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हिन्दी सिनेमा में तवाइफों का चित्रण

प्रणु शुक्ला
भारत में तवाइफों का अपना विलक्षण इतिहास रहा है, यहाँ तवाइफ संस्कृति से जुडी हुई रही हैं। हालाँकि मनोरंजन कर्म के लिए नारी ने इस तरह का पेशा अख्तियार किया था जिसे कभी भी समाज में इज्जत की दृष्टि से नहीं देखा गया, फिर भी संगीत और कला को समृद्ध करने के लिए इन तवाइफों की अहम भूमिका है। इन की ठुमरी,दादरा और संगीत की विशेष कला,तमीज,तहजीब,के लिए इन्हें जाना जाता रहा है।
युवा नवाबों को तमीज़ और तहज़ीब सीखने के लिए इन तवाइफों के पास भेजा गया था, जिसमें अच्छे संगीत और साहित्य में अन्तर करने और उसकी सराहना करने की क्षमता शामिल थी, शायद इसका अभ्यास भी, विशेष रूप से गज़ल की कला। 18वीं शताब्दी तक, तवाइफें उत्तर भारत में विनम्र, परिष्कृत संस्कृति का केन्द्रीय तत्त्व बन गयी थी।1 कुछ लोकप्रिय तवाइफों में बेगम समरू (जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सरधना की रियासत पर शासन करने के लिए उठीं), मोरन सरकार (जो महाराजा रणजीत सिंह की पत्नी बनीं), वज़ीरन (लखनऊ के अन्तिम नवाब वाजिद अली शाह द्वारा संरक्षित), बेगम हज़रत महल (वाजिद अली की पहली पत्नी जिन्होंने भारतीय विद्रोह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ), गौहर जान (एक उल्लेखनीय शास्त्रीय गायक जिन्होंने भारत के पहले रिकॉर्ड के लिए गाया), और जोहराबाई इत्यादि मानी जाती हैं। इन तवाइफों ने पहले भारतीय संगीत को समृद्ध किया और उसके बाद धीरे-धीरे समय, काल, परिस्थिति अनुसार इनके संगीत की गूंज सिनेमा में सुनाई देने लगी। इसलिए हिन्दी सिनेमा में तवाइफ और उनके जीवन का प्रवेश होना सामान्य-सी बात मानी जाने लगी। चूँकि हिन्दी सिनेमा अपने सामाजिक सरोकारों के लिए जाना जाता है इसलिए उसने स्त्री के हर रूप का चित्रण किया है चाहे वह तवाइफ ही क्यों न हो, हालाँकि यह भी माना जाता है कि तवाइफों के स्तर को नीचे गिराने में तथा वेश्या और तवायफ को एक ही मान लेने की स्वीकारोक्ति हिन्दी सिनेमा में की गई, लेकिन फिर भी हिन्दी सिनेमा का तवाइफ जैसे वर्ग का हिमायती होना उसके सामाजिक सरोकारों को रेखांकित करता है।
वेश्या और तवाइफ में अन्तर
वेश्या शब्द संस्कृत से निष्पन्न है जिसकी व्युत्पत्ति- वेश+यत्+टाप् से हुई है संस्कृत में वेश्या को परिभाषित करते हुए कहा गया है- वेशेन पण्ययोगेन जीवति सा वेश्या जिसका अर्थ है-बाजारू स्त्री।2 हिन्दी शब्दकोश में इसका अर्थ है- नाचगान तथा करतब से जीविका चलाने वाली स्त्री।3 वैदिक भाषा में वेश्या के लिए विश शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है सामान्य जनता अर्थात् जो सामान्य जनता के द्वारा भोगी जाए वह वेश्या है। वैसे वेश्या शब्द को अंग्रेजी में प्रोस्टीट्यूट कहा जाता है, जो लेटिन शब्द प्रोस्टीबुला अथवा प्रोसिडा से बना है जिसका अर्थ गणिका भी है।
