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जवाहरलाल नेहरू और संस्कृत

शुभनीत कौशिक
भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन महज़ एक राजनीतिक आन्दोलन न होकर एक सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन भी था। अकारण नहीं कि राष्ट्रीय आन्दोलन के सूत्रधारों ने उपनिवेशवादी विचारधारा से संघर्ष व प्रतिरोध को भी स्वाधीनता संग्राम का हिस्सा बनाया। आज़ादी की लडाई के दौरान भारत के जिन प्रबुद्ध राजनेताओं ने भारतीय सभ्यता व संस्कृति, भाषा और साहित्य, दर्शन व चिन्तन की परम्पराओं का गहन अध्ययन, विश्लेषण और मनन किया, उनमें जवाहरलाल नेहरू अग्रणी हैं। जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इण्डिया उनके इसी संस्कृतिबोध और इतिहास-दर्शन का परिचय देती है। भारतीय इतिहास व संस्कृति के बारे में गहन चिन्तन करते हुए भारत के आत्म की तलाश करने वाली यह किताब नेहरू ने अहमदनगर जेल में गिरफ्तारी के दिनों में लिखी थी। यह दिलचस्प है कि भारत के राष्ट्रवादी नेतृत्व ने संस्कृतिबोध से सम्पन्न ऐसी कई अनूठी और विचारोत्तेजक पुस्तकें औपनिवेशिक कारागार में कैद रहते हुए लिखी थीं। जिनमें लोकमान्य बालगंगाधर तिलक कृत गीता रहस्य भी उल्लेखनीय है।
उल्लेखनीय है कि भारतीय संस्कृति के निर्माण में संस्कृत भाषा व साहित्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका को नेहरू ने अपनी पुस्तकों, लेखों और भाषणों में बारश्वबार रेखांकित किया है। भारतीय संस्कृति और इतिहास में नेहरू की गहरी रुचि को देखते हुए यह संयोग नहीं कि डिस्कवरी ऑफ इण्डिया में वेद, उपनिषद, महाकाव्यों के साथ-साथ महाभारत और गीता पर भी स्वतंत्र अध्याय हैं। वेदों के सन्दर्भ में नेहरू ने लिखा है कि वेद मानवीय चिन्तन के आरम्भिक चरण में मानव मस्तिष्क की उदात्तता और उसके विस्तार का परिचय देते हैं। जहाँ ऋग्वेद के सन्दर्भ में नेहरू का विचार था कि ऋग्वेद शायद मनुष्य मात्र की पहली पुस्तक है। इसमें हमें इंसानी दिमाग के सबसे पहले उद्गार मिलते हैं, काव्य की छटा मिलती है और मिलती है प्रकृति की सुन्दरता और रहस्य पर आनन्द की भावना। वहीं उपनिषदों के सन्दर्भ में नेहरू का मानना था कि उपनिषद छान-बीन की, मानसिक साहस की और सत्य की खोज के उत्साह की भावना से भरपूर हैं। नेहरू के अनुसार उपनिषदों में सत्य की खोज का तरीका आधुनिक विज्ञान के ढंग का भले न हो, पर उसमें वैज्ञानिक पद्धति के अंश ज़रूर मौजूद रहे हैं। डिस्कवरी ऑफ इण्डिया के अलावा भी नेहरू द्वारा समय-समय पर दिए गए वक्तव्यों, उनके पत्रों और लेखों में संस्कृत के प्रति उनका गहरा लगाव खुलकर अभिव्यक्त हुआ है।
राजतरंगिणी और संस्कृत शब्दकोश
जून 1934 में जब जवाहरलाल नेहरू देहरादून जेल में बन्द थे, तब उन्होंने कल्हण कृत राजतरंगिणी के अंग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका लिखी थी। यह अंग्रेज़ी अनुवाद रंजीत सीताराम पण्डित द्वारा किया गया था। रंजीत पण्डित ने यह अनूदित पुस्तक मोतीलाल नेहरू को समर्पित की थी। रंजीत पण्डित ने विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस और कालिदास कृत ऋतुसंहार के भी अंग्रेज़ी अनुवाद किए थे।
