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आजादी की संकल्पना में लोककला का वर्तमान

अंकिता तिवारी
सन्दर्भ : ए दिए रात की ज़रूरत थे
वर्तमान समय में जब हमारा देश आजादी के 75 वर्षों के उल्लास को अमृत महोत्सव के रूप में मना रहा है , राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत के प्रति समझ विकसित करने के लिए , आजादी के मूल में छिपी अन्यान्य गाथाओं के बीच से गुजरने और आत्मसात करने के लिए कविता के उपन्यास ए दिए रात की ज़रूरत थे को पढे जाने की आवश्यकता है। शीर्षक के लिए कविता ने बशीर बद्र की पंक्तियों को साभार लिया है, उपन्यास के मूल में अन्तर्निहित लेखिका का उद्देश्य प्रकट करने के लिए एहतिशाम अख्तर की दो पंक्तियाँ कहना उपयुक्त होगा-
शहर के अँधेरे को इक चराग काफी है
सौ चराग जलते हैं इक चराग जलने से
ए पंक्तियाँ अँधेरे की मुखालिफत में रोशन चराग की जरूरत का बयान है। अँधेरे को हटाने की एक ही शर्त है- रोशनी। इसी खयाल से शायद लेखिका कविता इस उपन्यास ए दिए रात की ज़रूरत थे की नायिका का नाम रोशनी रखती है; जिसके जीवन का लक्ष्य है - दूसरों के स्वप्नों,आकांक्षाओं को पूरा करना। बहुरूपिया कलाकार समुदाय को उसकी खोयी पहचान दिलाने के लिए रोशनी प्रतिबद्ध संघर्ष का रास्ता अख्तियार करती है।
लोककलाएँ छोटी-छोटी पगडंडियों के सहारे अपनी अनथक यात्रा तय करती हैं और पीढी-दर-पीढी हस्तान्तरित होती जाती हैं,थोडे-बहुत बदलावों के साथ। समय के परिवर्तनशील चरित्र के साथ उनके स्वरूप में बदलाव आना स्वाभाविक है। सभ्यता के तकनीकी जनित विकास ने इन लोक कलाओं को हाशिए पर धकेल दिया है। पूँजी और तकनीक आधारित मनोरंजन के नवीन साधनों की सहज उपलब्धता ने लोक कलाओं की राह चुनौतीपूर्ण कर दी है। कविता का यह उपन्यास ऐसी ही एक लोक कला बहुरूपिया को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। जयपुर और आगरा के बीच स्थित गाँव आभानेर की संस्कृति से फूटी लोक कला की यह धारा लम्बे समय तक लोक समाज का मनोरंजन करती आई है। मेलों, तीज-त्योहारों, वैवाहिक आयोजनों में बहुरूपिया कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करके अपना जीवन यापन करते थे। बहुरूप बनाने में दक्ष और अपनी अदाकारी से लोक समाज को अचंभित कर देने वाले ए कलाकार आज बेकदरी का शिकार हुए हैं।
बहुरूपिया कला से सम्बद्ध कलाकारों की वर्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थिति की पडताल करता उपन्यास, कला को बचाने के रास्तों की तलाश में आगे बढता है। रोशनी को उसके मामा की तलाश बहुरूपियों की बस्ती सूर्यनगर तक ले आती है। रोशनी के मामा सिद्धार्थ कम उम्र में ही पिता की जमींदारी और धन - वैभव को ठुकराकर घर छोड कर चले गए थे। उनका यूँ चले जाना उनकी जुडवां बहन विद्या के लिए एक अन्तहीन प्रतीक्षा बन गया। विद्या के जीवन में समानान्तर रूप से अन्य घटनाक्रमों का सिलसिला चलता रहता है किन्तु भाई के बिछोह का दुख और उनके पुनः मिल सकने की उम्मीद स्थायी भाव बन जाती है - गोपीचन्द गाने और सारंगी बजाने वाले हर संन्यासी को रोकती है माँ। उन्हें भीख देती है और रोती हैं फूट-फूट कर...हर बहुरूपिए को भी कुछ न कुछ रोककर जरूर देती हैं माँ। माँ की इस पीडा और व्याकुलता को रोशनी ने छुटपन से ही महसूस किया है और इसी पीडा के चलते मामा की खोज को वह अपने जीवन का उद्देश्य बना लेती है।
