fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

रेत समाधि : लैंगिक सरहदों को तोडती गाथा

इन्दिरा
थर्ड जेण्डर के विशेष सन्दर्भ में

गीतांजलि श्री का उपन्यास रेत समाधि यूँ तो विभाजन की महागाथा है, लेकिन इस महागाथा की रचना में जाने कितने कहानियों-किरदारों के दर्शन होते हैं। यह उपन्यास किस्सागोई शैली में लिखा गया है, जिससे कईं और कहानियाँ जुडती जाती हैं। गीतांजलि श्री ने इस उपन्यास को तरह-तरह के रिश्तों का उपन्यास कहा है। एक बृहत्तर कथा, जिससे लघु कथाएँ जुडती जाती हैं। ऐसे ही एक कथा थर्ड जेण्डर रोज़ी की है। यह कथा लैंगिक वर्जनाओं को तोडते हुए थर्ड जेण्डर समुदाय के प्रति मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इस उपन्यास की भाषा, किरदार, कथा-शैली के साथ क्रांतिकारी प्रयोग किए गए हैं, साथ ही सामाजिक निषेधों से मुक्त होकर लैंगिक सरहदों को भी तोडने का प्रयास है। उपन्यास की प्रमुख पात्र अम्मा के चरित्र का सृजन नदी की भाँति हुआ है, एक स्वच्छन्द और उन्मुक्त काया। इसके अलावा माँ-बेटी, माँ-रोज़ी के रिश्तों ने पितृसत्ता समाज के लैंगिक नियमों को झुठलाया है। रोज़ी का किरदार हिन्दी साहित्य की थर्ड जेण्डर विमर्श धारा में एक क्रांति है।
विभाजन की त्रासदी से बुनी इस कथा की मुख्य किरदार चन्द्रप्रभा देवी (चन्दा) है, जिन्हें पूरे उपन्यास में अम्मा, कहीं-कहीं माँ कहकर संबोधित किया गया है। भारत विभाजन के समय चन्दा (अम्मा) जीवन बचाने के लिए रेत का समुंदर पार कर भारत आ जाती है। अब, 80 साल की विधवा अम्मा की जीवेषणा खतम-सी हो चुकी थी। देह को दीवार से सटा कर खुद की पीठ को ही दीवार बना दिया। जीवन और परिवार के प्रति अनमनापन इतना कि पलंग से उठने को तैयार नहीं। नहीं उठूँगी, नहीं उठूँगी करते-करते अम्मा जब नयी बनकर उठती है तो एक बच्ची के समान, जो सारे अधूरेपन को दूर कर हर राग-रंग से जीवन को भर लेना चाहती है। इस नएपन की साथिन रोज़ी बनती है, कभी सखा तो कभी सेविका के रूप में आती है। अम्मा को नए-नए अनुभवों से परिचय कराने वाली रोज़ी अम्मा की ज़ंदगी का अहम हिस्सा बन जाती है।
रोज़ी और अम्मा की पहली मुलाकात की घटना बहुत मार्मिक है। विभाजन के दौरान दंगों और नफरत की आग में दोनों पक्ष के कमजोर वर्ग को ही निशाना बनाया जा रहा था। पाकिस्तान की तरफ हिन्दू अल्पसंख्यकों की लडकियों को अपनी जान बचाकर भागना पड रहा था। ज़न्दगी बचाने की अफरा-तफरी में अम्मा को मिली बुद्ध भगवान की प्रतिमा और रोज़ी को मिली उसकी बाजी (चन्दा यानी अम्मा)। यहाँ से शुरू हुई यह मैत्री इतनी गहरी होती है कि दोनों जीवन भर एक-दूसरे का हाथ थामे रहती हैं। रोज़ी, जिस पर अम्मा का अथाह यकीन है, वह है कौन? रोज़ी समाज के लिए पहेली भी, रहस्य भी, उलटबाँसी भी। उपन्यास में रोज़ी का संक्षिप्त परिचय इस तरह दिया गया है -
एक थी रोज़ी, हिजडा, जिसने पूंजी बटोरी और अपनों की चैरिटी संस्था बनायी। अंजुमन-ए-इस्लाम के यतीमखाने से वो लंगर खाने गुरुद्वारे भाग जाती और वहाँ से किसी ईसाई मिशनरी के पास पहुँच गयी जिसने थोडा पढा लिखा दिया और बडी होकर वह अपनी रोजीरोटी की मालिक हो पायी। सिलाई, कढाई, तरह-तरह के हेंडीक्राफ्ट बनाना, जैम जेली चटनी अचार बनाना, काम करने वालों के लिए टिफिन भेजना, ऐसे काम करवाती थी। उसने झील पे फ्लैट खरीदा और किराए पे उठाया था।1
