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विभाजित मस्तिष्क और उसकी फलश्रुतियाँ

माधव हाडा
पश्चिमी ज्ञान मीमांसा और मीरं
भारतीय भाषा में जिसे धर्म कहा गया है, उसे किसी यूरोपीय भाषा द्वारा अनुवाद कर अभिव्यक्त करना असम्भव है, आस्था के क्षेत्र में भारतवर्ष ने विभाजित मस्तिष्क का विरोध किया है। हमारी बुद्धि, हमारी धारणा, हमारा आचरण, जिसे हम इस दुनिया में और उसके बाद भी प्रिय मानते हैं, ए सभी एक साथ मिलकर हमारे धर्म का गठन करते हैं। भारतवर्ष ने विश्वास को रोज़मर्रा के उपयोग और औपचारिक अवसरों जैसे वर्गों में विभाजित नहीं किया। उदाहरण के लिए जो जीवनशक्ति हाथों, पैरों, सिर, पेट आदि शरीर के विभिन्न अंगों का संचालन करती है, वास्तव में एक ही इकाई है और हाथ, पैर आदि में पृथक-पृथक जीवन नहीं है। इसी प्रकार, भारतवर्ष ने धर्म के अलग-अलग भाग नहीं किए, मसलन विश्वास का धर्म, कार्य का धर्म, रविवार का धर्म, अन्य छह दिनों का धर्म, चर्च का धर्म, घर का धर्म आदि-आदि। भारतवर्ष का धर्म, सम्पूर्ण समाज का धर्म है। इसकी जडें पृथ्वी में, तो शीर्ष आकाश में उदीयमान है। भारतवर्ष जडों और शीर्ष को अलग-अलग हिस्सों के रूप में नहीं देखता। भारतवर्ष तो धरती से आकाश तक फैले एक विराट वृक्ष के रूप में धर्म को देखता है, जो पूरे जीवन को आच्छादित किए हुए है।1 - रवीन्द्रनाथ ठाकुर
जर्मन भारतविद् हरमन गुस्ताव गोएत्ज़ (1898-1976 ई.) लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉड (1782-1835 ई.) के बाद मीरं के जीवन पर विस्तार से विचार करने वाले पहले यूरोपीय विद्वान् थे। टॉड ने मीरं पर स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं लिखा- उन्होने एनल्स एण्ड एँटिक्विटीज़ ऑफ राजस्थान (1832 ई.) और ट्रेवल्स इन वेस्टर्न इण्डिया (1839 ई.) में मीरं पर प्रसंगवश दो बहुत संक्षिप्त टिप्पणियाँ कीं। टॉड के बाद गोएत्ज़ ही पहले विदेशी विद्वान् थे, जिन्होंने मीरं के जीवन की अपने समय में उपलब्ध सभी स्रोतों और पारिस्थितिक साक्ष्यों के आधार पर पुनर्रचना की। उन्होंने 1956 ई. में दिल्ली की पी.ई.एन. शाखा में पूर्व राष्ट्रपति और दार्शनिक डॉ. राधाकृष्णन् की उपस्थिति में मीरं पर एक व्याख्यान दिया, जो बाद में, 1966 ई. में विद्याभवन, मुम्बई से मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। मीरं के सम्बन्ध में गोएत्ज़ की राय बहुत ऊँची थी। वे लिखते हैं कि हम केवल एक अन्य व्यक्तित्व के बारे में जानते हैं, जिसको उसके समान कहा जा सकता है और वह है यीशु मसीह। यदि कविता परमात्मा से प्रेरित है, तो वह पिछली सहस्राब्दी के दौरान भारत की सबसे बडी कवयित्री थी, क्योंकि वह एक असाधारण व्यक्तित्व, एक सन्त, मानव जाति में से सर्वोच्च पवित्रात्मा थी। 2 उनका कार्य मीरं के जीवन का इतिहास नहीं है, यह उसके जीवन की पुनर्रचना है। हरमन गोएत्ज़ कुछ हद तक टॉड के समान और अन्य यूरोपीय विद्वानों से अलग थे। उन्होंने आग्रहपूर्वक मीरं से सम्बन्धित सभी प्रकार के उपलब्ध स्रोतों का इस्तेमाल किया- वे इतिहास, जनश्रुतियों, पारिस्थितिक साक्ष्यों आदि में बहुत गहरे और दूर तक गए। मेवाड, मारवाड और मेडता सहित मध्यकालीन इतिहास की उनकी जानकारियाँ और समझ कभी-कभी चमत्कृत करती हैं। पुनर्रचना के लिए उन्होने उपलब्ध जनश्रुतियों को भी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखकर सुसंगत रूप देने या उनके युक्ती करण का प्रयास किया। गोएत्ज़ यह जानते थे कि मीरं के सम्बन्ध में उपलब्ध स्रोत सीमित हैं और जो हैं, वे आधुनिक अर्थ में प्रामाणिक नहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपने को पारिस्थितिक साक्ष्यों और संभावनाओं पर एकाग्र किया। संभावनाओं के आधार पर उन्होंने उपलब्ध तथ्यों को भी नयी व्यवस्था में रखा। वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने मीरं के जीवन से सम्बन्धित इतिहास से छूटी हुई जगहों को संभावनाओं से भरने की कोशिश की। उन्होंने लगभग अपनी सभी स्थापनाओं का समाहार यह कहकर किया कि यह सब केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं, दस्तावेज़ीकरण नहीं। 3 मीरं के जीवन की यह पुनर्रचना उनको मीरं के ऐसे व्यक्तित्व तक ले गयी, जो उसकी पारंपरिक और प्रचलित छवि से बहुत अलग और हटकर थी। उन्होंने लिखा कि इस तरह मीरं का जो व्यक्तित्व उभरता है, वह सन्त कवयित्री की पारम्परिक तस्वीर से काफी अलग है।4 उन्होंने आगे इसे और स्पष्ट करते हुए लिखा कि हमारी टिप्पणियों की समीक्षा करने से मीरं बाई का एक चित्र उभरता है, जो उनके पारंपरिक रूप से बहुत अलग है। एक भावुक गायिका नहीं, देव प्रतिमा के सामने उन्मादित होकर नाचते हुए और एक मध्यमवर्गीय मानसिकता वाले राणा द्वारा प्रताडित नहीं, बल्कि राजनीति में पारंगत एक महान राजकुमारी, एक समाज सुधारक और मिशनरी, एक अद्भुत कवयित्री और कलाकार, और फिर, पहले अपनी शाही हैसियत और उसके बाद एक कवि और सन्त के रूप में अपनी ख्याति, फिर अपने व्यक्तित्व और अन्त में भारतीय इतिहास की सर्वाधिक निर्णायक राजनीतिक और सांस्कृतिक क्रांतियों में से एक- भारतीयों और तुर्कों, हिन्दुओं और मुसलमानों पर अकबर के साम्राज्य की वैचारिक रचनाकार और अपने व्यक्तित्व का सतत उत्सर्ग करने वाली।5 मीरं की इस पुनर्रचना से उसके जीवन सम्बन्धित कई नवीन तथ्य और मोड-पडाव उजागर हुए। यह कार्य गोएत्ज़ ने बहुत मनोयोग परिश्रम से किया, लेकिन कईं बार केवल अनुमान पर एकाग्रता ने उनको दूसरे उपलब्ध तथ्यों से अलग कर दिया और उनकी कुछ धारणाएँ तर्क और युक्ति के दायरे से बाहर, इतनी दूर भी चली गईं कि उन पर विश्वास करना मुश्किल हो गया। मीरं का सन्त-भक्त और कवि रूप उसके स्त्री मनुष्य रूप का विस्तार था, गोएत्ज़ ने कुछ हद तक उसकी मनुष्य यात्रा की पहचान भी की, लेकिन उपनिवेशकालीन यूरोपीय विद्वानों की तरह महत्त्व उन्होंने भी उसके सन्त-भक्त, कवि और रहस्यवादी पवित्रात्मा रूप को ही दिया। उन्होंने इस तरह अपने यूरोपीय ज्ञान मीमांसीय आग्रह के कारण मीरं के ऐतिहासिक स्त्री मनुष्य को उसके सन्त-भक्त और कवि रूप से अलग कर दिया।
1.
जर्मन मूल के कला इतिहासकार हरमन गुस्ताव गोएत्ज़ भारतीय कला इतिहास के क्षेत्र में अपने विद्वत्तापूर्ण योगदान के प्रसिद्ध हैं। गोएत्ज़ का जन्म 17 जुलाई, 1898 ई. को जर्मनी के कार्लज़ूए में हुआ और उनकी शिक्षा म्यूनिख की रियल-व्यायामशाला में हुई। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की सेना में अपनी सेवाएँ दीं। अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत में, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने ओटोमन तुर्कों में रुचि ली। बाद में उनकी दिलचस्पी ईरान (फारस) और भारत के फारसी मुगल साम्राज्य में बढ गयी। भारतीय कला इतिहास पर उनका काम मुगल लघु चित्रकला के अध्ययन से शुरू हुआ। गोएत्ज़ ने इसका आलंकारिक कला, नृवंशविज्ञान और इतिहास के अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए विस्तार से अध्ययन किया। गोएत्ज़ ने महान मुगल काल में भारतीय रियासतों में पोशाक और फैशन विषय पर म्यूनिख विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। कुछ समय के लिए वे बर्लिन के नृवंशविज्ञान संग्रहालय में सहायक क्यूरेटर भी रहे। गोएत्ज़ ने नीदरलैंड में लीडेन विश्वविद्यालय के कर्न इंस्टीट्यूट फॉर आर्कियोलॉज़ी एण्ड इण्डियन हिस्ट्री के सहायक सचिव और भारतीय पुरातत्त्व की वार्षिक ग्रन्थ सूची के सम्पादन का कार्य भी किया। नीदरलैंड में जब विदेशियों के रोज़गार पर कुछ प्रतिबंध लगा दिए गए, तो गोएत्ज़ ने ब्रिटिश भारत में काम करना स्वीकार कर लिया। बडौदा राज्य के शासक सयाजीराव गायकवाड, तृतीय ने उन्हें 1939 ई. में बडौदा के संग्रहालय और पिक्चर गैलरी का निदेशक नियुक्त किया, जहाँ उन्होंने 1953 ई. तक अपनी सेवाएँ दीं। उन्होंने यहाँ रहते हुए महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में संग्रहालय विज्ञान विभाग स्थापित करने में मदद की और यहाँ कला इतिहास के प्रोफेसर भी रहे। यहाँ से वे दिल्ली गए, जहाँ वे नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट के निदेशक बने। अगले दो वर्षों में, उन्होंने इस गैलरी का पुनर्गठन किया। भारत में 19 साल की सेवा के बाद गोएत्ज़ अस्वस्थ हो गए, इसलिए उन्होंने 1955 ई. में जर्मनी वापस जाने का निर्णय किया। उनको भारतीय कला के इतिहास लेखन में योगदान के लिए 1971 ई. में जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार दिया गया। गोएत्ज़ के 32 पुस्तकों सहित कई प्रकाशन हैं। उनका सबसे महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य इण्डिया- फाइव थाउजेंड ईयर ऑफ इण्डियन आर्ट है। 8 जुलाई, 1976 ई. को उनका निधन हो गया।6 कार्ल जेट्टमार ने उनके अवदान का मूल्याँकन करते हुए लिखा है हरमन गोएत्ज़ ने विरासत के रूप में हमारे लिए क्या छोडा है, यह स्पष्ट किया जाना उचित रहेगाः यानी, एक जागरूकता कि पूरी दुनिया में नई स्थिति के साथ, कठिन और चुनौतीपूर्ण अनुसन्धान परियोजनाओं का एक असीमित क्षेत्र सामने आया है। कई विद्वानों के जीवन में इससे पूर्णता आने की संभावना है। सामान्य संस्कृति में इन शोधों के कौन-से फिल्टर उस युग के कई कष्टों पर स्वस्थ प्रभाव डाल सकते हैं, जिसमें हम रहते हैं और परिवर्तनशील विचारधाराओं को मिलाकर प्राप्त किए गए उनके निष्कर्ष मनगढंत तरीकों से प्राप्त निष्कर्षों से अधिक फायदेमन्द साबित होते हैं।7
2.