सिद्धार्थ, अर्थात् रोशनी के मामा इस पूरे उपन्यास में मूर्तमान न होते हुए भी हर जगह मौजूद हैं। माँ के आँसुओं में, रोशनी की खोज में, यशोधरा और शिव की मित्रता में और सबसे अधिक अपनी डायरी के पन्नों में। सिद्धार्थ की डायरी जो बहुरूपिए गिरधर से रोशनी को मिलती है, इस उपन्यास का केन्द्रीय कथ्य है। यह डायरी एक प्रकार से लेखिका का माउथपीस है।
बहुरूपिया कला की समझ के साथ इस डायरी में जो महत्त्वपूर्ण रूप से अंकित है, वह है - भारत के स्वतंत्रता संघर्ष की अंदरूनी सच्चाई और इसमें धडकती बहुरूपिया समाज की जीवटता। सिद्धार्थ स्वयं सुभाषचन्द्र बोस के अनुयायी थे और फारवर्ड ब्लॉक के अहम सदस्य भी। स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक घटना को काल्पनिक पात्र के द्वारा प्रस्तुत कर कविता ने इतिहास का एक ऐसा पाठ निर्मित किया है जो अनकहा और अचीन्हा था। यह पाठ सत्य की कल्पना में ही विस्तार पाता है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम एक वृहद् जन आन्दोलन था जिसमें हर छोटे-बडे व्यक्ति का योगदान पैबस्त है। इतिहास को विशिष्ट नजरिए से देखने और उस नजरिए को विचारात्मक परिणति तक पहुँचाने के क्रम में कविता के भीतर बसे लेखक की रेंज देखी जानी चाहिए !
उपन्यास की अन्तर्वस्तु में स्वतंत्रता आन्दोलन की घटनाएँ टुकडों में विन्यस्त हैं और इन टुकडों को जोडकर आजादी की लडाई की एक बडी तस्वीर सामने आती है। स्वतंत्रता आन्दोलन के एक अछूते सन्दर्भ में यह उपन्यास हमारी समझ का विकास करता है। उपन्यास में वर्णित स्वतन्त्रता आन्दोलन सम्बन्धी गतिविधियों के सन्दर्भ में दो पक्ष सामने आते हैं। डायरी में उल्लिखित अकल्प चाचा के पत्र से क्रांतिकारी दल की कार्य प्रणाली का एक छोटा-सा हिस्सा सामने आता है। वह 1904 के आस-पास का समय है। अकल्प चाचा खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी के साथी हैं। डायरी में अकल्प चाचा के सन्दर्भ को विस्तार देने के लिए पत्रों का प्रयोग किया गया है। अकल्प चाचा के समय का सच उनके द्वारा अपने भाई को लिखे पत्रों के माध्यम से सामने आता है। हालाँकि सिद्धार्थ की डायरी में इन पत्रों का सम्पूर्ण रूप में मौजूद होना व्यावहारिक नहीं लगता, किन्तु लेखिका अपने मंतव्य को साध ही ले जाती हैं। पत्र के एक छोटे-से अंश का उद्धरण यह दिखा सकने में सक्षम होगा कि कविता किस प्रकार आजादी की लडाई के आन्तरिक पहलुओं को उपन्यास का अहम हिस्सा बना पाई हैं - मुझे उदारवादियों की सोच से कोई दिक्कत नहीं है, परन्तु उनके ढुलमुलपने से है। वे तो डोमिनियन स्टेट,स्वशासन और स्वाधीनता के ऊहापोह में ही अब तक डूबे हुए हैं। यह क्रांति शायद इसीलिए नेतृत्वहीन हो गयी है। उपन्यास में कई महत्त्वपूर्ण डिटेल्स हैं, जैसे-बी.डी. पाल को सजा होना, छह माह के कारावास की सजा के बाद तीन वर्ष के अज्ञातवास। लाला लाजपतराय को चार वर्ष की सजा होना; तिलक का माँडले जेल में और अरबिन्द घोष का राजनीति से विमुख होकर धर्म की ओर मुडना। कहना होगा कि कविता, अकल्प चाचा के माध्यम से क्रांतिकारियों के प्रति अपनी पक्षधरता को स्पष्ट करती हैं। वह रेखांकित करती हैं कि निष्क्रिय विरोधों से कुछ भी नहीं होने वाला ! हल एक ही है - अपनी शक्ति के बल पर सिर्फ सैनिक विप्लव। उन्हें देश छोड देने को बाध्य और विवश करना।
