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ईश्वर का अन्त और हिन्दी कविता

नीरज

ईश्वर नहीं रोता है यदि/आदमियों के भूख दुःख दाह देखकर
तो ऐ दुनिया के तमाम आदमियोड्ड
दुनिया की सारी मठ,मस्जिदें तोड दो
वहाँ पर हल से जोतकर/ पेड और अन्न का बीज रोप दो।

-चन्द्रा (फेसबुक से साभार)

ईश्वर के नहीं रोने पर उसका नकार,उसके नाम पर बनाई गई संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न और उसके बदले मनुष्य के दुःख के कारणों की खोज को सृष्टि को समझने की सबसे सहज,जरूरी और तार्किक दृष्टि माना जा सकता है। हम जानते हैं कि सृष्टि निर्माण के आरम्भ से लेकर मानव सभ्यता की पूरी विकास-परम्परा (वैज्ञानिक परम्परा को छोडकर) में ईश्वर आस्था,विश्वास और भय के रूप में उपस्थित है। विश्व की लगभग सभी संस्कृतियों में ईश्वर को न केवल सृष्टि-नियंता माना जाता है अपितु उसे सर्वशक्तिमान,अजर-अमर, अविनाशी, विधाता, आदि, अनन्त, परम,एवं अनश्वर इत्यादि ऐसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। बकौल शम्भुनाथ -सामी मजहब-यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम ईश्वर को मानते हैं। ए एकेश्वरवादी धर्म हैं। ए देवताओं को नहीं मानते। हिन्दू लोग ईश्वर और देवों-देवियों दोनों को मानते हैं। ए ईश्वरवादी और बहुदेववादी दोनों एक साथ हैं।...जनजातियाँ आम तौर पर सर्वात्मवादी हैं। वे जड,वनस्पति,चेतन हर पदार्थ में ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करती हैं। भारतीय धर्म चिन्तन की वैचारिकता के भी जो प्रमाणिक पाठ उपलब्ध हैं उसके मूल में देखे, तो वहाँ ईश्वर की कल्पना समस्त सांसारिक पापों से मुक्त करने और भौतिक जगत से मोक्ष देने वाले मोक्षदाता के रूप में उसकी अनेक लीलापरक व्याख्याएँ मौजूद हैं। श्रीमद भगवद् गीता में जब कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि मुझसे बाहर और श्रेष्ठतर कुछ भी नहीं है। सम्पूर्ण सृष्टि मुझमें समाहित है और तुलसीदास रामचरितमानस में लिखते है कि -हरि अनंत हरि कथा अनंता/कहहि सुनहि बहु विधि सब सन्ता तो आस्था,श्रद्धा और सर्वस्व-समर्पण के इस महिमागान के मूल में ईश्वर की विराटता और सर्व शक्तिमानता के अलावा कोई दूसरा अर्थ शायद ही स्वीकार हो। कुरान की भी माने तो खुदा के अलावा कुछ भी पूज्य नहीं है। आधुनिक भारतीय मनीषा विवेकानन्द का मत है- जो माया पर शासन करता है वह ईश्वर है और जो माया के अधीन है वह जीवात्मा है।
आज का युग विज्ञान मतलब तर्क और प्रमाण के आधार पर ज्ञान को अनुभूत करने का युग है। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो जाने के बाद कि सृष्टि के निर्माण में ईश्वर की कहीं कोई भूमिका नहीं है, यह एक जीव विज्ञानी प्रक्रिया है,आज भी सृष्टि के निर्माण से लेकर ईश्वर का अस्तित्व एवं उसकी भूमिका के सन्दर्भ में पूरा संसार अनेक विरोधाभासों में उलझा हुआ है। मसलन जब कुछ न था तो ईश्वर था, जब कुछ नहीं रहेगा तब भी ईश्वर रहेगा, ईश्वर सृष्टि के प्रत्येक कण में विद्यमान है,वगैरह-वगैरह । वैसे भी अपने आरंभिक काल से ही विश्व के सभी अनुशासनों दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान, समाज-विज्ञान सभी की समस्या ईश्वर की सत्ता-संरचना को व्याख्यायित करने,मनुष्य के अस्तित्व को समझने एवं ईश्वर के साथ अस्तित्व को विश्लेषित करने की रही है। हलांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास की सैद्धांतिकियों ने न केवल ईश्वरीय या अलौकिक शक्ति की स्थापना के मूल-बिन्दुओं को तार्किकता के आधार पर खारिज किया अपितु सृष्टि के रहस्यों से सम्बन्धित लगभग सभी मिथकीय, धार्मिक,पौराणिक एवं अमूर्त विचारणाओं पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया। अस्तित्ववाद का तो पूरा दर्शन ही इस अवधारणा के इर्द-गिर्द चलता है कि मनुष्य का अस्तित्व उसके सार का पूर्ववर्ती होता है अथवा सार अस्तित्व का पूर्ववर्ती। ज्याँ पाल सार्त्र की दृष्टि में- जब ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं और मनुष्य स्वनिर्मित एवं स्वतंत्र है, तो उसे स्वायत्त तौर पर अपने मूल्य, उद्देश्य एवं लक्ष्य का आविष्कार करना चाहिए। यानी जैसा कि वह चाहता है। जैसा कि वह सम्पूर्ण चेतना एवं एहसास के साथ बनना चाहता है।
जहाँ तक ईश्वर की मृत्यु का सवाल है तो इसकी सूचना सबसे पहले उन्नीसवीं शताब्दी में फिलिप मेनलेण्डर और नीत्शे ने दी थी। परन्तु इसे स्थापित करने का श्रेय नीत्शे (1844-1900) को जाता है। नीत्शे एक ऐसा दार्शनिक था जिसने न केवल द गे साइंस (1882) नामक अपनी पुस्तक में ईश्वर की मृत्यु की घोषणा की बल्कि उन्होंने ईसाई धर्म की नैतिकता के प्रतिमानों की चुनौती (Beyond good and evil, 1886) में तथा मानवतावाद की मूलभूत चुनौतियों को भी अपनी आटोबायोग्राफी Ecce Homo (1988) में नया आयाम दिया। वे ईश्वर की उपस्थिति की अवधारणा के ही उसके होने की सबसे बडी बाधा मानते हैं। उन्होंने लिखा है- ईश्वर की अवधारणा अब तक उसके अस्तित्वमान होने की सबसे बडी बाधा है। हम ईश्वर को, उसकी उपस्थिति को आसानी से नहीं स्वीकारते हैं। और ऐसा करते वक्त हम उसकी गुणवत्ता को भी नजरअन्दाज करते हैं। ऐसा करते वक्त क्या हम दुनिया के गुनाहगार बनते हैं। नीत्शे ने न केवल ईश्वर की मृत्यु की घोषणा की बल्कि इस बात पर भी जोर दिया कि हमने ही उसे मारा है। जाहिर है जब ईश्वर ही नहीं रहा, तो उसकी सत्ता संरचना को आधार मानकर चलने वाले सभी संस्थान, ईकाइयाँ एवं उनकी शब्दावलिएों जैसे दिव्यता, पवित्रता,अलौकिकता जैसे शब्दों का भी कोई महत्त्व नहीं है। इसलिए नीत्शे अन्य संभावनाओं की तलाश की आवश्यकता पर बल देते हैं। उनके मतानुसार- ईश्वर की परिकल्पना मनुष्य के उद्विग्न एवं असन्तुष्ट विवेक के अतिरिक्त कुछ नहीं जिसके कारण वह आत्मोत्पीडन से ग्रस्त रहता है। जब ईश्वर की मृत्यु हो चुकी है, तो हमें अन्य सम्भावनाओं की तलाश करने की आवश्यकता है। क्योंकि ईश्वर की मृत्यु के साथ पराभौतिकवाद का भी अन्त हो चुका है। बात बिल्कुल स्पष्ट है कि ईश्वर की मृत्यु की घोषणा 19वीं शताब्दी में ही नीत्शे कर चुके थे, परन्तु उसे विस्तार देने का कार्य उत्तर आधुनिकता की प्रवृत्ति विकेन्द्रीकरण के कारण हुआ। उत्तर आधुनिकता न ईश्वर को मानती है और न उसकी वापसी के किसी भी प्रकार की संभावनाओं को। वह मानवता को संकटों से घिरे त्रासद परिस्थितियों में पाती है, जहाँ धूमिल के शब्दों में कहें तो-