हरमन गोएत्ज़ की इतिहास दृष्टि आम यूरोपीय इतिहासकारों से कुछ हद तक अलग थी। वे इतिहासकार नहीं, कला इतिहाकार और पुरातत्त्व संग्रहालय निदेशक थे, इसलिए उनकी दृष्टि आधुनिक इतिहास दर्शन में प्रशिक्षित आम आधुनिक यूरोपीय इतिहासकारों जैसी नहीं थी। उन्होंने अपने जीवन का बहुत महत्त्वपूर्ण समय भारत में व्यतीत किया और भारतीय मध्यकालीन कला और साहित्य सम्बन्धी सामग्री के सीधे सम्पर्क में भी आए, इसका सीधा प्रभाव भी उनकी दृष्टि पर दिखता है। मीरं के जीवन की इस पुनर्रचना में उनकी यूरोपीय इतिहासकार और मध्यकालीन भारतीय साहित्य का उनका ज्ञान और समझ एक साथ सक्रिय दिखते हैं। भारतीय मध्यकालीन कला और समझ के कारण भक्ति के सम्बन्ध में उन्होंने कोई सरलीकरण नहीं किया, जो यूरोपीय और आधुनिक संस्कार वाले भारतीय विद्वान अक्सर करते हैं। उन्होंने मीरं की खास प्रकार की क्षेत्रीय सांस्कृतिक पारिस्थितिकी को उसकी जीवन यात्रा के निर्धारण में खास महत्त्व दिया। उन्होंने माना कि धार्मिक अनुभव अनिर्वचनीय होता है, जो केवल उपमाओं, प्रतीकों, मिथकों और अनुष्ठानों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है, भाषाओं में नहीं, हर देश और सभ्यता में, बल्कि एक ही धार्मिक व्यवस्था के भीतर भी यह भिन्न होता है। मानवीय समझ के विभिन्न स्तरों के साथ, यह न केवल बुद्धि का मामला है, बल्कि हृदय का भी है।8 जनश्रुतियों के सम्बन्ध में गोएत्ज़ का नज़रिया यूरोपीय इतिहासकारों से कुछ हद तक अलग था। वे इनको अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों की तरह सर्वथा खारिज नहीं करते। वे उपलब्ध सूचनाओं में से इतिहाससम्मत सूचनाओं के चयन का आग्रह करते हैं। मीरं के जीवन की पुनर्रचना के प्रस्थान के दौरान ही वे यह संकल्प व्यक्त करते हैं। वे लिखते हैं कि मीरं बाई की जीवनी का निर्धारण उपलब्ध सभी सूचनाओं के आलोचनात्मक विश्लेषण के साथ उन सभी सूचनाओं को जो उसके सुसंगत जीवन विकास या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ असंगत है, हटाकर ही सम्भव है।9 जनश्रुतियाँ भी उनके लिए जिस रूप में वे होती हैं, मूर्खतापूर्ण हैं, लेकिन वे यह भी मानते हैं कि उनमें ऐतिहासिक तथ्यों का निर्विवाद मूल होता है। उन्होंने मीरं के सम्बन्ध में उपलब्ध प्राथमिक स्रोतों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि प्राथमिक स्रोत नाभाजी की भक्तभाल, प्रियादास की टीका और महिपति की भक्तिविजय, केवल मूर्खतापूर्ण और भावुक किंवदंतियों का एक संग्रह प्रस्तुत करते हैं, जैसाकि अधिकांश जीवनियों में पाया जाता है, जिनमें ऐतिहासिक तथ्यों का निर्विवाद मूल होता है, लेकिन स्पष्ट रूप से गलत समझा जाता है और गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।10 गोएत्ज़ का यूरोपीय इतिहासकार उनको देशज स्रोतों के प्रति संदेहशील बनाता है। उनके अनुसार ए स्रोत कुछ हद तक संदिग्ध हैं। इनके कारण ही मीरं के जीवन का विरूपीकरण हुआ है। देशज दस्तावेज़, शिलालेख, ताम्रपत्र उनके अनुसार मीरं की जीवन यात्रा के मोड-पडाव तय करने में बहुत उपयोगी नहीं हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि दुर्भाग्य से, पाठ आलोचना, स्रोतों के बारे में हमारे ज्ञान की, कम से कम वर्तमान स्थिति में हमारी बहुत मदद नहीं कर सकती है। आमतौर पर, विभिन्न लेखक अपने स्रोतों का उल्लेख नहीं करते हैं, जिससे सम्बन्धित परम्परा की जाँच नहीं होती है। इसके अलावा, दरबार में या उसके प्रभाव में लिखे गए अधिकांश काम पक्षपातपूर्ण थे। राजवंश या सैन्यशासक और पुरोहित वर्ग की प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक तथ्यों को शिलालेखों और ताम्रपत्र अनुदानों के मामले में दबा दिया जाता है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ आमतौर पर सुलभ नहीं थे और ऐतिहासिक ज्ञान और आलोचना अविकसित थी। कोई भी त्रुटि या सचेत विकृति न केवल परम्परा का स्थायी हिस्सा बनने के लिए उत्तरदायी थी, आगे और आगे विस्तृत और संयुक्त होने के लिए उत्तरदायी थी। सम्भवतः अधिकांश विसंगतियों को इन कमज़ोरियों के परिणामस्वरूप समझाया जाना चाहिए।11 गोएत्ज़ मीरं के जीवन की पुनर्रचना आख्यान और इतिहास की सीमाओं को ध्यान में रखकर करते हैं। उन्होंने साफ लिखा है कि किसी भी संगठित संप्रदाय द्वारा उन्हें स्वीकार नहीं किए जाने के बाद, उनका जीवन जल्द ही एक गाथा बन गया। ऐसा इसलिए और *यादा हुआ कि धार्मिक लेखक राजनीतिक इतिहास और उस दरबारी समाज के बारे में बहुत कम जानते थे, जिसमें वह रहती थी, और साथ ही इतिहास को जल्द ही ऐतिहासिक रिकॉर्ड में गलत साबित कर दिया गया था, क्योंकि बाद की पीढियों के लिए यह एक गौरवशाली समय नहीं था।12 गोएत्ज़ की इतिहास दृष्टि की एक खास बात और है, जो उन्हें सबसे अलग करती है, वो है उनकी संभावना या अनुमान पर निर्भरता। यहाँ उनका यूरोपीय इतिहासकार सक्रिय दिखता है। वे ज्ञात और प्रचारित को तर्क और युक्ति का सहारा लेकर संभावनाओं और अनुमानों के माध्यम से उलटते-पलटते हैं और यह दूर की कौडी लाने की सीमा तक होता है। वे मीरं के जीवन के ज्ञात मोड-पडावों के सम्बन्ध में कोई नया अनुमान करते हैं, जो कभी-कभी किसी तर्क को बहुत दूर तक खींचने जैसा होता है। अक्सर वे संभावना या अनुमान लगाने के बाद यह कहकर प्रकरण खत्म करते हैं कि यह हम सभी परिस्थितियों पर विचार करने से अनुमान लगा सकते हैं- कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हैं।13 यह टिप्पणी उनके कमोबेश सभी निष्कर्षों के समाहार में दुहरायी गयी है। गोएत्ज़ की इस मिली-जुली समझ और इतिहास दृष्टि का मिलाजुला प्रभाव उनकी मीरं के जीवन की पुनर्रचना पर साफ दिखाई पडता है।
3.
हरमन गोएत्ज़ की, जो दृष्टि और पद्धति है, वो उन्हें मीरं के जीवन की पुनर्रचना में कई नए ऐसे युक्तिसंगत मोड-पडावों और निष्कर्षों की तरफ ले जाती है, जिनका उनसे पहले किसी ने अनुमान भी नहीं किया था। मीरं के जीवन की पुनर्रचना में गोएत्ज़ की यह स्थापना महत्त्व रखती है कि मीरं महाराणा कुम्भा (1433-1468 ई.) की जगह महराणा सांगा (1509-1527 ई.) के सबसे बडे पुत्र भोजराज की विवाहिता थी। गोएत्ज़ के समय तक जेम्स टॉड14 और के.एम. झवेरी15 की यही धारणा अधिकांश विद्वानों में मान्य और प्रचारित थी कि मीरं महाराणा कुम्भा की रानी थी। बाद में इस पर विस्तार से विचार हुआ और अब इस सम्बन्ध में कोई संदेह नहीं है कि मीरं भोजराज की विवाहिता और मेडता के राव दूदा के पाँच में से चौथे बेटे रत्नसिंह की पुत्री थी। गोएत्ज़ ने इस सम्बन्ध में जो तर्क दिए थे, बाद में विद्वानों ने कमोबेश उन्हीं को दोहराया। ए तर्क इस प्रकार हैं- (1) यह कि अन्तःसाक्ष्यों में मीरं अपने को राठौड मानती है और अपने को दूदा से सम्बन्धित (दूदाजीनी) कहती है। भक्तमाल में भी उसके मेडता की होने का उल्लेख आता है, (2) मीरं के पिता रत्नसिंह थे, यह सभी तरह से प्रमाणित है। सांगा के सामन्त के रूप में उनका निधन 1527 ई. के खानवा के युद्ध में हुआ, (3) कुम्भा की रानियों के उल्लेख मिलते हैं, उनमें मीरं का नाम नहीं है, (4) कुम्भा अल्पवय में 1433 ई. में सत्तारूढ हुआ और उसका जन्म 1419 ई. में और मीरं का जन्म 1403 ई. में हुआ, तो विवाह के समय उसकी उम्र 14 वर्ष होनी चाहिए। कुम्भा का इस उम्र में विवाह सम्भव नहीं लगता, (5) महाराणा कुम्भा अत्यंत सहिष्णु और कृष्ण भक्त था। उसके द्वारा मीरं को प्रताडित करने की बात युक्तिसंगत नहीं है, (6) धर्माख्यानों में मीरं के जीव गोस्वामी के साथ वाद-विवाद का प्रकरण आता है। जीव गोस्वामी 1510 ई. के बाद वृन्दावन में रहने लगे और (7) चित्तौडगढ का मीरं बाई का मंदिर (वराह) कुंभश्याम मंदिर की तुलना में नया है।16 यह अलग बात है कि गोएत्ज़ ने अपनी धारणा की पुष्टि के लिए जो तर्क दिए, उनमें से कुछ बाद में विवादित हो गए, लेकिन, जो भी हो, अपने समय में गोएत्ज़ की इस स्थापना का बहुत महत्त्व था और इससे यह निर्विवाद स्थापित हो गया कि मीरं कुम्भा की रानी नहीं थी।
मीरं के प्रचारित पगली और प्रेमदीवानी रूप17 के विरुद्ध गोएत्ज़ की यह धारणा भी सही है कि मीरं एक सचेत, स्वावलम्बी और अपने समय में अच्छी तरह से शिक्षित युवती थी, जिसका विवाह महाराणा सांगा ने खूब सोच-समझकर अपने बडे और उत्तराधिकारी पुत्र भोजराज से किया।18 इस सम्बन्ध में दो बहुत मजबूत पारिस्थितिक और ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। पहला यह कि महाराणा सांगा अपने समय का बडा कूटनीतिज्ञ और अनुभवी शासक था और वह अपने सबसे बडे उत्तराधिकारी पुत्र के लिए पगली और प्रेमदीवानी युवती का चुनाव कभी नहीं करता। दूसरा यह कि आन्तरिक शक्ति सन्तुलन में जोधपुर (मारवाड) के राठौड पहले एक बार मेवाड पर आधिपत्य का प्रयास कर चुके थे19 और महाराणा सांगा उनको फिर से मज़बूत नहीं देखना चाहते थे, इसलिए इस विवाह से उन्होंने वीरमदेव, जो खुद राठौड था, को अपनी तरफ रखा। गोएत्ज़ ने पारिस्थितिक साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष भी सही निकाला कि राणा सांगा की जोधपुर मूल की रानी धनाबाई अपने पुत्र रत्नसिंह को सत्तारूढ देखना चाहती थी और मेडता और वीरमदेव से मीरं की सम्बद्धता इसमें बाधा थी, इसलिए उसके सम्बन्ध मीरं से तनाव और कटुता रहे होंगे।20 गोएत्ज़ से पहले और बाद में कुछ विद्वानों की यह धारणा थी कि राठौडों का भानजा होने के कारण रत्नसिंह की सहानुभूति मीरं के प्रति रही होगी21, लेकिन पारिस्थितिक साक्ष्य इसकी पुष्टि नहीं करते। दरअसल जोधपुर में राव गांगा (1480-1532 ई.) के बाद सतारूढ मालदेव (1511-1562 ई.) और वीरमदेव के सम्बन्ध शत्रुता के थे। उसने वीरमदेव को बहुत समय तक निराश्रय भटकने के लिए मजबूर किया था। राणा सांगा को पदच्युत कर उसके स्थान पर रत्नसिंह को सत्तारूढ करने की धनाबाई और उसके पीहर जोधपुर के राठौडों की मुहिम की गोएत्ज़ की धारणा भी बहुत हद तक तर्कसंगत और ऐतिहासिक है।22 राणा सांगा के समय में अन्तःपुर में होने वाले षड्यंत्र और जोधपुर के मालदेव के महत्त्वाकांक्षी होने की बात इसकी पुष्टि करती है। राणा सांगा निरन्तर युद्धों और उनमें घायल होने से कमज़ोर और निराश भी हो गया था- गोएत्ज़ की यह बात भी सही है।23 इस धारणा की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि इसकी अंतिम परिणति उसको जहर देकर मारने में हुई और यह ऐतिहासिक सत्य है।
