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इतिहास लेखन में कस्तूरबा

चित्रा माली
कस्तूर का जन्म 11 अप्रैल 1869 को पोरबन्दर में हुआ था और यह बात भी सर्वविदित है कि कस्तूर गाँधी जी से छह माह बडी थीं । बडे होने को लेकर गाँधी और कस्तूर में विवाद भी होता रहता था । गाँधी अपने आप को बडा जतलाना चाहते थे और कस्तूर सत्य को झुठलाने नहीं देती थी । गुजरात के पोरबंदर में कस्तूरबा और गाँधी का पैतृक निवास है,जो आस-पास ही है। सभी पर्यटक गाँधी के चार मंजिला मकान को देखकर लौट आते हैं,जबकि पास ही कस्तूरबा का मकान है उसे देखने की जहमत नहीं उठाते हैं क्योंकि सोशल कंडीशनिंग ही इस तरह की है कि कस्तूर के अलग व्यक्तित्व को या अलगाकर देखने की दृष्टि ही विकसित नहीं हो पाती है। गिरिराज किशोर जब पोरबंदर में गाँधी जी का मकान देख रहे थे तब एक दूसरे पर्यटक ने उनसे पूछा आपने कस्तूरबा का मकान देखा है? उनका जवाब था- नहीं, कहाँ है पर्यटक ने बताया, पीछे ही है । कस्तूरबा के घर के बाहर एक बुजुर्ग व्यक्ति से जब गिरिराज किशोर ने पूछा कि क्या यह कस्तूरबा का घर है, उन बुजुर्ग सज्जन ने अजीब नजरों से गिरिराज किशोर को देखते हुए पूछा तुम कस्तूर को जानते हो मुझे मालूम है,कस्तूर को अब कोई नहीं जानता । सब गाँधी को जानते हैं । भूला भटका कोई यहाँ आ जाता है। वह सज्जन जब ए सब कहे जा रहे थे, उनकी आँखों में शिकायत और वेदना साफ दिखाई दे रही थी । उन बुजुर्ग सज्जन के सवालों का कोई जवाब मेरे पास नहीं था । इस वाकए का जिक्र गिरिराज किशोर ने अपने उपन्यास बा में किया है । गाँधी का विराट व्यक्तित्व होने पर भी उसमें कस्तूर के अस्तित्व का विलय नहीं किया जा सकता है । कस्तूर का अपना एक अलग अस्तित्व है जो कई मायनों में गाँधी से भिन्न होते हुए भी एक-दूसरे के पूरक की तरह काम करते हैं,एक के बिना दूसरे की कल्पना मुश्किल है । सबाल्टर्न इतिहास की धारा ने कई दमित,शोषित अस्मिताओं को मुख्य धारा से जोडने का कार्य किया है जो कास्ट,क्लास,और जेंडर के आधार पर हाशिए पर थी। उनमें से कई फॉरगाटन वूमन थी जिन्हें भुला दिया गया था। इतिहास लेखन की इसी धारा ने नए - नए विमर्शों को जन्म दिया है, उन्हीं के तहत आज हम कस्तूर कपाडिया पर बात कर रहे हैं । कस्तूर पर पहली किताब वनमाला पारिख और सुशील नैयर ने गुजराती में लिखी है जिसका हिन्दी अनुवाद हमारी बा नाम से प्रकाशित हुआ है । वनमाला पारिख अपनी किताब हमारी बा में लिखती हैं, बापू के गर्विष्ठ पति होते हुए भी जब जरूरत मालूम हुई,बा उन्हें चेतावनी देने में पीछे नहीं रहीं। कस्तूरबा जैसी सरल पत्नी अपने गर्वीले पति को उसके दायित्व और अधिकारों के प्रति आगाह कर सकती है तो वह अपनी जिम्मेदारी को भी पूरी तरह समझती है । यह किताब कस्तूर के उत्तरार्ध जीवन में झाँकने का अवसर प्रदान करती है । कस्तूर के जीवन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ राजनीतिक जीवन में भी किसी प्रकार का न कोई द्वंद्व था न ही संघर्ष, वे दोनों ही मोर्चों पर समान रूप से कार्य कर रही थीं। कस्तूर पर दूसरी किताब मणिलाल गाँधी के पुत्र अरुण गाँधी और पुत्रवधू सुनन्दा गाँधी ने लिखी है द फॉरगाटन वूमेन । जिसमें अपनी दादी