रंजीत पण्डित द्वारा किए गए राजतरंगिणी के अनुवाद की भूमिका में नेहरू लिखते हैं कि जब वे नैनी सेंट्रल जेल में बन्द थे, तब उनके साथ जेल में बन्द रंजीत पण्डित ने राजतरंगिणी का अंग्रेज़ी अनुवाद करने की इच्छा प्रकट की थी, जिसे जानकर नेहरू ने उन्हें प्रोत्साहित किया था। अनुवाद की सराहना करते हुए नेहरू ने लिखा कि इस कार्य में रंजीत पण्डित ने जिस विद्वत्ता, योग्यता और उद्यम का परिचय दिया है, वह अभिभूत करता है। राजतरंगिणी के अनुवाद की चुनौतियों की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए नेहरू ने लिखा कि राजतरंगिणी इतिहास और काव्य दोनों है, इसलिए अनुवादक के सामने उस काव्य के संगीत के साथ-साथ कल्हण की शालीन और मधुर भाषा के अनुवाद की चुनौती भी पेश आती है। राजतरंगिणी के सन्दर्भ में नेहरू ने लिखा कि आठ सौ साल पहले लिखी गई इस किताब में कश्मीर के हज़ारों वर्षों के इतिहास को दज़र् किया गया है। इतिहास के इस लम्बे आख्यान में आरम्भिक काल के ब्योरे अस्पष्ट और संक्षिप्त हैं, वहीं जैसे-जैसे यह आख्यान कल्हण के अपने समय के नज़दीक आता चला जाता है, यह प्रामाणिक और विश्वसनीय हो उठता है। बकौल नेहरू, यह मुख्य रूप से राजाओं और राजपरिवारों की कहानी है, न कि आम लोगों की। किन्तु उसके बावजूद राजतरंगिणी केवल राजाओं के कार्यों का विवरण भर नहीं है। बल्कि यह राजनीतिक, सामाजिक और कुछ हद तक आर्थिक सूचनाओं का भी समृद्ध भंडार है। राजतरंगिणी में हमें मानवीय सम्बन्धों, मानवीय भावों यथा प्रेम और घृणा, आस्था और विश्वास की भी झलक मिलती है। जिसमें सूय्या के अभियाँत्रिकी के कारनामों और सिंचाई प्रबन्ध, ललितादित्य मुक्तापीड के दूरस्थ साहसिक अभियानों और मेघवाहन के अहिंसा प्रसार की नीति की विवेचना भी शामिल है।
आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू ने संस्कृत को प्रोत्साहन देने की नीति अपनाई। फरवरी 1949 में भाषाविज्ञानी सुमित्रा मंगेश कत्रे ने संस्कृत शब्दकोश तैयार करने के सन्दर्भ में प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र लिखा। पुणे स्थित दक्कन कॉलेज के निदेशक रहे सुमित्रा मंगेश कत्रे डिक्शनरी ऑफ संस्कृत ऑन हिस्टॉरिकल प्रिंसिपल्स के प्रधान सम्पादक भी रहे थे। उनके इस पत्र का प्रत्युत्तर देते हुए नेहरू ने लिखा कि संस्कृत का जैसा शब्दकोश आप तैयार करना चाहते हैं, वह मेरे लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह हमारे देश के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य है और हमारी सरकार इसके लिए हरसम्भव मदद करेगी। प्रो. कत्रे को जवाब देने के साथ ही 19 फरवरी, 1949 को ही नेहरू ने शिक्षा मंत्रालय के सचिव को भी एक नोट लिखकर इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना की जानकारी दी। संयोग से प्रसिद्ध फ्रांसीसी भाषाविज्ञानी और प्राच्यविद लुई रेनो उस वक्त हिन्दुस्तान में ही थे। नेहरू ने इस सन्दर्भ में उनसे भी राय ली। नेहरू ने शिक्षा