लेकिन, अम्मा और रोज़ी के बीच लैंगिक दायरे सरहद नहीं बना पाते हैं। रोज़ी का किरदार स्वातंत्र्य चेतना से लबरेज़ है जो लैंगिक पूर्वाग्रहों को खण्डित कर समानता के नए सोपान गढती है। रोज़ी के साहचर्य में अम्मा का पहनावा भी बदल जाता है। हर तरह की साडी पहनने वाली अम्मा गाउन पहनने लगती है। रोज़ी के इलाज पर अम्मा का इतना पक्का विश्वास कि अस्पताल में भी रोज़ी को बुलाने की ज़द करती है। रोज़ी के पास घरेलू नुस्खों के वो इलाज हैं, जो हकीम-लुकमान के पास भी नहीं होते। अम्मा के उभरते मस्स, तिल पर लहसुन का लेप लगाना, गीले बालों को तौलिए में बाँध कर सुखाने की समझाइश देना, बालों में आँवला, भृंगराज, मेहँदी लगाना सब कुछ रोज़ी के कहे अनुसार होता। एक 80 वर्ष की वृद्धा में यौवन का उत्साह, स्वच्छन्दता और ऊर्जा का स्रोत कोई और नहीं, बल्कि रोज़ी बुआ थी। यहाँ तक कि घर की पुरानी खराब चीजों से तरह-तरह के सामान बना कर ऑड्ज़ एन्ड एन्ड्ज़ नाम से ऑनलाइन बिजनेस भी शुरू किया गया। रोज़ी इन चीजों के बेचने पर मिली आमदनी का पचास प्रतिशत चिल्ड्रेन्स होम में देती और शेष अपने कुनबे की ज़रूरत के लिए दान में दे देती।
लेकिन, समाज के लिए तो रोज़ी हिजडा है, जो लैंगिकता की सपाट परिभाषा में ज़गह नहीं बना पाती है। लिंग के साथ नर तथा योनि के साथ मादा। ए दो ही लैंगिक खाँचे हैं। लेकिन इन दो खाँचों से बाहर भी एक वर्ग है जो लैंगिकता के निश्चित नियमों में फिट नहीं बैठता है। उस वर्ग के लिए सर्वसम्मत एक दैहिक संज्ञा नहीं, परिभाषा नहीं और समाज में ज़गह भी नहीं। स्त्री और पुरुष की दैहिक संज्ञाओं से इतर यह तृतीय लिंगी समुदाय है, जिन्हें बने-बनाए मानदण्डों में परिभाषित नहीं किया जा सकता। इस समुदाय को पैदा होने के साथ ही समाज से पृथक करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। उनके अस्तित्व और जीवन के प्रति विमुखता ही रहती है। रोज़ी बुआ को समाज नदी रूपी उलटबाँसी की तरह देखता है। ऐसी नदी, जो दोनों तरफ बहती प्रतीत होती है। वैसे ही, स्त्री और पुरुष, दोनों का एकमेक रूप तृतीय लिंग है, जिन्हें किन्नर, हिजडा, खोजा, कोठी, पवैया आदि नामकरण दिए गए हैं। स्त्री-पुरुष की दैहिक सीमाओं की वैधता को न मानने वाली रोज़ी की देह देखकर बेटी चकरा जाती है-
ए क्या उलटबाँसी है? शायद कोई सुराग है इस उलट तन को समझने का? अजीब कि रोज़ी को जो कहो, उसका उलट भी लागू। जैसे सपाट परिभाषाओं को धता बतलाने में लगा तन। सीमाओं की कोई वैधता न मानता बदन। इधर भी, उधर भी।2
रोज़ी अर्थात् तृतीय लिंग की देह रहस्य बन ही जाती है, जब ए सामाजिक जीवन से विलुप्त हो जाते हैं। द्विलैंगिक सामाजिक व्यवस्था में तृतीय लिंगी बच्चे के लिए घर-परिवार, समाज में कोई स्थान नहीं है। यदा-कदा समाज में इनकी उपस्थिति सभी के लिए कुतूहल बन जाती है। बेपहचान जीवन बीता देने वाले इस समुदाय के प्रति अमानवीय और उपेक्षित बर्ताव ही किया जाता है। लैंगिकता की कठोर सरहदों में रोज़ी का बदन रहस्य बन जाता है -
