए भी उनके यहाँ उतना ही स्पेस था जितना सहमति के लिए और सहमति-असहमति का यह बराबर स्पेस ही था जिसने उनके यहाँ बहसों और विमर्शों को न सिर्फ जन्म ही दिया बल्कि इनकी आवाज दूर तलक गई और इस आवाज की अनुगूँज ने सामंतशाही, सत्ता और (अ)व्यवस्था की मजबूत चौखटों पर ताकतवर दस्तक दी, जिससे अनेक बार ऐसे अवसर आए कि इन ताकतों की चूलें हिलने लगीं।
उन पर यदा-कदा ए आरोप भी लगते रहे कि उनकी पत्रकारिता अधिकतर स्त्री और दलित-विमर्श के गलियारों में ही घूमती रही और व्यवस्था परिवर्तन के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। मगर व्यवस्था परिवर्तन के मायने उनके लिए शायद अकेली राजनीतिक व्यवस्था तक ही रूढ नहीं थे बल्कि सामाजिक बदलाव उनके लिए अधिक महत्त्वपूर्ण था, जो इस बदलाव को समग्र व्यवस्था परिवर्तन का हिस्सा मानते थे। यह अलग बात है कि स्त्री और दलित को लेकर उनके अपने विशेष आग्रह थे। रमणिका गुप्ता फाउण्डेशन के राँची में हुए सम्मान समारोह जिसमें रमणिकाजी की वजह से मुझे भी जाने का सौभाग्य मिला, में उन्होंने दलित और स्त्री को रेखांकित करते हुए कहा था कि दलितों और स्त्रियों का कोई अपना इतिहास नहीं है। स्त्री का जो इतिहास है वह उसके मालिक का इतिहास है। उसका इतिहास सिर्फ पति या जो भी पुरुष है उसकी स्वामी भक्ति का इतिहास है, स्त्री का अपना नहीं। वह बेटे के लिए समर्पित है, पति के लिए समर्पित है, बाप के लिए समर्पित है या किसी पुरुष के लिए समर्पित है। उसी का नाम लेकर व्रत रखती है। उसी का नाम लेकर पूरा करती है और उसी का नाम लेकर कहना चाहिए कि तरह-तरह के आयोजन करती है। दलित का इतिहास भी हमारे इतिहास में ही है। वह अपमान, यंत्रणाओं और प्रताडना से भरा हुआ इतिहास है। मनुष्य को जो सम्मान चाहिए वह वहाँ बिल्कुल नहीं है। दलितों का भी इतिहास लगभग अपने मालिकों की सेवा, बेगार और उनके लिए जान देने देते रहने और कर्ज में रहने का इतिहास है। उनके बच्चों को स्कूल नहीं जाने दिया जाता, पढने नहीं दिया जाता और बराबरी का कोई अवसर नहीं दिया जाता। इसलिए स्त्री की तरह ही उनका भी अपना कोई इतिहास नहीं है।
संभवतः समाज द्वारा स्त्री और दलित को निम्न दर्जे पर रखने वाली सोच जैसे कारण ही रहे होंगे कि उन्होंने स्त्री और दलित को अपनी साहित्यिक पत्रकारिता की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रखा। आज देश के विश्वविद्यालयों में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श मुख्य विमर्शों में जगह बनाए हुए हैं और देश की अधिकतर गम्भीर पत्र-पत्रिकाओं में ए दोनों विमर्श स्थायी भाव की तरह बने हुए हैं तो यह श्रेय सिर्फ और सिर्फ राजेन्द्र यादव को ही जाता है। आपको याद होगा कि ए वही विश्वविद्यालय हैं जिन्हें राजेन्द्र यादव ने ज्ञान का कब्रिस्तान कहा था। इन विश्वविद्यालयों में होने वाले शोधों के तौर-तरीकों से वे हमेशा नाखुश दिखे। युवा आलोचक और मेरे अभिन्न मित्र डॉ. दिनेश कुमार (असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी साहित्य, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी) से एक लम्बी बातचीत में वे एक जगह कहते हैं कि मैं शुरू से ही मानता हूँ कि विश्वविद्यालय ज्ञान के कब्रिस्तान हैं। जहाँ सिर्फ 50 वर्ष पूर्व मरे हुए लोगों