हर आदमी सिर्फ अपना धन्धा देखता है / सबने भाईचारा भुला दिया है /
आदमी की सरलता को मारकर /
मतलब के अन्धेरे में (एक राष्ट्रीय मुहावरे की बगल में) सुला दिया है।

इसलिए अतिरिक्त आशा, आस्था, विश्वास हो या अतिरिक्त आशंका, सवाल (प्रश्नशीलता) दोनों ही जीवन स्थितियों से दूर की चीज लगती है और दोनों का आधार एक ही है- लोक में मानवीय शक्तियों का अभाव। तभी तो लोग या अधिकांश जनसमुदाय आज भी स्वस्थ मानवीय सम्बन्धों के बजाय धर्म-ग्रन्थों,परम्पराओं (रूढ), धर्म-स्थलों को बचाने में ही सार्थकता का अनुभव करते हैं। क्रूर अमानवता के समय में भी इन्हें मनुष्य की बजाय अपने देवी-देवताओं एवं आराध्य की ही चिन्ता होती है। लेकिन एक संवेदनशील कवि प्रभु की प्रभुताई बाँधने, रीति को चुप रहने एवं नीति को उदास नहीं होने (मत होना उदास कविता) की सलाह देने वाले बद्रीनारायण लिखते हैं-
प्रलय के दिनों में / सप्तर्षि, मछली और मनु / सब वेद बचाएँगे
कोई नहीं बचाएगा प्रेमपत्र / कोई रोम बचाएगा / कोई मदीना
कोई चाँदी बचाएगा कोई सोना / मैं निपट अकेला / कैसे बचाऊँगा तुम्हारा प्रेमपत्र।
किसी ईश्वर ने मनुष्य को बनाया है या नहीं इस पर जब से मनुष्य को सोचने, समझने और विचार करने की शक्ति मिली है तभी से दुनिया भर में बहस हो रही है। लेकिन ईश्वर की अवधारणा को मनुष्य ने ही जन्म दिया है, इसके भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। इस धरती पर लोगों ने अपने-अपने समाज, संस्कृति, परिस्थिति और जरूरत के हिसाब से अपने-अपने ईश्वर बना रखे हैं। इसलिए ईश्वर पाने के रास्ते अलग-अलग होने और ईश्वर के एक होने पर बल देने के बावजूद हिन्दुओं का ईश्वर अलग है, मुसलमानों का अलग, बौद्धों का अलग तो ईसाइयों का अलग। इतना ही नहीं, किसी खास जाति या धर्म में भी अलग-अलग ईश्वर हैं। जैसे हिन्दुओं के ईश्वर को ही लें, तो उच्चवर्ग और निम्नवर्ग दोनों के अलग-अलग ईश्वर हैं। शहरी और ग्रामीण इलाकों का अपना अलग-अलग ईश्वर है, तो आदिवासियों का अलग। हलांकि राम-कृष्ण, विष्णु, शंकर जैसे ईश्वरों में समानता है, परन्तु इसके बाद इतने अधिक ईश्वर हैं कि एक-दूसरे भी इसके बारे में नहीं जानते हैं। एक दूसरा उदाहरण और देखें। सारनाथ और कुशीनगर दोनों जगह दुनिया के कईं बौद्ध देशों जैसे जापान, वर्मा,श्रीलंका,थाईलैण्ड,चीन आदि के बौद्ध मंदिर हैं। यह जानने के बावजूद कि गौतम बुद्ध हिन्दुस्तान में पैदा हुए, इन देशों के मन्दिरों में बुद्ध की जो प्रतिमा है वह उस देश के आदमी की शक्ल से मिलती-जुलती है। अर्थात् थाइलैण्ड की बुद्ध की मूर्ति थाई आदमी-सी तो जापान की जापानी-सी लगती है। इन देशों में इन भगवानों से जुडी किंवदन्तियाँ भी उसी समाज की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर गढी और सुनाई जाती हैं। भगत सिंह ने भी लिखा है- मनुष्य ने अपनी सीमाओं, दुर्बलताओं व कमियों को समझने के बाद, परीक्षा की घडियों का बहादुरी से सामना करने, स्वयं को उत्साहित करने, सभी खतरों को मर्दानगी