नुकीले सीनों वाला, जो रोज़ी के हाथ ऊपर उठाने पर ओढनी से कूदने को लालायित हो जाते हैं। सीमा का उल्लंघन।3
इंसान को इंसान से अलग करने के लिए धर्म, जाति, भाषा के अलावा लैंगिक आधार भी है। द्विलैंगिक व्यवस्था में तृतीय लिंगी समुदाय के लिए समानता एक सपना ही है। समाज के निर्धारित दो लिंग से अलग होने पर अन्य की श्रेणी निर्धारित है। अन्य का मतलब क्या? जो महत्त्वपूर्ण न हो, या जिसे परिभाषित नहीं किया जा सकता! इसी अन्य का विरोध पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा का बिन्नी उर्फ विनोद करता है। रोज़ी भी इन सपाट परिभाषाओं को धता बतलाती है। लिंग निर्धारण के नियमों पर किए गए व्यंग्य बहुत मार्मिक हैं। रोज़ी के लिए पासपोर्ट बनाना है, लेकिन लिंग के बॉक्स में क्या भरा जाएगा, इस बात पर बेटी सोचती है - कैसा लगेगा ऐसा पासपोर्ट बनवाने में? फीमेल रोज़ी या क्या?4
रोज़ी भी अपनी अवस्था से अनजान नहीं है। वह कहती है - मुझे पासपोर्ट से क्या? न होने के फायदे हैं। हमारी गिनती न मुस्लिम किरस्तान में न यहूदी पारसी हिन्दू में न आदमी औरत में, हमारा नाम नहीं लेना। हमें पहचानना नहीं। हमें असल क्या, तसव्वुर से ही गायब रखना चाहते हैं।5
क्या लैंगिकता के आधार पर हदबन्दी आधुनिक काल की देन है? औपनिवेशिक काल से पहले भारत की संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था पर नज़र डालें तो यही दिखाई पडता है। शिखण्डी, वृहन्नला, मलिक काफूर आदि ऐतिहासिक-पौराणिक पात्र भारतीय इतिहास में मिलते हैं। मुगल काल तक सामाजिक जीवन से लेकर आर्थिक-राजनीतिक जीवन में इस समुदाय की प्रभावशाली भूमिका रही है। शाही दरबार में विश्वसनीय पदों पर भी आसीन थे। भारतीय संस्कृति में लैंगिक सीमाओं को इतना महत्त्व नहीं मिला है, जैसा कि गीतांजलि श्री लिखती हैं-
ललित कलाओं, लोक संस्कृति में एक अलग जिस्म है सीमाओं को पार करता। सीमा जहाँ पार होती वहीं संगम होता है। आदमी औरत एकमेक। बिरजू महाराज और कत्थक, जयशंकर और सुन्दरी। शंकर और पार्वती। इनके मिलन जादू रचते हैं, अन्य बनकर, अन्य को अपना बना कर। गाँधी औरताना पालथी में बैठ कर सीमा लाँघते हैं।6
पुरुष और स्त्री होने की कोई निश्चित परिभाषा नहीं हो सकती। हालाँकि, शारीरिक-जैव वैज्ञानिक स्तर पर यौनिकता (स्श्वङ्ग) को स्थूल रूप से परिभाषित किया जा सकता है। सामाजिक सिद्धांत में पुरुषों और स्त्रियों के लिए लिंग (त्रश्वहृष्ठश्वऋ) के माध्यम से सामाजिक-सांस्कृतिक भिन्नता को दर्शाया जाता है। अतः प्रकृति यौन अन्तर उत्पन्न करती है जबकि समाज लैंगिक भेदभावों को उत्पन्न करता है। लेकिन, भावनात्मक स्तर पर एक ही व्यक्ति पुरुष और स्त्री हो सकता है। भारतीय संस्कृति में दार्शनिक स्तर पर भी यह दृष्टिकोण सहजता के साथ स्वीकार्य है। अर्द्धनारीश्वर की हजारों साल पुरानी भारतीय अवधारणा है। भक्ति परम्परा में सन्तों द्वारा प्रेमभाव में तल्लीन होकर स्त्रीभाव की भक्ति की जाती थी। इस प्रेम-स्वरूपा भक्ति का ही माहात्म्य है कि नवधा भक्ति के साथ इसे दसवीं भक्ति के रूप में स्वीकार किया गया। कबीरदास जी भक्ति भाव में स्वयं स्त्री रूपी जीवात्मा की अवस्था में चले जाते थे तथा परामात्मा को पति के रूप में मानकर भक्ति में लीन होकर गाते-