जबकि वेश्या की तुलना में तवाइफ शब्द भावनात्मक अर्थों से भरपूर शब्द है। तवाइफ अरबी शब्द ताइफ का बहुवचन रूप है।4 जो कि अवध के शाही दरबार में 18वीं और 19वीं शताब्दी में एक अच्छी नाचने-गाने वाली स्त्री के लिए इस्तेमाल होता था। 19वीं शताब्दी से पहले यह कला और संस्कृति का मुख्य केन्द्र हुआ करती थीं। शाही दरबारों में ए अपनी कला को प्रदर्शित करती थीं। इनका मुख्य काम संगीत और नृत्य से जुडा हुआ था। कथक, दादरा और ठुमरी की विरासत तवाइफों से ही मिली है। हालाँकि, 1920 के समय में जैसे औपनिवेशिक विचार और रीति-रिवाज मजबूत होने शुरू हुए, तवाइफों ने अपना काम खोना शुरू कर दिया। वे लम्बे समय तक शाही घरानों में गाना गाकर और नाचकर अपनी जीविका कमाने में अक्षम होती जा रही थीं। इस कारण उन्होंने दूसरे पेशों में काम करना शुरू कर दिया था।5
लखनऊ की संस्कृति में जो मुजरेवाली या गाकर लोगों का मनोरंजन करती थी शाम को शमा रोशन करती थी वे तवाइफें कहलाती थी, जिस्म बेचना या जिस्म की नुमाइश करना जरूरी नहीं होता था। ठुमरी, दादरा इत्यादि संगीत की बडी-बडी महफिलें लगा करती थी।
24 मई 2009 को इंडियन एक्सप्रेस में अमृता दत्ता का लेख छपा। लेख का नाम था फॉर दी रिकॉर्ड। इस लेख में उन्होंने कोठे से निकली उन गायिकाओं के बारे में विस्तार से लिखा है जो अब हमारी याददाश्त से बाहर हो चुकी हैं। लखनऊ में ही चूनेवाली हैदर, हस्सो, नन्ही बेगम, मुगल जान, बडी जद्दनबाई जैसी कलाकार इन कोठों से निकली थीं। वो दौर ग्रामोफोन का दौर था, कलकत्ते की गौहर जान, लखनऊ की शमीम जान, जवाहर बाई, मोहम्मदी जान, वजीर जान, कानपुर की खुर्शीद जान ग्रामोफोन के बेसुरे से दिखने वाले भोंपू से अलग ही शमां बांधती थीं।इतिहास गवाह है फिल्म के लिए शोध करते समय यूरोपीय लेखकों के खातों में सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में तवाइफों के कलंक के बीज पाए।6
इतिहासकार सलीम किदवई के एक दुर्लभ और इतिहाससम्मत तर्क पर ध्यान देना लाजिमी है- तवाइफों, बाइयों व राजदरबारों एवं नवाबों के यहाँ आसरा पाने वाली गायिकाओं के बारे में कुछ भी ढूँढने से पहले हमें इस बात का खासा ध्यान रखना चाहिए कि इनमें से अधिकांश औरतों को अपने इतिहास को दोबारा से गढना पडा है। इन औरतों को अपनी जाती ज़न्दगी में इतने झूठ बोलने पडे हैं कि आसानी से इनकी बातों से यह निकालना बेहद मुश्किल है कि इनकी ज़न्दगी में जो कुछ हुआ और घटा है, वह कितना सही और कितना गलत है।7
किदवई इन अर्थों में इस पूरी परम्परा पर ऐसी पैनी नज़र डालते हैं कि आपको अपने व्यक्तिगत पसन्द की किसी भी बाई या गायिका को जानने- समझने के लिए कम से कम एक मज़बूत सिरा पकड में आ जाता है। हाँ, यहाँ यह बताना उतना ही प्रासंगिक है कि जब वे इस तरह का सार्वजनिक बयान इन गानेवालिएों के बारे में जारी करते हैं, तो उनका इशारा हमें उस परम्परा के प्रति भी मिलता हुआ नज़र आता है, जो बाद में जाकर सिनेमा में पूरी तरह दृश्यगत हो सका।
हिन्दी सिनेमा में तवाइफ चित्रण
