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भाषा, अनुवाद एवं राजनीति

अनुराधा पाण्डेय
Writing does not happen in a vacuum, it happens in a conte&t and the process of translating te&ts from one cultural system into another is not a neutral, innocent, transparent activity, translation is instead a highly charged, transgressive activity, and the politics of translation and translating deserve much greater attention than has been paid in the past. (Susan Bassnett)
लेखन कभी भी शून्य में नहीं होता, इसका कोई न कोई सन्दर्भ अवश्य होता है। किसी भी कृति को एक संस्कृति से किसी दूसरी संस्कृति में अनूदित करना पूर्णतः तटस्थ होकर, दोषरहित होकर एवं पारदर्शिता से नहीं किया जा सकता। इसके बरअक्स, अनुवाद करना बहुत ही ज़म्मेदारी पूर्ण दायित्व एवं नियमित कार्य होता है और अनुवाद की राजनीति का विषय बहुत महत्त्वपूर्ण है। अतीत की तुलना में आज के समय में इसे कहीं ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत है। (सु*ोन बस्स्नेट)
मानविकी से सम्बन्धित विभिन्न अनुशासनों की तुलना में अनुवाद अध्ययन प्रारंभिक अवस्था में है। अनुवाद अनुशासन का प्रादुर्भाव भाषाविज्ञान के अन्तर-अनुशासनात्मक विषय-रूप में हुआ है। अनुवाद में भाषाविज्ञान का पक्ष सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। अनुवाद का आधार भाषा है। अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में करते समय सन्देश के साथ भाषा का भी अन्तरण किया जाता है। सन् 1960 के दशक में अनुवाद का अर्थ केवल भाषाओं एवं उनकी संस्कृतियों के अन्तरण से लिया जाता था। 1960 की तुलना यदि वर्तमान समय से की जाए* तो आज अनुवाद अध्ययन परिपक्व अवस्था में पहुँच चुका है। इसीलिए आज अनुवाद अध्ययन में विविध पक्ष उभरकर सामने आ रहे हैं। इन्हीं में से भाषा, अनुवाद एवं राजनीति एक महत्त्वपूर्ण विमर्श के रूप में सामने आया है। अनुवाद अध्ययन में यह बात उठाई जा रही है कि अनुवाद हेतु किसी कृति अथवा पाठ का चुनाव राजनीति का विषय है अथवा नहीं? कोई अनुवादक अनुवाद हेतु कृति चयन का निश्चय करता है तो उसके उत्प्रेरक कारक क्या हो सकते हैं? निर्देशक किसी भाषा की कृति पर फिल्म निर्माण करना चाहता है* तो उस कृति के चुनाव के कारण क्या हो सकते हैं? चुनाव की इस प्रक्रिया को किस रूप में देखा जाए? साहित्य और फिल्म सभी भाषाओं के समाज में महत्त्वपूर्ण एवं रुचिकर माध्यम रूप में स्वीकृत हैं। इसलिए यह पता होना चाहिए कि किसी पाठ के अनुवाद को या किसी कृति पर आधारित फिल्म को हम किस रूप में देखें? इसके अतिरिक्त, यह जानने-समझने की आवश्यकता है कि जिस कृति को हम अनूदित रूप में पढ रहे हैं या जिस फिल्म को रूपांतरण रूप में देख रहे हैं क्या वह राजनीति का विषय भी है? यह शोध इन्हीं विषयों पर आधारित है।
अनुवाद कई रूपों में होता है। यथा- अन्तःभाषी अनुवाद (अर्थात् समान भाषा के पाठ का उसी भाषा में अनुवाद) अन्तरभाषी अनुवाद (किसी एक भाषा के पाठ का किसी दूसरी भाषा में अनुवाद) एवं अन्तर-प्रतीकात्मक अनुवाद (एक भाषा के लिखित पाठ का दूसरी अथवा उसी भाषा में प्रतीकांतर अर्थात उस पाठ का फिल्मांकन, नाट्य रूपान्तरण इत्यादि)। अनुवाद के दो महत्त्वपूर्ण रूप हैं। पहला किसी कृति का एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद और दूसरा किसी कृति का अन्तर-प्रतीकात्मक अनुवाद। अन्तर-प्रतीकात्मक अनुवाद अर्थात किसी लिखित कृति पर नाट्य मंचन अथवा फिल्मांकन। वर्तमान में अनुवाद इन्हीं दो रूपों में विशेष रूप से प्रचलित है। एक भाषा से दूसरी भाषा में पाठ का अनुवाद और किसी पाठ का फिल्म रूप में प्रदर्शन। इन दोनों ही प्रकार के अनुवादों के अन्तर्गत राजनीति के विविध बिंदुओं को देखा जा सकता है।
अनुवाद का राजनीतिक पक्ष