दुलहनी गावहु मंगलचार
हम घर आए हो राजा राम भरतार।7
उपन्यास में लच्छू चाचा के प्रसंग द्वारा लेखिका ने दैहिक सीमाओं, लैंगिक नियमों पर व्यंग्यात्मक प्रहार किया है। लच्छू चाचा के स्त्रैण हाव-भाव को समाज सहजता से स्वीकृति दे देता है। उनके जनाना व्यवहार का मज़ाक नहीं बनाया जाता है, न ही सामाजिक जीवन से वंचना, उपेक्षा मिलती है। वहीं, प्रजनन में भूमिका नहीं होने मात्र से थर्ड जेण्डर समुदाय के लिए लैंगिक नियम इतने कठोर बन जाते हैं कि वे प्रेम और अपनत्व को भी तरस जाते हैं। लैंगिक दोष के आधार पर मौलिक अधिकार, सामाजिक जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता है। जहाँ लच्छू चाचा सामाजिक ताने-बाने में एकमेक बने रहते हैं, दूसरी तरफ रोज़ी समाज के समक्ष एक उलटबाँसी बन जाती है। लच्छू चाचा को समाज स्वीकार कर लेता है, लेकिन रोज़ी को नहीं कर पाता है। थर्ड जेण्डर की बात आने पर समाज का रवैया असंवेदनशील हो जाता है। थर्ड जेण्डर के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण को रोज़ी के इस कथन से समझा जा सकता है -
हम विकृति, बाजी। दूर रखो। देखा तो घूँसा लगा दिया। मरी कि बच गयी ए भी पलट के न देखा। नहीं देखा तो नहीं देखा। गायब रहें, गायब हैं हम, ए गुलिस्ताँ हमारा हमारा।8
क्या इन्सान का वज़ूद उसकी लैंगिक स्थिति तय करती है? जो फिट नहीं, उसे गरिमापूर्ण जीवन का हक नहीं! शरीर के सब अंग एक समान, मानवीय संवेदनाएँ भी वही, तो फिर उत्पीडन, घृणा, उपेक्षा और वंचना क्यों? लैंगिक विभेदीकरण के स्थान पर लैंगिक विविधीकरण की आवश्यकता है जो समाज को समावेशी बनाए। सभी मनुष्यों को समान भाव से स्वीकार करना प्रगतिशील समाज की पहचान है। यही बात गीतांजलि श्री बेहद सटीक अंदाज़ से कहती है -सब जोड बेजोड व्यक्तित्व हैं, चाहे पूरे या अधूरे। और सब अनंत हैं, चाहे बुलबुले।9
तन को निश्चित परिपाटी और नियमों पर स्वीकारने वालों को बदन के रहस्य डराते हैं। वर्ना तन में क्या पूर्णता और क्या अधूरापन। देह वर्जना का विषय नहीं हो सकती। गीतांजलि श्री तन को हेय मानने के स्थान पर पूजने की बात करती हैं। तन को समझना है तो पृथ्वी को बूझो कहते हुए दैहिक परिवर्तनों के साथ दैहिक विविधताओं को स्वीकार करने की बात की गयी है। अम्मा की योनि के पास फोडे की तुलना लिंगम से करते हुए निर्भीकता से दैहिक सरहदों को तोडने का प्रयास किया गया है। जो भीतर उग आया था, हर लटके झटके पे बाहर फिसल आने। खुशमिज़ाज लिंगम।10