के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बांधने के लिए ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना की। इसलिए इस बात की कोई आशंका नहीं होनी चाहिए कि मनुष्य ने ईश्वर को बनाया है। अपनी आवश्यकता एवं प्रेरणा के आधार पर ही उसकी निर्मिति की है। फिर इक्कीसवीं सदी के आते-आते या यूँ कहें कि पूरे उत्तर आधुनिक परिदृश्य का समय लाल्टू के शब्दों में भूख का हल ढूँढती / जनता के थकने का समय है। इसलिए यहाँ ईश्वर भी जीवन की विकलता एवं समाज की क्षुब्ध नैतिकता-बोध से अपनी जर्जर अमर काया को मोक्ष दिलाना चाहता है। नीलाभ की कविता ईश्वर को मोक्ष की कुछ पंक्तियाँ देखें -
वह ईश्वर था जिसके बारे में कहा जाता था कि उसने दुनिया / बनायी थी। मगर इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के आते / आते उसे भी इसका भरोसा नहीं रह गया था। अपनी कथित / रूप से बनायी गई दुनिया में उसके पास रहने को जगह / नहीं रह गई थी... इक्कीसवीं सदी की / पहली दहाई तक आते आते वह पूरी तरह बेघर हो गया था। जब वह हवा के परमाणु में खोजता था अपना ठौर / वह पाता था वहाँ कोयले, पेट्रोल और डीजल को कब्जा। जमाकर बैठे हुए / जल के कण से उसे घकेल कर बाहर / कर देते थे बार-बार कारखानों के जहरीले स्राव... उनींदी रातों में धुएँ और धुन्ध से करियाए आकाश में धुँआसी / लालटेन की तरह टिमटिमाते ध्रुव या ध्रुव तारे को निहारते / हुए वह अपनी अनश्वरता पर खीझ कर कामना करता था / अपने सृजे मनुष्य से जन्मने का ताकि मोक्ष पा सके वह किसी तरह अपनी जर्जर अमर काया से।
ईश्वर और मनुष्य के सम्बन्धों की परख में जितनी तटस्थता, तार्किकता और सार्थकता समकालीन हिन्दी कविता में आई है उतनी हिन्दी कविता में पहले न थी। मध्ययुग में मनुष्य के सम्बन्ध-स्रोत का मुख्य स्रोत ही ईश्वर था। इसलिए वहाँ सभी व्यक्ति ईश्वर की सन्तान थे। सामाजिक-परिवर्तन, विद्रोह हो या यूटोपिया, अध्यात्म एवं भक्ति सभी का उद्देश्य जाऊँ कहाँ तजि चरण तिहारे एवं जित खिंचै तित जाऊँ ही था। लेकिन वैज्ञानिकता के विकास से ईश्वरीय धारणा खण्डित हुई और मनुष्य का सम्बन्ध-स्रोत बना परिवेश। इस वैज्ञानिक एवं आधुनिक जीवन-सरंचना में परम्परागत मूल्य निरर्थक होते जा रहे थे, परन्तु नए मूल्यों की सृष्टि भी नहीं हो पाई थी। इसलिए भारतेंदु युग में ईश्वर भारतनाथ बना तो द्विवेदी युग में स्वयं देवत्व मनुष्यत्व के धरातल पर (साकेत - सन्देश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया। इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया) आकर गोवर्धन उठाने तक की तर्कसंगत व्याख्या (प्रियप्रवास) करने लगा। छायावाद तक आते-आते हिन्दी कविता का ईश्वर से लगभग मोहभंग हो चुका था। रहस्यवाद हो या निजी-मुक्ति, राष्ट्रीय-चेतना हो या सामाजिक-परिवर्तन सभी जगह दैवीय शक्ति की व्यावहारिक भूमिका तार्किकता में परिवर्तित हो गई थी। दैवीय शक्ति का अन्याय से गठबन्धन(अन्याय जिधर है,उधर है शक्ति-राम की शक्तिपूजा) निराला से शक्ति की मौलिक कल्पना करवाता है, तो प्रगतिशील कवियों से देवताओं की आत्महत्या। यह विश्वास अनुभव एवं अन्ध-मूल्यों पर आधारित श्रद्धा के बरक्स विवेक और तर्क का व्यावहारिक विकास है। इसलिए इस पूरे परिदृश्य को कभी निरर्थक होते जा रहे परम्परागत मूल्यों के बहाने तो कभी अनास्था और अन्धकार के बहाने मूल्यों के इस संकट को बार-बार रेखांकित किया गया है। धर्मवीर भारती लिखते हैं-