अनुवाद का कार्य पूर्णतः भाषा पर आधारित है। स्रोत भाषा चयन एवं लक्ष्य भाषा चयन की प्राथमिकता कई दृष्टियों से निर्धारित होती है। जिनमें आर्थिक उपलब्धता, बहुसंख्यक समाज द्वारा स्वीकृत भाषा, प्रचलित भाषा, उच्च वर्ग द्वारा प्रभावित भाषा, उच्च जाति द्वारा समर्थित भाषा आदि कारण प्रभावी हो सकते हैं। ठीक यही कारक लक्ष्य भाषा के चयन में भी प्राथमिक होते हैं। इनके अतिरिक्त, अनुवाद की भाषिक शैली का चयन अनुवादक की मनः स्थिति, श्रेष्ठता बोध, शैक्षणिक स्थिति आदि से प्रभावित होती है। यही कारण है कि वर्तमान समय में अंग्रेजी का वर्चस्व सर्वत्र देखने को मिल रहा है। किसी भी भाषा की कृति का चयन करने के उपरांत मौलिक लेखक की भाषिक शैली का अनुसरण करते हुए अनुवादक को समरूप पाठ तैयार करना पडता है। वर्तमान समय में किसी मौलिक कृति में देखा जाए, तो अंग्रेजी भाषा का प्रयोग शब्दों अथवा वाक्यों आदि के स्तर पर किसी भी भाषा के पाठ में देखने को मिल रहा है। हिन्दी भाषा का लेखक कहानी, उपन्यास, नाटक आदि में भी अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग बहुतायत से करने लगा है। ऐसी स्थिति में अनुवादक के सामने दो विकल्प होते हैं। अनुवाद में अनुवादक अंग्रेजी भाषा के शब्दों का लक्ष्य भाषा में अनुवाद कर दें या फिर लक्ष्य भाषा के अनुवाद में ज्यों के त्यों अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग करे। ठीक वैसे ही जैसे मौलिक कृति में की गई है। इन दोनों ही प्रकार के विकल्पों का चयन अनुवादक की व्यक्तिगत दृष्टि को प्रदर्शित करता है। इन सभी कारणों से ही यह कहा जा रहा है कि वर्तमान दौर राजनीति से सर्वाधिक प्रभावित है। या यूं कहें कि आज के समय में हर व्यक्ति राजनीतिक दृष्टि से अपने आस-पास की चीजों की जांच-पडताल करने लगा है। यही कारण है कि अनुवाद का क्षेत्र इससे प्रभावित हो रहा है।
वर्तमान में संविधान स्वीकृत भाषाओं के अतिरिक्त अन्य कई बोलियाँ एवं उपबोलियाँ प्रचलित हैं। जिनमें सम्प्रेषण एवं साहित्य लेखन भी होता रहा है। लेकिन वर्तमान समय में बोलिएों के साहित्य को दरकिनार कर दिया गया है। बोलिएों को न तो साहित्य लेखन में प्रयोग किया जाता और न ही जो लिखित साहित्य है उसे किसी अन्य भाषा में अन्तरित करने की कोशिश की जा रही है। अनुवाद करते समय प्रत्येक अनुवादक की यह कोशिश होती है कि उसके द्वारा अनूदित साहित्य सर्वाधिक जनसमुदाय तक पहुँच सके और इसी कोशिश में अनुवादक ऐसी भाषा का चयन करता है जो सर्वाधिक जनता द्वारा बोली, समझी और प्रयोग की जाती है। यही कारण है कि हिन्दी की कई बोलियाँ, उपबोलियाँ, आदिवासी भाषाएँ आदि विलुप्त की स्थिति में आ चुकी हैं। इस दृष्टि से यह स्पष्ट है कि अनुवाद में भाषा का पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावी है। राजनीति का विषय आज के समय में भाषा एवं अनुवाद दोनों ही में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
अनुवाद में राजनीति के प्रश्न
जब अनुवाद अध्ययन की शुरुआत हुई तो इसका विषय विस्तार, अनुवाद प्रकार, प्रक्रिया, अनुवादक के गुण, अनुवाद की सीमाएँ आदि तक ही सीमित था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस अनुशासन में बहुत बदलाव हुआ है। वर्तमान समय के विमर्शों के दृष्टिकोण को भी अनुवाद अनुशासन में शामिल किया जाने लगा है। हालाँकि, पाश्चात्य देशों में अनुवाद का विमर्शों के साथ अध्ययन और शोध पहले से होने लगा था, लेकिन भारतीय परम्परा में ए प्रश्न आज के समय में प्रकाशित किए जा रहे हैं। बहरहाल, अच्छी बात है कि इस अनुशासन में विमर्शों की दृष्टि से तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन की शुरुआत हो चुकी है एवं इसे स्वीकृति भी मिलने लगी है। अनुवाद अध्ययन में कृतियों के अनुवाद के इतिहास को देखा जाए, तो यह बहुत प्राचीन है। अनुवाद को अनुशासन के रूप में स्थापित करने की बात भी नहीं थी, उसके कई वर्षों पूर्व से ही भाषा में अनुवाद का व्यवहार होता रहा है। कृतियों के अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में सतत रूप से होते रहे हैं। विश्व साहित्य, अनुवाद के माध्यम से दूसरी भाषा के साहित्य, समाज, दर्शन, धर्म, संस्कृति को समझता आ रहा है। ऐसे में, इस विषय पर किसी का ध्यान नहीं था कि क्या अनुवाद