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मणिपुर का इतिहास गुलामी का इतिहास नहीं है

सूर्यनारायण रणसुभे
घुमक्कडी की आदत तो शायद अनुवांशिकी हो। हमारे पुरखे आर्थिक दृष्टि से कभी भी समद्ध नहीं थे। रोजगार की तलाश में वे निरन्तर भटकते रहते थे। तब न राज्य थे न जनतंत्र। न किसी प्रकार के बँधन। सम्भवत. 18वीं सदी से मेरे पुरखों की जो भी जानकारी मुझे मिली है, उससे स्पष्ट है कि वे सूरत से होते हुए आंध्र गए। आंध्र से महाराष्ट्र। महाराष्ट्र से कर्नाटक। और वहाँ से फिर महाराष्ट्र। मेरी पीढी अलबत्ता अब महाराष्ट्र में स्थाई रूप से रह रही है। मेरे दादा किसी सेठ के व्यापार हेतु 1870-80 के करीब रंगून भी हो आए थे। पिताजी जिन्दगी भर अलग-अलग दूकानों में छोटी.मोटी नौकरी करते रहे। एक सेठ के यहाँ वे नौकरी पर थे। उस सेठ के व्यापार हेतु वे दक्षिण के सभी राज्यों मे कई बार जाते।
मुझे एक बेटी, एक बेटा। ए दोनो मॅट्रिक की कक्षा में आने के पूर्व अधिकांश भारत के राज्यों में हम इन्हें घुमा लाए थे। परिणामस्वरूप उनमें भी घूमने की आदत बन गई है। भारत के तीन-चार राज्य अगर छोड दें, बिहार, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, अरुणाचल, नागालैण्ड और मिजोरम अन्य सभी प्रदेशों की यात्राओं पूरी हुई हैं। आयु के 74 वें वर्ष में यूरोप के 6 देशों में हम दोनों घूम आए हैं। व्याख्यान देने हेतु तो देश के अधिकांश राज्यों में मैं जाता रहा हूँ। वैसे ही व्याख्यान देने हेतु पाकिस्तान के कराची में भी हो आया हूँ।
उम्र के 80 वें वर्ष में बेटी और बेटे ने उत्तर पूर्व राज्य मणिपुर जाने का कार्यक्रम तय किया। अवकाश ग्रहण करने के बाद सम्भवतः 2003 में मैं पत्नी और बेटा-बेटी उन दिनों अरुणाचल प्रदेश में केन्द्र सरकार की एक परियोजना में कार्यरत था, मेघालय, सिक्किम, असम, ब्रह्मपुत्र पर स्थित द्वीप माजुली को आए थे। इस बार मणिपुर की यात्रा पर जाना तय किया गया। मुम्बई से गुवाहाटी और गुवाहाटी से इम्फाल हवाई जहाज से। तथा इम्फाल से भीतरी प्रदेशों में कार से घूमने का कार्यक्रम बना। एक एजेंट के माध्यम से सम्पूर्ण कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गई ।
मणिपुर जाने पर मुझे इस बात का एहसास हुआ कि कश्मीर में 370 धारा हटाने के बाद यह विज्ञापित किया गया इसमें भारत का कोई भी व्यक्ति अपनी पूंजी वहाँ लगा सकता है, कारोबार शुरू कर सकता है। मुझे यह अनुभव हुआ, असम को छोडकर अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में कोई भी भारतीय जमीन खरीद नहीं सकता। वहाँ प्रवेश पाने के लिए पुलिस विभाग की अनुमति लेनी पडती है।