जिसको तुम कहते हो प्रभु /
उसने जब चाहा
मर्यादा को ही अपने हित में बदल लिया /
वंचक है वो।
न्यूयार्क में एक कब्रिस्तान को देखकर केदारनाथ सिंह को लगता है-
फूलों से घिरा /
और कविताओं से ढँका /
और बडे-बडे कीमती पत्थरों से मढा हुआ /
एक भव्य कब्रिस्तान था। जिसे देखकर /
पानी भर आता था/
जीवितों के मुँह में।
समकालीन हिन्दी कविता में ईश्वर के अलग-अलग एवं लगभग अधिकांश रूपों पर विचार किया गया है। यहाँ ईश्वर की उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों हैं। एक तरफ ईश-वन्दना, ईश-कृपा के बहाने ईश्वरीय स्वरूप की पडताल है, तो दूसरी ओर सांप्रदायिकता, सामाजिक-विषमता एवं ऐसे ही अन्यान्य कारणों से ईश्वर के अन्त की प्रस्तावना एवं उसका स्वीकार। हरिश्चन्द्र पाण्डे उस वर्ग की मानसिकता को बतलाते हैं जिसके लिए ईश्वर सुविधा और आवरण है,अपने प्रत्येक अमानवीय कार्यों को तर्कसंगत सिद्ध करने के लिए- उसकी आँखें बन्द समझ / डंडी मार लो बलात्कार कर लो / या गला रेत दो आदमी का / ईश्वर एक बडी सुविधा है।
जीवन को कटु-यथार्थ एवं राम को महाकाव्य मानते हुए कवि कुँवर नारायण राम को सम्बोधित करते जो लिखते हैं वह ईश्वर के अन्त का प्रामाणिक कारण लगता है-
इससे बडा क्या हो सकता है। हमारा दुर्भाग्य /
एक विवादित स्थल में
सिमट कर रह गया तुम्हारा साम्राज्य
अयोध्या इस समय
तुम्हारी अयोध्या नहीं/
योद्धाओं की लंका है
मानस तुम्हारा चरित नहीं /
चुनाव का डंका है?
हे राम, कहाँ यह समय /
कहाँ तुम्हारा त्रेता युग /
कहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम
और कहाँ यह नेता युग /
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुराण किसी धर्मग्रन्थ में /
सकुशल सपत्नीक
अबके जंगल वो जंगल नहीं/
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीकि
हर वक्त सांप्रदायिक-घटनाओं के घटने की आशंका के आज के दौर में ईश्वर अपने ही भक्तों की दृष्टि में अपराधी हो गया है। अयोध्या, द्वारका, मथुरा, ईश्वर-निवास के सारे स्थान लंका बन चुके हैं तथा जंगल भी ऋषि-मुनियों के रहने के लिए नहीं बल्कि माफिया एवं राजनीति के गठजोड का अखाडा बन गया है। ईश्वर के प्रताप को फैलाने के लिए आज भी भय का सहारा लिया जा रहा है। समकालीन कविता ने संकीर्णता की इस राजनीति को न केवल निरावृत्त किया है बल्कि यह भी बताया है कि जिसे जिन्दा रहने के लिए भय की जरूरत पडती है वह ईश्वर कैसे हो सकता है? यहाँ लीलाधर जगूडी की भय भी शक्ति देता है संग्रह की दो कविताओं मंदिर लेन और मध्याँतर को देखना भी प्रासंगिक होगा। मंदिर लेन में धर्म के ठेकेदारों की धज्जियाँ उडाने के बहाने इस बात को उद्घाटित किया गया है कि किस प्रकार मंदिर, कब्रिस्तान और गिरिजाघरों के आस-पास हत्या, बलात्कार एवं जरायम जैसे अपराध-कर्मों को अंजाम दिया जा रहा है। जगूडी की