मंत्रालय को भेजे अपने नोट में लिखा कि मुझे पूरा यकीन है कि यह कार्य राष्ट्रीय महत्त्व का है और सरकार को इसे हरसम्भव प्रोत्साहन देना चाहिए। प्रो. कत्रे ने उक्त परियोजना के लिए 58,000 रुपए प्रतिवर्ष की माँग की थी। इस सन्दर्भ में नेहरू ने लिखा कि ‘इस परियोजना के महत्त्व को देखते हुए यह कोई बडी राशि नहीं है। मेरे विचार में, अगर यह परियोजना समुचित रूप से सम्पन्न हो पाई, तो यह संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए लाभदायी तो होगा ही, साथ ही, यह भारत के लिए भी एक उपलब्धि होगी। नेहरू ने आश्वासन दिया कि शिक्षा मंत्रालय इस परियोजना के सन्दर्भ में जो भी उचित कदम उठाएगा, उसे नेहरू का पूरा समर्थन मिलेगा।
संस्कृत आयोग और कालिदास समारोह
अक्टूबर 1956 में भारत सरकार द्वारा भारत में वर्तमान संस्कृत शिक्षा के सभी पक्षों पर विचार करने के लिए संस्कृत आयोग का गठन किया गया। जिसकी अध्यक्षता प्रख्यात भाषाविद डॉक्टर सुनीति कुमार चटर्जी कर रहे थे। समिति के अन्य सदस्य थे : जे.एच. दवे, प्रो. एस.के. दे, प्रो. टी.आर.वी. मूर्ति, प्रो. वी. राघवन, पण्डितराज वी.एस. रामचन्द्र शास्त्री, प्रो. विश्वबन्धु शास्त्री, प्रो. आर.एन. दाण्डेकर (सदस्य-सचिव)। उक्त समिति ने नवम्बर 1957 में अपनी अंतिम रिपोर्ट भारत सरकार को सौंप दी थी। संस्कृत आयोग के समक्ष जिन लोगों ने मौखिक साक्ष्य दिए थे, उनमें जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। संस्कृत आयोग ने 14 मई, 1957 को नेहरू से मिलकर उनका मौखिक साक्ष्य लिया था। नेहरू ने आयोग से कहा कि वे मानते हैं कि संस्कृत भारतीय सभ्यता का आधार है, इसलिए वे इस भाषा के गहन अध्ययन को बढावा देना चाहेंगे। शिक्षण के माध्यम के रूप में संस्कृत, शास्त्रीय ग्रन्थों के प्रकाशन, विदेशों में भारतीय प्रदर्शनियों में संस्कृति और कला दीर्घा के आयोजन, संस्कृत की प्राचीन व दुर्लभ पाण्डुलिपियों की खोज और उनके संरक्षण के विषय में संस्कृत आयोग के सामने नेहरू ने अपनी राय रखी और संस्कृत के संवर्धन के लिए अपनी प्रतिबद्धता प्रकट की।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद स्मारक व्याख्यान देते हुए फरवरी 1959 में नेहरू ने भारतीय परम्परा के विषय में अपनी राय पूरी स्पष्टता से रखी थी। इसी व्याख्यान में संस्कृत भाषा के विषय में बोलते हुए नेहरू ने कहा कि दुनिया में किसी और भाषा ने किसी जाति के इतिहास में शायद ही इतनी जीवंत और अहम भूमिका निभाई हो, जितनी कि संस्कृत ने। यह केवल उच्चतम विचारों और उत्कृष्ट साहित्य का ही माध्यम नहीं रही है, बल्कि इसने भारत को राजनीतिक विभेदों के बावजूद एकसूत्र में बाँधने का काम किया है। इसी प्रकार सितम्बर 1959 में राजभाषा के सन्दर्भ में संसदीय समिति की रिपोर्ट पर लोकसभा में बोलते हुए नेहरू ने संस्कृत के बारे में कहा कि मैं संस्कृत का प्रशंसक हूँ। प्राचीन काल में भारतीय चिन्तन और संस्कृति की महानता को अगर कोई एक चीज़ अपने में समाहित किए हुए है, तो वह संस्कृत भाषा है। आज की भारतीय भाषाएँ या तो सीधे तौर पर संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं या फिर दक्षिण भारतीय भाषाओं की तरह वे संस्कृत से गहरे जुडी हुई हैं।