अकल्प चाचा के प्रकरण के बाद स्वतंत्रता आन्दोलन के आगामी समय को सिद्धार्थ के माध्यम से अभिव्यक्ति मिलती है जिसका ज़रिया पुनः डायरी बनती है। वास्तव में उपन्यास का एक बडा हिस्सा इसी डायरी के पृष्ठों से निकल कर सामने आता है। सिद्धार्थ का जन्म अकल्प चाचा की मृत्यु के दस साल बाद ठीक उसी दिन हुआ था। सिद्धार्थ कहीं न कहीं उनसे खुद को जुडा हुआ पाते हैं। अकल्प चाचा की ही तरह वे भी क्रांति का रास्ता चुनते हैं।
भारत विभाजन की त्रासदी का काला समय भी डायरी में अंकित है। लेखिका डायरी के माध्यम से उन मुद्दों को बडी सहजता से विश्लेषित कर देती हैं जिन्हें इतिहासकारों की भाषा में समझना शायद कठिन होता ! सिद्धार्थ की आन्तरिकता में पैठकर यह महसूसा जा सकता है कि स्वतंत्रता की लडाई उनके लिए एक बेहद भावुक और संवेदनशील निर्णय था। स्वतंत्रता आन्दोलन के कई तथ्यों और पहलुओं को वह जिस भावुकता से सामने लाते हैं उसमें एक गहरी अपील है। उनकी इस अपील में आजादी का एक बडा परिदृश्य दिखाई देता है। वेबेल प्लान, कैबिनेट मिशन और माउण्टबेटन प्लान का नियोजन इस परिदृश्य को वैधता प्रदान करते हैं।
उपन्यास का मूल कथ्य बहुरूपिया समाज का अतीत और वर्तमान है जिसमें स्वतंत्रता आन्दोलन की संघर्ष रश्मियाँ चमकती हैं। कविता दिखाती चलती हैं कि बहुरूपिया कलाकार आज भिक्षुक बन जाने को अभिशप्त हैं। कविता बार-बार इस बात को दोहराती हैं कि कला और आजीविका की अनिवार्य पारस्परिकता नहीं होनी चाहिए। कलाकार की जीविका के अन्य साधन भी हों, तभी कलाएँ बच सकती हैं ! रोशनी के माध्यम से भी वह इसी बात को रेखांकित करती हैं। सिद्धार्थ, रूपल भी कला को बचाने के लिए इसी रास्ते को उचित मानते हैं। लोककलाओं का स्थान आज संस्कृति विभाग के पन्नों तक ही सिमटकर रह गया है; आम जन के बीच इनकी लोकप्रियता लगभग मिटती जा रही है। कला से जब जीवन निर्वहन कठिन हो जाए तो कला या जीवन में से जीवन को ही चुना जा सकता है ! रोशनी इसका हल कुछ यों देती है - बच्चे सिर्फ बहुरूपिया कला ही क्यों सीखें, मनसुख काका से जूते बनाना,गोपाल से बढईगिरी और इसी तरह अन्य लोगों से भी अलग-अलग काम। इस तरह से ए बच्चे कल को आत्मनिर्भर हो सकेंगे और खुद की पसंद का काम चुन सकेंगे और बहुरूपिया बनेंगे भी तो सिर्फ कला के लिए, आजीविका के लिए नहीं। रोशनी का यह विचार काफी हद तक डायरी में अंकित सिद्धार्थ के विचारों से मेल खाता है-कलाकार बने रहो,पर मन और आत्मा से। रोटी तो कहीं और ही तलाशनी होगी। उसके लिए तो मजदूर बनना होगा। यह हमारे देश का सबसे बडा दुर्भाग्य है कि कलाकार ही यहाँ भूखे मरते हैं। लोककलाओं के सन्दर्भ में रोशनी और सिद्धार्थ की यही चिंताएँ ही