के चुनाव में राजनीति का सन्दर्भ हो सकता है? जैसे- किसी कृति के अनुवाद में राजनीतिक शक्ति का प्रभाव हो सकता है? क्या अनुवाद प्रक्रिया बाह्य शक्तियों द्वारा प्रभावित होती है? इस तरह के विविध प्रश्न अनुवाद विमर्श के आयाम से दूर ही थे। लेकिन, यह सत्य है कि प्रत्येक अनुवाद में राजनीतिक कारण अवश्य होते हैं। यह भी सम्भव है कि यह कारण सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक विषय से सम्बन्धित हो सकता है। अनुवाद हेतु पाठ चयन और अनुवाद सम्बन्धित सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषय बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनको नकारा नहीं जा सकता। प्रेमचन्द द्वारा लिखित उपन्यास गोदान का अनुवाद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखित उपन्यास गोरा का अनुवाद एवं अनंतमूर्ति के उपन्यास संस्कार का अनुवाद इस विमर्श को समझने की दिशा में महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। इतना ही नहीं, अनुवाद एवं राजनीति में यह भी महत्त्वपूर्ण है कि- किसी जिम्मेदार अनुवादक द्वारा किसी कृति का अनुवाद करने में अधिक समय क्यों लगता है? इसका कारण अनुवादक का विषय के प्रति पाठगत प्रेम है? अथवा अनुवादक की रुचि किस अन्य प्रकार के पाठ में है? यह कारण भी पाठ के अनुवाद में लगने वाली समयावधि को निर्धारित कर सकता है। मान लीजिए कि किसी पाठ का सम्बन्ध किसी विशेष विचारधारा से हो और उसका अनुवाद किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जा रहा हो जिसकी उस विचारधारा से सहमति ही न हो। ऐसे निश्चित तौर पर उस पाठ के अनुवाद में विरोधाभास की स्थिति देखने को मिल सकती है। अकबर के शासनकाल में जब रामायण एवं महाभारत के अनुवाद करवाए जा रहे थे जिसमें से रामायण के अनुवाद का सन्दर्भ अब्दुल कादिर बदायूनी का मिलता है। हालाँकि, रामायण का अनुवाद अकबर के आदेश पर किया जा रहा था। इस अनुवाद पर अपने अनुभव को स्पष्ट करते हुए अब्दुल कादिर बदायूनी लिखते हैं कि उनके द्वारा ऐसी कृति का अनुवाद करना बहुत कठिन अनुभव था जिसके विचार एवं दर्शन में उनकी आस्था नहीं थी और न ही उससे वे सहमत थे इसके बाद भी अब्दुल कादिर बदायूनी द्वारा अनूदित फारसी रामायण अनुवाद की गुणवत्ता में श्रेष्ठ एवं समतुल्य है। इस अनूदित पाठ में अनुवादक ने मूल कृति के भाव एवं अर्थ को सुरक्षित रखते हुए अनुवाद किया है। किसी संस्था द्वारा किसी पाठ का चुनाव, अनुवादक का चुनाव और अनुवाद-रूप का चुनाव आदि महत्त्वपूर्ण विषय हैं। स्रोत भाषा के पाठ का अनुवाद किस लक्ष्य भाषा में सर्वप्रथम होना चाहिए? यह भी महत्त्वपूर्ण है। हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी आदि ऐसी भाषाएँ हैं जिनसे सर्व-प्रथम कृतियों का चुनाव अनुवाद हेतु किया जाता है एवं इन्हीं भाषाओं में अनुवाद को प्राथमिकता दी जाती है। इस रूप में, भाषा के आधार पर कृति का चुनाव महत्त्वपूर्ण कारण है। अनुवाद हेतु अनुवादक के विचार, अनुवादक का संस्थागत प्रेम, अनुवादक के गुण आदि भी महत्त्वपूर्ण बिंदु हैं।
अनुवाद एवं राजनीति
अनुवाद और राजनीति दो भिन्न-भिन्न शब्द हैं। जब हम अनुवाद का उपयोग किसी राजनीतिक लाभ अथवा किसी विशेष विचारधारा के प्रचार के लिए करते हैं तो अनुवाद एवं राजनीति एक-दूसरे से अलग होते हुए भी अलग नहीं होते। अनुवाद में पाठ के चयन तथा उत्पादन की प्रक्रिया के अन्तर्गत ए प्रश्न एक-दूसरे में निहित हैं। जब भी कोई सार्वजनिक अभिव्यक्ति दी जाती है अथवा किसी प्रकार की अनौपचारिक बातचीत की जाती है तो उन वाक्यों में, उसमें शामिल शब्दों के चयन के पीछे एक परम्परा एवं विचारधारा सक्रिय होती है। मुख से निःसृत शब्दों एवं वाक्यों का चयन हमारी मानसिकता द्वारा निर्धारित होता है। इस मानसिक निर्मिति के पीछे हमारा परिवार, समाज, राज्य, देश, वातावरण, शिक्षा आदि सभी कारक महत्त्वपूर्ण होते हैं। ठीक इसी तरह, कोई भी अनुवाद सिर्फसाधारण रूपांतरण नहीं होता बल्कि अनुवाद में शब्दों का चयन, वाक्य रचना आदि के लिए निर्धारित योजना एवं शक्ति कार्य