मीरं के जीवन की पुनर्रचना में गोएत्ज़ का सबसे बडा योगदान उसके द्वारका प्रवास और बाद के उसके जीवन की घटनाओं की पुनर्रचना है। दरअसल मीरं के द्वारका में मूर्ति में विलीन हो जाने की अलौकिक घटना का कोई ऐतिहासिक निहितार्थ तो ज़रूर है। हो सकता है कि इसमें कुछ सच्चाई है और कुछ कल्पना, लेकिन यह बहुत महत्त्वपूर्ण पुनर्रचना है। खुद गोएत्ज़ ने भी कहा है कि यह गलत हो सकता है, लेकिन यह मानकर कि जनश्रुतियों में इतिहास का मूल बीज होता है उन्होंने इनको मीरं के जीवन के सुसंगत विकास में समायोजित करने चेष्टा की है। उन्होंने 1546 ई. के बाद की अकबर, तानसेन, बीरबल, तुलसीदास से मीरं की भेंट सम्बन्धी जनश्रुतियों पर निर्भर जीवन यात्रा की भी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ पुनर्रचना की। उनकी इस पुनर्रचना में लोक धारणाओं और इतिहास की अद्भुत जुगलबन्दी है। लोक में प्रचारित हो गया कि 1546 ई. के आसपास मीरं भगवान रणछोडजी की मूर्ति में समा गई। मीरं के अध्एताओं और इतिहासकारों ने भी मान लिया कि किसी दुर्घटना, बीमारी या जल समाधि लेने से हुई मीरं की मृत्यु को लोक ने अपने स्वभाव के अनुसार चमत्कार के रूप में प्रचारित किया है। क्योंकि यह घटना 1546 ई. के आसपास हुई, इसलिए इसके बाद मीरं की अकबर, मानसिंह, तुलसीदास, तानसेन और बीरबल से भेंट से सम्बन्धित जनश्रुतियों को अनैतिहासिक और कपोल-कल्पित मानकर खारिज कर दिया गया।24 गोएत्ज़ का यह अनुमान है कि मीरं का निधन 1546 ई. के आसपास नहीं हुआ। अधिकांश पारम्परिक स्रोतों के अनुसार मीरं की मृत्यु 65-67 वर्ष की उम्र में हुई, इसलिए इस हिसाब से 1498 ई. के आसपास जन्म लेने वाली मीरं का निधन 1563-1565 ई. में हुआ होगा। उनका मानना है कि मूर्ति में समा जाने की कहानी मीरं से मेवाड लौटने का आग्रह करने वाले ब्राह्मणों ने अपनी असफलता छिपाने के लिए गढी होगी। उनका अनुमान है कि मीरं द्वारका से चुपचाप निकलकर चली गई। उनके अनुसार द्वारका से अदृश्य हो जाने के बाद मीरं दक्षिण और पूर्वी भारत के तीर्थस्थानों की यात्रा और प्रवास पर रही होगी। इन यात्राओं के सम्बन्ध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। लोक में भी इस सम्बन्ध में कोई विश्वास या धारणा नहीं है। लगभग एक दशक बाद 1560 ई. से कुछ पहले सबसे पहले उत्तर भारत में बाँधवगढ (रीवां) के राजा रामचन्द्र बाघेला (1555-1592 ई.) के दरबार में उसकी मौजूदगी के फिर संकेत मिलते हैं। लोक धारणाओं के अनुसार यहाँ कुछ समय रहने के बाद वह आम्बेर और मथुरा गई। जनश्रुतियों में वर्णित तानसेन, तुलसीदास, अकबर, मानसिंह और बीरबल से उसकी भेंट इसी दौरान हुई होगी।25 ए जनश्रुतियाँ एकबारगी पूरी तरह अनैतिहासिक और कपोल-कल्पित लगती हैं, लेकिन यदि मीरं का निधन 1546 ई. के आसपास नहीं हुआ और वह 1563-1565 ई. तक जीवित थी, तो इस दौरान के ऐतिहासिक घटनाक्रम और परिस्थितियों के साथ इनका तालमेल बैठ जाता है। हरमन गोएत्ज़ ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि ए जनश्रुतियाँ, जैसी कि वे मौजूद हैं, निहायत मूर्खतापूर्ण हैं, लेकिन फिर भी तुलनात्मक रूप से स्पष्ट ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में वे बहुत अच्छी तरह समायोजित हो जाती हैं।26
गोपीनाथ शर्मा27 सहित कुछ इतिहासकार विद्वानों की धारणा कि विरुद्ध गोएत्ज़ की यह मान्यता कि मीरं जीवन के उत्तरार्ध में द्वारका में थी, कुछ हद तक सही है। मीरं जिस तरह गुजरात में लोकप्रिय है और उसकी रचनाएँ जिस तरह से गुजराती में मिलती है, उससे लगता है कि मीरं ने अपने जीवन का कुछ हिस्सा गुजरात के द्वारका में भी व्यतीत किया। उसके विधवा जीवन के अंतिम वर्ष द्वारका और बेट द्वारका में भजन-कीर्तन, पुण्यकार्य और सत्संग आदि में निकले। इतिहास, लोकाख्यान, कविता, जनश्रुतियाँ आदि सभी इसकी पुष्टि करते हैं। गुजरात में मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन को वहाँ के जनसाधारण के सरल समावेशी और उदार होने के कारण व्यापक स्वीकृति मिली। नरसी मेहता (1414-1481 ई.), ईसरदास (1539-1618 ई.) आदि कई सन्तों ने वहाँ के सामन्तों और जनसाधारण को गहराई तक प्रभावित किया। यहाँ के गिरनार, जूनागढ, डाकोर आदि कई स्थान बडे भक्ति केन्द्रों के रूप में विकसित हुए। यहाँ गुजरात से बाहर के भी कई सन्तों का आवागमन हुआ। कहते हैं कि मीरं के गुरु रैदास भी गिरनार के पास सरसई गाँव में बस गए थे।28 मीरं के द्वारका आने के तीन कारण प्रतीत होते हैं- एक तो उस समय गुजरात भक्ति आन्दोलन का केन्द्र हो गया था, दूसरे यहाँ वह सुरक्षित थी, क्योंकि उस समय यहाँ उसके पितृपक्ष के राठौड वंश की एक शाखा वाढेल (वाढेर) का शासन था और तीसरे, यह उसके आराध्य कृष्ण का निवास स्थान था। कहते हैं कि मीरं सौराष्ट्र में पहले जूनागढ आई। जूनागढ से सरसई, सोमनाथ, गौरखमणि, माधवपुर, घेड, सुदामापुरी, पोरबंदर और नियाडी होते हुए वह आरंभडा पहुँची, जहाँ उस समय शिवा सांगा नामक वाढेल राजा शासक था। शिवा सांगा तेरहवीं सदी में मारवाड से आए राठौड वेरावलजी बीजल का वंशज था। वेरावलजी और बीजलजी ने कच्छ के छोटे रेगिस्तान के पास वेदमती नदी तक का इलाका कब्*ो में ले लिया था और उन्होंने द्वारका की उत्तरी खाडी के किनारे आरंभडा गाँव में नई बस्ती बसा कर वहाँ पर सत्ता कायम की।29 शिवा सांगा स्वयं कृष्ण भक्त था। कहते हैं कि मीरं काफी समय तक आरंभडा में रही।30 मीरं आरंभडा के बाद बेट द्वारका में रही। यहाँ उसने एक मंदिर बनवाया। मीरं ने बेट द्वारका में मंदिर बनवाया, यह उल्लेख इतिहास में सर्वप्रथम पश्चिमी भारत की यात्रा में लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉड ने किया। टॉड ने 1822 ई. में इंग्लेंड जाने के लिए उदयपुर से प्रस्थान किया और वह आबू, सिद्धपुर, पाटन आदि होते हुए द्वारका पहुँचा। बेट द्वारका सम्बन्धी अपने वृत्तांत में उसने लिखा कि जो देवालय मेरे लिए अधिक आकर्षण की वस्तु सिद्ध हुआ वह था मेरी भूमि मेवाड की रानी लाखा की स्त्री सुप्रसिद्ध मीरंबाई का बनवाया हुआ सौरसेन के गोपाल देवता का मंदिर जिसमें वह नौका प्रेमी अपने मूल स्वरूप में विराजमान था; और निस्संदेह यह राजपूत रानी उसकी सबसे बडी भक्त थी।31 टॉड का यह उल्लेख प्रामाणिक होना चाहिए, क्योंकि टॉड को मीरं के बेट में मंदिर बनवाने की जानकारी मेवाड में मिली होगी और उसने इस जानकारी को मंदिर को साक्षात देखकर प्रमाणित किया होगा। मीरं के बेट में मंदिर बनवाने की जानकारी बेट के इतिहास और लोक स्मृतियों में भी है। पुरातत्त्व और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर तैयार की गई द्वारका परिचय में मीरंबाई सम्बन्धी प्रकरण में एक जगह उल्लेख है कि मीरंबाई आरंभडा पहुँची। उस समय आरंभडा में शिवा सांगा नाम का वाढेर राजा था। वह मीरंबाई की ही तरह रणछोड का भक्त था और मीरं के पीहर का था। मीरं काफी समय तक आरंभडा में रही। शिवा सांगा को प्रेरित कर बेट में द्वारकाधीश का मंदिर बनवाया।32 यह असम्भव नहीं है- सामन्त स्त्रियाँ दूरस्थ तीर्थस्थानों पर मंदिर और बावडियाँ आदि बनवाती थीं और उनका जीर्णोद्धार करवाती थीं। कहते हैं कि स्वयं मीरं ने चित्तौड में कुम्भस्वामी मंदिर के समीप कृष्ण का मंदिर बनवाया था। चित्तौड-उदयपुर पाटनामा में मीरं द्वारा मंदिर बनवाने और इसके निर्माण और प्रतिष्ठा में हुए व्यय का विवरण मिलता है।33 एक धारणा यह भी है कि मीरं ने द्वारका के लगभग नष्ट हो गए मुख्य मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। द्वारका का वर्तमान मंदिर बहुत बाद में अठारहवीं शती में गोपाल नायक तांबेकार ने बनवाया था। मीरं 1537 ई. में द्वारका पहुँची तब वहाँ का मुख्य कृष्ण मंदिर नष्टप्राय अवस्था में था। सम्भवतया मीरं की प्रेरणा से इसका पुनर्निर्माण हुआ। मीरं द्वारा पुनर्निर्मित मंदिर वर्तमान मंदिर की तुलना में बहुत छोटा था।34 द्वारका में मंदिर निर्माण के अलावा मीरं द्वारा एक अन्न क्षेत्र कायम करने का भी उल्लेख मिलता है। इस अन्नक्षेत्र में साधुओं और तीर्थयात्रियों को भोजन मिलता था। मीरं के निधन के बाद महाराणा उदयसिंह ने अपने परिवार सहित द्वारका की तीर्थयात्रा की थी और उनके साथ गए उनके सामन्त सुरजणजी हाडा ने मीरं के अन्नक्षेत्र की तरह एक नया अन्नक्षेत्र कायम किया था।35
मीरं के द्वारका परवर्ती जीवन के सम्बन्ध में गोएत्ज़ का अनुमान भी सर्वथा निराधार नहीं है। इसकी पुष्टि कतिपय ऐतिहासिक और पारिस्थितिक साक्ष्यों से होती है। इस सम्बन्ध में कुछ साक्ष्यों का उल्लेख गोएत्ज़ ने किया है और कुछ बाद में नए उजागर स्रोतों से सामने आए हैं। मीरं के लम्बी और दीर्घकालीन तीर्थयात्रा पर निकल जाने के स्पष्ट कारण थे। मीरं मेवाड लौटना नहीं चाहती थी। वहाँ स्थितियाँ अभी अनुकूल नहीं थी। उदयसिंह को अधिकांश सामन्तों ने मिलकर शासक तो घोषित कर दिया था, लेकिन मेवाड पर उसका आधिपत्य अभी पूर्ण और निर्विघ्न नहीं था। उसकी हैसियत अभी शेरशाह सूरी के सामन्त की थी। 1543 ई. में मालदेव को पराजित करने के बाद शेरशाह ने अजमेर पर कब्ज़ा किया और फिर वह चित्तौड की तरफ बढा। उदयसिंह ने उसको किले की चाबियाँ सौंप कर संधि कर ली। शेरशाह चित्तौड आया और वहाँ अपना प्रतिनिधि रखकर बिना लडे ही चला गया।36 उदयसिंह के सम्बन्ध मे अधिकांश इतिहासकारों की राय अच्छी नहीं है। गौरीशंकर ओझा के अनुसार उसमें वीरोचित साहस का अभाव था और वह विलासप्रिय और विषयी था।37 मीरं के मन में भक्ति आन्दोलन का उत्स और केन्द्र होने के कारण दक्षिण भारत के लिए खास अनुराग और आग्रह रहा होगा। निरन्तर देशाटन और साधु-सन्तों के सत्संग से वह दक्षिण से अच्छी तरह परिचित भी थी। रैदास के गुरु रामानन्द दक्षिण के ही थे और वल्लभाचार्य और चैतन्य भी दक्षिण की यात्रा पर गए थे।
दक्षिण भारत की अपनी लम्बी यात्रा का समापन मीरं ने शायद पुरी और नदिया होते हुए बाँधवगढ में राजा रामचन्द्र बाघेला के यहाँ किया। रामचन्द्र बाघेला 523 या 626 ई. में गुजरात से वहाँ आकर बाघेला राज्य की बुनियाद रखने वाले व्याघ्रदेव का वंशज था।38 उसका दरबार मध्यकाल में सन्त-भक्तों, कवियों और कलाकारों का प्रमुख आश्रय स्थल था। वह सन्तों-भक्तों का भी सम्मान करता था। कहते हैं कि कबीर भी वहाँ गए थे। बाँधवगढ के अभयारण्य में अभी भी कबीर का मंदिर बना हुआ है। वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ भी जगन्नाथपुरी की यात्रा से लौटते हुए यहाँ रुके थे।39 मेवाड-मारवाड के लोक में भी मीरं के वाघेलों के यहाँ जीवित होने की अपुष्ट जानकारी थी। यह उल्लेख उसके पदों में एक स्थान पर आता है। मीरं की ननद ऊदां एक पद में कहती है कि राणाजी के वाघेलों, तुम खबर लो कि मेडतणी मीरं जीवित है या मर गई (राणाजी रा वाघेला थे ल्यो ने मीरं जी री खबरि, मुईक जीवै मीरं मेडती।)40 मीरं यहीं तानसेन के सम्पर्क में आई होगी। तानसेन 1560 ई. से पूर्व तक रामचन्द्र बाघेला के दरबार में था। बाद में यहीं से अकबर आग्रहपूर्वक उसको अपने दरबार में ले गया। बीरबल के नाम से विख्यात महेशदास भी रामचन्द्र बाघेला के दरबार में रहा था, इसलिए वह, हो सकता है, यहीं उसके भी सम्पर्क में आई होगी। बाँधवगढ के पास ही रामभक्ति के लिए प्रसिद्ध और प्राकृतिक सुषमा से भरपूर चित्रकूट में तुलसीदास (1532-1623 ई.) भी थे।41 सम्भवतया मीरं यहीं उनसे भी मिली होगी। तुलसीदास इस समय तक युवा थे और बहुत प्रसिद्ध भी नहीं थे। बाँधवगढ में कुछ समय प्रवास के बाद सम्भवतया मीरं ने आम्बेर और मथुरा का रुख किया होगा। मीरं यहाँ शायद आम्बेर के राजा भगवानदास के दत्तक पुत्र मानसिंह42 के सम्पर्क में आई। मानसिंह और बीरबल दोनों ही युवा अकबर के बहुत आत्मीय और निष्ठावान सामन्त और मित्र थे, इसलिए आश्चर्य नहीं है कि वह इन दोनों के ज़रिए अकबर (1542-1605 ई.) के भी सम्पर्क में आई हो। अकबर बहुत आरम्भ में ही हिन्दू सन्तों-भक्तों और रहस्यवादियों के पास आने-जाने लग गया था।43