कस्तूरबा के जीवन के हर पक्ष को गहराई से लिखा गया है । शायद लेखकों को भी कहीं न कहीं यह लगता हो कि उनकी दादी की उपेक्षा की गई है । कस्तूर पर तीसरी और महत्त्वपूर्ण किताब एक उपन्यास बा के रूप में है जिसे गहन शोध के बाद गिरिराज किशोर ने लिखा है। जिसमें पूर्व की दोनों किताबों का सन्दर्भ लिया गया है। इसके पूर्व गिरिराज किशोर पहला गिरमिटिया लिख चुके थे । जो गाँधी पर ही केंद्रित था, लेकिन उनके इर्द गिर्द के पात्र भी उसमें समाहित थे जिनमें कस्तूर भी कहीं न कहीं मौजूद थी । कस्तूरबा से एक बार पूछा गया कि बापू की आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में आप कहाँ हैं कस्तूरबा ने हँसकर कहा था, मैंने तो पढी नहीं, पढ भी नहीं सकती थी। लेकिन मैं यह जानती हूँ कि मेरे अनपढ होने की जिम्मेदारी उन्होंने हम दोनों में समान रूप से बाँटी हैं । बापू ने जो सत्य के साथ प्रयोग किए हैं, उन्हें मैंने भोगा है। गाँधी के सत्य के साथ प्रयोगों ने उन्हें व कस्तूर को अपने परिवार,परिजन और समाज के विरुद्ध भी कईं बार खडा किया है । कस्तूर के लिए ऐसी दुविधा के क्षण भी आए हैं कि वे किस तरफ जाएँ और किसका साथ दें, एक तरफ पति और दूसरी तरफ बेटा, लेकिन इन सभी विषम परिस्थितियों में भी कस्तूर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटीं । सामाजिक जीवन में प्रवेश करने से पहले तथा गाँधी के सत्य के प्रयोगों से पूर्व भी कस्तूर में सच को कहने का साहस कम नहीं था । ऐसा ही एक वाकया गाँधी के इंग्लैण्ड से भारत आने के बाद पोरबन्दर का है । जब वे बैरिस्टर बन गए थे और घर की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल थी,ए बताने का साहस कस्तूर ने किया था तुम्हे मालूम है कि बडे भईया पर कितना कर्ज है तुम्हारी पढाई और रहने के खर्च के कारण और साथ ही तुम्हारे अनुसार घर में जो परिवर्तन किए गए हैं उनमें भी कम खर्च नहीं हुआ है। अब उनको तुम्हारी सहायता की जरूरत है। इस सच और जिम्मेदारी का एहसास जब कस्तूर के द्वारा मोहनदास को कराया गया, तो वे अन्दर तक हिल गए थे और क्रोधित हो दूसरे ही दिन कस्तूर को हरि के साथ रेल में बिठाकर पोरबंदर उनके मायके भेज दिया था। मोहनदास की इस तरह की प्रतिक्रिया का कस्तूर ने कोई प्रतिकार नहीं किया ।
यह उसी साहस का प्रतिफलन है कि आज हम कस्तूरबा पर अलग से बात कर रहे हैं जो महज गाँधी जी की पत्नी ही नहीं थी,उनका अपना खुद का एक स्वतंत्र अस्तित्व था। कस्तूर से कस्तूरबा बनने का एक लम्बा सफर है जिसकी शुरुआत गाँधी जी से विवाह करके होती है। कस्तूर का विवाह मात्र तेरह वर्ष की आयु में गाँधी के साथ हो गया था। विवाह के बाद का जीवन सामान्य पति-पत्नी के जीवन से शुरू होकर एक-दूसरे के सच्चे मित्र हो जाने तक का सफर था। कस्तूर ने सबसे पहला प्रतिरोध शादी के बाद गाँधीजी के पतित्व की धारणा के बाद किया था जिसमें एकपत्नी व्रत का पालन गाँधीजी के द्वारा किया जा रहा था और वे कस्तूर से भी एकपति व्रत का पालन करवाना चाह रहे थे,जिसके चलते उन्होंने कस्तूर के कहीं भी आने-जाने पर अपना नियंत्रण रखना चाहा था लेकिन आने-जाने के निर्णय को लेकर कस्तूर ने गाँधी जी के द्वारा लगाए अंकुशों का विरोध किया। कस्तूर