करती है। इस योजना के तहत ही अनुवादक का चुनाव किया जाता है और इसी योजना के तहत अनुवादक की विचारधारा भी काम करती है। अनुवाद नितांत ही तटस्थता का काम है। अनुवाद में अनिवार्यता है कि अनुवादक पाठ के अनुकूल लक्ष्य भाषा पाठ का निर्माण करे। लेकिन, अनिवार्यता के बावजूद भी अनुवादक अपनी व्यक्तिगत मान्यता एवं विचारधारा से अनुवाद को प्रभावित करते हैं। अनुवाद का सम्बन्ध राजनीति से जोडते हुए अनुवाद विदुषी तेजस्विनी निरंजना का मानना है कि- अनुवाद कार्य एक राजनीतिक कार्य होता है। किसी भी पाठ का अनुवाद करते समय महत्त्वपूर्ण है कि यह ध्यान दिया जाए कि अनुवाद के माध्यम से किस तरह के प्रश्नों को ज्यादा मजबूती से उभारा जाता है और किन प्रश्नों को दबाया जा रहा है। अनुवाद और राजनीति में एक प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि- पाठ में लिखित किन चीजों का अनुवाद किया जाए और किन चीजों को छोड दिया जाए। इन दोनों प्रश्नों में यह तय है कि इनमें से एक पक्ष हाशिए पर जरूर जाएगा। यदि ऐसा होता है तो, फिर यह प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यूं किया जाता है? अनुवाद में एक प्रश्न को प्रमुखता क्यों दी जाती है? अनुवाद में किसका पक्ष लेना चाहिए? इन प्रश्नों के निर्धारण में कभी-कभी कोई विशेष विचारधारा क्रियाशील होती है तो कभी किसी संस्था अथवा शक्ति की भूमिका होती है। इस प्रक्रिया में विचारधारा, राज्य सत्ता और शक्ति के अलावा आर्थिक कारण भी महत्त्वपूर्ण हो सकता है। यह अनुवादक को राजनीति का हिस्सा बनने के लिए बाध्य कर सकता है। ए सभी कारक अनुवाद एवं राजनीति में एक-दूसरे से गुंथे हैं। अतः किसी भी स्वतंत्र विचार को ग्रहण करना मुश्किल है। ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं जो अनुवाद की राजनीति को स्पष्ट करते हैं। जैसे- बाइबिल के अनुवाद का सम्बन्ध बहुत ही महत्त्वपूर्ण रूप में राजनीति से जुडा हुआ है। अनुवाद के आरंभिक चरण में बाइबिल के अनुवाद को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इसके बाद भी जब अनुवाद कार्य हुआ तो अनुवादकों को दण्डित किया गया। यहाँ तक कि मृत्यु-दंड भी दिया गया। बाइबिल के अनुवाद में शब्दानुवाद को अनुमति मिली। इसके लिए भी स्वीकृति इसलिए मिली क्योंकि इसमें एक भी शब्द बदले नहीं जाने चाहिए। बाइबिल के इन अनुवादों से हमें पता चलता है कि इसके अनुवाद ने इस दौर की सत्ता और राजनीति को कैसे प्रभावित किया। यूरोपीय नवजागरण काल में अनुवाद एक हथियार के रूप में प्रयोग किया गया। अनुवाद कार्य का सहारा देश की जनता एवं सत्ता को प्रभावित करने के लिए किया गया। यही कारण है कि अनुवाद और राजनीति को मानव राजनीति के बृहत् परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। वस्तुतः जब हम अनुवाद और राजनीति की बात करते हैं, तो हमारी नजर स्पष्ट एवं तटस्थ होनी चाहिए। अनुवाद में राजनीति की शुरुआत अनुवाद हेतु पाठ का चयन करते समय ही शुरू हो जाती हैं। राजनीति की दूसरी प्रक्रिया अनुवाद की प्रक्रिया के समय शामिल होती हैं। अर्थात् अनुवाद करते समय जब किसी कारणवश अनुवाद में कुछ जोडा या घटाया जाता है तब यह विषय राजनीति से जुड जाता है। यह दूसरी प्रक्रिया पहली प्रक्रिया से काफी जटिल होती है। ए दोनों ही प्रश्न चुनाव एवं निर्णय अनुवाद के दौरान वैचारिक और आर्थिक कारणों से प्रभावित होते हैं।
अनुवाद एवं राजनीति में विचारधारा की भूमिका
विचारधारा शब्द अपने-आप में बहुत विस्तृत विषय है। किसी भी विचारधारा के अन्तर्गत राजनीतिक विमर्श और अनुवाद के विमर्श समाहित होते हैं। विचारधारा राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तीनों प्रकार की हो सकती है। इन तीनों की अपनी नियामक शक्तियाँ होती हैं। अर्थात् राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विचारधारा की अपनी अलग-अलग शक्तियाँ हैं। राजनीति में जब कोई व्यक्ति/शक्तिधारक सहायक नहीं होता अथवा उपयोगी नहीं होता तब वह समाज उसे पूरी तरह से खारिज कर देता है। इसी तरह जब कोई सामाजिक-सांस्कृतिक नियम, समाज