शुरुआत में सामाजिक तौर पर फिल्म जगत को पेशे के रूप में एक अच्छा काम नहीं माना जाता था। विशेष तौर पर महिलाओं के लिए तो बिल्कुल भी सही नहीं देखा जाता था। शुरुआत में फिल्मों में महिलाओं का काम करना मना था। पुरुष ही महिला बनकर उनके किरदार निभाते थे। उस दौर में जब महिलाओं ने सिनेमा में काम करना शुरू किया तो सबसे पहले तवाइफों ने फिल्मों में काम करना शुरू किया था।
हिन्दी फिल्मों में तवाइफ का चित्रण भी स्त्री को मातहत, कमजोर और पतिता के रूप में चित्रित किया है, इसमें मुस्लिम संस्कृति है, नवाबी तहजीब है, कोठे में रहने वाली तवाइफें हैं,, उनकी मजबूरियाँ है,, बडे-बडे कोठे के अन्तर स्थल, तहजीबों, स्त्री के श्ाृगार, अदाएँ, शोखी से रचे-बसे हैं। वहाँ मुशायरे, ठुमरी, गज़ल गायकी पूरी तरह से महफूज़ है। कोठे की तवाइफ साधारण वेश्या नहीं है। उसके कद्रदान शहर के तमाम रईस और उमरा है।8
जद्दनबाई फिल्म इण्डस्ट्री में काम करने वाली शुरुआती महिलाओं में से एक नाम हैं। जद्दनबाई पहली महिला थी जिन्होंने इंडस्ट्री स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने संगीत मूवीटोन के नाम से अपना प्रोडक्शन हाउस स्थापित किया था। वह फिल्मों के लिए संगीतकार, निर्माता और निर्देशक का काम किया करती थीं।9
जानी-मानी अभिनेत्री नर्गिस इनकी ही बेटी थीं। उन्होंने अपनी बेटी को भी नृत्य की शिक्षा दी थी। जद्दनबाई जैसी कई महिलाओं ने फिल्म इंडस्ट्री में अपने पुरुष सहयोगियों के साथ मिलकर निर्देशन, निर्माता, लेखन, गायक और गीतकार के तौर पर काम किया। फिल्मों की कई विधाओं में तवाइफों ने सीधे-सीधे काम करना शुरू कर दिया था। इसमें संगीत का क्षेत्र सबसे बडा था। ए महिलाएँ संगीत के नए-नए रूप सामने ला रही थीं। मलका जान और गौहर जान ने 1902 में भारत में सबसे पहले किसी गाने को रिकॉर्ड किया था। जद्दनबाई ने 1937 में मोती का हार नाम का गाना एक फिल्म के लिए बनाया था। इस लिस्ट में सुल्ताना बिब्बो ( हफीज़ा बेगम, दिल्ली की प्रसिद्ध तवायफ की बेटी), जहाँनारा कज्जन (लखनऊ तवायफ सुग्गन बाई की बेटी) जैसे नाम शामिल हैं। जल्द ही तवाइफों की संगीत संस्कृति को फिल्मों में दिखाने का चलन चल पडा। संगीतकारों ने कोठों के संगीत को बनाना शुरू कर दिया। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड गयो रे गाना तवाइफों से लिया गया है। यह गाना 1960 में रिलीज हुई फिल्म मुगल-ए-आज़म का हिस्सा बना। बहुत-से संगीतकार हिन्दी फिल्म के संगीत में सीधे-सीधे प्रसिद्ध तवाइफों के गानों को इस्तेमाल कर रहे थे जो उनकी महफिलों में गाए जाते थे। वर्तमान में भी म्यूजिक इण्डस्ट्री में यह रवायत चल रही है।
साथ ही मशहूर फिल्म पाकीजा का इन्हीं लोगों ने, सरदारी बेगम का आज जाने की जिद न करो, और हमरी अटरिया जैसे हिट गानों को सभी पंसद करते हैं। ए सभी गाने मूल रूप से तवाइफों के हैं। धीरे-धीरे तवाइफ के संगीत के योगदान को भुला दिया गया। जो तवाइफें प्लेबैक सिंगर के तौर पर काम करती थीं, उन्हें रेडियो स्टेशन में बैक एँट्रेस करने के लिए कहा गया।