का ही अभिनन्दन होता है। जीवित और जीवंत लोग उनके गले कभी नहीं उतरते। समाज और राजनीति के दूसरे प्रश्नों से जूझने वाले लेखक विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के लिए सबसे बडे आउटसाइडर होते हैं। उनके हिसाब से शुद्ध साहित्यकार वह है जो चौबीसों घंटे रीतिकाल, भक्तिकाल और छायावाद ही घोटता रहता है और प्रगतिवाद तक आते-आते उनकी साँस फूल जाती है। उनके लिए केवल कलावादी और कवि ही साहित्यकार होते हैं। अपने गुरुदेव से उन्होंने जो पढा था उसे ही वे आज भी छात्रों के कान में उगलते रहते हैं। अभी इन्होंने ज्यादतियों के नाम पर केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, नागार्जुन जैसों की कैसी मिट्टी पलीद की है। शायद ही कोई अध्यापक हो जिसकी कलम के शिकार यह गरीब रचनाकार नहीं हुए हों। इनके लिए न यशपाल साहित्यकार है, न राँगेय राघव, न भगवत शरण उपाध्याय और न शिवराज सिंह चौहान, क्योंकि वे साहित्य को समाज शिक्षा से जोड रहे थे। खैर... यह बात विशेष रूप से रेखांकित करने योग्य है कि राजेन्द्र यादव ने इन दोनों ही विमर्शों को केन्द्र रखकर इन्हें मुख्यधारा का विमर्श बनाया। उल्लेखनीय है कि चाहे स्त्री-विमर्श हो या दलित-विमर्श दोनों ही विमर्श आज सिर्फ पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों का हिस्सा बनने तक ही सीमित नहीं है बल्कि समाज में आज इन दोनों के बीच एक सम्मानजनक स्थान है।
हालाँकि उन पर रह-रहकर यह आरोप लगते रहे हैं कि उनका स्त्री-विमर्श दैहिक विमर्श तक सीमित रहा है और बौद्धिकता से उसका दूर-दूर तक का वास्ता नहीं है। डॉ. दिनेश कुमार से इसी बातचीत में बौद्धिक और दैहिक के इस प्रश्न पर उन्होंने इसे और खोलते हुए कहा कि मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि आफ बौद्धिकता के मायने क्या हैं। क्या ईमानदारी से कहानियाँ, उपन्यास लिखने वाली स्त्रियाँ बौद्धिक नहीं होतीं। फिर भी नाम लेने हो तो मैं कहूँगा कि हमने रोहिणी अग्रवाल, अर्चना वर्मा, सुधा अरोडा, निर्मला जैन, अनामिका और विजय शर्मा जैसी आधा दर्जन लेखिकाओं को प्राथमिकता दी है जो किसी भी समीक्षक या विचारक से उन्नीस नहीं हैं।
उल्लेखनीय है कि हमारे समय के साहित्य की दुनिया के इन बेहतरीन नामों और इनके वजूद पर गौर करें और स्त्री, उसके वजूद और उसकी मुक्ति के मायनों की बात करें तो विश्वविख्यात फ्रेंच लेखिका सिमोन द बोउआ और राजेन्द्र यादव के विचार अक्षरशः मिलते हैं। सिमोन की विश्वचर्चित कृति द सेकंड सेक्स के हिन्दी रूपांतरण स्त्री उपेक्षिता ( प्रभा खेतान) में एक जगह लिखा है कि देश में बहुत कम स्त्रियाँ जीनियस हुई हैं, तो उसका कारण उसका स्त्री होना नहीं बल्कि यह समाज है जो स्त्री की सारी अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता रहता है। उसको प्रत्येक सुविधा से वंचित रखता है। बुद्धिमान से बुद्धिमान स्त्री की भी सार्वजनिक हितों के लिए बलि दे दी जाती है। यदि उन्हें विकास का पूरा अवसर मिले तो कोई भी ऐसा काम नहीं जो वे ना कर सके... उसे समाज की फूहड प्रथाओं ने जकड कर रख दिया है। राजेन्द्र यादव के स्त्री-विमर्श पर शिद्दत के साथ दृष्टिपात करें, तो राजेन्द्र यादव की स्त्री-मुक्ति के मायने वे हैं जहाँ एक स्त्री इस पौरुषपूर्ण समय से बाहर आकर अपने बौद्धिकता के दम पर अपना अलग अस्तित्व बनाए न कि इस मुक्ति के मायने पुरुष समाज से इतर कोई अलग दुनिया बसा लेने की कल्पना।