और उसकी संस्कृति के अनुकूल नहीं होते, तब समाज और संस्कृति उसे नकार देती है। कईं अनुवाद किसी समाज विशेष या देश में इसीलिए प्रतिबंधित कर दिए गए क्योंकि उस वर्तमान समय में लक्ष्यभाषा समाज या सत्ता के लिए अग्राह्य थी। जबकि वही अनुवाद किसी दूसरे समाज के लिए मान्य भी हो सकता था। भारतीय औपनिवेशिक काल में अनुवाद ने भारत में उपनिवेश स्थापित करने में एक शस्त्र की तरह काम किया। भारतीय भाषाओं के साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद बहुत तेजी से अंग्रेजी सरकार द्वारा कराया गया। इस अनुवाद के पीछे हम अंग्रेजों की राजनीतिक मंशा को आसानी से समझ सकते हैं। आज यह बात स्पष्ट है कि उस दौर में इन अनुवादों के पीछे क्या राजनीतिक कारण क्रियाशील थे। विलिएम जोंस ने शकुंतला नाटक का संस्कृत से अंग्रेजी अनुवाद सिर्फ अनुवाद के लिए नहीं किया था बल्कि उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अभिज्ञानशाकुंतलम् जैसी कृति को पहुँचाने की कोशिश की तथा भारतीयों के मन में यह विश्वास जगाने हेतु कि अंग्रेज़ भी भारतीय साहित्य का सम्मान करते हैं। विलिएम जोंस द्वारा किया गया अनुवाद किस तरह का अनुवाद होगा इसका निर्धारण उस कृति की व्याख्या करने पर ही ज्ञात हो सकता है। लेकिन, इस बात पर बिल्कुल भरोसा नहीं किया जा सकता कि विलिएम जोंस द्वारा किया गया अनुवाद बिना किसी हेर-फेर किए, मूल नाटक के सभी पात्रों को उसी रूप में प्रस्तुत करता होगा। किसी भी प्रस्तुतीकरण में व्यक्ति का वैचारिक पूर्वाग्रह जरूर शामिल होता है। औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ विद्वानों द्वारा किए गए भारतीय साहित्य के अनुवादों के बारे में बताते हुए फिगुएरा लिखते हैं कि- एक चीज आसानी से कही जा सकती है कि संस्कृत के आरंभिक अनुवादों में पश्चिम का प्रभाव स्पष्ट है। यहाँ यह कहने का सिर्फ इतना मतलब है कि मूल स्रोत की सामग्री को दूसरी भाषा में हेर-फेर के साथ प्रस्तुत करना उस समय के निकायों का कार्य था। यह वाक्य अपने आप में ही उस दौर की औपनिवेशिक सरकार की मानसिकता को भली-भाँति स्पष्ट कर रहा है। रिचर्ड बार्टन द्वारा अरेबियन नाइट्स का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। यह कृति अरबी साहित्य का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है लेकिन अनूदित होने से पहले यह ग्रन्थ इतना प्रसिद्ध नहीं था जितना कि अनूदित होने के बाद हुआ। यूनेस्को ने काफी विश्लेषण के बाद अनुवाद का एक इण्डेक्स बनवाया जिसमें यह बताया है कि पश्चिमी यूरोप के ग्रन्थों का प्रचलन साम्यवादी देशों में साम्यवाद के खत्म होने के बाद बढा जबकि उस समय के जो देश थे उनमें गिरावट दर्ज की गई। दर्शन और धर्म से सम्बन्धित ग्रन्थों को साम्यवादियों ने पूरी तरह से दबा दिया। साम्यवादी विचारधारा ने उस समय की अन्य प्रचलित विचारधाराओं को खारिज कर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करना चाहा था। साम्यवादी शासन के बारे में उस देश के लोगों के बीच मतभेद था। यदि यह मतभेद नहीं होता, तो साम्यवाद से प्रभावित अनुवाद शीर्षकों की माँग उन्हीं साम्यवादी देशों में साम्यवाद के पतन के बाद क्यों कम हो गई? यह प्रश्न गौर करने लायक है। कभी-कभी अनुवाद को ग्रन्थ की वैचारिकता के कारण नहीं बल्कि उसके अनुवादक की वजह से भी नकार दिया जाता है। इटली में इसी तरह की एक घटना थामस मोन एवं आन्द्रे की है। जिनका अनुवाद कार्य इटली में सिर्फ इस वजह से प्रचलित नहीं हो सका क्यूंकि वह फेविष नामक संप्रदाय के प्रति आस्था रखते थे। इनके अनुवादों को इनके संस्थागत रुझान के आधार पर खारिज कर दिया गया। यूरोपीय समाज में इस तरह के कई उदाहरण मिल सकते हैं।
धार्मिक ग्रन्थों के अनुवाद में राजनीति की भूमिका