हिन्दी सिनेमा में किरदार के रूप में तवाइफ
लेखिका रुथ वनिता ने अभी तक बनी 235 फिल्मों में तवाइफों की भूमिका को लेकर डांसिंग विद द नेशन : कोर्टिजंस इन बॉम्बे सिनेमा‘ किताब लिखी थी। उनका मानना है कि हिन्दी फिल्मों में तवाइफों को कभी पतित और अबला के तौर पर पेश नहीं किया गया। उन्हें विदुषी, अपने हुनर में काबिल, अमीर और आधुनिक औरत की तरह दिखाया गया, जो अपनी मर्जी की मालकिन हैं। तवाइफ को एक अच्छी औरत साबित करने वाली फिल्मों में साधना और तवाइफ को भी गिना जा सकता है। लेकिन, सबसे अलग थी शरतचन्द्र चटर्जी की देवदास की तवाइफ चन्द्रमुखी, जो निस्वार्थ भाव से देवदास का सहारा बनती है। मुज़फ्फर अली की फिल्म जानिसार भी एक तवाइफ और अवध के नवाब की प्रेम कहानी थी।10
1928 में आरएस चौधुरी ने अनारकली बनाई जिसमें दिनशा बिल्मोरिया और रूबी मायर ने काम किया था।
1935 में चौधुरी ने इन्हीं दोनों कलाकारों को लेकर दूसरी बार फिर अनारकली बनाई! फिल्मिस्तान ने 1953 में नन्दलाल जसवंत लाल के निर्देशन में प्रदीप कुमार, बीना राय को लेकर फिर अनारकली बना डाली।1941 में होमी वाडिया प्रोडक्शन की इंग्लिश फिल्म कोर्ट डांसर आई थी। इसमें पृथ्वीराज कपूर ने प्रिंस चन्द्रकीर्ति और साधना बोस ने राज नर्तकी की भूमिका निभाई थी।
लेकिन, 1961 में के आसिफ ने मुगले आज़म बनाकर इस कथानक को अमर कर दिया।
अकबर बने पृथ्वीराज कपूर के साथ दिलीप कुमार और मधुबाला ने सलीम और अनारकली के पात्रों को जिस तरह जीवन्त किया, वो कोई और नहीं कर सका।1955 में तमिल और तेलुगु में वेदांतम राघवैया के निर्देशन में भी सलीम-अनारकली की कथा को फिल्माया जा चुका है। शशि कपूर ने शूद्रक के संस्कृत नाटक मृच्छकटिकम पर उत्सव फिल्म बनाई थी। इसमें रेखा ने वसन्त सेना का किरदार निभाया था, जो राज दरबार में नर्तकी होती है।
आचार्य चतुरसेन ने अपने उपन्यास वैशाली की नगर वधू में आम्रपाली नाम की तवाइफ को गढा था। इस पर भी अब तक दो बार आम्रपाली नाम से ही हिन्दी फिल्में बनी हैं। पहली बार 1945 में नन्दलाल जसवन्तलाल के निर्देशन में बनी आम्रपाली में मुख्य किरदार सबिता देवी ने किया था। दूसरी बार आम्रपाली 1966 में बनी, जिसे लेख टण्डन ने निर्देशित किया था। इसमें आम्रपाली का किरदार वैजयंती माला ने निभाया था और सुनील दत्त मगध सम्राट अजातशत्रु थे।
भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा की नायिका चित्रलेखा जो बाल विधवा है और मौर्य सम्राट की राजनर्तकी भी। इस कहानी पर निर्देशक केदार शर्मा ने दो बार फिल्म बनाई। 1941 में बनी पहली चित्रलेखा में मेहताब और नन्दरेकर ने काम किया था। यह फिल्म अभिनेत्री मेहताब के स्नान दृश्य के कारण चर्चित हुई थी। 1964 में दूसरी बार बनी चित्रलेखा में मीना कुमारी, प्रदीप कुमार और अशोक कुमार थे।
अभिनेत्री वहीदा रहमान ने तो उस दौर में गुरुदत्त की फिल्म प्यासा (1957) में तवाइफ की भूमिका की, जब दूसरी अभिनेत्रियाँ इससे कतराती थीं। उन्हें लगता था कि ऐसे किरदार निभाने से उनकी छवि बिगडेगी।