लैंगिक स्थिति की अस्पष्टता के कारण थर्ड जेण्डर समुदाय मुख्यधारा से वंचित है ही, लेकिन उनके साथ होने वाला शोषण तब और बढ जाता है जब धर्म, राजनीति, प्रशासन और कानून व्यवस्था भी उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं। समाज में यह समुदाय अल्पसंख्यक है। किसी मज़बूत पहचान समूह का हिस्सा ना होने, राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों पर प्रभाव नहीं डाल पाने के कारण भी *यादा दुर्गति हुई है। जेण्डर नियमों ने तृतीय लिंगी समुदाय को अमानवीय परिस्थिति में जीने को मज़बूर किया है। क्या किन्नर में प्राण नहीं होते, भावना नहीं, बुद्धि और चेतना नहीं होती? सब है जो एक इन्सान में है। उनकी अस्मिता को रौंदना निर्लज्जता नहीं तो क्या है! इनके साथ होने वाली यौन हिंसा, हत्या को रिपोर्ट नहीं किया जाता है, क्योंकि ए तो ऐसे ही होते हैं की सोच वाला समाज इनके दर्द को नहीं समझ सकता। एक बच्चा कि बच्ची के साथ शारीरिक शोषण की घटना वाला प्रसंग खुद रोज़ी का है। ताकत के खेल में रोज़ी जैसे बच्चे कि बच्चियों से दुनिया, समाज, कानून, प्रशासन सरोकार नहीं रखते। रोज़ी कहती है-
हमारी किसे पडी। हम तो उनके बाज़ार में भी नहीं कि हमें लुभाने के इश्तेहार बनाएँ, हमारे लिए दुकान खोलें और नफा कमाएँ। लोभी पंसारी को भी हमारी ग्राहिकी नहीं चाहिए, तो सोच लो हम कितने निकृष्ट अदृश्य परिशिष्ट। न मेरे लिए फिल्म, न साहित्य, न कला, न कपडे। जो आप उतार दें, उस उतरन में हम उतर लें। अपनी गिनती नहीं। झील में डाल आओ तो किसी को पता नहीं चलेगा कि एक कम है।11
और एक दिन यही होता है। रोज़ी के झील वाले मकान के किराएदार दम्पत्ति (शीला/शकीला और उसका प्रेमी) ने रोज़ी की हत्या कर दी। रोज़ी के मरने पर पुलिस केस दज़र् नहीं किया गया। शनाख्त के लिए माँग की गयी तो यह कहकर उपेक्षा कर दी गयी कि जिसमें असली-नकली का फर्क ना समझ आए, उसका क्या ढूँढें? रोटी, कपडा, मकान की मूलभूत ज़रूरतों के साथ मौलिक अधिकार प्राप्त करना थर्ड जेण्डर समुदाय के लिए अब भी एक ख्वाब ही है। गुमशुदा की रिपोर्ट कराने गयी अम्मा से दरोगा कहता है-
ए लोग सबके बीच आकर रहने लगे तो समझिए प्रलय आ गयी। खैर, उसने फ्लैट किराए पर उठा दिया था। एक बार तीन चार कुत्ते अचानक उस पर टूट पडे, एक दम खडा है, अगले दम चारों खाने चित्त। कुत्तों को भी पहचान है कि ए बेपहचान वाले! बच्चे पीछे दौडते, पत्थर मारते।12
थर्ड जेण्डर के साथ आजीवन उपेक्षा और घृणा से भरा अमानुषिक व्यवहार किया जाता है। भारत की न्यायपालिका ने तीसरे लिंग के रूप में पहचान दे दी, लेकिन व्यवहार में अभी भी यह दूर की कौडी ही प्रतीत होती है। मृत रोज़ी के हक और संवैधानिक अधिकारों के बारे में लिखना अखबार वालों के लिए फायदेमन्द नहीं। उनका बिजनेस सिर्फ सनसनीखेज और चटपटी कहानियों से बढता है। समाज की रक्षा करने वाली पुलिस भी तृतीय लिंगी के लिए अमानवीय और संवेदनहीन हो जाती हैं। रोज़ी के लिए चिंतित अम्मा को पुलिस समझाती है कि-
आप जानती हैं न वो क्या था, किसके चक्करों में पड रही हैं, नाचते गाते भीख माँगते और न जाने क्या क्या पेशा करते, सारे में फिरते हैं ए लोग, शादी ब्याह चोरी चकारी और जो मैं आपसे कह नहीं पाऊँगा, सब करते हैं, हम तो जानते हैं, कोडे लगाते हैं पकड के, फिर छोड देते हैं, कोई अपना थाना थोडे गन्दा करना है।13