राजेन्द्र यादव ने अपनी साहित्यिक पत्रकारिता को हंस के माध्यम से किए जाने वाले विमर्शों और चेतनायुक्त सम्पादकियों के माध्यम से समय के साथ अपडेट होते हुए आगे बढाया। समय की उठा-पटक और परिणाम को वे बखूबी पहचानते थे। यही वजह थी कि साहित्य के अलावा समाज और राजनीति में घटने वाले घटनाक्रमों को उन्होंने बिना किसी देरी या बहाने के तत्काल काल के भाल पर अंकित करके अपने हस्तक्षेप और अपने होने को दर्ज करवाया। संभवतः यही कारण है कि हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता में उन जैसा कोई दूसरा नहीं कर पाया। उनके सम्पादकीयों के तेवर ने समय-समय पर उन प्रतिक्रियावादी ताकतों को झकझोरा जो समाज को सोलहवीं सदी की ओर धकेलती है। देश-दुनिया के वे तमाम लोग जो राजेन्द्र यादव के लेखन में रुचि रखते हैं वे भलीभाँति जानते हैं कि किस तरह से उन्होंने हनुमान को दुनिया का पहला आतंकवादी बताते हुए धारदार संपादकीय लिखा था। यह घटना इस बात को रेखांकित करती है कि उनकी साहित्यिक पत्रकारिता बेहद बेबाक, निर्भीक, निडर और बडी से बडी सत्ता और ताकतों को आईना दिखाने की हिम्मत रखती थी।
विशेषकर जब-जब अभिव्यक्ति की आजादी की बात आती थी तब वह हर उस शख्स के साथ खडे नजर आते थे जहाँ अभिव्यक्ति की प्राथमिकताएँ तय होती हैं। फिर भले ही उनके सामने किसी तरह की सत्ता और ताकत क्यों ना हो। हमेशा आजाद अभिव्यक्ति और लोकतन्त्रीय व्यवस्था की हामी भरने वाले इस शख्स के बारे में अनेकानेक ऐसी घटनाएँ हैं जो इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी का पैरोकार साबित करती है। प्रख्यात लेखिका तस्लीमा नसरीन जब लज्जा वाले घटनाक्रम के कारण बांग्लादेश से भारत शरण लेकर आईं और यहाँ आने पर जब वे लिखने लगी तो बडे-बडे पत्रकार घरानों ने उनको छापने की हिम्मत नहीं की। उस वक्त राजेन्द्र यादव उनके साथ पुरजोर ढंग से खडे हुए और उनकी कलम को वही आवाज़ दी जिस तेवर के लिए तस्लीमा नसरीन जानी जाती हैं। यहाँ तक कि अपनी पत्रिका हंस में भी तस्लीमा नसरीन का स्तम्भ शुरू करवाया और वह उनके जाने के बाद आज भी बदस्तूर जारी है।
हंस के संपादकीय उठाकर देखें तो राजेन्द्र जी ने सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक, वैचारिक, कला-संस्कृति और इनसे इतर अनेकानेक मुद्दों को बहसों और विमर्शों के केन्द्र में रखकर समाज को चेतना के स्वर दिए जिसकी अनुगूँज हमें हर समय सुनवाई देती रहती है- बशर्ते कि हम सुनना चाहें।
राजेन्द्रजी के व्यक्तित्व पर एक सरसरी नजर डाली जाए, चटक रंग के कुर्ते या जो भी लिबास पहनते बहुत सलीके से.. लोग जिस तरह एक उम्र के बाद फैशन की ओर ध्यान कम कर देते हैं राजेन्द्र जी के साथ ऐसा बिलकुल नहीं था। सिगरेट पीते वक्त कैंची से काट-काट कर उसे बार-बार अपनी जेब में रखने का उनका तरीका इतना गलैमराइज्ड लगता था कि देखने वाले का भी सिगरेट पीने का मन हो उठता था। महिला और पुरुष मित्रों के साथ जमकर अड्डेबाजी और ठहाके लगाकर हँसना और अपनेपन से रिश्ते निभाना कोई उनसे सीखे। आप दो बार उनसे मिले नहीं कि इन मुलाकातों के बाद आपसे उतनी