उपन्यास का प्रस्थान हैं। वास्तव में कला और संस्कृति के प्रति मान-सम्मान और उनके संरक्षण की चाह जब तक जन विचार नहीं बनती, तब तक उनके अस्तित्व के विलोपन का खतरा मँडराता रहेगा ! यहाँ पर यह कहना भी अनुपयुक्त न होगा कि यदि कविता शिव और सिद्धार्थ के मेल से आजादी की लडाई में बहुरूपियों के अवदान पर कुछ और विस्तार में जातीं तो उपन्यास का फलक और विस्तृत हो सकता था। इस बात का उन्होंने संकेत मात्र किया है कि सिद्धार्थ ने बहुरूपियों की संगत में रहकर भेष बदलने की जिस कला को सीखा वह आजादी के संघर्ष में उनके लिए सहायक सिद्ध होती है। कविता स्वतंत्रता संग्राम की डीटेलिंग के साथ बहुरूपियों की वर्तमान स्थिति पर ज्यादा फोकस करती हैं।
कविता अपने लेखन के माध्यम से संभावनाओं की असीम दुनिया को देखने और उसे व्यावहारिकता में लाने का प्रयास करती हैं। बदलाव उनके लेखकीय सरोकारों की अनिवार्य टेक है। ध्यानपूर्वक देखें तो कविता इस बदलाव में शिक्षा को महत्त्वपूर्ण साधन मानती हैं। इस उपन्यास के माध्यम से वह दिखाती हैं कि रोजगारपरक शिक्षा के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर मजबूती से बढा जा सकता है। उपन्यास की सूत्रधार या कहें केन्द्रीय चरित्र रोशनी को इस सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। रोशनी के साथ चलते हुए इदंनमम उपन्यास की मन्दाकिनी, चाक उपन्यास की सारंग, आंवा उपन्यास की नमिता की स्मृति कौंध छोड जाती है और इस क्रम में हम देख पाते हैं कि रोशनी का संघर्ष इन उपन्यासों के महिला चरित्रों के संघर्ष से कितना आगे निकल जाता है ! रोशनी जैसी चरित्रों को रचने की उपलब्धि यही है कि वह दूसरों के सपनों को अपने सपनों से जोडना जानती है और उनको पाने का रास्ता भी !
बहुरूपिया समाज की स्थिति से दो चार होते हुए कविता व्यवस्थागत सवालों को भी उठाती हैं। वह अंग्रेजों द्वारा 1871 में बनाए गए क्रिमिनल ट्राइब एक्ट की अमानवीयता को दर्ज करते हुए दिखाती हैं कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी इन कानूनों में आमूल चूल बदलाव नहीं किए गए हैं। 1951 का सिविल आफेंडर एक्ट कुछ जनजातियों को तो जरायमपेशा की परिधि से बाहर निकालता है किन्तु अधिकांश जनजातियों के ऊपर यह अब भी लागू है। उनकी औरतें मानो सामाजिक सम्पत्ति हों और पुरुष सारे अपराधों के जिम्मेदार ! मानों उनका जन्म ही अपराधी ठहराए जाने के लिए हुआ है ! उनका पूरा जीवन संदेह के अँधेरे और तंग रास्तों से गुज़रता है। उपन्यास में इसका भोक्ता बहुरूपिया शिव भी बनता है और कालांतर में उसका बेटा गिरधर भी इन लोगों के प्रति सन्देह की इस मानसिकता के चलते जेल जाता है।