धार्मिक ग्रन्थों के अनुवाद की राजनीति का सन्दर्भ यदि भारतीय प्रसंग में देखना हो, तो इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण मुगल काल से लिया जा सकता है। मुगल शासक अकबर ने अपनी छवि को धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए अनुवाद कार्य का सहारा लिया। उसने संस्कृत, तुर्की और अरबी आदि भाषाओं के साहित्य का पर्शियन में अनुवाद कराने के लिए मकतबखाना खोला। इस मकतबखाना को आज के समय के हिसाब से अनुवाद संस्था भी कह सकते हैं। उस समय धार्मिक कट्टरता विद्यमान थी। इसीलिए मुल्ला बदायूनी ने रामायण का अनुवाद करने से मना किया था। बाद में इसका अनुवाद किया भी तो राज्य के भय के कारण। इस अनुवाद में उन्होंने राम का रहीम, ईश्वर का अल्लाह तथा युगपुरुष अथवा अवतारी पुरुष को रसूल के रूप में परिवर्तित कर दिया है। अकबर की कोशिशों के बाद संस्कृत से पर्शियन में रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थों का अनुवाद हुआ। बाइबिल विश्व में सबसे अधिक अनूदित किया जाने वाला धार्मिक ग्रन्थ है। अद्यतन जानकारी के अनुसार यूनाइटेड बाइबिल सोसाइटी ने बाइबिल के विश्व में 475 भाषाओं में अनूदित होने की जानकारी दी है। ईसाई धर्म का प्रचार इसके अनुवाद होने के बाद निःसन्देह रूप से और बढ गया था। भारतीय परिदृश्य में यदि इसके प्रसार की बात करें तो हम पाते हैं कि जब अंग्रेजों का आगमन हुआ उस समय भारत कई सम्प्रदायों तथा जातियों के बीच विभक्त था। जाति प्रथा इतनी कठोर थी कि लोग उससे ऊब चुके थे। भारतीयों में ईसाई धर्म को प्रचारित करने में इस विभाजन ने और ज्यादा योगदान दिया। जाति प्रथा के शोषण तले दबे सबसे निम्न जाति के समुदाय हिन्दू धर्म के प्रति अपनी आस्था को नहीं बनाए रख सके और जाति शोषण से मुक्ति पाने हेतु इन लोगों ने ईसाई धर्म को स्वीकार करना शुरू कर दिया था। हिन्दू धर्म की जाति प्रथा के कारण गरीब व शोषित लोगों में ईसाई धर्म का प्रचार करना, अपने धर्म को उच्च बताना एवं उदार बताने में ए ईसाई धर्मप्रचारक सफल रहे। जाति प्रथा की जो विकृतियाँ हिन्दू समाज में थीं, उससे लोग बाहर निकलना चाहते थे और उनके पास विकल्प रूप में ईसाई धर्म का सहारा मौजूद था। इसी स्थिति का फायदा उठाकर ईसाई मिशनरियों ने बाइबिल का अनुवाद भारतीय भाषाओं में करना शुरू कर दिया। इन सभी अनुवादों के पीछे की राजनीति स्पष्ट रूप से हमारे समक्ष उपस्थित है। इसका अनुवाद इतनी अधिक संख्या में करवाया गया कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद तत्कालीन समय में उपलब्ध हो चुका था। इन अनुवादों के माध्यम से धर्म-प्रचारार्थ जगह-जगह पर ईसाई धर्म की संस्थाएँ भी खोली गई थीं। बाइबिल के अनुवाद ने भारत में ही नहीं बल्कि अंग्रेजों के अन्य औपनिवेशिक देशों में भी ईसाई धर्म को फैलाने में महत्त्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया। इससे यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि ऐसा सिर्फ ईसाई धर्म ने ही किया है। क्योंकि जब एक जगह कई धर्म होंगे, तो उनके बीच यह प्रतिस्पर्धा सदैव रहती है। किस धर्म के अनुयायियों की संख्या कितनी है इस बात की गिनती हमेशा होती रहती है। ज्यों ही यह प्रतिस्पर्धा समाप्त होती है वैसे ही इसकी राजनीति भी समाप्त हो जाती है। जब किसी राज्य में कोई एक ही धर्म होता है वह सदैव दूसरे धर्म को अपने राज्य में प्रसारित होने से रोकता है। कुछ ऐसा ही उन देशों के साथ भी होता था जो किसी अन्य देश के उपनिवेश होते थे। गुलाम देशों पर शासन करने वाले अन्य देश उनकी संस्कृति तथा उनकी सभ्यता को सदैव दबाने की कोशिश करते हैं और अपनी संस्कृति को प्रसारित करने की कोशिश में लगे रहते हैं। भारत के साथ भी ऐसा ही हुआ था। भारत एक ऐसा देश है जहाँ दूसरे धर्मों के लोग ने बार-बार आक्रमण कर इसे बदलने की कोशिश करते रहे।