ही घनिष्ठता हो जाती थी जितना कोई 20 साल पुराना उनका दोस्त हो। मेरा उनसे पहली बार कहीं 2007 के आसपास मिलना हुआ- मेरे मित्र कवि-सम्पादक हरेप्रकाश उपाध्याय के साथ जहाँ शायद किसी नाटक का मंचन था। मैं उनके पैर छूने लगा, तो तपाक से मेरे हाथ पकड लिए और पैर छूने के लिए मना किया। तब हरे प्रकाश जी ने बताया कि ए किसी को अपने पैर नहीं छूने देते और उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया। हालाँकि उससे पहले साहित्यकार और पत्रकार मित्र लवलीन (जयपुर) ने एक बार मेरी फोन पर उनसे बात करवाई थी, उस टेलीफोनिक परिचय का हवाला देते हुए रात को उनके निवास पर मैंने बताया, तो उन्हें याद आया। हालाँकि उस मुलाकात के थोडे दिन पहले ही मेरे पास युवा कथाकार अजय नावरिया का फोन आया था कि सुभाष हंस में काम करने के लिए राजेन्द्रजी को एक उप संपादक की आवश्यकता है और मैंने तुम्हारा नाम सजेस्ट किया, तो राजेन्द्र जी ने हामी भर दी। मगर मेरे लिए यह बहुत अफसोसजनक था कि मेरी पारिवारिक परिस्थितियाँ इस तरह की थीं कि मैं चाह कर भी हंस और राजेन्द्र जी के सान्निध्य का हिस्सा नहीं बन पाया। उसके बाद हरे प्रकाश उपाध्याय ने वहाँ पर उप सम्पादक के रूप में काफी समय तक काम किया।
उसके बाद कईं बार उनसे मिलना हुआ। उनमें से दो बार निकट के सम्पादक और कथाकार कृष्ण बिहारी जी के साथ उनसे लम्बी मुलाकातें हुईं- हंस के कार्यालय में और उनके निवास पर भी। उस समय मैं श्रीगंगानगर से निकलने वाले दैनिक प्रशान्त ज्योति का रविवारीय साहित्यिक परिशिष्ट संपादित करता था। मैंने एक बार मैत्रेयी पुष्पाजी के बन ठन कर कहानी देने गई... वाले वक्तव्य पर एक परिचर्चा प्रशान्त ज्योति में आयोजित की जिसका संयोजन डॉ. साधना अग्रवाल ने किया था, जिसमें देश की स्थापित लेखिकाओं के वक्तव्य थे। उस परिचर्चा का हवाला देते हुए उन्होंने हंस के एक संपादकीय में लगभग नाराजगी के रूप में जिक्र किया, जिसका भाव यह था कि मैत्रेयी तुम विचलित मत होना मैं तुम्हारे साथ हूँ। खैर, उनके साथ जितने भी रहे अच्छे रिश्ते रहे। कुल जमा दर्जनभर बार उनसे मिलने और बात करने का अवसर मिला। 31 जुलाई 2012 को हंस के वार्षिक उत्सव के बाद रात 10:00 से 2:30 बजे तक कृष्ण बिहारी जी के साथ उनके निवास पर और 1 अगस्त 2012 को लगभग पूरे दिन हंस के कार्यालय में हुई उनसे मुलाकात और बात अन्तिम बन गई...।
नई कहानी से लेकर अपनी व्यक्तिगत कहानियों के लिए सबसे अधिक चर्चित रहे इस महा बौद्धिक को ना सिर्फ याद रखा जाएगा बल्कि इनकी अड्डेबाजी पर होने वाली दमदार सार्थक बहसों, विमर्शों, साहित्य, विचार के साथ-साथ हमेशा अपनी धारदार लेखनी की वजह से विवादों के केन्द्र में रहने वाले इस मसीहा की प्रगतिशील सोच, अभिव्यक्ति की आजादी, वैचारिक लोकतंत्र के समर्थक और स्त्री और दलित-विमर्श के नेतृत्वकारी वाहक के रूप में यादव जी इतनी लम्बी लकीर खींच गए कि हमेशा इनका अनुकरण किया जाएग। यह हकीकत है कि विश्व साहित्य के आदरणीय राजेन्द्र यादव जैसे अध्एता, ऐसे संपादक, ऐसे लेखक, ऐसे विमर्शकार और ऐसे बौद्धिक महामानव कभी-कभी ही पैदा होते हैं।

सम्पर्क - सम्पादक, पूर्वकथन हिन्दी विभाग,
भगवती गर्ल्स कॉलेज,
लालगढ जाटान, जिला- श्रीगंगानगर
पिन- 335037 (राजस्थान)
मो. 9829099479