अप्रैल 1959 में संस्कृत विश्व परिषद के छठवें अधिवेशन का आयोजन पुरी में होना था, जिसकी अध्यक्षता डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। संस्कृत विश्व परिषद को दिए अपने शुभकामना सन्देश में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि संस्कृत भारत के लिए प्रेरणा का अजस्र स्रोत रही है और हमें इसके संरक्षण और परिवर्धन का हरसम्भव प्रयास करना चाहिए। साथ ही, इसे आधुनिक काल के अनुरूप समायोजित करने के भी प्रयास हमें करने होंगे। उसी वर्ष के आखिर में नेहरू नवम्बर 1959 में उज्जैन में आयोजित हुए दूसरे अखिल भारतीय कालिदास समारोह के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। कालिदास की भाषा के सौष्ठव, सौंदर्य और उसके गठन पर टिप्पणी करते हुए नेहरू ने कहा कि कालिदास में बिलकुल ठीक जोड था इन बातों का, मेल था। सौंदर्य कितना अच्छा और उसी के साथ गठी हुई भाषा। तो इसमें तो खैर, कोई शक नहीं कि मैं समझता हूँ कि हमारे कवियों में कोई उनका मुकाबला नहीं करता। और जितना अधिक हमारे देश भर के लोग उनको पढें, उनको समझें, यह तो उनको लाभ उसके पचास होंगे, लेकिन एक लाभ अवश्य होगा कि हमारी आजकल की भाषा पर भी उसका असर पडेगा और अच्छा असर पडेगा।
साहित्य अकादेमी द्वारा वर्ष 1959 में ही वी. राघवन के सम्पादन में संस्कृत की त्रैमासिक पत्रिका संस्कृत प्रतिभा का प्रकाशन शुरू किया गया। इस पत्रिका के प्रकाशन में भी जवाहरलाल नेहरू ने अहम भूमिका निभाई थी। इसी प्रकार जुलाई 1961 में कलकत्ता में आयोजित हुए अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मेलन के 26वें अधिवेशन को भी नेहरू ने अपना शुभकामना सन्देश भेजा। इस अधिवेशन की अध्यक्षता राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। अपने सन्देश में संस्कृत को भारतीय संस्कृति व सभ्यता का आधार बताते हुए नेहरू ने संस्कृत भाषा रूपी सांस्कृतिक ज्योति को प्रज्वलित रखने का आह्वान किया था।
महाभारत और भगवद्गीता
अप्रैल 1953 में जब भण्डारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने महाभारत के शांतिपर्व का सटीक संस्करण प्रकाशित किया, तब इस परियोजना के सम्पादक और प्रसिद्ध प्राच्यविद डॉ. एस.के. बेलवलकर ने जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखकर इसके बारे में सूचित किया। नेहरू ने अपने जवाबी खत में लिखा कि महाभारत के सटीक संस्करण के प्रकाशन से उन्हें बेहद खुशी मिली है। उन्होंने यह भी लिखा कि वे संस्थान के इस काम में गहरी दिलचस्पी रखते हैं और इस काम में संस्थान की सफलता पर बधाई देते हैं। तीन साल बाद, वर्ष 1956 में जब भण्डारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा महाभारत के तीन और खण्डों का प्रकाशन किया गया, तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पुणे के इस प्रतिष्ठित संस्थान में मौजूद थे। अगस्त 1956 में संस्थान में हुए इस आयोजन में जवाहरलाल नेहरू के साथ इस परियोजना के सम्पादक डॉ. एस.