आम्बेर के राजाओं के साथ मीरं की घनिष्ठता भी असामान्य नहीं थी। दरअसल वे अपने समय के सबसे अधिक उदार और प्रगतिशील राजपूत शासक थे। उनकी नीतियाँ और विचार मीरं से मेल खाते थे। आम्बेर का राजा भारमल अकबर के राज्यारोहण में गया था और युवा अकबर पर उसका अच्छा प्रभाव था।44 बाद में 1562 ई. में उसने अपनी बेटी हरखाबाई का विवाह अकबर से करके मुगलों के साथ वैवाहिक सम्बन्धों की शुरुआत की।45 अकबर ने अपनी इस हिन्दू रानी को मरियम जमानी का खिताब दिया। मुगलों के साथ गठबंघन में आम्बेर के राजा अग्रणी तो थे ही, अकबर की राजपूत नीति के निर्धारण में भी उनकी निर्णायक भूमिका थी। उन्होंने भक्ति आन्दोलन के नए और उदार विचारों को भी प्रश्रय दिया। उन्होंने ब्रज, गोवर्धन और वृन्दावन में हरदेवजी, गोविन्ददेवजी और राधावल्लभ के मंदिर बनवाए।46 वे परम्परा से कृष्ण भक्त थे। भारमल का पिता पृथ्वीराज कृष्णदास पयहारी का शिष्य और प्रसिद्ध कृष्ण भक्त था। उसका उल्लेख भक्तमाल में भी आता है।47 बाबर के विरुद्ध खानवा के युद्ध में वह सांगा का सहयोगी था। बालाबाई के नाम से विख्यात उसकी एक राठौड रानी अपूर्वादेवी भी मीरं की तरह कृष्ण भक्त थी।48 शायद मीरं का मानसिंह पर खास प्रभाव पडा। अकबर ने भगवानदास और मानसिंह के साथ 1568 ई. में चित्तौड पर आक्रमण किया। यह आक्रमण बहुत विध्वंसकारी था, इसमें नरसंहार भी खूब हुआ, लेकिन मानसिंह इस दौरान मीरं सेवित गिरधरजी की मूर्ति को सुरक्षित बचाकर अपने साथ ले गया। भगवानदास और मानसिंह ने बाद में आम्बेर में सुन्दर और भव्य जगतशिरोमणिजी का मंदिर बनवा कर इसमें उसको प्रतिष्ठापित किया।49 वृंदावन में मानसिंह ने भारतीय और मुगल शैली के मिलेजुले स्थापत्यवाला गोविन्ददेव का जो विशालकाय और भव्य मंदिर बनवाया उससे भी मीरं के सम्बन्ध का कुछ अनुमान किया जा सकता है। कहते हैं कि वृन्दावन पहले जंगल था। 1514 ई. के आसपास महाप्रभु चैतन्य वृन्दावन आए और उन्होंने वहाँ भगवतपुराण में वर्णित कई स्थान खोज निकाले। वे वहाँ कुछ समय रुककर चले गए लेकिन बाद में उन्होंने अपने दो शिष्यों- रूप और सनातन को वहाँ भेजा। आगे चलकर रूप गोस्वामी के भतीजे जीव गोस्वामी और चैतन्य के कुछ और शिष्य-गोपाल भट्ट, रघुनाथदास और रघुनाथ भट्ट भी वहाँ आ गए। चैतन्य के इन छह शिष्यों ने वृन्दावन से कृष्ण की कई प्रतिमाएँ खोज निकालीं। उन्होंने मुस्लिम आक्रांताओं के भय से इनको ज़मीन या घरों में यहाँ-वहाँ छिपा दिया। गोविन्ददेव की प्रतिमा रूप गोस्वामी को वृन्दावन के गोमा टीले से मिली थी। रूप गोस्वामी का निधन 1563 ई. में हुआ। मानसिंह ने 1590 ई. में वृन्दावन में गोविन्ददेव के मंदिर में इसी प्रतिमा को स्थापित किया।50 यह तो लगभग मान्य तथ्य है कि जीव गोस्वामी रूप गोस्वामी के भतीजे थे और उनकी मीरं से भेंट हुई थी और वे उससे प्रभावित भी थे। मीरं मंदिर की प्रतिष्ठा तक जीवित नहीं थी, लेकिन सम्भव है कि मानसिंह के मन में मीरं से सम्बन्ध के कारण जीव गोस्वामी और रूप गोस्वामी के प्रति आदर-सम्मान और श्रद्धा का भाव रहा हो।
अकबर पर मीरं के प्रभाव के सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं हैं। शायद उस पर सीधा कोई प्रभाव नहीं रहा होगा, लेकिन ऐसा हो सकता है कि वह मीरं के सीधे सम्पर्क में आनेवालों से प्रभावित रहा हो। कहते हैं कि अकबर की पहली और सबसे प्रभावशाली हिन्दू रानी हरखाबाई उर्फ मरियम जमानी मीरं की शिष्या थी।51 यह तय है कि अकबर की हिन्दू समर्थक और राजपूत राजाओं के साथ गठबंधन की नीति को मरियम ज़मानी ने दूर तक प्रभावित किया। यह उल्लेखनीय है कि इस प्रभाव के कारण ही अकबर ने आरम्भ में हिन्दू समर्थक और राजपूत राजाओं के साथ सद्भावपूर्ण गठबंधन की नीति को खुलकर बढावा दिया। 1962 ई. में, जब वह केवल बीस वर्ष का था, तो उसने युद्ध बंदियों को दास बनाने की प्रथा समाप्त कर दी। उसने 1563 ई. में हिन्दुओं पर पूर्व के मुस्लिम शासकों द्वारा लगाया तीर्थ कर समाप्त कर दिया। यही नहीं, उसने 1564 ई. गैर मुस्लिमों के विरुद्ध लगाया गया सबसे अधिक घृणास्पद कर जजिया भी उठा लिया। वह हिन्दुओं की तरह वस्त्राभूषण पहनने लगा और माँसाहार के भी खिलाफ हो गया। तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार यह सब युवा अकबर पर उसके हरम की हिन्दू राजकुमारियों के मज़बूत नियंत्रण और प्रभाव के कारण हुआ।52
4.
हरमन गोएत्ज़ की मीरं के जीवन की यह पुनर्रचना सर्वथा निर्दोष नहीं है। जनश्रुतियों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समायोजन या युक्तीकरण और इस आधार पर अनुमान और संभावना का उनका आग्रह कई बार उनको गलत निष्कर्षों तक ले गया है। खास बात यह है कि गोएत्ज़, जिसको मीरं के जीवन का सुसंगत विकास या ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कहते हैं, उसमें ए निष्कर्ष बेमन और कई बार खींच-तानकर जबरन निकाले हुए लगते हैं। मीरं और रैदास के गुरु-शिष्य सम्बन्ध को लेकर की गई गोएत्ज़ की संभावना दूर की कौडी है। लोक में यह धारणा है, रैदास मीरं के गुरु थे और मीरं की रचना के कुछ अन्तःसाक्ष्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। गोएत्ज़ की यह बात भी कुछ हद तक ही सही है कि रैदास मीरं के क्रांतिकारी सामाजिक और धार्मिक विचारों के मुख्य प्रेरणा स्रोत रहे होंगे।53 रैदास (1410-1500 ई.)54 के मीरं (1498-1546 ई) के गुरु होने में सबसे बडी बाधा दोनों के बीच का समयाँतराल है। गोएत्ज़ ने अनुमान किया है कि बाल्यकाल में एक साधु द्वारा मीरं को कृष्ण की मूर्ति देने की जो जनश्रुति है, उसमें आया साधु रैदास है। यही रैदास महाराणा सांगा की माँ रतनकुँवर झाली के भी गुरु थे। गोएत्ज़ लिखते हैं कि मीरं सीधे अपने को रैदास की शिष्या मानती है और झाली रानी उसमें बहुत अधिक दिलचस्पी लेती है। इसका कोई कारण होना चाहिए। इसका एक ही उत्तर है, जो मैं देख सकता हूँ, वह यह कि बाबा जिसने गिरधर जी की मूर्ति मीरं को दी वह वास्तव में रैदास स्वयं थे।55 रैदास के बाल्यकाल में मीरं को मूर्ति देने की धारणा गोएत्ज़ की धारणा से दोनों के समय में अन्तर होने की आपत्ति भी नहीं रही और जनश्रुति को भी आधार मिल गया, लेकिन इसका ऐतिहासिक और पारिस्थितिक साक्ष्यों तथा प्रचलित आख्यानों और जनश्रुतियों के साथ तालमेल नहीं बैठता। यह सही है कि मीरं की कविता में एकाधिक स्थानों पर रैदास के उसके गुरु होने का उल्लेख है और पारिस्थितिक साक्ष्य झाली रानी रतनकुँवर द्वारा मीरं को सरंक्षण देने की पुष्टि करते हैं, लेकिन बाल्यकाल में रैदास द्वारा गिरधरजी मूर्ति मीरं को देने की बात गले उतरने वाली नहीं है। यह सही है कि मीरं का रैदास से अनौपचारिक गुरु सम्बन्ध रहा होगा, लेकिन बाल्यकाल में एक अबोध कन्या द्वारा मूर्ति पाकर किसी बाबा को गुरु मान लेने की बात युक्तिसंगत नहीं है। फिर, झाली रानी को यह जानकारी होना कि यह मूर्ति उसके गुरु रैदास ने ही मीरं को दी, भी अविश्वसनीय है। यह भी कि निर्गुण मतानुयायी रैदास के पास कृष्ण प्रतिमा का होना भी आश्चर्यजनक है। यह सही है कि रैदास और मीरं के बीच गुरु-शिष्य का अनौपचारिक सम्बन्ध ज़रूर रहा होगा। लोक में भी सदियों से यह धारणा है कि रैदास मीरं के गुरु थे। मीरं की कविता के कुछ अन्तःसाक्ष्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। इस धारणा को बल इस तथ्य से भी मिलता है कि चितौडगढ में कुंभश्याम मंदिर के पास बनी छतरी को लोग अभी भी रैदास की छतरी कहते हैं। शोभालाल शास्त्री की 1932 की एक संस्कृत रचना से भी इसकी पुष्टि होती है। इसमें लिखा गया है कि श्री नन्दनन्दन-पदा-म्बरुहस्य भृंगी मीरं हरेनिर्लयमुच्चमिमं चकार।/यस्याग्रतो लसति मण्डपिकांतरस्थं त्स्या गुरोश्चरण-पंकज-युम-चिह्नम।। (श्री नन्दनन्दन के चरणारविंदों की मधुकरी मीरंबाई ने यह ऊँचा विष्णु मंदिर बनवाया था, जिसके सन्मुख ही छत्री के भीतर गुरु के चरणों के चिह्न शोभायमान हैं।)56 लोक की स्मृति में रैदास और मीरं के गुरु-शिष्य सम्बन्ध को लेकर कई धारणाएँ हैं। लोक मर्मज्ञ महेन्द्र भानावत ने मीरं की लोक स्मृतियों से जुडे राजस्थान और गुजरात के कई स्थानों की यात्राएँ कीं। उनके अनुसार लोक मानता है कि राजस्थान के जोधपुर जिले के पिपलोदा गाँव के रैदास जाति से चमार थे, पढे-लिखे नहीं थे पर अन्तर्ज्ञानी थे। मीरं उनके साथ चित्तौड से निकल गई और कई स्थानों की यात्रा करती हुई द्वारका पहुँची। उसने डाकोर में रैदास को अपना गुरु बनाया। लोक की यह भी धारणा है कि रैदास मीरं के वाट गुरु थे। वे मीरं के भक्ति और अध्यात्म गुरु ही नहीं थे, उसके सच्चे पालक, संभालक और प्रदर्शक थे और उनका और मीरं का साथ अन्त तक रहा।57 पश्चिमी राजस्थान की निम्न जातियों में मीरं के भजन हरजस के रूप में सदियों से गाए जाते हैं और वहाँ भी यह माना जाता है कि रैदास ही मीरं के गुरु थे।58 गुजरात में भी इस तरह की लोक स्मृतियाँ हैं। वहाँ प्रसिद्ध है कि मीरं के गुरु रैदास गिरनार के पास सरसई गाँव में बस गए थे और मीरं भी वहाँ गई थी।59 मीरं की कविता में भी रैदास के उसके गुरु होने का उल्लेख आता है। वह कहती है-
खोजत फिरुं भेद वा घर को, कोई न करत बखानी। रैदास सन्त मिले मोहि सतगुरु, दीन्ही सुरत सहदानी।।
मेरो मन लाग्यो हरिजी सूं, अबन रहूँगी अटकी। गुरो मिलिया रैदासजी, म्हाने दीनी ज्ञान की गुटकी।।60
एक अन्य स्थान पर वह कहती है-
नहिं मैं पीहर सासरे, नहीं पियाजी री के साथ।
मीरं ने गोविंद मिल्या जी, गुरु मिलिया रैदास।।61