16 जिलों का मणिपुर भारत के उत्तर पूर्व में बसा हुआ है। पूरे मणिपुर राज्य की जनसंख्या केवल 2855000 है, मतलब महाराष्ट्र के पुणे या नागपुर शहर से भी कम। 28 लाख में 16 जिले। इसके उत्तर में नागालैण्ड राज्य है तो दक्षिण की ओर मिजोरम और पश्चिम में असम। पूर्व दिशा में म्याँमार देश, तो दक्षिण की ओर चीन की सीमा है। इस तरह भारत के पूर्व में स्थित यह राज्य सुरक्षा तथा सैनिकी की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील राज्य है। यह राज्य भारत में 15 अगस्त 1947 को सम्मिलित नहीं हुआ, तो 15 अक्टूबर 1949 में भारत में विलीन हो गया। यहाँ साक्षरता 80त्न यहाँ रोना मातृभाषा बोली जाती है जिसे हम मणिपुरी भाषा कहते हैं। यह सब की भाषा नहीं है। आदिवासी जनजाति के कबीलों का राज्य है इस कारण दर्जनों भाषाएँ यहाँ हैं। हमारी मार्गदर्शक पद्मिनी मुझे बता रही थी कि मतई समाज में मणिपुरी बोली और लिखी जाती है। इम्फाल के हवाई अड्डे पर उतरने के बाद बाहरी व्यक्ति सीधे शहर में जा नहीं सकता। पुलिस विभाग का एक कार्यालय वहाँ है। 100 रु. प्रति व्यक्ति देकर आधार कार्ड की फोटो कॉपी, खुद की फोटो देने के बाद वहाँ आने का प्रयोजन बताने पर ही इम्फाल में प्रवेश दिया जाता है। मिजोरम, नागालैण्ड, मेघालय में तो इससे भी कडे बन्धन हैं। इसकी जरूरत भी वहाँ है। क्योंकि यह सीमा प्रदेश है। हमारी मार्गदर्शिका मुझे बता रही थी कि वैष्णव समाज में मणिपुरी बोली और लिखी जाती है पर यह समाज पूरे मणिपुर में मुश्किल से 20 प्रतिशत है। शेष सभी आदिवासी जनजाति के लोग हैं। प्रत्येक की बोली भिन्न है। यह भिन्नता इतनी है कि आदिवासी विभागों में जो विद्यालय हैं, वहाँ अगर एक कक्षा में 30-35 छात्र हो तो प्रत्येक की अपनी अलग बोली होगी। इसलिए उनमें सहज संवाद सम्भव नहीं होता। इसी कारण अंग्रेजी हमारे यहाँ पहली भाषा है। मणिपुरी भले ही पहली भाषा के रूप में पढाई जाती रही हो, परन्तु वह सब की समझ में कहाँ आती है। सर्वाधिक बल अंग्रेजी पर ही होता है। और अंग्रेजी हम सबको सहज भाषा लगती है। हिन्दी की पढाई छठी कक्षा से दसवीं कक्षा तक होती है। उसकी ओर केवल सम्पर्क भाषा के रूप में देखा जाता है। पढाई के माध्यम की भाषा तो अंग्रेजी ही है।
सिक्किम, मेघालय की तुलना में मणिपुर में प्रकृति का भव्य स्वरूप देखने नहीं मिलता। प्रकृति सौंदर्य देखना हो तो अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम में ही जाना चाहिए। मिजोरम, नागालैण्ड में गया नहीं हूँ। यूरोप और खासकर स्विजरलैण्ड की प्रकृति की बहत चर्चा होती है। पूर्वोत्तर भारत की प्रकृति तो यूरोप से भी बेहतरीन लगती है। एक तो स्विजरलैण्ड ने विश्व भर में अपनी प्रकृति सौंदर्य का जो विज्ञापन किया उस कारण तथा हमारी उपनिवेशवादी मानसिकता के कारण यूरोप हमें अधिक सुन्दर लगता है। सिक्किम के आगे कंचनजंगा की पर्वतमालाओं के दर्शन होते हैं। इन सब की तुलना में मणिपुर कहीं भी नहीं बैठता। यहाँ भी नदियाँ हैं, ऊँचे-ऊँचे पहाड हैं, पहाडों पर मणिपुरी जीवन है।