बहुरूपिया कला और स्वतंत्रता संघर्ष के साथ जो एक खास प्रभाव इस उपन्यास में मौजूद है वह है - प्रेम की आकुलता। प्रेम की उद्दात्तता और विराटता उपन्यास में कुछ ऐसे गुंथी हुई है कि कथ्य उससे कहीं भी अलग नहीं हो पाता। यशोधरा, शिव और सिद्धार्थ का प्रेम कथा के वितान में सर्वस्व मौजूद है। यशोधरा का बहुरूपिए शिव के प्रति आकर्षण का कारण क्या है ! शिव का शारीरिक सौष्ठव ! गोरा, लम्बा शरीर,बडी-बडी घनेरी मूँछें, बडेरी आँखें, खूब सुतवा नाक और खूब लम्बे पैर या शिव के द्वारा धरे जाने वाले नाना वेष ! मनोवैज्ञानिक पडताल करें तो हम पाएँगे कि यह प्रेम के निषेध के प्रति उपजने वाला नैसर्गिक आकर्षण है। एक धनी-मानी परिवार की रूपसी कन्या की अपने पास सब कुछ होने की भावना से विरक्ति। यशोधरा का शिव से परिचय और संवाद विहीन यह अतिशय प्रेम और इस प्रेम को परिणति तक ले आने की जिद के लिए पारिवारिक और सामजिक नियमों के खिलाफ इतना बडा कदम उठा लेना रोमांटिसिज्म की पराकाष्ठा जैसा लगता है! यशोधरा राय पर पहरे इतने ज्यादा थे कि शिव के प्रति उसके आकर्षण, प्रेम और अन्ततः उसके साथ भाग जाने को इन सीमाओं के प्रति विद्रोह के रूप में भी देखा जा सकता है। कथा के विकास क्रम में यशोधरा का व्यक्तित्व और निखर कर सामने आता है और वह प्रेम के चुनाव के पश्चात जीवन की हर कठिनाई का डटकर मुकाबला करती है! प्रेम में लिए गए निर्णयों के सन्दर्भ में यह एक बडा सन्देश है।
प्रेम की विकलता और अधैर्य यशोधरा के प्रारंभिक चरित्र में दिखते हैं, तो सिद्धार्थ के प्रेम में उतना ही गाम्भीर्य और स्थिरता है। यशोधरा के प्रति सिद्धार्थ का प्रेम एक अलौकिक भाव बोध का सृजन करता है। अपनी इच्छाओं- आकांक्षाओं को परे हटाकर सिर्फ यशोधरा के सपनों को पूरा करना ही उनका ध्एय बन जाता है। यशोधरा के प्रति विकट आकर्षण के बावजूद सिद्धार्थ यशोधरा को उसके प्रेम शिव तक पहुँचाने के एकमात्र वाहक बनते हैं। शिव के प्रति अपनी मित्रता के प्रण को भी आजीवन निबाहते हैं - आसक्ति शब्द तुच्छ लगता है मुझे , यश के लिए अपने लगाव को व्यंजित करने में। परम्परागत हर शब्द उस मोह के आगे नगण्य जैसे। पर क्या करूँ कि बने-बनाए शब्दों को बरजकर कोई नया शब्द गढने में असमर्थ पाता हूँ खुद को... वास्तव में प्रेम को शब्दों में प्रकट किया भी नहीं जा सकता, प्रिय के प्रति किया गया व्यवहार उसके मापन का एक घटक बन सकता है। सिद्धार्थ का प्रेम एकात्म समर्पण और निस्वार्थता का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर कथा में व्यंजित है।
कविता प्रेम के सहज सरल रास्तों के बजाय कठिन रास्तों को चुनती हैं। यशोधरा शिव को न चुनकर यदि सिद्धार्थ को चुनती या रोशनी नदीम को न चुनकर आकाश को, तो दोनों का ही जीवन अपेक्षाकृत आसान होता किन्तु कविता प्रेम को शीतल, तृप्तिदायक जल न मानकर आग का दरिया मानती हैं। असम्भाव्य की प्राप्ति की संभावना में जो उत्तेजना व आकर्षण है वह सीधे सरल मार्ग पर आगे बढने में कहाँ ! किसी के प्रति अथाह प्रेम होने का कारण क्या होता है! इतना प्रेम कि उसके समक्ष जीवन की प्रत्येक कठिनाई बौनी लगने लगे! इस प्रश्न का कोई उत्तर दे पाना असम्भव की हद तक मुश्किल है। इसीलिए शायद कविता यशोधरा के शिव के प्रति या रोशनी के नदीम के प्रति गहन लगाव को व्यावहारिक धरातल पर समझा नहीं पाती। जिस सवाल का कोई जवाब न हो वह अपनी संरचना में कितना व्यापक और आन्तरिकता में कितना गहरा होगा इसे कहने की ज़रूरत नहीं! किन्तु अन्ततः यह मार्ग आत्महंता परिस्थितियों में जाकर समाप्त होता है- शिव और नदीम की आत्महत्या प्रेम की समस्त दार्शनिकता पर एक बडा प्रश्नचिह्न छोड जाती है। प्रेम के आदर्श को दिखा देने के पश्चात कविता सामाजिकता की ओर मुड जाती हैं और रोशनी की माँ के अनुभव को एक पूर्ण समाज के निर्णय के तौर पर प्रस्तुत कर देती हैं- रिश्ते बराबरी में ही चलते हैं, पनपते और पलते भी।