बाइबिल के अनुवाद के अतिरिक्त अन्य दूसरे धार्मिक ग्रन्थों के अनुवाद को लेकर भी कई तरह के राजनीतिक कार्य किए गए हैं। अनुवाद के क्षेत्र में एक राजनीतिक विवाद कुछ वर्ष पूर्व रूस में भगवद्गीता को लेकर हुआ था। वहाँ पर मामला न्यायालय में इसलिए गया क्योंकि वहाँ के एक व्यक्ति द्वारा भगवद्गीता पर आरोप लगाते हुए इसे बंद करने की माँग की गई थी। उस व्यक्ति का यह कहना था कि यह ग्रन्थ समाज में नस्लीय भेदभाव तथा सामाजिक भेदभाव को जन्म देने वाला है। हालाँकि वहाँ की सरकार ने इस शिकायत पर ऐसा कुछ किया नहीं। लेकिन यह बात सत्य है कि इस तरह की शिकायत किसी एक व्यक्ति की नहीं हो सकती। इसके पीछे अन्य दूसरे धर्म के मानने वाले और उनकी कोई संस्था अवश्य रही होगी। हालाँकि भगवद्गीता हिन्दू धर्म का ऐसा ग्रन्थ है जिसका विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हो चुका है। इसके अतिरिक्त यह भी तथ्य प्रमाणित है कि इस ग्रन्थ का अनुवाद भारत की हिन्दूवादी संस्थाओं या संप्रदायों द्वारा जबरदस्ती नहीं कराया जाता बल्कि इस ग्रन्थ में उद्धृत सन्देश अथवा विचार के कारण विषय की अलग-अलग भाषाओं के लोगों ने अपनी भाषा हेतु कराया है।
राज्य द्वारा निर्धारित अनुवाद की राजनीति
अनुवाद की राजनीति में मीडिया और संचार माध्यम भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यही कारण है कि समाचारों, बहसों, कई तरह की फिल्मों आदि पर समय-समय पर प्रतिबन्ध लगाए जाते रहे हैं। यह प्रतिबंध लगाना इसलिए होता है क्योंकि सत्तासीन व्यक्ति को यह भय बना रहता है कि कहीं इन खबरों या बहसों के माध्यम से राज्य का तख्ता पलट न हो जाए। हम सभी जानते हैं कि सत्ता परिवर्तित करने में संचार माध्यम की बडी भूमिका होती है। इसीलिए काबिज़ सत्ता द्वारा सदैव ऐसी चीजों का विरोध होता रहता है जो उस सत्ता को खत्म करना चाहती हो। विलिएम टिंडले ने न्यू टेस्टामेंट का अनुवाद अंग्रेजी में करके उसे जर्मनी में प्रकाशित कराया था। वहीं से यह पुस्तक इंग्लैंड में पहुँची जहाँ पर चर्च के पादरियों ने इस अनूदित ग्रन्थ को जला दिया। क्योंकि उनका विश्वास था कि यह ग्रन्थ सिर्फ लैटिन भाषा में ही होना चाहिए क्योंकि उस दौर में लैटिन भाषा आम जनता की समझ में नहीं आती थी। चर्च के इन पादरियों को अपनी सत्ता के छिन जाने का भय हो गया था। इसलिए वे इसके अनुवाद को जनता तक नहीं पहुँचने देना चाहते थे। इसी प्रकार सन् 1624 ई. में मार्टिन लूथर किंग ने बाइबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद किया था। जिसे तत्कालीन पोप के आदेश से जला दिया गया। ईश्वर तथा सत्ता के नाम पर बिना किसी कारण के ही इन अनूदित ग्रन्थों को सिर्फ इसलिए जलाया गया क्योंकि उस दौर के शक्तिशाली लोगों को यह डर हो गया था कि यदि आम जनमानस इन धर्म-ग्रन्थों को आसानी से पढ लेगा और इनकी सही व्याख्या समझ लेगा, तो उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इस तरह से अनुवाद और सत्ता की राजनीति ए दोनों ही आपस में गुंथे हुए हैं। किसी अनुवाद पर प्रतिबन्ध लगाना और किसी अनुवाद को स्वीकार्यता प्रदान करना यह राजनीति का हिस्सा है।
भारतीय सन्दर्भ में यदि देखा जाए, तो हिन्दी साहित्य में भाषा के स्तर पर बदलाव हुआ। भारत के तत्कालीन दौर को देखा जाए, तो यहाँ पर वैदिक काल से संस्कृत का वर्चस्व बना हुआ था। यह वर्चस्व पालि, प्राकृत एवं अपभ्रंश के रूप में टूटा लेकिन उस दौर में मुगल शासन था और शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत कम था। मुगल शासन के कारण अरबी-फारसी का प्रभुत्व बढ रहा था और ए भाषाएँ यहाँ की आम जन की भाषा नहीं थीं। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल में कई भक्त कवियों जैसे तुलसी, सूर, नानक, कबीर, ज्ञानेश्वर, नरसी मेहता आदि ने लोक भाषा में लिखना शुरू किया। क्योंकि इन सन्त कवियों का मानना था कि यदि इन लोगों को संस्कृत के ग्रन्थों में समाहित ज्ञान से परिचित कराना है, तो इनकी ही भाषा में संवाद करना आवश्यक है। भाषा का यह चुनाव उस समय का सामाजिक कारण था। उस समय भारतीय भाषाओं से इतर साहित्य का अनुवाद नहीं हो रहा था क्योंकि उस समय भारत कईं शासकों के अधीन था जिसके कारण लोग सक्रिय नहीं थे। इस दौर में एक मात्र दाराशिकोह द्वारा उपनिषदों का पर्शियन भाषा में अनुवाद किया गया एवं कराया गया था। भक्तिकाल के अवसान एवं रीति काल के प्रारंभ होने के समय में भारतीय पुराणों तथा धर्म से सम्बन्धित ग्रन्थों का ही अनुवाद हो रहा था। क्योंकि इस समय की शोषित तथा दमित जनता के मन में अपने देश तथा संस्कृति के प्रति निराशा की भावना व्याप्त हो चुकी थी। इस निराशा को दूर करने के उद्देश्य से इन लोगों को अपने धर्म, संस्कृति, परम्परा आदि की महानता से परिचित करना अनिवार्य था। इनके मन से निराशा को दूर करने के लिए इन धार्मिक तथा पौराणिक ग्रन्थों के अतिरिक्त कोई अन्य साधन नहीं था। यही कारण है कि इस समय के अनुवादों में चाहे वह दामोदरदास द्वारा अनूदित मार्कण्डेय पुराण हो या सबल सिंह चौहान एवं गोकुलनाथ गोपीनाथ द्वारा किया गया महाभारत का अनुवाद।