चर्चा करते समय तथा वहाँ का सबसे प्राचीन किला देखते समय जो जानकारी मिलती है उससे स्पष्ट है कि मणिपुर में एक सुप्त ऐसा सांस्कृतिक संघर्ष शुरू हो चुका है। यह संघर्ष खासतौर पर आर.एस.एस. तथा भाजपा के प्रवेश के बाद शुरू हुआ है। यह संघर्ष सार्वजनिक स्तर पर कम परंतु पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर अधिक है। इसकी पृष्ठभूमि ऐसी है कि अठारहवीं सदी में मणिपुर में वैष्णव पन्थ का प्रवेश हो जाता है। मणिपुर एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ सन 35 से 1955 तक एक ही वंश के राजा राज्य कर रहे थे। यह वही राजा थे जिन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया था। मुगल भी यहाँ प्रवेश नहीं कर पा रहे थे। 1919 में चार अंग्रेजों को फाँसी देने वाला यह देश का एकमात्र राज्य है। भारत के अधिकांश हिस्से में जब अंग्रेज फैल गए, शस्त्र तथा युद्ध में बलिष्ठ साबित हुए तब यहाँ के राजा ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया। मित्रता के स्तर पर। इसलिए मणिपुर का इतिहास गुलामी का इतिहास नहीं है। सारे लोग अपने इस राजा के प्रति निष्ठा रखते थे, रखते हैं। यह राजवंश हिन्दू धर्म के नहीं थे। उनका धर्म सनामाही है। यह निसर्ग उपासक धर्म है। विश्व का प्राचीनतम धर्म है। यह मूर्ति पूजक नहीं है। कर्मकाण्डी नहीं है । वर्णाश्रम धर्म नहीं है। जातियाँ-उपजातियाँ नहीं है। 18 वीं सदी में वैष्णव पथ का प्रचार असम में जोरों से शुरू हुआ। मणिपुर में 20 प्रतिशत ईसाई, 20 प्रतिशत वैष्णवपंथी 30 प्रतिशत आदिवासी जनजातियाँ हैं, ऐसी सामाजिक संरचना है। यह सभी आदिवासी सनामाही पन्थ के अर्थात् निसर्ग उपासक हैं। वैष्णव पन्थी सरामाही को नष्ट कर आदिवासियों कह रहे हैं कि वे हिन्दू हैं। सभी वैष्णो पन्थी कहलाए। मणिपुरी में अस्पृश्यता नहीं है। जाति व्यवस्था है। परन्तु अस्पृश्यता नहीं है। कोई काम गन्दा-बुरा है ऐसा वे नहीं मानते। जो गन्दे काम करने वाले हैं उनके सम्बन्ध श्रेष्ठता निम्रता के नहीं होते। मैतई समाज में ऊंच-नीच भेद हैं। वहाँ ब्राह्मण हैं जो खुद को श्रेष्ठ मानते हैं और अन्य भी उन्हें श्रेष्ठ या उच्च मानते हैं। मैतेई के जो कृष्ण मंदिर हैं वहाँ गर्भ गृह में सिवाय ब्राह्मणों के औरों को प्रवेश नहीं होता। इंफाल में जो सबसे बडा कृष्ण मंदिर है जहाँ हम कई घंटों तक रुके थे, जहाँ हमने महाप्रसाद भी लिया वहाँ के गर्भगृह में सिवाय ब्राह्मणों के और किसी को प्रवेश नहीं है।