रैदास रामानन्द के शिष्य और कबीर के समकालीन सन्त-भक्त थे। रैदासपंथियों के अनुसार उनका जन्म 1376 ई. में और निधन 1506 ई. में हुआ।62 भक्तमाल की प्रियादास टीका के अनुसार चित्तौडगढ की एक झाली रानी ने काशी जाकर उनसे दीक्षा ली।63 टीका में इस रानी का नामोल्लेख नहीं है, लेकिन हर्मन गोएत्ज़ सहित कुछ विद्वानों का अनुमान है, यह रानी गुजरात के काठियावाड के हलवद के झाला राजपूत राजधर की बेटी रतनकँवर है, जिसका विवाह महाराणा सांगा के पिता रायमल (1473-1509 ई.) के साथ हुआ था। भक्ति के संस्कार इस रानी को बचपन में सौराष्ट्र से मिले होंगे, जो उस समय भक्ति आन्दोलन का केन्द्र था और जहाँ नरसी मेहता आदि सक्रिय थे। भक्ति सम्बन्धी अपने अनुराग और सक्रियता के कारण मीरं को मेवाड के अन्तःपुर में इसी रानी का संरक्षण और समर्थन भी हासिल रहा होगा।64 इसी झाली रानी के आग्रह पर रैदास चित्तौड आए और वहीं उनका निधन हुआ। जनसाधारण में रैदास की स्वीकार्यता और सम्मान बहुत था। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भक्ति पर ब्राह्मणों का एकाधिकार मानने वाले लोगों ने उनके पूर्व जन्म में ब्राह्मण होने की कथाएँ गढकर उन्हे सन्त-भक्त मान लिया था। कथा के अनुसार मांसादि सेवन के कारण शापित होकर उन्हें चमार के घर जन्म लेना पडा, लेकिन उन्होंने स्तनपान तब किया, जब रामानन्द ने उन्हें राममंत्र का उपदेश दिया। दूसरी कथा के अनुसार चित्तौडगढ में ब्राह्मणों ने जब उनके साथ बैठकर भोजन करना स्वीकार नहीं किया, तो उन्होंने पूर्वजन्म में अपने ब्राह्मण होने के प्रमाणस्वरूप चमडी चीरकर अपनी जनेऊ दिखाई।65 कुछ विद्वानों के अनुसार मीरं के जन्म के आस-पास रैदास का निधन हो गया था, इसलिए मीरं का रैदास की शिष्य होना सम्भव नहीं है।66 उनकी धारणा है कि या तो सामन्त स्त्री और लोकप्रिय होने के कारण अन्य सम्प्रदायों से प्रतिद्वंद्विता के चलते रैदासपंथियों ने अपने पंथ से सम्बद्ध दिखाने के लिए यह कथा गढी हो या रैदास के परवर्तीकाल में होते हुए भी मीरं ने उनका पुण्य स्मरण गुरु के रूप में किया हो अथवा किसी रैदासी साधु के प्रति उसका गुरु भाव रहा हो। उत्तर भारत के लोक की स्मृति में जिस तरह रैदास और मीरं के गुरु-शिष्य सम्बन्ध की कहानियाँ प्रचलित हैं उससे यह तो तय है कि मीरं किसी-न-किसी तरह रैदास से परिचित ज़रूर रही होगी। जहाँ तक मीरं के रैदास के परवर्ती होने का सवाल है, तो रैदास के जन्म का समय अधिकांश आधिकारिक विद्वान अज्ञात मानते हैं।67 धार्मिक साहित्य में रैदास के जन्म और निधन के सम्बन्ध में जो तिथियाँ दी गई हैं, वे बहुत प्रामाणिक नहीं हैं। यह भी तय है कि मीरं ने रैदास से शिष्यत्व की स्थायी और कोई औपचारिक दीक्षा भी नहीं ली होगी। मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के दौरान जनसाधारण सभी तरह के सन्त-भक्तों का सम्मान करता था और उनसे प्रभावित होने पर उनके प्रति अनौपचारिक गुरुभाव रखता था। इस आन्दोलन में कई सन्त-भक्त निम्न जातियों से थे। आरंभिक कुछ अन्तर्बाधाओं के हट जाने के बाद जब वे स्वीकार्य और सम्माननीय हो जाते थे तो उनसे मेलजोल की वर्जनाएँ नहीं रहती थीं। राजस्थान के मेवाड-मारवाड में ऐसे कई सन्त हुए, जिनका जनसाधारण और सामन्त समाज में सम्मान और स्वीकार्यता थी।68 झाली रानी के रैदास से औपचारिक दीक्षा लेने के प्रकरण से सिद्ध है कि इस सम्बन्ध में सामन्त समाज में कोई वर्जना नहीं थी। सम्भवतया मीरं झाली रानी रतनकुंवर के संरक्षण में और उससे सम्पर्क के कारण रैदास से प्रभावित रही होगी और इस कारण उसके मन में उनके प्रति अनौपचारिक गुरु भाव रहा होगा। एक सामन्त स्त्री और एक निम्न जाति सन्त के बीच का यह सम्बन्ध जन भावनाओं और आकांक्षाओं के अनुसार था, इसलिए खूब प्रचारित हुआ। इसको लेकर जनसाधारण ने कई कहानियाँ गढीं और उनको भजनों में गूँथकर खूब गाया। गोएत्ज़ की रैदास द्वारा बालिका मीरं को मूर्ति देने की धारणा बहुत दूर तक खींचकर किया गया अनुमान है। वे स्वयं इस सम्बन्ध में आश्वस्त नहीं हैं। उन्होंने लिखा है कि, लेकिन यह हम परिस्थितियों पर विचार करने से ही अनुमान लगा सकते हैं। कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है।69
मीरं और भोजराज के तनावपूर्ण वैवाहिक सम्बन्ध के बारे में गोएत्ज़ के अनुमान का भी कोई पारिस्थितिक या ऐतिहासिक आधार नहीं है। पदप्रसंमाला के नागरीदास (1699-1764 ई.) के उल्लेख के आधार पर गोएत्ज़ अनुमान करते हैं कि मीरं ने यह कहकर कि उसका विवाह कृष्ण से हो गया है, भोजराज के साथ वैवाहिक सम्बन्ध के निर्वाह से इन्कार कर दिया। नागरीदास का उल्लेख इस तरह है -
मीरं बाई सौं राना बहौत दुष पाएँ रहै, राना के घर की रीततें इनके भिन्य रीत, यह भगवत सम्बन्ध सत्य संग विसेस करें, देह सम्बन्ध को नातो व्यौहार कछु न मानें, राना बहुत समुझाय रह्यौ चरनामृत को नाम लेके दीजियों, उनको प्रण हैं, चरणामृत के नाम तें पी ही जायंगे, सो ऐसे ही भयो, जानि बूझ पीयो, राना तो इनके मरिबे की राह देखत रह्यौ, अरु वह झांझ मृदंग संग लैके परम रंग सों एक नयो पद बनाय ठाकुर आगे गावत भए, पद बहुत प्रसिद्ध भयो। सो वह यह पद-
रानै जू विष दीनौ, हम जानी
जान बूझि चरनामृत सुनि पियो, नहिं बौरी भौ रानी
कंचन कसत कसौटी जैसैं, तन रह्यो बारह बानी
आपुन गिरधर न्याव कियो यह, छान्यौ दूध रू पानी
राना कोटक वारौ जिहि पर, हौं तिहिं हाथ बिकानी
मीरं प्रभु गिरधर नागर कैं, चरन कमल लपटानी 70
गोएत्ज़ इसी आधार पर यह लिखते हैं कि विवाह समारोह में अपने पति के स्थान पर गिरधरजी की मूर्ति की परिक्रमा करते हुए, उसने राजकुमार के बजाय हृदय में स्वयं के साथ अपने आराध्य को पाया। बेशक, गलती को सुधारा गया और पहले इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन जब मीरं ने वैवाहिक सम्बन्ध के निर्वाह से इनकार कर दिया और ज़ोर देकर कहा कि वह भगवान से विवाह कर चुकी है, तो कहा जाता है कि भोज की माँ कंवरबाई सोलंकी ने राणा से शिकायत की थी, जो निश्चित रूप से, नाराज़ हो गया था।71 गोएत्ज़ यह भी कहते हैं कि इसके बाद मीरं को महाभूतालय में कैद कर दिया गया और भोजराज ने दूसरा विवाह कर लिया। वे लिखते हैं कि वास्तव में क्या हुआ हम और नहीं जानते हैं, लेकिन इतना निश्चित है कि मीरं बाई का महाभूतालय तक सीमित रहने के बाद, कौमार्य अछूता रहने दिया गया। और एक धारणा के अनुसार, भोज ने दूसरी राजकुमारी से शादी कर ली थी।72 भोजराज के सम्बन्ध मीरं से तनाव और कटुता के होने और इस कारण भोजराज के दूसरा विवाह कर लेने की धारणा सही नहीं है। उपलब्ध ऐतिहासिक और पारिस्थितिक साक्ष्य इसकी पुष्टि नहीं करते। मीरं की कविता में बार-बार राणा सम्बोधन को उसके पति भोजराज से सम्बन्धित मानने से पति से उसके सम्बन्ध कटु और तनावपूर्ण होने की बात प्रचारित हो गई, जबकि ऐसा नहीं था। गोएत्ज़ भी उन विद्वानों में शामिल हैं, जो मीरं के पदों में आए राणा को उसका पति मानते हैं। वे यह भी मानते हैं कि इस राणा से मीरं उत्पीडित भी हुई। दरअसल राणा सम्बोधन केवल सत्तारूढ के लिए प्रयुक्त होता है। मीरं की कविता में जिस राणा से तनावपूर्ण सम्बन्ध और नाराज़गी का बार-बार उल्लेख आता है, वह भोजराज नहीं है। भोजराज तो सतारूढ ही नहीं हुआ और राणा सांगा के जीवित रहते ही उसका 1518 और 1523 ई. के बीच निधन हो गया, इसलिए यह संज्ञा उससे सम्बन्धित हो ही नहीं सकती। सही तो यह है कि राणा संज्ञा उसने अपने सतारूढ देवर विक्रमादित्य (1531-1536 ई.) और रत्नसिंह (1528-1531 ई.) के लिए प्रयुक्त की है। विक्रमादित्य मूर्ख और दंभी था, जबकि अल्प समय के लिए सत्तारूढ रत्नसिंह से भी मीरं के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। रत्नसिंह और उसकी माँ धनाबाई राठौड वीरमदेव के खिलाफ थे, इसलिए, ज़ाहिर है, उनके मीरं से भी सम्बन्ध खराब रहे होंगे। ससुराल में परिजनों से मीरं के सम्बन्ध प्रतिरोध और तनावपूर्ण होने का एक प्रकरण भक्तमाल की टीका में आता है। इसके अनुसार विवाह के तत्काल बाद परम्परा के अनुसार देवी पूजन के सास के आग्रह को मीरं ने यह कहकर ठुकराया दिया कि उसके आराध्य तो कृष्ण हैं, इसलिए वह देवी की पूजा नहीं करेगी।73 इस प्रकरण के कई निहितार्थ निकाले गए। कुछ लोगों का मानना है कि परम्परा से मीरं के ससुराल मेवाड में शैव भक्ति की परम्परा थी और एकलिंग यहाँ के शासकों के आराध्य थे और मीरं अपने पारिवारिक वैष्णव भक्ति के संस्कारों के कारण कृष्ण भक्त थी, इसलिए देवी पूजा का विरोध करती है। वस्तुस्थिति इससे एकदम अलग है। दरअसल शैव और वैष्णव भक्ति और पूजा के शास्त्रीय रूप जो भी रहे हों लोक के दैनंदिन जीवन में उनके बीच कोई स्पष्ट विभाजक रेखा नहीं थी। लोक में शिव हो या विष्णु, सभी भगवान थे और पूज्य थे। यह निराधार है कि मेवाड में केवल शैव भक्ति की परम्परा थी। यहाँ शैव पूजा के समानांतर विष्णु की पूजा-आराधना की लम्बी परम्परा थी और लोक में उसका प्रभाव शैव पूजा की तुलना में *यादा ही गहरा और व्यापक था।74 दरअसल यह प्रकरण प्रियादास ने कुछ बढा-चढाकर अपने साम्प्रदायिक आग्रह के कारण गढा प्रतीत होता है। मध्यकाल में वैष्णव भक्ति के कुछ सम्प्रदाय लोक में अपने वर्चस्व के लिए आग्रही थे और शैव और शाक्त पूजा की निदां-भर्त्सना भी करते थे। प्रियादास चैतन्य गौडीय सम्प्रदाय से सम्बन्धित थे, इसलिए भक्ति के अपने ढंग और पूजा विधानों के लिए उनमें खास प्रकार का आग्रह था। मीरं सामन्त स्त्री थी और अपने जीवन काल में ही लोक में प्रसिद्ध हो गई थी, इसलिए उसको अपने रंगढंग में दिखाना प्रियादास को अपने सम्प्रदाय की लोकप्रियता के लिए उपयोगी लगा होगा। नागरीदास का तत्सम्बन्धी उल्लेख मीरं के सन्त-भक्त रूप के निर्माण और प्रतिष्ठा की प्रक्रिया का हिस्सा है और इस तरह के उल्लेख अन्य स्त्री सन्त-भक्तों के सम्बन्ध में भी मिलते हैं। गोएत्ज़ का यह तर्क भी दूर की कौडी है कि भोजराज के वैवाहिक सम्बन्ध नहीं रखने के कारण से मीरं को उसकी पत्नी ही नहीं माना गया और इस कारण ही उससे सती होने का आग्रह भी नहीं किया गया। मीरं भोजराज की विवाहिता थी- यह उल्लेख एकाधिक जगह आता है। मुंहता नैणसी री ख्यात में यह उल्लेख है कि भोजराज सांगावत। इणनुं, कहे छे मीरंबाई राठौड परणाई हुती।75 इसी तरह रामदान लालस (1761-1825 ई.) कृत भीमप्रकाश में भी उल्लेख है के भोजराज जेठो अभंग कंवरपणे म्रत कीध।76 दरअसल मीरं के समय में सती प्रथा इतनी व्यापक नहीं थी और सती होना स्वैच्छिक था, इसलिए उससे सती होने का आग्रह नहीं किया गया।
गोएत्ज़ का यह अनुमान कि मीरं का अकबर के बजाय बाबर से मिलने और उसकी भेंट ग्रहण करने से प्रताडित किया जाना भी सर्वथा निराधार है। प्रियादास की टीका में यह उल्लेख है कि मीरं के सौंदर्य और गायन की ख्याति सुनकर भेष बदलकर अकबर मीरं का गायन सुनने गया था और उसने उसको बहुमूल्य भेंट भी दी। राणा ने इससे कुपित होकर मीरं को प्रताडित किया। युवती मीरं (1498-1546 ई.) और अकबर (1542-1605 ई.) के बीच के समयाँतराल के कारण यह भेंट सम्भव नहीं थी, मीरं की युवावस्था में अकबर ने जन्म लिया था और अधिक से अधिक वह बालक रहा होगा। गोएत्ज़ ने इस घटना को युक्तिसंगत बनाने के लिए यह अनुमान किया कि मीरं को भेंट अकबर से नहीं, बाबर (1483-1520 ई.) से मिली थी और इसका कारण मीरं का सौंदर्य और उसका गायन नहीं था। उनके अनुसार अकबर मीरं से उसके बडे पिता वीरमदेव का समर्थन पाना चाहता था। गोएत्ज़ ने लिखा है कि किंवदंती में वर्णित भेंट अकबर से नहीं, बल्कि बाबर से आयी थी, और यह मीरं की सुन्दरता के कारण नहीं, बल्कि उसके चाचा वीरमदेव के लिए सब्सिडी के रूप में आयी था। बाबर निश्चित रूप से राजपूत सत्ता को वापस मजबूत होने से रोकने में रुचि रखता था और इसलिए, रतनसिंह द्वारा प्रताडित किए गए दल का समर्थन करेगा।77 गोएत्ज़ का यह अनुमान असंगत होने के साथ निराधार भी है। मीरं का तत्कालीन राजनीतिक उठापटक में कोई हस्तक्षेप था, इसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता। बाबर से अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने के लिए बाबर से सम्पर्क करने वाली करमेती की तरह मीरं अन्तःपुर में बहुत प्रभावशाली भी नहीं थी। विधवा राजपूत स्त्रियों का किसी आक्रान्ता विधर्मी शासक से भेंट पाने का और कोई प्रमाण भी नहीं मिलता। मीरं की अकबर से भेंट की जनश्रुति में भी भक्त मीरं के कृष्ण प्रतिमा सम्मुख नृत्य-गायन के दौरान अकबर के आगमन से मीरं अनजान है।78 वीरमदेव स्वयं बहुत पराक्रमी और प्रभावशाली था- उसके लिए बाबर की मीरं को भेंट देने की बात किसी भी तरह विश्वसनीय नहीं है।