अपने निर्णय स्वयं लेती थीं, गाँधी जी जितनी रोक-टोक लगाते वह उनको नहीं मानती थी। अपने विवाह के आरंभिक जीवन में ही कस्तूर के प्रतिरोधी स्वरूप को देखा जा सकता है। कस्तूर साहस और आत्मविश्वास से लबरेज थी जो उस दौर की महिलाओं में बहुत ही कम पाया जाता था । अपने पति की आज्ञा की अवज्ञा करना उस दौर में सामान्य नहीं था,लेकिन साहसिक कस्तूर के द्वारा अवज्ञा की गई । सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह के व्यावहारिक प्रयोगों को गाँधी ने कस्तूर से ही सीखा था ।
कस्तूर और गाँधी के जीवन का दूसरा अध्याय गाँधी के विदेश प्रवास से प्रारम्भ होता है । इंग्लैण्ड प्रवास से लौटने के बाद शीघ्र ही गाँधी को दक्षिण अफ्रीका जाना पडा । दक्षिण अफ्रीका के दूसरे प्रवास के समय गाँधी अपने साथ कस्तूर को ले गए। दक्षिण अफ्रीका के पहले प्रवास के दौरान हुए कटु अनुभवों ने गाँधी को अन्दर तक झकझोर दिया था यही समय मोहन से महात्मा बनने का भी है । इस दौरान गाँधी कई नए प्रयोग अपने साथ कर रहे थे । गाँधी और कस्तूर के परिवार से पहली महिला विदेश यात्रा कर रही थी यह बात कस्तूर के लिए गौरव की थी,साथ ही आधी आबादी के लिए भी जो आज तक अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तलाश में हैं। गाँधी दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स आश्रम की स्थापना कर एक ऐसे समाज का निर्माण करने का प्रयास कर रहे थे जहाँ धर्म, जाति, रंग, नस्ल या लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव न हो । सबके साझे सरोकार और सबके साझे सुख दुःख हो । जहाँ सभी कार्य आश्रमवासियों के द्वारा स्वेच्छा से किए जाएँ । जहाँ तक कस्तूर का आश्रम में रहने का सवाल था वह गाँधी की सहधर्मिणी बनकर उनके प्रयोगों में शामिल होने का प्रयास कर रहीं थीं । लेकिन कस्तूर जिस सामाजिक संरचना से समाज व्यवस्था से आई थीं वहाँ कार्यों का स्पष्ट विभाजन था जो गाँधी के द्वारा किए जा रहे प्रयोगों के अनुकूल नहीं था । जिससे विवादों का होना लाजमी था । आश्रम में पहला विवाद पाखाने की सफाई को लेकर था,कस्तूर ने पाखाने की सफाई करने से मना कर दिया जिस पर गाँधी जी ने आक्रोश में कस्तूर को वहाँ से चले जाने के लिए कहा तब, कस्तूर ने गाँधीजी से कहा, विदेश में मैं अकेली कहाँ जाऊँ मैं आफ साथ यहाँ आई हूँ,जितना हक आपका है उतना हक मेरा भी है इस आश्रम पर। लोगों द्वारा कस्तूर को गाँधी की अनुयायी या अनुगामी कहा जाता था,पर ऐसा था नहीं। कस्तूर के अपने स्वतन्त्र विचार और धारणाएँ थी जो गाँधी से भिन्न भी थी । गाँधी की सबसे बडी आलोचक कस्तूर थीं जो गाँधी के हर कदम पर सही गलत का आकलन करती थी ।
दक्षिण अफ्रीका में 1913 में एक काला कानून पास हुआ जिसमें ईसाई मत के अनुसार किए गए विवाह और विवाह विभाग के अधिकारी के यहाँ दर्ज किए विवाह के अतिरिक्त अन्य विवाह मान्य नहीं रह गए थे । दूसरे शब्दों में हिन्दू, मुसलमान,पारसी आदि लोगों के विवाह अवैध करार कर दिए गए और ऐसी विवाहित स्त्रियों की स्थिति पत्नी की न होकर रखैल जैसी रह गयी थी ।