के. बेलवलकर भी मौजूद थे। इस मौके पर पण्डित नेहरू ने एक संक्षिप्त भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने महाभारत और संस्कृत भाषा की महत्ता को रेखांकित किया। पर जवाहरलाल नेहरू का यह भाषण शुरू हुआ लोकमान्य तिलक को याद करते हुए। कारण कि उस दिन तारीख थी 1 अगस्त यानी बालगंगाधर तिलक की पुण्य-तिथि। 1920 में इसी दिन असहयोग आन्दोलन औपचारिक तौर पर शुरू होना था और उसी दिन तडके तिलक का निधन हुआ था। अकारण नहीं कि नेहरू के जेहन में उस महान राष्ट्रवादी नेता और भारतीय संस्कृति के अप्रतिम विद्वान की यादें अब भी ताजा थीं।
महाभारत के बारे में नेहरू ने कहा कि महाभारत ने समय के साथ हिन्दुस्तान में लाखों लोगों को प्रभावित किया है, वह उनके जीवन और संस्कृति का अनन्य हिस्सा बन चुका है। उन्होंने कहा कि वे संस्थान की इस परियोजना के लिए और भण्डारकर इंस्टीट्यूट के लिए कभी भी आर्थिक संसाधनों की कमी नहीं होने देंगे। संस्कृत भाषा पर बोलते हुए नेहरू ने कहा कि यद्यपि हजार से भी ज्यादा वर्षों से संस्कृत हिन्दुस्तान में आम लोगों की बोलचाल की भाषा नहीं रह गई है, लेकिन फिर भी संस्कृत की जीवनीशक्ति और भारतीय संस्कृति से इसका जुडाव अद्भुत है।
संस्कृत की इसी जीवनीशक्ति और इसकी दृढता की चर्चा करते हुए अपनी प्रसिद्ध किताब डिस्कवरी ऑफ इण्डिया में एक पूरा अध्याय ही लिखा था नेहरू ने। जिसका शीर्षक है : वाइटलिटी एण्ड परसिसटेन्स ऑफ संस्कृत। संस्कृत भाषा पर केन्द्रित इस अध्याय में नेहरू ने लिखा है कि भाषा महज व्याकरण या भाषाशास्त्र नहीं होती, वह इन सबसे कहीं व्यापक है। उनके अनुसार, भाषा एक समूची संस्कृति की प्रतिभा, उसकी मेधा और विद्वत्ता की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। वह उस संस्कृति के विचारों का मूर्त और जीवंत रूप है। हिन्दुस्तान के सन्दर्भ में, नेहरू ने संस्कृत को एक ऐसी ही भाषा के रूप में देखा। आधुनिक भारतीय भाषाओं को संस्कृत की देन की चर्चा भी नेहरू ने अपनी किताब में की है।
नेहरू के अनुसार, महाभारत प्राचीन भारत की राजनीतिक व सामाजिक संस्थाओं तथा भारतीय परम्परा और पुराकथाओं का विश्वकोश है। जिसमें भारतवर्ष की मौलिक एकता पर ज़ोर दिया गया है। भगिनी निवेदिता को उद्धृत करते हुए नेहरू ने लिखा कि महाभारत विविधता और जटिलता में एकता का परिचायक है। डिस्कवरी ऑफ इण्डिया लिखते हुए नेहरू न केवल इस बात से अवगत थे कि भंडारकर इंस्टीट्यूट में कुछ भारतीय विद्वान महाभारत का एक समालोचनात्मक संस्करण तैयार कर रहे हैं। बल्कि उन्हें यह भी मालूम था कि उसी दौरान रूसी प्राच्यविदों ने महाभारत का रूसी भाषा में अनुवाद किया था।