यह कविता इन जगहों की आपराधिक क्रूरता पर न केवल हमारा ध्यान आकर्षित करती है वरन् उस सच्चाई को सामने लाती है जिसे हमारे समाज का बहुत बडा भाग मूर्तियों से या मूर्तियों के बहाने ढँके हुए हैं। इसी प्रकार मध्याँतर में ईश्वर के अस्तित्व की शिनाख्त के बहाने उन कारणों को खोजा गया है जिसके कारण समाज का पुरुष, अपराधी एवं कर्महीन होता जा रहा है। धार्मिक-ठेकेदारी के इस दौर में ऐसी कविताएँ एक प्रकार से ईश्वर के अन्त की ही प्रस्तावना रचती है।

ईश्वर के कपडे बचाने का मतलब है
अपनी खाल बचाना /
ईश्वर को जब एक वीराने में यह पता चला /
न कोई आदि है न कोई अन्त/
न कोई माई है न बाप /
न कोई जन्म है न मृत्यु /
तब से किसी भी कीमत पर
बिकने को तैयार है /
उसे समझाने वाले माई-बाप और
भाई बंधु चाहिए /
ईश्वर को टायफाइड है।
ईश्वर को मलेरिया है /
एड्स की भी जाँच चल रही है /
बहुत से सहमत हैं कि
मरणासन्न ईश्वर को /
सारे प्रपंच से अलग रखना है /
पर वह मरते दम भी दम साधे है /
और बयान देने पर तुला हुआ है।
आज के समय में ईश्वर, धर्म या धार्मिक परम्पराओं से अधिक मनुष्य को बचाने की जरूरत है। लेकिन स्वप्निल श्रीवास्तव के ईश्वर बाबू जब एक अजनबी आम आदमी को गुण्डों से बचाते हैं, तो अपराध स्वरूप मृत्यु पाते हैं-
ईश्वर नहीं मरा था / मर गए ईश्वर बाबू / इसलिए कोई हंगामा/ नहीं हुआ।
स्पष्ट है ईश्वर नहीं मरा था, जबकि मरना ईश्वर को ही चाहिए था। अमानवीयता अपने चरम पर तब पहुँचती है जब ईश्वर या धर्म के नाम पर योजनाबद्ध हत्याओं, दंगों एवं सामूहिक नरसंहारों को अंजाम दिया जाता है। इसलिए तो राजेश जोशी लिखते है-सबसे बडा अपराध है इस समय /निहत्था और निरपराध होना/जो अपराधी नहीं होंगे / मारे जाएँगे। धार्मिक उन्माद पैदा करने, योजनाबद्ध हत्याओं या दंगों एवं इंसान को मारने के लिए ही अगर ईश्वर का अस्तित्व बचा रहना चाहिए, तो ईश्वर का हर हाल में मरना ही श्रेयस्कर है। ईश्वर अगर जीवन को मानवीय नहीं बना पाता है, तो उसके अस्तित्व की सच्चाई पर प्रश्न उठना लाजिमी है। समकालीन हिन्दी कविता ईश्वर के ऐसे ही खोखले एवं अमूर्त अस्तित्व के बरक्स मानवीय जीवन में ईश्वर के जरूरी हस्तक्षेप को इतिहास, परम्परा और स्मृति के सार्थक संवाद एवं विश्वसनीय तरीकों की समाजोन्मुख वैचारिकता से हल करने का प्रयास करती है। विष्णु खरे का न हन्यते, मनमोहन का ईश वंदना, वीरेन्द्र डंगवाल का ईश-कृपा, नरेश सक्सेना रचित समुद्र पर हो रही है बारिश, बद्री नारायण कृत मत होना उदास संजय चतुर्वेदी कृत प्रकाश वर्ष जैसी रचनाओं में इसे सहजता से लक्षित किया जा सकता है। समकालीन हिन्दी कविता यह प्रश्न बार-बार उठाती है कि ईश्वर गरीब, बेबस, लाचार लोगों के लिए वैसी उष्मा है जिससे कभी ऊर्जा प्राप्त नहीं होती है, अगर ईश्वर वास्तव में है, तो इतना अमूर्त, जटिल क्यों हैं, विषमतामूलक समाज के लिए वह कुछ करता क्यों नहीं है? स्थिति और अधिक भयावह हो जाए इससे पहले हमें इसे समझना होगा-
ईश्वर/ बस एक सम्भावना है /
दिन में रात में /
हर्ष और विषाद में
कुछ भी अप्रत्याशित घटित होने का /
सहज आलम्बन ईश्वर है।
सही है यह /फिर इतना जटिल क्यों?