इस कानून के विरोध में गाँधी जी ने सत्याग्रह करने का निश्चय किया और उसमें सभी से सम्मिलित होने का आह्वान किया । किन्तु कस्तूर से गाँधी ने इस सत्याग्रह में भाग लेने के लिए नहीं कहा । कस्तूर को इस बात का काफी बुरा लगा और उन्होंने गाँधी जी से इस बात पर अपना विरोध भी दर्ज किया । गाँधी जी ने अपना तर्क रखा और उनसे कहा कि वे नहीं चाहते थे कि मेरे कहने से तुम सत्याग्रहियों में जाओ और फिर बाद में कठिनाईयों में पडकर विषम परिस्थिति उपस्थित करो। अगर तुम स्वेच्छा से इस काले कानून के खिलाफ सत्याग्रह में शामिल होना चाहती हो तो अवश्य हो। कस्तूर स्वेच्छा से सत्याग्रह में शामिल हुई और तीन अन्य महिलाओं के साथ जेल गईं। जेल का भोजन शाकाहारी न होने के कारण कस्तूर ने जेल अधिकारियों से फलाहार की माँग की । जेल में चार दिन तक बिना खाए कस्तूर को रहना पडा । पाँचवे दिन से तीन टमाटर प्रतिदिन फलाहार के रुप में कस्तूर को दिया जाने लगा,जो सन्तुलित आहार की दृष्टि से काफी कम था। तीन माह तक कस्तूर इसी आहार पर रही,जिससे उनके स्वास्थ्य पर काफी असर पडा। यह कस्तूर के जीवन का पहला सार्वजनिक सत्याग्रह और जेल में अहिंसक प्रतिरोध था ।
1915 में जब कस्तूर गाँधी के साथ भारत लौटीं, तब पत्रकारों ने उनसे सवाल किया था,क्या आप वहाँ जेल में रही थीं? तब उनका जवाब था, हाँ, मैं उस काले और दमनकारी कानून के खिलाफ जेल में गई थी। उस दौर में किसी भारतीय महिला का जेल जाना सामान्य बात नहीं थी। इसमें गौर करने वाली और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इस सत्याग्रह में कस्तूर का शामिल होना, उनका आत्मनिर्णय था, गाँधी ने इसके लिए उन्हें प्रेरित किया था,प्रभावित नहीं किया था ।
भारत में आने के बाद गाँधी ने सत्य के साथ जितने प्रयोग किए उन सभी प्रयोगों में कस्तूर ने अपनी भागीदारी या कहें सक्रिय भागीदारी अदा की। चाहे वह चम्पारन के तिहरवा गाँव में रहकर दवाई वितरण का कार्य हो,साफ- सफाई के लिए महिलाओं और बच्चों को प्रेरित करना हो या खेडा सत्याग्रह के समय घूम-घूमकर स्त्रियों में उत्साह का संचार करना हो ।
1922 में जब गाँधीजी को गिरफ्तार किया गया और उन्हें छह साल की सजा हुई उस समय कस्तूर ने कमान सम्भाली और भाषण दिया, जिसने उन्हें वीरांगना के रुप में प्रतिष्ठित किया । यहाँ गाँधी से अलग उनकी अपनी अस्मिता का निर्माण हुआ जो कस्तूर को कस्तूरबा में परिवर्तित कर रहा था । कस्तूर ने जब सामाजिक और राजनीतिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करना आरम्भ की तब वैश्विक पटल पर नारीवादी दृष्टिकोण क्या था और नारीवाद के विकास के विभिन्न चरणों में हम कस्तूर के इन प्रयासों को किस चरण में अनुकूल देखते हैं,यह नारीवादी दृष्टिकोण से देखना महत्वपूर्ण होगा ।
वैश्विक परिदृश्य में नारीवाद की पहली लहर (First-wave faminism) के समय कस्तूर दक्षिण अफ्रीका में है और वहाँ भी स्वेच्छा से सत्याग्रह में शामिल है। पहली लहर मुख्य रुप से महिलाओं के मताधिकार पाने और विधिसम्मत आधिकारिक तौर पर असमानताओं पर मुख्य रूप से केंद्रित थी । नारीवाद की पहली लहर का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक असमानताओं से लडने पर ध्यान केंद्रित करना था ।