इसी क्रम में कुछ बातें भण्डारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट के बारे में भी। इस संस्थान की स्थापना 1917 में पूना (पुणे) में हुई थी, रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर (1837-1925) के 81वें जन्मदिन के अवसर पर। रामकृष्ण गोपाल भंडारकर समाज-सुधारक होने के साथ-साथ दक्कन के आरंभिक इतिहास के अधिकारी विद्वान थे। वर्ष 1918 में बंबई सरकार ने दुर्लभ पाण्डुलिपियों के अपने संकलन को भण्डारकर इंस्टीट्यूट को दे दिया था। अगले ही वर्ष संस्थान ने महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण प्रकाशित करने की परियोजना पर काम शुरू कर दिया। वर्ष 1925 में वी.एस. सुकथनकर इस बृहद परियोजना के मुख्य सम्पादक नियुक्त हुए। विष्णु सीताराम सुकथनकर (1887-1943) संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान और प्रसिद्ध भारतविद थे। वर्ष 1943 में उनके निधन के बाद श्रीपाद कृष्ण बेलवलकर इस परियोजना के मुख्य सम्पादक बने। आगे चलकर उन्होंने महाभारत के भीष्मपर्व, शांतिपर्व आदि का सम्पादन किया।
अन्ततः 1966 में महाभारत के इन सटीक संस्करणों का प्रकाशन का काम पूरा हुआ, जो कुल 19 खण्डों में फैला हुआ है। सितंबर 1966 में भारत के राष्ट्रपति और भारतीय दर्शन के अधिकारी विद्वान सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा इन सभी खंडों का विमोचन किया गया। सुकथनकर और बेलवलकर के अलावा एस.के. दे और आर.एन. दाण्डेकर सरीखे विद्वान भी सम्पादक की हैसियत से इस परियोजना से जुडे रहे। वर्ष 1919 से 1966 तक विद्वानों ने बारह सौ से अधिक पाण्डुलिपियों के गहन अध्ययन और विश्लेषण के बाद महाभारत के इन संस्करणों को तैयार किया। महाभारत की इस परियोजना के अलावा संस्थान ने वर्ष 1939 से भण्डारकर ओरियंटल सीरीज का प्रकाशन भी शुरू किया था।
नेहरू की प्रिय पुस्तकों में से एक भगवद्गीता की बात करें, तो नेहरू ने डिस्कवरी ऑफ इण्डिया में लिखा है कि गीता में दर्शन के साथ राजकार्य और रोज़मर्रा के जीवन में भी नीति और नैतिक सिद्धांतों के अमल पर बल दिया गया है, जिसमें विश्व-कल्याण की भावना भी शामिल है। बकौल नेहरू, जब इंसान का मन दुविधा में हो और किंकर्तव्यविमूढ हो, तब गीता उसे प्रकाश दिखाती है और उसका सही मार्गदर्शन करती है। गीता मानव जीवन के आध्यात्मिक पक्ष को उठाती है और उसी क्रम में यह दैनन्दिन जीवन की व्यावहारिक समस्याओं का भी निदान करती है। नेहरू ने विलिएम हंबोल्ट को भी उद्धृत किया, जिनके अनुसार गीता किसी भी भाषा में लिखी गई सबसे खूबसूरत और एकमात्र सच्ची दार्शनिक कविता है।
जुलाई 1962 में नित्य नारायण बनर्जी को लिखे एक पत्र में नेहरू ने उपनिषदों और गीता की सार्वभौमिकता को रेखांकित किया था। उन्होंने लिखा कि उपनिषद और गीता मुझे गहरी सांत्वना और आत्मिक शांति प्रदान करते हैं। किंतु आधुनिक भारत में हिन्दू जीवन में मैं उपनिषद व गीता की उच्च आध्यात्मिकता नहीं पाता। उसकी जगह संकीर्ण मानसिकता ने ले ली है। उपनिषद और गीता में जिस सार्वभौम व्यापकता के दर्शन होते हैं, उसका भारत के अधिकांश हिन्दुओं में प्रायः अभाव है। मैं अध्यात्म में विश्वास रखता हूँ, लेकिन धर्म का जैसा व्यवहार आजकल भारत में किया जा रहा है, उसे मैं संकीर्ण और विभेदकारी पाता हूँ।
रामायण