औपनिवेशिक दौर में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना भी एक महत्त्वपूर्ण योजना थी। इस संस्था ने संस्कृत-हिन्दी आदि से अंग्रेजी में ग्रन्थों का अनुवाद कराना शुरू किया। अंग्रेजों का यह मानना था कि यदि वे इस देश पर और यहाँ की जनता पर अधिक समय तक शासन करना चाहते हैं, तो उन्हें यहाँ के इतिहास, समाज, धर्म आदि की जानकारी होनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने अनुवाद कार्य पर बल दिया। अभिज्ञान-शाकुंतलम, गीता, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों का अनुवाद किया गया। हालाँकि अंग्रेजों द्वारा अनुवाद की कोशिश अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए थी लेकिन परोक्ष रूप से शिक्षा के प्रचार-प्रसार का भी माध्यम बन गई। इन अनुवादों में यदि देखा जाए, तो भारतीय साहित्य के ग्रन्थों के पश्चिमी भाषाओं में बहुत कम अनुवाद हुए। अपवाद होगा कि अंग्रेजी को छोडकर किसी अन्य विदेशी भाषा में अनुवाद कराया गया हो, लेकिन हिन्दी एवं अन्य दूसरी भारतीय भाषाओं जैसे बांग्ला एवं मराठी आदि में देश की विभिन्न भाषाओं के ग्रन्थों का अनुवाद कराया गया। अंग्रेजी साहित्य को भारतीय साहित्य में अनूदित करना एवं इसके माध्यम से अपनी श्रेष्ठता को प्रचारित करना इनका केन्द्रीय उद्देश्य था। उमर खैय्याम की रुबाइयों के अंग्रेजी अनुवाद तथा भारतीय भाषा में उपलब्ध शास्त्रीय ग्रन्थों का अनुवाद शिक्षित वर्ग को पश्चिमी ताकतों का एहसास कराने के लिए किया गया था। अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद की परम्परा ने उस समय के मौलिक साहित्य लेखन की क्षमता को कुछ सालों तक प्रभावित किया। फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अनुवाद ने भारतीय परिदृश्य को काफी नयी चीजों को समझने का मौका दिया।
अनुवाद एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम राजनीति, साहित्य, सिनेमा, विज्ञापन, शिक्षा, शोध आदि सभी विषयों को जोडते हुए देख सकते हैं। साहित्य के क्षेत्र में यदि देखा जाए, तो पाश्चात्य साहित्य का भारतीय भाषाओं में पठन होना एवं भारतीय भाषाओं के साहित्य का पाश्चात्य देशों में अपनी पहचान बनाना अनुवाद के माध्यम से सम्भव हुआ। अनुवाद ऐसा औज़ार है जिसके द्वारा दो भाषाओं के लोगों, साहित्य एवं संस्कृतियों आदि के बीच सम्पर्क बनाया जाता है। इस स्थिति में महत्त्वपूर्ण है कि अनुवाद हेतु किस तरह के पाठ का चुनाव किया जाता है और इन अनुवादों को किस रूप में प्रकट किया जाता है। किसी भाषा पाठ के अनुवाद में वहाँ की धार्मिक आस्था से लेकर राजनीतिक संस्था की भूमिका भी काम करती है। इन सभी प्रश्नों की दृष्टि से यदि गौर किया जाए तो आज के समय में अनुवाद में राजनीति का चिन्तन महत्त्वपूर्ण है। अनुवाद के इतिहास के साथ ही राजनीति का इतिहास भी जुडा हुआ है, इसका प्रमाण बाइबल अनुवाद के सन्दर्भ में देखा जा सकता है।
सन्दर्भ ग्रन्थः
* शुक्ल, रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली।
• Niranjana, Tejaswini, History, Post Structuralism and the Colonial Conte&t, CaliforniaÑ University of California Press.
• Schaffner, Christina and Bassnett Susan, eds. Political Discourse, Media and Translation, Cambridge Scholar Publishing.


सम्पर्क - अतिथि अध्यापक (अनुवाद अध्ययन)
महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र
क्षेत्रीय केन्द्र, इलाहाबाद (प्रयागराज)
मो. ९०१५८१४९९५
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