1972 में पाकीजा और 1981 में आई उमराव जान ने तवाइफों की जिंदगी की कई परतें खोली थीं। ए दोनों फिल्में हिन्दी फिल्म इतिहास की अमर कथाएँ मानी जाती हैं। पाकीजा में मीना कुमारी ने साहेब जान और नरगिस के मां-बेटी के दोहरे किरदार निभाए थे। पाकीजा की खासियत थी कि इस फिल्म ने देखने वालों को तवाइफ की खूबसूरती में छुपी तडप, प्रेम और समर्पण से परिचित कराया था। निर्देशक कमाल अमरोही ने ए घृणित जीवन जीने वाली औरतों की मुसीबतों का हल ढूँढने की कोशिश भी की थी। ए फिल्म बनने में 14 साल जरूर लगे, पर मीना कुमारी ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया। 1981 में लेखक मिज़ार् मोहम्मद हादी रुसवा के उर्दू उपन्यास उमराव जान पर मुजफ्फर अली ने रेखा को लेकर उमराव जान बनाई थी। फिल्म के लिए रेखा को सर्वश्रेष्ठ अभिनय का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। गीत-संगीत और अभिनय में भले ही दोनों फिल्मों ने इतिहास बनाया हो लेकिन, दोनों फिल्मों में एक बडा अन्तर था। कमाल अमरोही की पाकीजा और मुजफ्फर अली की उमराव जान में तवाइफ के मन में दबा प्रेम, समर्पण और आम औरत की तरह घर बसाने की अतृप्त इच्छा का ही फिल्मांकन था। लेकिन, पाकीजा में समाज के इस वर्ग की समस्याओं का पूर्ण विराम लग गया। उधर, उमराव जान में पुरुषों में वफा और सच्चा प्यार तलाशती तवाइफ की जिन्दगी को एक सवालिया निशान लगाकर छोड दिया गया था। अमीरन घर से कोठे पर जाती है, लेकिन कोठे से घर नहीं आ सकती। उसके अपने पराए हो जाते हैं, फिर पराए अपने कैसे हो सकते हैं अमीरन कहती है आप बेवफा करके नवाब रहेंगे, हम वफा करके भी तवाइफ ही रहेंगे, समाज स्त्री की कोई गलती माफ नहीं करता उसकी बेबसी, मजबूरी को नहीं समझता। उससे केवल ईमानदारी, नैतिक, दैहिक पवित्रता पुरुष के प्रति एक निष्ठा समर्पण की उम्मीद की जाती है। सभ्य, इज्जतदार अमीर और रईस तवाइफ के कोठे पर जाना अपनी शान समझते हैं, लेकिन तवाइफ को मनुष्य नहीं मानते।11
रेखा ने उमराव जान के अलावा 1978 में अमिताभ बच्चन के साथ मुकद्दर का सिकन्दर में भी जोहराबाई की भूमिका निभाई, जो कोठे पर नाचती है। इस फिल्म का एक गाना सलाम ए इश्क मेरी जान लम्बे अरसे तक लोगों की जुबान पर चढा रहा। इसके अलावा प्यार की जीत, उत्सव, दीदार-ए-यार और जाल जैसी फिल्मों में भी उन्होंने तवाइफ का किरदार निभाया था। इस्माइल श्राफ की फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता में एक बच्ची को तवाइफ बनाने की मार्मिक प्रस्तुति से दर्शक अन्दर तक हिल जाता है। तवाइफों की जिंदगी को कुरेदना संजय लीला भंसाली का प्रिय विषय है। वर्षों बाद एक बार फिर फिल्म जगत में विस्थापित होती अभिनेत्री माधुरी दीक्षित में एक नई पहचान व आत्मविश्वास भरने का श्रेय देवदास में तवाइफ बनी चन्द्रमुखी के किरदार को ही जाता है, लेकिन इस बार रुपहले पर्दे की इस