नवम्बर 1953 में जवाहरलाल नेहरू ने वाल्मीकि रामायण के एन. चन्द्रशेखर अय्यर द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद की प्रस्तावना लिखी। उल्लेखनीय है कि चन्द्रशेखर अय्यर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। इस प्रस्तावना में नेहरू ने पहले तो यह स्वीकारोक्ति लिखी कि वे संस्कृत के विद्वान नहीं हैं और संस्कृत का उनका ज्ञान भी सीमित है। आगे उन्होंने लिखा कि रामायण ने बीते हुए युगों में हिन्दुस्तान की अनगिनत पीढियों के भावों और विचारों को प्रभावित किया है। राम और सीता की इस जीवंत कथा ने किसानों और श्रमिकों से लेकर उच्च कोटि के विद्वानों तक को आकर्षित किया है। जहाँ वाल्मीकि ने इस महाकाव्य को संस्कृत में लिखा, वहीं तुलसीदास ने इसे अवधी में लिखकर जनमानस तक पहुँचाने का काम किया। नेहरू का कहना था कि एक ऐसी कथा, जिसने निरन्तर बदलते भारतीय इतिहास में कई सहस्राब्दियों तक लाखों लोगों के हृदयों को झंकृत किया हो, उसमें ज़रूर कुछ खास बात होगी। उनके अनुसार, उनका अपना जीवन भी भारत की महान भूमि की विविधता और उसकी आधारभूत एकता को जानने-समझने का एक खोजपूर्ण प्रयास था।
नेहरू ने लिखा कि इतिहास की शक्तिशाली प्रक्रियाओं की बौद्धिक समझ बनाना हमारे लिए बेहद ज़रूरी है। अपने आगामी भविष्य को हम सही दिशा दे सकें, इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम अपने अतीत और वर्तमान के प्रति भावनात्मक रूप से जागरूक हों। मुझे नहीं लगता कि रामायण और महाभारत को जाने बिना, जो भारतीय इतिहास के गौरव और समृद्ध भंडार हैं, भारत और उसके लोगों को ठीक-ठीक समझा जा सकता है। कुछ यही बात नेहरू ने और ज़ोर देकर नवम्बर 1959 में कालिदास जयन्ती समारोह में भी कही थी। उनके अनुसार, ‘एक बडी निशानी स्वतंत्रता की है कि आँख-कान खुल जाएँ और जब यह खुलते हैं तब दो तरफ वह देखते हैं, एक तो अपने प्राचीन समय को उसकी याद ताजी हो जाती है और एक भविष्य की तरफ क्योंकि भविष्य में उसको जाना है। अगर हम खाली भविष्य की तरफ देखें तो हमारी जड नहीं रहती है, हमारे देश की, हमारी जाति की, पुरानी जड उखड जाती है और उसके साथ जितने गुण हैं उसके वह भी कुछ कम हो जाते हैं। अगर हम खाली प्राचीन समय की तरफ ध्यान दें, भविष्य की तरफ नहीं तो हम जम जाते हैं आगे नहीं बढते, दोनों बातें करनी हैं। कोई देश या कोई कौम आगे बढती नहीं बहुत जब तक उसकी जड गहरी न हो। जड आती है तो जो कुछ उस जाति के अभ्यास, तजुर्बे सैकडों-हज़ारों बरस से होते हैं वो उसके रग और रेशों से भर जाते हैं।
संस्कृत साहित्य में नेहरू
जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा एन ऑटोबायोग्राफी का संस्कृत अनुवाद कमलापति मिश्रा ने किया, जोकि आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र से जुडे थे। फरवरी 1963 में अपनी आत्मकथा के संस्कृत अनुवाद के प्रकाशन हेतु दिए गए सन्देश में नेहरू ने लिखा कि जब श्री कमलापति मिश्रा जी ने मुझे पहले लिखा था कि वे मेरी आत्मकथा का अंग्रेज़ी भाषा से संस्कृत में अनुवाद कर रहे हैं, मुझे कुछ आश्चर्य हुआ और कुछ खुशी भी हुई थी। मुझे खेद है कि मैं संस्कृत को कम जानता हूँ, लेकिन वह मुझे बहुत प्रिय है और मैं समझता हूँ कि भारत ने जो हज़ारों वर्षों से बहुत ऊँचे और बडे कार्य किए और अपने विचारों को प्रकाशित किया और फैलाया, फिर और दुनिया भर में प्रसिद्ध हुआ, इसमें संस्कृत का सबसे बडा भाग है। हमारा सबसे बडा धन या दौलत संस्कृत है और हमको चाहिए कि इसकी प्रेम से रक्षा करें और इसकी उन्नति हो।