मनुष्य जब परिस्थितियों को नहीं बदल पाता है तब परिस्थितियाँ उस पर हावी हो जाती हैं। भाग्यवाद, कर्मफलवाद, ईश्वर आदि पर आधारित धर्म का पूरा ढाँचा इसी तरह के सामाजिक जीवन से उत्पन्न और परिचालित होता है। परन्तु परिस्थितियाँ बदलने पर नया ज्ञान, कर्मकाण्ड और नियतिवाद को भेदकर परिस्थितिज्ञान और कर्तव्यबोध के रूप में आता है। समकालीन कवियों के सामने कबीर के समान जस तू तस तोहि कोह न जाना वाली समस्या नहीं है। इनके काव्य-मूल्यों की ऐतिहासिकता जीवन को ईश्वर-भय नहीं बल्कि और अधिक मानवीय बनाते चले जाने की है। इसलिए यहाँ ईश्वर साक्षात् विधाता, कृपाकारक बनकर नहीं बल्कि वास्तविक चुनौतियों के सम्मुख खडा है, यही ईश्वर के अन्त का अभिप्राय भी है-
भगवन / आओ रहो इन बच्चों के साथ/
हवा भरो स्कूटर के पहियों में /
चाय की दूकान पर धोओ जूठे बर्तन
ईश्वर की मृत्यु या ईश्वर आधारित संस्थानों से नियंत्रित समाज के अन्त का सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण समकालीन दलित और आदिवासी कविताएँ हैं। परम्परागत संस्कार और धर्म आधारित सभी दर्शन मानते हैं कि मनुष्य या समाज जैसा भी है ईश्वर का रचा हुआ है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास ने यह साबित कर दिया कि गरीब, दलित या अछूत पैदा नहीं होते, वरन् इसी वर्ण आधारित समाज-व्यवस्था में बनाए गए हैं। इसलिए दलित कवियों के यहाँ न केवल ईश्वर के प्रति नकार का भाव है बल्कि ईश्वर को केन्द्र मानकर चलने वाले सभी संस्थानों के प्रति भी विद्रोह एवं अस्वीकार का भाव है। क्योंकि इस ईश्वर के बहाने ही समाज के प्रतिनिधि कभी कर्मफल, पुनर्जन्म, वर्ण-व्यवस्था तो कभी संकीर्णता और छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथाओं से मनुष्य-मनुष्य में भेद पैदा करते हैं। जातिवादी संस्कारों के मूल कारक के सामने मनुष्य की प्रश्नशीलता की ताकत पर ही ओमप्रकाश वाल्मीकि बस्स बहुत हो चुका में सृष्टि नियंता ब्रह्म के खुद के जन्म पर सवाल खडा करते हैं तो मुकेश मानस राम के बहाने उसके (ईश्वर के) ठेकेदारों से इजाजत लेने का कडा प्रतिरोध करते हैं। क्योंकि इस प्रक्रिया में ईश्वर नहीं अन्ततः मनुष्य ही मरता है। इसलिए विषमतामूलक व्यवस्था के कारक होने के कारण सभी दलित कवि ईश्वर के अस्तित्व को ही नकारते हैं। यह एक प्रकार से ईश्वर के अन्त की ही सामाजिक-स्वीकृति है। मोहनदास नेमिशराय तो जानलेवा परम्पराओं के बरक्स प्रतिरोध की पहचान करते हुए पूरी आस्तिक आस्था पर ही प्रश्नचिह्न लगा देते हैं-
ईश्वर की मौत /
उस पल होती है
जब मेरे भीतर उभरता है सवाल /
ईश्वर का जन्म
किस माँ की कोख से हुआ था /
ईश्वर का बाप कौन?