एससी-एसटी का एहसास तो यहाँ के लोगों को तब हुआ जब केन्द्र में एससी-एसटी प्रवर्ग की घोषणा की गई। इसके पूर्व प्रत्यक्ष व्यवहार में एससी या दलित, ऐसी कोई व्यवस्था यहाँ की समाज संरचना में नहीं थी। उनसे हुई बातचीत से पता चला है कि पूरे मणिपुर में दहेज नामक कोई समस्या नहीं है। उनके अनुसार इसका एक कारण तो यह है कि यहाँ की अधिकांश स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी हैं। बेरोजगारी का प्रश्न ही नहीं है । चाहे जितना पढा-लिखा युवक हो उसकी ओर से किसी भी प्रकार की मांग की नहीं जाती। उसके घरवालों की ओर से भी कोई मांग नहीं की जाती। अलबत्ता विवाह में वधूपक्ष की ओर से एक पलंग और कपडे रखने के लिए एक बक्सा बडा-छोटा, मँहगा, अपनी हैसियत के अनुसार दिया जाता है।
प्रदेश में सरकारी आंकडों के अनुसार यहाँ की जनसंख्या में 8 प्रतिशत मुस्लिम हैं। परंतु उनमें और यहाँ की जनजातियों में कभी तनाव नहीं रहा। यहाँ के मुस्लिम स्थानिक संस्कृति में पूर्णतः डूब गए हैं। प्रत्येक मुस्लिम घर में यहाँ की जनजाति के घरों की तरह अपने पूर्वजों का कोई एक चिह्न घर के एक कोने में होता है। उसके सम्मुख बैठकर ही वह प्रार्थना नमाज आदि करता है। परन्तु 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद यहाँ दंगा हुआ था। उसके बाद फिर कभी नहीं।
यहाँ के अधिकांश पढे-लिखे लोग हिन्दी जानते हैं। हिन्दी के प्रति विरोध नहीं है। परन्तु कुछ माह पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री ने हिन्दी के प्रति आग्रह पकडा तो उसके विरोध पर यहाँ तीव्र प्रतिक्रिया हुई। अंग्रेजी माध्यम में ही पढाई हो, ऐसा आग्रह यहाँ सभी का है, क्योंकि सब को बाँधकर रखने वाली यही एक भाषा है ऐसा यहाँ माना जाता है।
सम्पूर्ण मणिपुर में शराबबन्दी है परन्तु यहाँ की जनजातियों में, आदिवासियों की झोपडियों में चावल को सडाकर बीयर और शराब बनाई जाती है। घर के सभी सदस्यों का यह आवश्यक पेय है। हम सभी जब एक आदिवासी गाँव एण्ड्रो गए तब हमारे मार्गदर्शक बीच रास्ते में स्थित एक गाँव के आदिवासी घर पर हमें खाना खिलाने के लिए ले गए। वहाँ हमारा स्वागत चावल से बने इस बीयर से किया गया। केवल बीयर ही नहीं, शराब भी दी गई। इस पर कोई रोक-टोक नहीं। क्योंकि इस जनजाति की जीवन पद्धति का यह अनिवार्य-सा हिस्सा है। फिर इसके ग्राहक भी हैं। पडोस के म्याँमार में यहाँ से शराब जाती है। आदिवासी जनजातियों के दो-तीन प्रमुख रोजगार हैं। जिनके पास भूमि है वे खेती करते हैं। जिनके पास नहीं है वेठ कपडे बनते हैं या शराब बनाते हैं। यहाँ की हस्तकला विश्वभर में प्रसिद्ध है। बाँस से सैकडों सुन्दर आकर्षक ऐसी वस्तुएँ ए बनाते हैं, उपयोगी तथा कलात्मक, दोनों तरीके से। फिर महीन कपडे बुनने की कला तो यहाँ काफी प्राचीन है। जिस वस्तु संग्रहालय