उपन्यास में गिरधर का रोशनी के प्रति लगाव का संकेत या रहमान चाचा और माँ के सम्बन्धों की स्निग्धिता का जो एँगेल लेखिका ने जोडा है वह सहज प्रतीत नहीं होता और न ही इसकी कोई आवश्यकता कथा विकास में दिखती है । इस उपन्यास की स्त्री पात्र यशोधरा, रूपल, माँ और रोशनी स्त्री की भावात्मक शक्ति के पुंज के एकत्रीकरण के रूप में व्यक्त होती हैं। इनमें से प्रत्येक अपने आप में विशिष्ट हैं और अपने-अपने स्तर पर एक आदर्श को परिकल्पित करती है। रूपल का संघर्ष अपने समय और समाज के खिलाफ एक स्त्री का हलफनामा है। बहुरूपिया बनने की कवायद स्त्रियाँ नहीं करतीं किन्तु अपने पति की बीमारी में घर चलाने के लिए वह इस चुनौती को स्वीकार करती है। उसका व्यक्तित्व संघर्ष की आँच में तपकर निखरे सोने की तरह अपनी चमक पाठकों तक बिखेरता है। कम पंक्तियों में भी उसकी मौजूदगी एक मानीखेज एहसास देकर जाती है। रूपल और यशोधरा का कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहना, परिवार की जिम्मेदारियों के प्रति पूर्ण समर्पण संघर्ष की मिसाल कायम करता है।
किसी भी रचना का मूलभूत गुण है उसकी पठनीयता। ए दिए रात की ज़रूरत थे गजब के पठनीय आस्वाद से भरपूर है, मगर इसके लिए रचना के भीतरी प्रवाह में धँसना पडता है, सतही तौर पर इसके प्रवाह में एकमेक होना सम्भव नहीं ! इसकी सतह में अगर भावना का प्रवाह है, तो इसकी गहराई में वैचारिकी की मंथर गति। कविता इस रचना को एक बौद्धिक समृद्धि तक ले जाती हैं। इस बौद्धिक समृद्धि को वह भावना और प्रेम की डोर से अलग नहीं होने देतीं। उपन्यास के शिल्प को डायरी और पत्र शैली में इस तरह गूंथा गया है कि कई बार पाठक चकित हो जाता है। कथा संवहन की यह एक अलहदा शैली है। डायरी का अंश-अंश में पढा जाना और अचानक वर्तमान पर आकर कथा का रुक जाना पाठक की उत्सुकता को लगातार बढाता जाता है। इन अर्थों में देखा जाए तो कविता अपने समय की एक सामर्थ्यवान लेखिका बनकर उभरती हैं। उपन्यास अपने पूरे कलेवर में भाषा की स्तरीयता और अर्थ के गाम्भीर्य को कहीं भी नहीं छोडता। पाठक जब इस रचना से बाहर निकलता है तो वह बहुत कुछ नया लेकर लौटता है।
उपन्यास का अन्त एक संभावना के साथ होता है। सिद्धार्थ और विद्या को पारम्परिक विरासत में प्राप्त उस जमीन पर, जिसके ओर-छोर में कहीं न कहीं गरीब-शोषितों की आहें घुली मिली थीं, उसकी इमारत को एक शिक्षण संस्था में ढाल दिया जाता है। शिक्षण संस्था- जिसके अन्दर सामाजिक बदलाव की अपूर्व क्षमता है। शिक्षा ही वह रोशनी है जिसके बल पर समाज को आगे का रास्ता दिखाया जा सकता है। कविता का यह उपन्यास उजास के साथ एक उम्मीद छोड जाता है , साहित्य का समाज को प्रदेय यही है।

सम्पर्क-सहायक प्रोफेसर-हिन्दी,
राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
बाँदा,(उ.प्र.)
मो. 914001699