सृष्टि निर्माण का दैवीय सिद्धान्त विशेषकर हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में इस बात का बार-बार जिक्र आता है कि सृष्टि का, मनुष्य का नियन्ता ईश्वर है। ईश्वर की भक्ति में ही मनुष्य की सार्थकता निहित है। ईश्वर कर्म के आधार पर मनुष्यों को फल देता है। ऐसे में जाहिर है कि समाज के निम्नवर्गीय इस दलित समाज को निम्न कार्य (मैला ढोने, सडक साफ करने आदि-आदि) करने के कारण उसे फल भी निकृष्ट ही मिलेगा। दलित साहित्य इस अतार्किक सैद्धांतिकी, कर्मफल एवं पुनर्जन्म को प्रश्नांकित कर ईश्वर और इस व्यवस्था से सीधे सवाल करता है। कर्मफलवाद की अवधारणा से उत्पन्न सामाजिक विषमता का दंश कितना यातनामय और अमानवीय है इसे जयप्रकाश कर्दम की इस कविता से भी समझा जा सकता है-
ईश्वर तेरे सत्य और शक्ति को /
मैं अब जान गया हूँ
तेरे दलालों की कुटिलता /
और कमीनेपन को भी /
पहचान गया हूँ
शुक्र है तू कहीं नहीं है /
केवल धर्म के धन्धे का /
एक ट्रेड नेम है
अगर सचमुच तू कहीं होता /
तो सदियों की /
अपनी यातना का हिसाब
मैं तुझसे जरूर चुकाता।
आदिवासी समाज हलाँकि जड,चेतन यूँ कहें कि प्रकृति के हर रूप में ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार करता है। लेकिन पूँजीवादी सभ्यता ने विकास के नाम पर जिस तरह से जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ उनके सांस्कृतिक बोध को विकृत करने का लगातार षडयंत्र किया है उसका पूरा प्रभाव उनकी जीवन शैली पर दिखाई देता है । इसलिए आदिवासी कविताएँ विकास के षडयंत्र के साथ-साथ उसके सहायक ईश्वर की अवधारणा और उसमें बाज़ार की भूमिका सबकी पडताल करती है । धर्म,ईश्वर और आस्था के मिश्रण से निर्मित सामाजिक विडम्बना जब बाज़ार से खाद पानी लेती है, तो हिंसा ईश्वर द्वारा ली गई प्रार्थना बन जाती है,गरीबी और भूखमरी ईश्वर पर यकीन न करने का परिणाम, अच्छा बने रहने और बुरे कर्मों के बाद उससे बचने दोनों के लिए ईश्वर जरूरत बन जाता है । फिर उपभोक्तावाद या मानवतावादी आपातकाल के इस दौर में मनुष्य के लिए ईश्वर तक पहुचने का रास्ता भी बाज़ार से ही होकर जा रहा है तो जाहिर है माँग और आपूर्ति को बनाए रखने में भय की भूमिका श्रद्धा और आस्था से और अधिक होगी । युवा आदिवासी कवयित्री जसिन्ता केरकेट्टा लिखती है -
और कितनी अजीब बात है/
भले और बुरे दोनों ही आदमियों के पास
एक बात बिलकुल एक सी है/
कि दोनों की आदत में
शामिल है एक ही ईश्वर।
भले और बुरे, सत्य और असत्य,धार्मिक और पाखण्डी अगर सबका ईश्वर एक है, तो ईश्वर की सत्ता और संरचना, और उसके नाम पर बनी हुई संस्थाओं के समाजशास्त्रीय मूल्याँकन का सही समय शायद दस्तक दे रहा है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि समकालीन हिन्दी कविता में ईश्वर के अन्त का समर्थन पश्चिमी सिद्धान्तों की तरह तो नहीं लेकिन विषमतामूलक एवं अन्यायपूर्ण व्यवस्था का समर्थक होने के कारण किया गया है। हिन्दी कविता में ईश्वर के अन्त का जो सन्दर्भ वेद और रोम के बदले प्रेमपत्र को बचाने, प्रभु की प्रभुताई का मर्यादा के अपने हित में इस्तेमाल करने की वैचारिकता से चला था वह इक्कीसवीं शताब्दी के इस दूसरे दशक तक आते-आते बाजार से नियंत्रित होने लगा। फिर हिन्दी के कवियों के लिए बाज़ार तो पराधीनता का नया दुष्चक्र है । इसलिए अब कवि ईश्वर की महानता और पवित्रता के बदले ईश्वर को ईख चूसते हुए (ईख चूसता ईश्वर -हेमन्त कुकरेती ) ईश्वर के बदले नींद की कामना करते हुए (ईश्वर नहीं नींद चाहिए -अनुराधा सिंह ) और उसे एक अनाडी फोटोग्राफर (ईश्वर एक अनाडी फोटोग्राफर है -राजेंद्र उपाध्याय) घोषित करता है । आस्था , अलौकिकता और भय के बदले यही कविता का मानवतावाद है । देवत्व के मनुष्यत्व पर आने का सामाजिक और साहित्यिक आधार भी यही है।

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