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राजेश जोशी की कविताएँ

राजेश जोशी
पिता की स्मृति
पिता !
जाने से कुछ माह पहले
तुम अपनी स्मृति कहीं रख कर
भूल गए थे ।
जैसे अक्सर ही तुम अपनी
ऐनक या अपने दाँत की डिब्बी
कहीं रख कर भूल जाते थे
तुम्हें हम में से कोई भी याद नहीं था
यहाँ तक कि तुम माँ को भी नहीं पहचान पाए थे
तुम बरसों से जिस घर में रहे आए
वहाँ तुम अपने ही कमरे का रस्ता भूल जाते थे

तुम्हारे चले जाने के बाद हमने घर के कोने कोने में
तुम्हारी किताबों और अस्तव्यस्त से कागजों में
तुम्हारी स्मृति को ढूंढने की बहुतेरी कोशिश की
लेकिन वो कहीं नहीं मिली
अगर भूले से वो मिल गयी होती
तो क्या हम उसमें अपने को ढूंढ पाते?
कोई नहीं जानता कि मनुष्य का कोई उत्तर जीवन
होता है या नहीं
लेकिन कहीं होता तो तुम किसी को भी अपने बारे में
कुछ भी कैसे बता पाते ?

तुम कभी-कभी कोई श्लोक
बोल कर जब उसका अर्थ बताते
तो मैं सोचता कि
किसी दिन उसे डायरी में लिख लूंगा
यह ख्याल तो कभी आया ही नहीं
कि कभी तम भी अपनी स्मृति को कहीं रख कर
भूल जाओगे !
अब जब मैं खुद कुछ कुछ भूलने लगा हूँ
अपनी खाली डायरी और कलम लिए खडा हूँ ........
विस्मृतियों के इस बियाबान में !!

अब तो वो मकान भी नहीं रहा !
जिसमें तुम अपनी स्मृति कहीं रख कर भूल गए थे
तुम जो अपनी स्मृति को कहीं रख कर भूल गए हो
कभी कभी भटकते हुए
हमारी स्मृतियों में चले आते हो
दिख जाते हो कभी कभी,
खोए खाए से चलते फिरते,
थोडे गुमसुम से और कभी-कभी
बोलते बतियाते हुए !



मैं और कविता

मेरे जन्म लेने से पहले
मैं पैदा नहीं हुआ
और तय है , मौत से पहले
मैं नहीं मरूँगा
लेकिन इतने ही विश्वास के साथ
कविता के बारे में यह बात कहना मुश्किल है

वो मेरे पैदा होने से पहले से ही
मन के किसी कोने में छिप कर
अपने खटराग में लगी थी शायद
और अन्तिम पंक्ति के लिखे जाने के बाद भी
उसने मेरा पीछा नहीं छोडा है !

माँ

माँ जब हँसती थी
उसकी आँखें बन्द हो जाती थीं

कई दिन बाद लेकिन एक दिन ऐसा हुआ
कि माँ की आँखें बन्द हो गयीं
जबकि वो हँस भी नहीं रही थीं
मैंने उसकी बगल में खडी मृत्यु से कहा
यह साफ साफ चीटिंग है .......
तुम तत्काल या तो माँ की हँसी लौटाओ
या उसकी वो आँखें
जो मुझे देखते ही मुझमें कुछ ढूंढने लगती थीं !

सम्पर्क - एम-11, निराला नगर, दुष्यंत कुमार त्यागी मार्ग, भदभदा रोड, भोपाल-४६२००३
मो. ९४२४५७९२७७