में हम गए थे वहाँ विभिन्न रंगों, विभिन्न डिजाइनों के कपडे रखे हुए थे। एक शाल की कम से कम कीमत 10000 रु.। हाथकरघे पर ए आदिवासी इसे बनते हैं। मणिपुर वास्तव में म्यूजियम का राज्य है। पेरिस की तरह। अलग-अलग प्रकार के वस्तु संग्रहालय हर स्थान पर हैं। आदिम मनुष्य से सम्बन्धित म्यूजियम, आदिवासी का म्यूजियम, वस्त्रों से सम्बन्धित म्यूजियम, मणिपुर राजघराने का म्यूजियम, इन्फाल में स्थित भव्य मणिपुर राज्य म्यूजियम, स्वतंत्रता के बाद बना नेताजी सुभाषचन्द्र बोस म्यूजियम। हम जो देख चुके हैं वह म्यूजियम केवल 2 जिलों में। अन्य जिलों में और कितने होंगे पता नहीं। एक समृद्ध गौरवशाली इतिहास इस भूमि को प्राप्त है। कला और संस्कृति तो इसकी अपनी विशेषता है।
इन्फाल से 20-25 किलोमीटर दूरी पर मुतुआ म्यूजियम है। वहाँ हम मुसवा बहादुर नामक मणिपुरी कला भाषा और चित्रकला के विशेषज्ञ से मिले। 78 वर्ष की उम्र में भी उनका उत्साह देखने जैसा था। जंगली फूल देकर उन्होंने हमारा स्वागत किया। वे लकडी की कारीगरी कला के विशेषज्ञ हैं। इसके अलावा उन्होंने मणिपुरी कला पर 2 दर्जन से भी अधिक पुस्तकें मणिपुरी-अंग्रेजी में लिखी हैं। पुस्तक दोनों भाषाओं में। एक परिच्छद मणिपुरी में, दूसरा परिच्छेद अंग्रेजी में। उनकी एक पुस्तक मणिपुरी आर्ट, लैंग्वेज एण्ड सिम्बल मेरी बेटी ने खरीदी। रु.1500/- में। इस पुस्तक में सैकडों कलात्मक वस्तुओं के चित्र हैं। करीब 1 घण्टे तक उनसे अंग्रेजी हिन्दी में बताया रहा था। उन्हें हिन्दी बहुत कम आती है। समझते तो जरूर हैं।
उत्तर-पूर्व राज्यों में आलू के सिवाय अन्य सब्जियाँ मुश्किल से मिलती हैं। मुख्यतया चिकन-अण्डे तथा अन्य प्राणियों का माँस खाया जाता है। परन्तु मणिपुर इसका अपवाद है। यहाँ स्थानीय सब्जियाँ विपुल मात्रा में मिलती हैं। विशेष रूप से पत्तागोभी और फूलगोभी तो बहुत। पत्ता गोभी का सूप यहाँ की विशेषता है। इसलिए मणिपुर में शाकाहारियों को कोई परेशानी नहीं है। जंगली केले भी यहाँ मिलते हैं। यहाँ के रोजमर्रा के खाने में चावल और सब्जी प्रमुख है। पाँच सितारा होटल में गेहूँ की रोटी मिलेगी, अन्यत्र कहीं भी नहीं। चिकन तो हर स्थान पर। इनके रोज के भोजन में मछली तो होगी ही। मछलिएों के अनेक प्रकार यहाँ उपलब्ध होते हैं। चावल के इतने प्रकार शायद ही देश के किसी अन्य भाग में होते हों। यहाँ के सरकारी म्यूजियम में चावल के 145 प्रकार रखे गए हैं। इन सब का उत्पादन आज भी यहाँ होता है। विशेष रूप से काले चावल की खीर यहाँ बहुत प्रसिद्ध है। पाँच सितारा होटल में भी इसे स्थान प्राप्त है।
हमारा पूरा परिवार सेंद्रिय खाद्य वस्तुओं का उपयोग करता है। हम सबको सुखद आश्चर्य इस बात का हुआ है कि पूरे मणिपुर में जो खेती होती है उसमें रासायनिक खादों का उपयोग कतई नहीं किया जाता। सब कुछ प्राकृतिक।