इस उपन्यास में पत्रकारिता, प्रशासन आदि पर व्यंग्य किए गए हैं, लेकिन बात जब ट्रांसजेण्डर के संवैधानिक, मौलिक, सामाजिक अधिकारों की होती है, तो ए व्यंग्य एकदम तीखे और मार्मिक हो जाते हैं। कथा को पढते हुए यह महसूस होता है कि गीतांजलि श्री विमर्श के नियमों के अनुरूप घिसा-पिटा नहीं लिखती है। वे अपनी राह खुद बनाती चलती हैं। उनके पात्र भी उन्हें राहें सुझाते चलते हैं। इसके कारण विमर्श के दायरे सतही न रहकर विस्तृत होते हैं तथा दिखावटीपन नहीं आता। ट्रांसजेण्डर पात्र रोज़ी का किरदार हिन्दी साहित्य में इस विमर्श को नयी दिशा देगा। रोज़ी का किरदार इतना जीवंत है कि अपने आप में शख्सियत बन गया है। रोज़ी के किरदार के सम्बन्ध में लेखिका मृदुला गर्ग के विचार एकदम सही हैं-
गीतांजलि ने किरदार को इस तरह गढा है कि वह एक शख्सयत बन कर उभरता है; थर्ड जेण्डर का नुमाइंदा नहीं। हम भूल जाते हैं कि वह थर्ड जेण्डर है या फर्स्ट या महज पारम्परिक औरत। रेत समाधि की माँ और रोज़ी की दोस्ती ऐसी है कि हुआ करे जेण्डर कोई। दोस्त तो दोस्त होता है, कतई।14
जितना सहज और सुन्दर रिश्ता अम्मा और रोज़ी का है, किसी किन्नर पात्र के साथ ऐसा रिश्ता हिन्दी साहित्य में देखने को नहीं मिला है। गीतांजलि श्री ने रोज़ी के माध्यम से लैंगिक भेदभाव के चरम रूप को बडी सूक्ष्मता के साथ प्रस्तुत किया है। लैंगिक आधार पर सामाजिक भेदभाव और उनसे उत्पन्न विसंगतियों को गंभीरता से उकेरा है। लैंगिकता की परिपाटी में मानवीय मूल्य कुचल जाते हैं। लेकिन रोज़ी जैसे साहसिक पात्र ने समस्त लैंगिक वर्जनाओं को धता बतला दिया। उपन्यास में रोज़ी का किरदार बहुत मज़बूत है, भले ही विस्तार में कम। रोज़ी जैसा मज़बूत और जीवन्त थर्ड जेण्डर पात्र अभी तक हिन्दी साहित्य में नहीं रचा गया है। कथा जैसे-जैसे आगे बढती है, रोज़ी का किरदार सशक्त होता जाता है। रोज़ी आत्मनिर्भर थी, नाच-गाने के बजाए रज़ा टेलर बनकर सिलाई का काम करती रही। जब यह पता चलता है कि रोज़ी अपना दिवंगत शरीर मेडिकल रिसर्च के लिए अस्पताल को दान में दे देती है तो समस्त संवेदनाएँ एक साथ इक्कठी हो जाती हैं। रोज़ी के माध्यम से थर्ड जेण्डर विमर्श धारा को नए आयाम मिलेंगे और विमर्श की सरहदों को तोडकर नई संभावनाएँ तलाशी जाएँगी।

सन्दर्भ सूची -
1. श्री, गीतांजलि, रेत समाधि, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करणः मार्च, 2022, पृष्ठ - 250
2. वही, पृष्ठ - 208
3. वही, पृष्ठ - 207
4. वही, पृष्ठ - 231
5. वही, पृष्ठ - 238
6. वही, पृष्ठ - 207
7. दास, श्यामसुन्दर (सम्पादक), कबीर ग्रन्थावली, साहित्य सरोवर प्रकाशक, आगरा, पृष्ठ - 125
8. श्री, गीतांजलि, रेत समाधि, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करणः मार्च, 2022, पृष्ठ - 238
9. वही, पृष्ठ - 227
10. वही, पृष्ठ - 222
11. वही, पृष्ठ - 239
12. वही, पृष्ठ - 247
13. वही, पृष्ठ - 248
14. http://epaper.navjivanindia.com//inde&. php?mod =1&pgnum =11&edcode =71&pagedate=2022-4-17×type=a नवजीवन अखबार, पृष्ठ 11, (देखा गया दिनांक- 2 जून, 2022)


सम्पर्क - 403, चाथी मंजिल ए,
अशोक काम्प्लेक्स, रानाडे रोड, दादर,
वेस्ट मुम्बई-४०००२८
Email - ichaudharywy|@gmail.com
मोबाईल नं. - 8882719790