तवाइफ की सफलता वास्तव में असाधारण है क्योंकि फिल्म देवदास में अपने दर्द व तन्हाई के अहसास में दर्शकों को डुबोने वाली चन्द्रमुखी अकेली नहीं है बल्कि उसके साथ प्यार में हारा एक शराबी प्रेमी देवदास यानी शाहरुख खान और खानदान व रुतबे की बलि वेदी पर अपने प्यार को कुर्बान करने वाली पारो यानी ऐश्वर्य राय भी है। इन सबके बावजूद फिल्म देवदास में लोकप्रियता की बाजी माधुरी ने ही मारी है। बेशक फिल्म की सफलता में आकर्षक व भव्य सैट, संगीत और बेशकीमती पोशाकों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन देवदास, पारो और चन्द्रमुखी के प्यार की ज्योति में चन्द्रमुखी की लौ ही हिन्दी सिनेमा जगत में अमर रहेगी। तवाइफ की भूमिका वाली यादगार फिल्मों में 2002 में आई संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदास है, जिसमें माधुरी दीक्षित ने चन्द्रमुखी का किरदार निभाया था। देवदास के बाद उन्होंने 2015 में बाजीराव मस्तानी बनाई, जिसमें दीपिका पादुकोण ने मस्तानी की भूमिका की। भंसाली ने अब 2022 में गंगूबाई काठियावाडी बनाई, जिसमें आलिया भट्ट ने तवाइफ का किरदार निभाया। यह फिल्म एक तवाइफ के माफिया क्वीन बनने की कहानी है। भंसाली की यह फिल्म मशहूर लेखक एस.हुसैन जैदी की किताब माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई पर आधारित है। मुख्य किरदार के रूप में तवाइफ वाली फिल्मों में देवदास (1955), प्यासा (1957), साधना (1958), जिंदगी या तूफान (1958), शराफत (1970), पाकीजा (1972), गोमती के किनारे (1972), अमर प्रेम शामिल हैं। (1972), उमराव जान (1981) , तवाइफ (1985), अंगारे (1986) , इंतेकाम(1988), पति पत्नी और तवाइफ (1990), दिल आशना है (1992), देवदास (2002), *13* , मंगल पाण्डेः द राइजिंग (2005), उमराव जान (2006), *14* बोल (2011) , बाजार ए हुस्न (2014), माह ए मीर (2016), कलंक (2019), और डॉक्यूमेंट्री फिल्म, द अदर सॉन्ग (2009)।
इसके अतिरिक्त तवाइफों के ऊपर बनने वाली फिल्मों में साल 1959 में रिलीज हुई फिल्म बैंक मैनेजर, बेनजीर(1964), संघर्ष (1968), तवायफ और सलमा (1985) में तवाइफों के किरदार देखने को मिले। नमकीन,मंडी,मौसम,खिलौना(1970), तेरी पायल मेरे गीत(1993) और गाइड(1965) तवाइफ, लागा चुनरी में दाग,डी डे, चमेली, तलाश, चिंगारी, बेगमजान, ट्रैफिक सिग्नल, चाँदनीबार, खलनायक, सांवरिया, चोरी चोरी चुफ चुफ,रज्जो,जूली,मार्केट, नो एँट्री,लक्ष्मी, इत्यादि हैं।
कनाडा में रहने वाली प्रोफेसर टेरेसा हुबेल और नन्दी भाटिया एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं, जो साहित्य, फिल्म और ऐतिहासिक दस्तावेजों में तवाइफों और देवदासियों के चित्रण पर केंद्रित है। हुबेल कहती हैं, हिन्दी फिल्मों में उन्हें बुनियादी तौर पर त्रासद और दुखी शख्सियतों के तौर पर दिखाने का रुझान है। उन्हें रात्रिसंगी चुनने, खुलेआम नाचने-गाने, मुंहफट बोलने की आजादी दूसरी स्त्रियों से ज्यादा दी जाती है, पर साथ ही उन्हें समाज सुधार के एजेंडे का हिस्सा बना लिया जाता है।