गोएत्ज़ की यह धारणा कि चित्तौड से वापसी के बाद मेडता में मीरं के मर्यादा विरुद्ध आचरण का उसके बडे पिता (पिता के बडे भाई) वीरमदेव ने विरोध किया और इस कारण तत्काल उसे वहाँ से जाना पडा भी पूरी तरह गलत हैं। गोएत्ज़ ने लिखा है कि मीरंबाई को मेडता लाया गया, लेकिन वीरमदेव ने अपनी भतीजी के रूप में उसकी रक्षा करते हुए, उसके क्रांतिकारी विचारों और जीवन के तरीकों पर आपत्ति जताई, जो कि राजकुमारी के लिए नहीं, किसी भी विधवा के लिए अशोभनीय थे। उसे केवल अपने चचेरे भाई जयमल, जिसके साथ वह राव दूदाजी द्वारा शिक्षित थी, एक समर्पित प्रशंसक और समर्थक मिला। इस प्रकार उसने जल्द ही मेडता को भी छोड दिया और तीर्थयात्राओं की एक श्ाृखला पर चली गई, जिसका वृन्दाबन में जीव गोस्वामी के साथ उसके संघर्ष के अलावा कोई विवरण ज्ञात नहीं है।79 गोएत्ज़ की इस धारणा की पुष्टि किसी भी पारिस्थितिक और अन्तःसाक्ष्य से नहीं होती। राव दूदा के निधन के बाद मीरं का लालन-पालन वीरमदेव और उसकी पत्नी राणा साँगा की बहन गोरज्यादेवी ने किया। उसका विवाह भी भोजराज से इसी दम्पती की पहल पर हुआ, इसलिए ज़ाहिर है, वह वीरमदेव की पालिता और स्नेहपात्र थी। वीरमदेव से उसके स्नेह के सम्बन्ध थे। चित्तौड में प्रताडित होने पर मीरं ने अपने बडे पिता वीरमदेव को ही स्मरण करते हुए कहा कि म्हारा बाबो सा न केजो म्हानै बेगा लेवा आवै।80 मीरं के मेडता से तत्काल चले जाने की बात भी आधारहीन है। मालदेव के आक्रमण के बाद टोडा तक मीरं भी विस्थापित वीरमदेव के साथ रही। मीरं की कविता के एक अन्तःसाक्ष्य से लगता है कि वह टोडा तक वीरमदेव के साथ थी। उसके एक पद में यह उल्लेख मिलता है। वह कहती है-जाण न दी जी य्यारे कारणे रे ज मीरं टोडारे बेस मोटी हुई।81 हुकमसिंह भाटी ने यशोधरा चरित्र के साक्ष्य से अनुमान लगाया है कि टोडा पर मालदेव का आधिपत्य 1538 ई. में हुआ, इसलिए संभावना है कि इस समय तक मीरं वीरमदेव के साथ रही होगी।82
रतनसिंह के बाद सत्तारूढ विक्रमादित्य मूर्ख और छिछोर था, इसकी पुष्टि पारम्परिक सभी इतिहास रूपों से होती है, लेकिन गोएत्ज़ ने उसके समलैंगिक होने का जो अनुमान किया है, उसमें कोई बहुत सचाई नहीं लगती। गोएत्ज़ की यह धारणा सही है कि वह पूरी तरह से अन्य महत्त्वाकांक्षी पुरुषों के प्रभाव में ही नहीं था, वह अपने परिवार के सदस्यों और अन्य सामन्तों के खिलाफ आसानी से चिढनेवाला और गंभीर रूप से पूर्वाग्रह से ग्रसित भी था।83 गोएत्ज़ की यह धारणा सच है कि वह मूर्ख और दम्भी था और सामन्तों के प्रति उसकी राय भी अच्छी नहीं थी। सभी ऐतिहासिक साक्ष्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। गौरीशंकर ओझा ने उसके सम्बन्ध में लिखा है कि शासन करने लिए वह तो बिल्कुल अयोग्य था। अपने खिदमतगारों के अतिरिक्त उसने दरबार में सात हज़ार पहलवानों को रख लिया, जिनके बल पर उसको अधिक विश्वास था और अपने छिछोरपन के कारण वह सरदारों की दिल्लगी उडाया करता था, जिससे वे अप्रसन्न होकर अपने-अपने ठिकानों में चले गए और राज्य व्यवस्था बहुत बिगड गयी।84 विक्रमादित्य के समलैंगिक होने सम्बन्धी गोएत्ज़ की धारणा अतिरंजना लगती है। उन्होंने लिखा है कि लगता है विक्रमजीत मानसिक रूप से विकृत, समलैंगिक था।85 अपनी धारणा की पुष्टि में गोएत्ज़ ने तर्क दिया है कि उसके वैवाहिक जीवन की कोई जानकारी इतिहास में नहीं मिलती। वे लिखते हैं कि उसकी रानियाँ या उपपत्नियाँ ज्ञात नहीं हैं, हालाँकि उस उम्र में उसकी युवावस्था और स्थिति यौन अपव्यय के लिए प्रोत्साहन की रही होगी।86 गोएत्ज़ की यह धारणा आधारहीन है- विक्रमादित्य के वैवाहिक जीवन के सम्बन्ध में ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। बडवा देवीदान की ख्यात में उसकी चार रानियों- राव भवानीदासजी की बाई सोलंखणी, राव सुरसेणजी की सोलंखणी राजमतां, राव गांगा की जोधपुरीजी-राठौडजी हरखदे और चवाणजी बाईचन्द्रमतां का उल्लेख मिलता है। ख्यात में यह भी उल्लेख है कि इनमें पहली तीन रानियाँ उसकी मृत्यु पर सती भी हुईं।87 स्वयं गोएत्ज़ भी इस सम्बन्ध में पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने लिखा है कि यों यह साफतौर नहीं कहा जा सकता, यह सब कहना संभावना है कि वह स्त्रैण चरित्र का समलैंगिक था।88
5.
गोएत्ज़ मीरं के जीवन की पुनर्रचना में इतिहास में बहुत गहरे और दूर तक जाते हैं और एक तरह से उसके जागतिक जीवन की पहचान कर कुछ हद तक उसकी स्त्री मनुष्य यात्रा के सभी मोड-पडाव बना देते हैं। यह उनका अपने ढंग का पहला और नया कार्य था, लेकिन विचित्र यह है कि समाहार में उनका ज़ोर उसके रहस्यवादी पवित्रात्मा सन्त-भक्त रूप पर है। अन्त में मीरं की उपलब्ध कविता के सरोकारों को वे इसी नज़रिए से समझते हैं। उनका साफ मानना है कि राणा सम्बोधन वाले मीरं के राग-द्वेष, शिकायत आदि से सम्बन्धित पदों को बहुत महत्त्व दे दिया गया है, क्योंकि यह मध्यवर्गीय गृहस्थ जीवन की उठापटक को प्रतिबिम्बित करते हैं। उन्होंने लिखा है कि उस के नाम पर चलन में मौजूद ऐसे बहुत सारे पद, जिनकी भावभूमि संकीर्ण और बदले की कार्यवाही से पूर्ण है, और जो मीरं के भव्य पवित्र और ईश्वर भक्ति में डूबे काव्य से भिन्न है। लेकिन इन पदों ने उसके जीवन की कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं की स्मृति को सहेजा है। और अन्त में उनके बारे में लिखने वालों द्वारा निम्न मध्यवर्गीय लोगों के जीवन के अनुभव के आलोक में हर चीज़ की यानी रानी मीरं बाई की राजनीतिक समस्याओं की पुनर्व्याख्या की गई, और वह मध्यमवर्गीय घरों की ज़न्दगी की कथा बन गई। और यह व्याख्या जल्द ही आधिकारिक हो गई, क्योंकि यह बात धार्मिक क्षेत्रों में सबसे अधिक रुचि रखने वाले मध्यम वर्ग के स्त्री-पुरुषों और वैसे ही बौद्धिक धरातल पर रहने वाले उच्च वर्ग के लोगों की मानसिकता के अनुकूल थी।89 गोएत्ज़ का मानना है कि मीरं की असल रचनाएँ कृष्ण के प्रति उसके समर्पण और प्रेम की रचनाएँ हैं।90 यहाँ पहुँचकर गोएत्ज़ कुछ हद तक फिर टॉड के समान हो जाते हैं और अन्ततः उनके लिए भी मीरं पवित्रात्मा और रहस्यवादी सन्त-भक्त और कवयित्री हो जाती है। मीरं के लिए उसकी भक्ति और वैयक्तिक जीवन के रागद्वेष और द्वन्द्व अलग-अलग नहीं हैं। उसकी भक्ति की जडें उसके वैयक्तिक जीवन की उठापटक में हैं- उसकी भक्ति इसी में से फूटती और इसी के अनुसार फलती-फूलती है, लेकिन गोएत्ज़ उसकी भक्ति और अध्यात्म को उसके वैयक्तिक जीवन की निरन्तरता और विस्तार नहीं मानते। उनका इतिहास का यूरोपीय संस्कार अन्त में मीरं को पवित्र और ईश्वर भक्ति में डूबे सन्त-भक्त के रूप को महत्त्व देकर उसमें उसके वैयक्तिक जीवन की भूमिका को अस्वीकर कर देता है। भारतीय धारणा और आचरण इस तरह का नहीं है- यह जैसा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा है कि जडों और शीर्ष को अलग-अलग हिस्सों के रूप में नहीं देखता।
गोएत्ज़ ने कुछ अपवादों को छोड दें, तो बहुत मनोयोग और निष्ठा के साथ मीरं के जीवन की पुनर्रचना की। मध्यकालीन इतिहास और उसमें भी राजस्थान के क्षेत्रीय इतिहास की उनकी समझ और जानकारियाँ किसी भी भारतीय विद्वान् की तुलना में बहुत गहरी और व्यापक हैं। यह विडम्बना है कि उनकी यह पुनर्रचना चर्चा में नहीं आयी। आख्यानों और जनश्रुतियों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समायोजन और युक्तिकरण की उनकी पद्धति के कुछ अच्छे नती*ो भी निकले। इससे मीरं के जीवन के कुछ मोड-पडावों के सर्वथा नए रूप सामने आए। उन्होंने पहली बार मेवाड-मारवाड और मेडता की पारस्परिक सम्बन्धों की उठापटक के बीच मीरं के जीवन को समझने का प्रयास किया। उन्होंने मीरंकालीन महाराणा सांगा, रत्नसिंह, विक्रमादित्य, सूरजमल, करमेती, धनाबाई, उदयसिंह, दूदा, वीरमदेव, जयमल, गांगा, मालदेव, अकबर, बाबर आदि कई ऐतिहासिक चरित्रों के बीच के उनके सम्बन्धों की बुनावट और ऐतिहासिक घटनाक्रम में मीरं की खोजबीन की। उन्होंने जनश्रुतियों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखकर मीरं के द्वारका और इसके बाद की अब तक अज्ञात जीवन यात्रा की पहचान बनायी। उनके अनुसार मीरं का मनुष्य रूप उसके प्रचारित सन्त-भक्त रूप से अलग था। खास बात यह है कि इस पुनर्रचना की पुष्टि के लिए गोएत्ज़ के पास कोई दस्तावेज़ नहीं था, केवल पारिस्थितिक साक्ष्य या अनुमान थे और उन्होंने यह बात ज़ोर देकर बार-बार कही।
पुनर्रचना की गोएत्ज़ की यह पद्धति इतिहास की यूरोपीय धारणा के दायरे में आती है या नहीं, इस पर लम्बे विचार-विमर्श की ज़रूरत है। यहाँ केवल यह कहा जा सकता है कि इसके कुछ बहुत अच्छे और कुछ खराब नती*ो निकले। यूरोपीय इतिहासकारों के देशज और दरबारी स्रोतों पर अविश्वास के संस्कार और प्रशिक्षण के कारण वे अपने अनुमानों को इनसे पुष्ट नहीं कर पाए। देशज और दरबारी स्रोतों में इस तरह की सामग्री है, जो कुछ उनके समय उपलब्ध थी और कुछ बाद में सामने आयी, जो उनके कुछ अनुमानों की पुष्ट करती है। गोएत्ज़ की सारी कवायद मीरं को उसकी प्रचारित रूमानी और रहस्यवादी सन्त-भक्त पहचान से अलग करने की है, लेकिन विचित्र यह है कि वे अपने समाहार में इसी पहचान पुख्ता करने में लग गए और उसकी केवल कृष्ण के प्रेम और समर्पण की रचनाओं को महत्त्व देकर उसके जागतिक जीवन की उठापटक की रचनाओं को इनसे कमतर ठहराने में लग गए। मीरं एक समग्र मनुष्य है- उसका सन्त-भक्त रूप उसके दैनंदिन जीवन संघर्ष और अनुभव का विस्तार है और उसके बीच में ही बनता-बढता है। मीरं की कविता में यही समग्रता है, इसमें उसकी भक्ति और जीवन संघर्ष सम्बन्धी कविताएँ अलग-अलग नहीं हैं, लेकिन विचित्र यह है कि अपनी मीरं की पहचान और समझ में गोएत्ज़ इनको अलग करके देखते हैं। गोएत्ज़ का यह कहना सही है कि मीरं ने इस दुनिया की सारी चमक और सारे दुःखों का अनुभव किया था, वह समाज के शीर्ष पर सत्ता के खेल को और गरीब तथा सताए हुए उन लोगों के दुःखों को जानती थीं, जो उसके भगवान की आभा में डूबे रहते थे फिर भी राजाओं और पुजारियों की घातक घृणा से पीडित थे। वह जन्मना हिन्दू अभिजात थी और उसका विकास एक ऐसी दृष्टि में हुआ था जहाँ सभी पुरुष गोपियाँ या एक ईसाई की भाषा में भगवान के बच्चे थे।91 मीरं का यह अनुभव केवल उसके सन्त-भक्त का अनुभव नहीं है, यह उसके भक्त में शामिल मनुष्य का अनुभव भी है। मीरं इसीलिए अपने भक्ति के अनुभव को अपने मनुष्य के अनुभव और संघर्ष के साथ रखकर देखती-समझती है। मीरं की कविता में इसीलिए भक्ति के साथ उसके जीवन के राग-द्वेष, तनाव और द्वंद्व भी आते हैं, लेकिन विचित्र यह है कि गोएत्ज़ का विभाजित मस्तिष्क इनको अलग करके देखता-समझता है।
सन्दर्भ और टिप्पणियाँ:
1. रवीन्द्रनाथ टैगोर, विजन ऑफ हिस्ट्री, अनु. सिबेश भट्टाचार्य एवं सुमिता भट्टाचार्य (शिमला : इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी, 2003), पृ. 33.

2. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स (मुंबईः भारतीय विद्या भवन,1966), पृ. 1.
3. वही, पृ. 40.
4. वही, पृ. 3.
5. वही, पृ. 40.
6. हरमन गोएत्ज़ के जीवन से सम्बन्धित अधिकांश जानकारियाँ ग्रोव इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इस्लामिक आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर, खण्ड-1, संपा. जोनाथन एम. ब्लूम एवं शेलिया ब्लेयर (न्यूयार्क : ओक्सफोर्ड, 2009), पृ. 118 पर आधारित हैं।
7. कार्ल जेट्टमार, ओरीजनल वेरोऑफंगटिल्चिंगः हरमन गोएत्ज़, ईस्ट एण्ड वेस्ट-26, 1976, पृ. 539-40.
8. हरमन गोएत्ज़: मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 1.
9. वही, पृ. 3.
10. वही, पृ. 2.
11. वही, पृ. 2.
12. वही, पृ. 40.
13. वही, पृ. 7.
14. लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉडः एनल्स एण्ड एँटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान, खण्ड-2, संपा. विलिएम क्रूक (दिल्लीः मोतीलाल, बनारसीदास, पुनर्मुद्रित संस्करण, 1971, लंदन, प्र.सं., 1920) पृ. 337.
15. कृष्णलाल एम. झवेरी, माइल स्टोन्स ऑफ गुजराती लिटरेचर (नयी दिल्लीः एशियन एज्यूकेशनल लिटरेचर सर्विसेज, 1993), पृ. 35.
16. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 5.
17. बीसवीं सदी और उसके बाद मीरं का यही सन्त-भक्त रूप लोकप्रिय साहित्य, चित्रकथा, फिल्म और कैसेट्स-सीडीज में भी चल निकला। इन माध्यमों की पहुँच का दायरा आख्यानों और इतिहास की तुलना में बहुत बडा था इसलिए मीरं का निर्मित सन्त-भक्त रूप जनसाधारण में लोकप्रिय हो गया। इन माध्यमों ने अपनी व्यावसायिक ज़रूरतों के अनुसार इसको पुष्ट और परिवर्तित भी किया। गीता प्रेस (हनुमानप्रसाद पोद्दार, भक्त नारी- भक्त चरित माला-2, गोरखपुरः गीताप्रेस, 2001) और अमर चित्रकथा (अनंत पै, मीरंबाई, इण्डिया बुक हाउस प्रा.लि., मुंबई, पुनर्मुद्रण, 2007) की मीरं अपनी धार्मिक अस्मिता के प्रति सचेत मध्यवर्गीय जनसाधारण की आकांक्षाओं के अनुसार आदर्श हिन्दू पत्नी और सन्त-भक्त है, जबकि डायमंड बुक्स (गिरिजाशरण अग्रवाल, प्रेम दीवानी मीरं, नयी दिल्लीः डायमंड पॉकेट बुक्स प्रा.लि., 2003) की मीरं भूमण्डलीकृत अर्थव्यवस्था में पले-बढे नयी पीढी के मध्यवर्ग की काम्य स्त्री छवि के अनुसार रूमानी, स्वतंत्र और अंशतः परम्परा विरोधी है। फिल्म (गुलज़ार निर्देशित मीरं) में भी मीरं असाधारण भक्त स्त्री और प्रेम दीवानी है। लोकप्रिय ऑडियो कैसेट्स-सीडीज में भी मीरं की ऐसी रचनाएँ संकलित की गई हैं, जो उसके भक्त और प्रेम दीवानी स्त्री रूप को ही पुष्ट करती हैं।
18. वही, पृ. 8.
19. महाराणा मोकल (1421-1433 ई.) के समय यह घटना हुई। लाखा के उत्तराधिकारी चूंडा ने स्वेच्छा से जोधपुर मूल की रानी हंसाबाई के पुत्र मोकल के पक्ष में मेवाड छोड दिया। अल्पवय मोकल के समय राज्य कार्य हंसाबाई का भाई राठौड रणमल करने लगा। उसकी मंशा अच्छी नहीं थी- उसने मनमानी शुरू कर दी। विस्तृत विवरण के लिए देखिए - गौरीशंकर हीराचन्द ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास (जोधपुरः राजस्थानी ग्रन्थागार, 1996-97), पृ. 270-279.
20. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 13.
21. हुकुमसिंह भाटी, मीरंबाईः ऐतिहासिक और सामाजिक विवेचन (जोधपुरः रतन प्रकाशन, 1986), पृ. 17.
22. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 13.
23. वही, पृ. 13.
24. सी.एल. प्रभात, मीरं: जीवन और काव्य, खण्ड-1 (जोधपुरः राजस्थानी ग्रन्थागार, 1999) पृ. 153.
25. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 33.
26. वही, पृ. 35.
27. गोपीनाथ शर्मा, भक्त मीरंबाई (उदयपुरः मीरं कला मंदिर, 1990), पृ. 18.
28. भरत सी. सुखपरिया, प्रदीप आर. माधवाणी एवं गिरीश वी. गणात्रा, संपादन, मीरंबाई का जीवन चरित्र, द्वारका परिचय (द्वारकाः रवि प्रकाशन, प्रथमावृत्ति-गुजराती, 2004, प्रथमावृत्ति-हिन्दी, 2005), पृ. 79.
29. ओखामण्डल का वाढेल वंश के वेरावलजी और बिज़लजी नाम के राठौड राजपूत भाई लगभग 13वीं सदी में (राजस्थान के) मारवाड से द्वारका आ पहुँचे। उस प्रदेश में हिरौंल राजपूतों और चावडा राजपूतों के बीच विग्रह चल रहा था। इस विग्रह के अन्त में राठौड जीते और उस प्रदेश में से चावडाओं को नेस्तनाबूद कर दिया। उन्होंने आसपास के प्रदेशों पर कब्जा करके एक छोटी पर प्रबल सत्ता की स्थापना की। अब इन राठौडों ने वाढेल या वाढेर अल्ल (उपनाम) लगाना शुरू किया। वैरावलजी ने कच्छ के छोटे रेगिस्तान के पास वेदमती नदी तक का इलाका कब्जे में ले लिया था। उसने अपनी राजधानी द्वारका की उत्तरी खाडी के किनारे आरंभडा गाँव में नई बस्ती बसा कर वहाँ पर सत्ता कायम की। उसकी मृत्यु के बाद उसके बेटे विकमसी ने सत्ता प्राप्त की। इस विकमसी के बाद लगभग नौ राणा हुए। सभी ने मिलकर लगभग 120 साल तक शासन किया। विकमसी की....(अस्पष्ट) पीढी में सांगणजी आते हैं, जिन्होंने अपनी सत्ता जामखंभाळिया तक फैला ली थी। सांगणजी ने राव मांडलिक के शंखोद्धार दीप पर चढाई करके उसे पराजित किया था। सांगणजी का माणेक अवटंक के वाघेरों के साथ संघर्ष होता रहता था इसलिए उसने ओखामण्डल पर वाढेरों का शासन तथा द्वारका पर वाघेरों का शासन रहे, ऐसी संधि की थी। उसने इस प्रकार का समझौता भी करवाया था कि दोनों सामंजस्य के साथ रहें, जिससे बाहर के शत्रु आकर दोनों का विनाश न करे। तबसे दोनों जातियाँ साथ मिलकर रहने लगीं। सांगणजी के बाद उनका पुत्र भीमजी सत्ता पर आया। भीमजी के समय में द्वारका के समुद्र में होने वाली सामुद्रिक लूट को रोकने के लिए महमूद बेगडा ने चढाई की और भीमजी को भगा कर समग्र प्रदेश पर मुस्लिम सत्ता कायम की। पर बाद में वाढेरों ने बलशाली सेना एकत्र कर समग्र प्रदेश को कब्जें में ले लिया था। लगभग इस्वी सन् 1592 में अकबर के दबाव से मुज़फ्फर हार कर आरंभडा के वाढेर राणा शिव(सवजी) के आश्रय में आया। उस समय मुगल सत्ता ने चढाई की थी। उसके साथ के युद्ध में शिवराणा ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ओखामण्डल का प्रदेश मुस्लिम सत्ता के (उस समय मुगल सत्ता के नीचे) हस्तक आ गया था। इस समय शिवराणा का बेटा सांगणजी सिंध की तरफ भाग गया परंतु उसने मल्ल नाम के मुस्लिम शासकों को हथियार फेंककर भागने के लिए विवश कर दिया। सांमणा माणेक सिंध में सांगणजी को ढूँढने गया। वह उसे वापस ले आया, तब जो भयंकर युद्ध हुआ उसमें मुस्लिम सेना हार गयी। युद्ध के बाद आरंभडा की राजगादी पर सांगणजी का राज्याभिषेक हुआ। सांगणजी के बाद अखेराज सत्ता पर आया। वह अभी कुमार ही था तब उसके बहनोई नवानगर के जाम ने उन्हें कैद कर लिया था तब द्वारका के माणेक के पुत्र पतरामेल ने वाघेरों की फौज ले जाकर उसे छुडाया था। ईसवी सन् 1664 में अखेराजजी का अवसान हुआ और उसका पुत्र भोजराज गद्दी पर बैठा। उसके राजकुमार वजेराजजी की अपने अन्य छह भाइयों के साथ अनबन हुई, इसीलिए भोजराजजी ने उसे पोशितर की जागीर वंशपरम्परा के रूप में देकर उसे वहाँ का प्रशासन सौंपा। ईसवी सन् 1715 तथा 1718 के दरमियान आरंभडा तथा पोशितर के वाढेर सरदारों ने द्वारका वाले वाघेरों की मदद से सौराष्ट्र के कुछेक स्थानों पर डाका डाला था। तब नवानगर, गौडल और पोरबन्दर की सेनाओं ने चढाई की और उन्हें दबाने की कोशिश की। इस अवसर पर नवानगर का वह प्रदेश जो वाढेरों ने हथिया लिया था वह उन्हें छोड देना पडा। ओखामण्डल के प्रदेश में ही उनकी सत्ता सीमित हो गई। वजेराजजी को पोशितर की जागीर दे दिए जाने पर आरंभडा के दो हिस्से हुए, तो वाघेरों के भी द्वारका और वसई जैसे दो हिस्से हुए। ए चारों अपने-आपको राजा कहलवाते थे, फिर भी बाहर का कोई शत्रु आता था तो वह सभी एक साथ हो जाते थे। -रसिकलाल पारीख, गुजरात का राजकीय और सांस्कृतिक इतिहास (मुगलकाल), प्रकाशक सूचना विषयक पृष्ठ नहीं है, पृ. 138-140.
30. मीरंबाई का जीवन चरित्र, द्वारका परिचय, पृ. 80
31. जेम्स टॉड, पश्चिमी भारत की यात्रा, हिन्दी अनुवाद, गोपालनारायण बहुरा (जोधपुरः राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, द्वितीय संस्करण, 1996), पृ. 442
32. मीरंबाई का जीवन चरित्र, द्वारका परिचय, पृ. 80.
33. महाराणी जी श्री मीरं कंवरी राठौड मेडता रा दूदा भारमलोत जोधउत की ने मंदर करायो श्री नाराईण चारभुजाजी को जी को समोरथ संमत पदरसे चवदा से कामचलतो हुवो संमत 1514 का महा सुदी पंचमी रे दन नीम दीदी गढ चित्तौड उपरे भगवा श्री कुंभ श्याम को मंदर राणा जी श्री कुम्भाजी करायो जणी मंदर नखे राणी मीरं कंवरी ने करायो संमत पदरासे छतीसा ताई हुवो बरस बीस महे हुवो संमत 1536 ताई हुवो। जी की खरचदाअरी का रुपिया 44799 उदीयापण का रुपीया बाब्वन हजार नसे चौतीस लागा52934 चीतौपर आई ठाणा मंदर का छ जी सु सगला सु सगस काम मीरंबाई का मंदर हुवो। अकंदर रुपीया पाँच लाख नवसे तेतीस लागा 500933 उदीयापण हुवो। संमत पदरासे छ्तीसा बरषे 1536 का माह बुदी आठम गुरुवार के दन उदीयापण हुवा। (यहाँ मीरं को महाराणा सांगा की रानी लिखा गया है, जो गलत है। इसी तरह जो तिथियाँ दी गई हैं, वे भी इतिहाससम्मत नहीं हैं।-लेखक) -चित्तौड-उदयपुर पाटानामा, खण्ड-2, संपा. मनोहरसिंह राणावत, (सीतामऊः श्री नटनागर शोध संस्थान, 2003), पृ. 156.
34. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 31.
35. ठाकुर चतुरसिंह, मीरं प्रकरण, परम्परा (विद्याभूषण हरिनारायण पुरोहित अंक), भाग-63-64, पृ. 70.
36. अब्बास खान सरवानी, तारीख-ए-शेरशाही, दि हिस्ट्री ऑफ इण्डिया एज टोल्डबाई इट्स ओन होस्टोरियन्स, खण्ड- 4, संपा. एवं अनुवाद, एच.एम. इलिएट (लंदनः ट्रयुबनेर एण्ड कंपनी 1872), पृ. 406 .
37. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, उदयपुर राज्य का इतिहास, पृ. 422
38. ए कनिंघम रिपोर्ट्स ऑफ ए ट्यूर इन रीवा, बुन्देलखण्ड, मालवा एण्ड ग्वालिएर, इन 1884-1885 बाई आरकियोलोजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया (कलकत्ताः सुपरिटेंडेंट ऑफ गवर्मेंट प्रिंटिंग, इण्डिया, 1885), पृ. 103.
39. जे.एम. सहेलात, अकबर (मुम्बईः भारतीय विद्या भवन, 1964), पृ. 218.
40. मीरं, मीरं बृहत् पदावली, भाग-1, संपा. हरिनारायण पुरोहित (राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, तृतीय संस्करण, 2006), पृ. 16
41. माताप्रसाद गुप्त, तुलसीदासः जीवन वृत्त और कृतियाँ, रामचरितमानस, संपा. सुधाकर पाण्डेय (दिल्लीः राधाकृष्ण प्रकाशन, 1972), पृ. 9
42. जगदीशसिंह गहलोत के अनुसार मानसिंह भगवानदास के छोटे भाई भगवंत दास का पुत्र था।- कछवाहों का इतिहास (जयपुरः युनिक ट्रेडर्स, संशोधित संस्करण 2004), पृ. 91.
43. जे.एम. सहेलात, अकबर, पृ. 221
44. वही, पृ. 195
45. विंसेट ए. स्मिथ, अकबर दि ग्रेट मुगल,1542-1605 (लंदनः ओक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, 1917), पृ. 57.
46. जगदीशसिंह गहलोत, कछवाहों का इतिहास, पृ.91 एवं 101
47. नाभादास, श्रीभक्तमाल (श्रीप्रियादासजी प्रणीत टीका-कवित्त सहित), संपा. सीतारामशरण भगवानप्रसाद रूपकला (लखनऊः तेजकुमार बुक डिपो (प्रा.) लिमिटेड, ग्यारहवाँ संस्करण 2011), पृ. 724.
48. देवीसिंह मंडावा, कच्छवाहों का इतिहास (जोधपुरः राजस्थानी ग्रन्थागार, द्वि. सं.2010), पृ. 15.
49. प्रोग्रेस रिपोर्ट आरकियोलोजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया- वेस्टर्न सर्किल, 1910, परिग्रहण क्रमांक 22181 (नयी दिल्लीः केन्द्रीय आर्कियोलोजिकल लाइब्रेरी), पृ. 47 एवं जगदीशसिंह गहलोत, कछवाहों का इतिहास, पृ. 23.
50. असीमकुमार राय, हिस्ट्री ऑफ जयपुर स्टेट (नयी दिल्लीः मनोहर, 1973), पृ. 161.
51. हरमन गोएत्ज़, मीरंबाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 37.
52. एच.जी. कीने, ए स्केच ऑफ दि हिस्ट्री ऑफ हिन्दुस्तान (दिल्लीः इदाराए अदबियात, 1972), पृ. 98 और जे.एम. सहेलात, अकबर, पृ. 221.
53. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 6.

54. रैदास के अध्एता उनके जन्म और मृत्यु के समय के सम्बन्ध में एक राय नहीं हैं। उन्होंने जो विभिन्न तिथियाँ सुझायी हैं उनमें समय का अन्तराल बहुत व्यापक है- इनके अनुसार रैदास का जन्म 1376 से 1443 ई और मृत्यु 1520 से 1540 ई. के बीच हुई। रैदासपंथियों के अनुसार उनका जन्म 1376 ई. में और निधन 1506 ई. में हुआ। रैदास के पहले आधुनिक अध्एता रामचरण कुरील ने पारम्परिक विश्वास के आधार पर रैदास का समय 1414 से 1540 ई. माना। रामानन्द शास्त्री ने माना कि रैदास का जन्म 1384 से 1398 ई. के बीच और मृत्यु 1520-1538 ई. के बीच हुई होगी। ए.पी. सिंह के अनुसार उनका जन्म 1376 से 1538 के बीच हुआ होगा। दर्शन सिंह और योगेंद्र सिंह की राय इससे अलग है- योगेंद्र सिंह के अनुसार इस सम्बन्ध में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उनके अनुसार रैदास का जन्म 1443 ई. के आसपास हुआ होगा। (सन्त रैदास, इलाहाबादः लोक भारती प्रकाशन, 208, पृ. 15) दर्शन सिंह के अनुसार रैदास का जन्म 1414 और उनकी मृत्यु 1527 ई. में हुई। विनांद कैलवर्त्त और पीटर जी. फ्रेडलेंडर ने रैदास की सक्रियता का समय 1450 से 1520 ई. के बीच माना है। (लाइफ एण्ड वर्कस ऑफ रैदास, पार्ट-ढ्ढ (दिल्लीः मनोहर, 1992,) पृ. 26.) रैदास के जीवनकाल के सम्बन्ध में भी बहुत प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। उनका समय उनकी वाणी में उल्लिखित अन्य सन्त-भक्तों और अन्य सन्त भक्तों की वाणी में उनके उल्लेख तथा रामानन्द के समय के आधार पर तय किया जाता है। रैदास रामानन्द के शिष्य थे, यह उल्लेख भक्तमाल और रैदास परचई में मिलता है। रामानन्द के जन्म का समय अनुमान के आधार पर 1356 ई. के आसपास माना गया है। रैदास ने कबीर का उल्लेख सम्मानपूर्वक किया है, जिनका समय 1398-1515 ई. ठहरता है। मीरं अपने पदों में एकाधिक स्थानों पर रैदास का उल्लेख गुरु की तरह करती है, जिसका समय 1498 से 1546 ई. तक है, लेकिन मीरं का रैदास से सम्बन्ध औपचारिक के बजाय अनौपचारिक शिष्यत्व का ही होना चाहिए। इसी तरह धन्ना भगत ने रैदास का स्मरण बहुत आदरपूर्वक किया है, जिनका जन्म 1415 ई. में हुआ। है। स्पष्ट है कि रैदास रामानन्द के समकालीन और उनसे कनिष्ठ, कबीर के समकालीन और कनिष्ठ और धन्ना भगत के समकालीन और उनसे वरिष्ठ होने चाहिए। भक्तमाल और रैदास परचई सहित कुछ ग्रन्थों के विश्वास के अनुसार कबीर, रैदास आदि रामानन्द के बारह शिष्य थे। यह सही है कि रैदास ने कबीर की तरह अपने रामानन्द के शिष्य होने का उल्लेख नहीं किया, लेकिन भक्तमाल और रैदास परचई के उल्लेख रैदास के सक्रिय जीवन के बहुत बाद के नहीं हैं। रामानन्द के जीवनकाल की तिथियों को लेकर भी अभी अनिश्चय है- इनमें उनका जन्म 1338 से 1348 के बीच और मृत्यु 1445 से 1460 ई. के बीच मानी गई है। रैदास की सक्रियता का समय इस आधार पर तय होना चाहिए कि वे रामानन्द, कबीर और धन्ना के समकालीन थे। रामानन्द की उम्र कबीर व धन्ना से कुछ *यादा रही होगी और धन्ना कबीर से आयु में कम रहे होंगे। अनुमान किया जा सकता है कि रैदास का जन्म 1410 ई. के आसपास और उनका निधन 1500 ई. के आसपास हुआ होगा। ए तिथियाँ सभी देशज स्रोतों में वर्णित तिथियों के भी आसपास हैं। विनांद कैलवर्त्त और पीटर जी. फ्रेडलेंडर ने रैदास को रामानन्द से असम्बद्ध और मीरं से सम्बद्ध दिखाने के लिए उनके जन्म और और मृत्यु की तिथियों को आगे किया है, जो युक्तिसंगत नहीं है।
55. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 7.
56. मोहनलाल दशोरा, श्रीवीरभूमिः चित्तौडगढ -श्रीचित्रकूट गुण मालिका (उदयपुरः मोहनलाल दशोरा एडवोकेट, द्वितीय संस्करण, 2013), पृ. 41.
57. महेन्द्र भानावत, निर्भय मीरं (यह पुस्तक मीरं सम्बन्धी लोक स्मृतियों पर आधारित है। इसके लिए भानावत ने 1982 से1987 तक मीरं से सम्बन्धित अधिकांश स्थानों की शोध यात्राएँ कीं) (उदयपुरः मुक्तक प्रकाशन, उदयपुर, 1994 )
58. परिता मुक्ता, अपहोल्डिंग दि कॉमन लाइफ- दि कम्यूनिटी ऑफ मीरंबाई (कोलकाताः ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, 1997), पृ. 105.
59. मीरंबाई का जीवन चरित्र, द्वारका परिचय, पृ. 79.
60. मीरं, मीरं बृहत् पदावली, भाग-1, पृ. 207, पृ. 220
6. वही, पृ. 201.
62. धर्मपाल मैनी, रैदास (नयी दिल्लीः साहित्य अकादेमी, 2008), पृ. 14.
63. बसत चित्तौर मांझ रानी एक झाली नाम, नाम बिन कान खाली आन शिष्य भई है। -श्री भक्तमाल (श्रीप्रियादासजी प्रणीत टीका-कवित्त सहित), पृ. 477
64. हरमन गोएत्ज़, मीरंबाई, हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 11.
65. वियोगी हरि, संपा., सन्त सुधा सार (नयी दिल्लीः सस्ता साहित्य मण्डल, तीसरी बार, 2004), पृ. 155.
66. गोपीनाथ शर्मा, भक्त मीरंबाई, पृ. 19.
67. वियोगी हरि, सन्त सुधा सार, पृ. 155
68. माधव हाडा, पचरंग चोला पहर सखी री- मीरं का जीवन और समाज (नयी दिल्लीः वाणी प्रकाशन, 2015), पृ. 95-99.
69. हरमन गोएत्ज़: मीरंबाई, हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 7.
70. नागरीदास, पद प्रसंग माला, नागरीदास ग्रन्थावली, संपा. किशोरीलाल गुप्त, खण्ड-2 (वाराणसीः नागरीप्रचारिणी सभा, 1955), पृ. 363.
71. हरमन गोएत्ज़, मीरं बाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 10.
72. वही, पृ. 10.
73. देवी के पुजायबे कौं कियौ ले उपाय सासु, बर पै, पुजाइ सुनि वधू पूजि भाखियै। / बोली जू बिकायौ माथौ लाल गिरधारी हाथ, और कौन नव, एक वही अभिलाखियै।। -श्री भक्तमाल (श्रीप्रियादासजी प्रणीत टीका-कवित्त सहित), पृ. 716.
74. माधव हाडा, पचरंग चोला पहर सखी री, पृ. 96.
75. मुंहता नैणसी, मुंहता नैणसी री ख्यात, भाग-1, संपा. बद्रीप्रसाद साकरिया (जोधपुरः प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, 2006), पृ. 21.
76. रामदान लालस-भीम प्रकाश - पाडुलिपि (कोलकाताः सेठ सूरजमल नागरमल पुस्तकालय), पृ. 3.
77. हरमन गोएत्ज़, मीरंबाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 21.
78. अमर चित्रकथा की तरह ही मकॉव बुक्स ने चित्र कथा (मीरंबाई, 2009) प्रकाशित की, जिसमें अकबर और तानसेन का भेष बदल कर मीरं के यहाँ आने और उसकी पूजित प्रतिमा के चरणों में हार चढाने की घटनाओं से सम्बन्धित जनश्रुति को अपेक्षाकृत अधिक विस्तार से चित्रित किया गया है। यहाँ हिन्दू धार्मिक आग्रह नहीं है, इसलिए इसमें अकबर की सराहना की गई है। एक चित्र में अकबर बैठा है और उसके सम्बन्ध में केप्सन में लिखा गया है कि उन दिनों दिल्ली में मुगल सम्राट अकबर का शासन था और वह उदार और सुसंस्कृत था। आगे एक चित्र में वह दरबार में संगीत सुनकर उसकी तारीफ कर रहा है और उसके सम्बन्ध में केप्सन है कि वह अच्छा और पवित्र संगीत पसंद करता था।
79. हरमन गोएत्ज़, मीरंबाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 25.
80. मीरं मीरं बृहत् पदावली, भाग-1, पृ. 165.
81. मीरं, मीरं बृहत् पदावली, भाग-2, संपा. कल्याणसिंह शेखावत (जोधपुरः राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, 1975), पृ. 48.
82. हुकुमसिंह भाटी, मीरंबाईः ऐतिहासिक और सामाजिक विवेचन (जोधपुरः रतन प्रकाशन, 1986), पृ. 20.
83. हरमन गोएत्ज़, मीरंबाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 22.
84. गौरीशंकर ओझा, उदयपुर राज्य का इतिहास, पृ. 394.
85. हरमन गोएत्ज़, मीरंबाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 22.

86. वही, पृ. 22.
87. बडवा देवी दान, मेवाड के राजाओं की राणियों, कुँवरों और कुँवरियों का हाल, संपा. देवीलाल पालीवाल (उदयपुरः साहित्य संस्थान, राजस्थान विद्यापीठ, 1985), पृ. 10.
88. वही, पृ. 10.
89. हरमन गोएत्ज़, मीरंबाईः हर लाइफ एण्ड टाइम्स, पृ. 22.
90. वही, पृ. 42.
91. वही, 42.

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