यही प्रयास कस्तूर के द्वारा दक्षिण अफ्रीका के प्रयोगों और सत्याग्रह आन्दोलन के रूप में देखने को मिलते हैं । जिन्हें राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक असमानताओं के लिए प्रतिरोध के रूप में भी देख सकते हैं। कस्तूर के द्वारा किए गए इन सक्रिय प्रयासों को नारीवाद की पहली लहर के विकासक्रम में रख सकते हैं ।
भारत में नारीवाद की दूसरी लहर 1915 से 1947 तक है जो भारतीय राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भूमिका को भी दर्शाती है, इसका सम्बन्ध लिंग असमानता के साथ है । नारीवाद की दूसरी लहर मुख्य रूप से महिला की पहचान (Identity) पर जोर देकर कई दशकों की राजनीतिक सोच को एक साथ पेश करती है । नारीवाद की दूसरी लहर काफी हद तक मताधिकार के अलावा अन्य असमानता के भेदभाव समाप्त होने के रूप में,इस तरह के कई मुद्दों के साथ सम्बन्धित है । नारीवाद की दूसरी लहर के सन्दर्भ में अगर कस्तूर द्वारा किए गए प्रयास को देखें, तो कहीं-न-कहीं उनमें राजनीतिक समझ और अधिकारों की जागरूकता को निकट से देख सकते हैं।
कस्तूर द्वारा किए गए प्रयासों ने महिलाओं में राजनीतिक समझ और अपने अधिकारों की समझ को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है। 1939 में राजकोट के ठाकुर साहब ने प्रजा को कतिपय अधिकार देना स्वीकार किया था, किन्तु बाद में मुकर गए । इसी के साथ ठाकुर साहब सुन्दर लडकियों को उठावा लेते थे और उनके साथ जबरदस्ती की जा रही थी। जब इस खबर की पुष्टि हुई तो जनता ने सत्याग्रह शुरू कर दिया। पहली सत्याग्रही बंदी मणिबेन को बनाया गया जो सरदार पटेल की बेटी थी और कस्तूर के अधिक निकट थी। यह खबर जब सेवाग्राम पहुँची तो कस्तूर व्याकुल हो उठी थी। कस्तूर ने कहा अब यह मामला मात्र राजनीतिक अधिकारों का नहीं रहा अब ए महिलाओं के सम्मान से जुड गया है। मैं खामोश नहीं रहूँगी। कस्तूर महिलाओं की अस्मत को बचाने और सत्याग्रह में शामिल होने के लिए राजकोट चली गई । गाँधी जी ने हरिजन में लिखा था मेरी पत्नी वहाँ (राजकोट) की जनता की पीडा से दुखी है । हालाँकि वह भी मेरी तरह बुढा गई है, जेल की कठिनाइयों को सहन करने में वह मुझसे भी कम समर्थ है । वह राजकोट जाना चाहती है । जब यह समाचार प्रकाशित होगा तब तक वह राजकोट जा चुकी होगी।
कस्तूर जैसे ही राजकोट पहुँची, उन्हें नजरबंद कर लिया गया । इस पूरी लडाई में कस्तूर महिलाओं के साथ असमानता, भेदभाव और अन्य कई मुद्दों पर लडती दिखाई देती हैं ।
भारत छोडो आन्दोलन के आह्वान के लिए जब गाँधीजी को 9 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर लिया गया तब कस्तूर ने शिवाजी पार्क (बम्बई) में भाषण देने का निर्णय लिया, किन्तु पार्क के द्वार पर पहुँचते ही गिरफ्तार कर ली गयीं । ऐसे अवसर कस्तूर के जीवन में कई बार आए और उन्होंने इन अवसरों का इस्तेमाल राष्ट्रीय आन्दोलन और स्वतंत्रता प्राप्ति की अलख जगाए रखने में किया । लेकिन आज अगर हम कस्तूर पर अलग से विमर्श कर रहे हैं तो इसके कई कारण हमारे सामने मौजूद हैं । लगातार कस्तूर के अस्तित्व का विलय गाँधी के अस्तित्व में किया जाता रहा है जो कहीं न कहीं भारतीय समाज का चरित्र भी है । जिससे कस्तूर पर कोई नया विमर्श सामने नहीं आया है । सामान्य पति-पत्नी की नोंक-झोंक से गाँधी का महात्मा बनना और कस्तूर का बा बन