अकारण नहीं कि जवाहरलाल नेहरू के प्रेरणादायी जीवन को आधार बनाकर संस्कृत में अनेक महाकाव्य और दूसरी पुस्तकें लिखी गईं। इनमें गोस्वामी बलभद्रदास शास्त्री कृत नेहरू यशः सौरभम् महाकाव्यम्, ब्रह्मानन्द शुक्ल कृत श्रीनेहरूचरितम् (महाकाव्यम्), पण्डित जयराम शास्त्री कृत श्रीजवाहरवसन्त साम्राज्यम्, श्रीधर वर्णेकर रचित जवाहरतरंगिणी, ज्वालापतिलिंग शास्त्री कृत श्रीशांतिदूतः, कृष्णदत्त भारद्वाज कृत नेहरूसूत्राणि, रामकिशोर मिश्र रचित गीतजवाहरम्, रामचरण शास्त्री कृत जवाहर-जीवनम्, रमाकान्त मिश्र कृत जवाहर-लालनेहरूविजयनाटकम् आदि प्रमुख हैं।
संदर्भ -
1. जवाहरलाल नेहरू, हिन्दुस्तान की कहानी, (नई दिल्ली : सस्ता साहित्य मण्डल, 1947), पृ. 85.
2. एस. गोपाल (संपा.), सेलेक्टेड वर्कस ऑफ जवाहरलाल नेहरू (यहाँ के बाद सेलेक्टेड वर्कस), प्रथम सीरीज, खण्ड 06, (नई दिल्ली : जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फण्ड, 1972), पृ. 432. साथ ही देखें, राजतरंगिणी : द सागा ऑफ द किंग्स ऑफ कश्मीर, अनु. रंजीत सीताराम पण्डित, (इलाहाबाद : इण्डियन प्रेस, 1935).
3. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 10, (नई दिल्ली : जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फण्ड, 1990), पृ. 69.
4. वही, पृ. 69-70.
5. रिपोर्ट ऑफ द संस्कृत कमीशन, 1956-1957, (नई दिल्ली : भारत सरकार, 1958).
6. मुशीरूल हसन (संपा.), सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 38, पृ. 171-74.
7. जवाहरलाल नेहरूज स्पीचेज, खण्ड 4, सितम्बर 1957-अप्रैल, 1963 (नई दिल्ली : प्रकाशन विभाग,
1964), पृ. 1.
8. वही, पृ. 61.
9. माधवन के. पलात (संपा.), सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 46, पृ. 312-13.
10. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 54, पृ. 436.
11. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 69, पृ. 497.
12. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 22, पृ. 140.
13. जवाहरलाल नेहरूज स्पीचेज, खण्ड 3, मार्च 1953-अगस्त 1957, (नई दिल्ली : प्रकाशन विभाग,
1958), पृ. 418-421.
14. जवाहरलाल नेहरू, डिस्कवरी ऑफ इण्डिया, (नई दिल्ली : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1994
*1946*), पृ. 108-09.
15. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 78, पृ. 354-55.
16. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 24, पृ. 705.
17. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 54, पृ. 433-434.
18. सेलेक्टेड वर्कस, द्वितीय सीरीज, खण्ड 81, पृ. 423.
19. देखें, मधुबाला, संस्कृत-वांग्मय में नेहरू, (दिल्ली र्‍ ईस्टर्न बुक, 1977).

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