12 हालाँकि समय और परिस्थिति के अनुसार हिन्दी सिनेमा ने वेश्या और तवाइफ के अन्तर को धीरे-धीरे खत्म कर दिया, लेकिन फिर भी हिन्दी सिनेमा की बुनियादी नींव रखने के लिए तवाइफों को सदैव याद किया जाता रहेगा। यदि हिन्दी सिनेमा में तवाइफ नहीं होती, तो सिनेमा का संगीत पक्ष तथा खासतौर से स्त्रियों का सिनेमा में आगमन इतनी शीघ्रता से नहीं हो पाता जितना कि होना चाहिए था। हालाँकि धीरे-धीरे हिन्दी सिनेमा में इन तवाइफों की भूमिका नकारात्मक होती चली गई तथा महज देह व्यापार और दैहिक वार्तालाप पर ध्यान दिया जाने लगा, लेकिन फिर भी भारतीय सिनेमा का सांगीतिक पक्ष इन बाईजियों का ऋणी है और रहेगा।
सन्दर्भ
1-डेविड कर्टनी,ए फ्यू फेमस तवाइफ्स ऑफ द टाइम, द तवाइफ, द एँटी-नॉच मूवमेंट, एण्ड द डेवलपमेंट ऑफ नॉर्थ इंडियन क्लासिकल म्यूजिकः पार्ट 6 - द पासिंग ऑफ द टॉर्च, 23 फरवरी 2016
2- वामन शिवराव आप्टे, संस्कृत हिन्दीकोश, मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन, 12वाँ संस्करण, दिल्ली, 2015 पृ0 33।
3-कालिका प्रसाद, वृहत हिन्दी कोश, ज्ञानमंडल लिमिटेड, बनारस, प्रथम संस्करण, संवत् 2009, पृ. 1149
4-मुहम्मद मुस्तफा खाँ मद्दाह, उर्दू हिन्दी शब्दकोश,उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,हिन्दी भवन लखनऊ,पृष्ठ 285,संस्करण तीसरा,1977।
5-डेविड कर्टनी,ए फ्यू फेमस तवाइफ्स ऑफ द टाइम, द तवायफ, द एँटी-नॉच मूवमेंट, एण्ड द डेवलपमेंट ऑफ नॉर्थ इंडियन क्लासिकल म्यूजिकः पार्ट 6 - द पासिंग ऑफ द टॉर्च, 23 फरवरी 2016।
6-अमृता दत्ता का आलेख,फार द रिकॉर्ड,द इंडियन एक्सप्रेस, 24मई 2009,अभिगमन तिथि-11 मई, 2022।
7-शॉफील्ड, कैथरीन बटलर (अप्रैल 2012)। द कोर्टेसन टेलः फीमेल म्यूजिशियन एण्ड डांसर्स इन मुगल हिस्टोरिकल क्रॉनिकल्स, 1556-1748। लिंग और इतिहास । 24 (1): 150-171. डीओआई : 10.1111/जे.1468-0424.2011.01673.।
8-उर्दू ,अवध, तवाइफ, हिन्दी सिनेमा का इस्लामिक उद्भव,लेखक मुकुल केसवान, पृष्ठ 246 (फोरगिंग आईडेंटिटी,संपादक ज़ोया हसन में संगृहीत,रूटलैग प्रिन्टर्स,संस्करण-1994
9- तवाइफों की भूमिका को हिन्दी सिनेमा कैसे भुलाता चला गया, पूजा राठी का आलेख,hindi.feminisminindia.com, 18 अप्रैल 2022, अभिगमन तिथि 19 अप्रैल 2022।
10-रूथ वनिता,डांसिंग विद द नेशन : कोर्टिजंस इन बॉम्बे सिनेमा, पृष्ठ-23,संस्करण,2017(किंडल संस्करण),स्पीकिंग टाइगर पब्लिकेशन प्रा.लि.
11-उर्दू ,अवध, तवाइफ, हिन्दी सिनेमा का इस्लामिक उद्भव,लेखक मुकुल केसवान, पृष्ठ 246 (फोरगिंग आईडेंटिटी,संपादक ज़ोया हसन में संगृहीत,रूटलैग प्रिन्टर्स,संस्करण-1994
12-सिनेमा-बाईजी, तवाइफ या फिर देवी-संध्या द्विवेदी/मंजीत ठाकुर का आलेख
नई दिल्ली,08 मई 2019अपडेटेड 8:26 क्करू ढ्ढस्ञ्ज,अभिगमन तिथि-29मई2022।

सम्पर्क - साहित्य सदन, एफ-2, रॉयल केसल अपार्टमेन्ट,
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