जाना आसान नहीं था । किसी भी स्त्री के लिए श्ाृगार,कपडों,गहनों का मोह अपने परिवार, बच्चों का मोह त्यागना आसान कार्य नहीं है । यह सभी कस्तूर ने स्वेच्छा से, आत्मनिर्णय से किया होगा । जिसका अलग से कोई वर्णन हमें दिखाई नहीं देता है । कहीं-न-कहीं कस्तूर ने प्रतिरोध किया होगा,कोई वाद-विवाद या बहस या तर्क-वितर्क गाँधी और कस्तूर में हुआ होगा,जो कि निहायत ही निजी रहा होगा । ऐसे ही कई और प्रश्न भी हमारे सामने उपस्थित हैं,जैसे ब्रह्मचर्य के प्रयोग जब गाँधी कर रहे थे तो कस्तूर की स्वीकृति का प्रश्न, जबकि आज भी महिलाएँ अपनी सेक्स लाइफ पर किसी तरह की कोई टिप्पणी सार्वजनिक और निजी कम ही करती हैं या न के बराबर,तब कस्तूर की स्वीकृति या अस्वीकृति के प्रश्नों का कहीं स्पष्ट जवाब नहीं मिलता है । नारीवादी दृष्टिकोण से इन प्रश्नों पर विमर्श की दरकार है ।
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति का कारण कस्तूर ही थी,अन्यथा आधी आबादी को जोड पाना आसान कार्य नहीं था,आधी आबादी का साथ आना और सत्याग्रह में सक्रिय भागीदारी करना,कस्तूर के नेतृत्व का ही कमाल था,जिसे गाँधी जानते थे,कई जगहों पर गाँधी ने कस्तूर को रोल मॉडल की तरह प्रस्तुत भी किया है,चाहे वह आन्दोलनों में भाग लेना हो या खादी की साडी का उपयोग हो या फिर आजादी की लडाई के यन्त्र के रूप में चरखे के इस्तेमाल का प्रयोग हो ।
गाँधी जैसे व्यक्तित्व की पत्नी के रूप में एक स्त्री का स्वयं अपने और साथ ही देश की आजादी के आन्दोलन से जुडे दोहरे संघर्ष को जानना समझना कस्तूर और कस्तूर बा के अलग-अलग अस्तित्व और व्यक्तित्व को जानना- समझना है जिसमें वह पत्नी,माँ और देश की आजादी के लिए एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में दिखाई देती है । जिसकी स्वतन्त्र सोच और विचार हैं, जो निर्णय लेने में समर्थ है, वह अनुगामी न होकर सहचरनी है । कस्तूर को शत शत नमन और इसी उम्मीद के साथ कि सभी महिलाओं में उनके समान आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता का संचार हो जिससे वह किसी से संचालित न होकर स्व-नियंत्रित और स्व-शासित हो । कस्तूर का इस तरह बहुआयामी व्यक्तित्व है जिस पर विस्तार से चर्चा की दरकार है ।
सन्दर्भ : -
1. गिरिराज किशोर (2016).बा .राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली.
2. गुहा, रामचन्द्र (2018).गाँधी दक्षिण अफ्रीका से भारत आगमन और गोलमेज सम्मेलन तक 1914-
1931.अनु. सुशांत झा. खंड -1.हिंद पॉकेट बुक्स पेंगुइन रैंडम हाउस इम्प्रिंट.
3. गुहा, रामचन्द्र (2015).गाँधी भारत से पहले शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफर .अनु. सुशांत
झा.हिन्द पॉकेट बुक्स, पेंगुइन रैंडम हाउस इम्प्रिंट.
4. गाँधी एम.के.(1957).सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा.अनु.काशीनाथ त्रिवेदी.नवजीवन प्रकाशन,
अहमदाबाद .
5. परमार शुभ्रा (2015).नारीवादी सिद्धान्त और व्यवहार. ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड, नई
दिल्ली.

सम्पर्क - सहायक प्रोफेसर
गाँधी एवं शांति अध्ययन विभाग,
महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा,
क्षेत्रीय केन्द्र कोलकाता