इन्फाल शहर से थोडी दूरी पर स्थित प्राचीन किला देखने हम गए। इस किले में भी एक म्यूजियम है, जहाँ मणिपुर के राजाओं के 2000 वर्ष के इतिहास को करीने से रखा गया है। 200 एकड भूमि पर बना यह विशाल किला मणिपुर राज्य का 2000 वर्ष का इतिहास अनेक प्रमाणों द्वारा प्रस्तुत करता है। यहीं पर सनामाही पन्थ का एक सुन्दर मन्दिर है, जो शायद पिछले 25 वर्षों में बना हो। इस किले को देखने के लिए मार्गदर्शक की जरूरत होती है। जिसकी पूर्ति भी अधिकृत रूप से की जाती है। पूरे किले को पैदल घूमते हुए देखना तो किसी को भी सम्भव नहीं है। इसलिए यहाँ टिकट लेने के बाद ऑटो रिक्शा की व्यवस्था की गई है, जिसे युवक-युवतियाँ चलाते हैं और वही गाइड का भी काम करते हैं।
इन्फाल से 70 किलोमीटर की दूरी पर एक बहुत सुन्दर रिसोर्ट है गेलगांज। वहाँ पहले दिन हम लोगों का मुकाम था। यह रिसोर्ट बहुत ऊँचाई पर बना हुआ है। रिसोर्ट के कमरे में बैठकर नीचे देखें तो प्राकृतिक रूप से बनी एक विशाल झील दिखाई देती है। चारों ओर से पहाड और पहाडों से निकला पानी नीचे की समतल भूमि पर। बडा ही सुन्दर नजारा है। इस रिसोर्ट में ही तीन-चार दिन रुकने की इच्छा होती है। यहाँ के खानसामें इतना जायकेदार वेज-नॉनवेज खाना बनाते हैं कि क्या कहें। मणिपुर के भोजन की एक विशेषता यह है कि बहुत कम तल, मसाले भी बहुत कम। बावजूद इसके खाना जायकेदार। अर्थात् चावल, दाल, सब्जी, सलाद, पत्तागोभी का सूप या चिकन। एकदम बढिया। नाश्ते में उबले हुए अण्डे, ब्रेड, चाय, बिस्किट।
हम लोगों की इच्छा थी कि आदिवासियों के गाँव में उनके जैसे मिट्टी के घरों में 2 दिन रहें। इसकी व्यवस्था भी हमारे एजेंट ने कर दी थी। एण्ड्रो नामक एक आदिवासियों की बस्ती का गाँव है। पहाडों के बीच। वहाँ मिट्टी के कमरे बने हुए हैं, सैलानियों के लिए। अन्य व्यवस्था आधुनिक तरीके की, मतलब बिजली, कमोड, वाशबेसिन आदि। पर कमरे मिट्टी के। बाहर गहरी शांति। दूर पहाडों पर आदिवासी गाँव। परन्तु इन मिट्टी के कमरों के बाहर कुछ नहीं। दूर तक जंगल और पहाड। एक आदिवासी घर से खाना, नाश्ता लाकर दिया जाता था। यहीं पर बैठकर अपनी मार्गदर्शिका पद्मिनी से मैंने मणिपुर राज्य के लोगों का जीवन, वहाँ की संस्कृति, शिक्षा, राजनीति आदि को जानने की कोशिश की थी।
मैं सर्वाधिक प्रभावित हुआ यहाँ के स्त्री जीवन को देखकर। यहाँ की स्त्री स्त्रीत्व का एहसास लेकर नहीं जीती। एक तो उसकी वेशभूषा में और पुरुष की वेशभूषा में कोई बुनियादी अन्तर ही नहीं है। सभी स्त्रियाँ पुरुषों की तरह शर्ट और कमर के नीचे लूंगी की तरह एक वस्त्र बाँधती हैं। तमिलनाडु के पुरुषों की जो वेशभूषा होती है, वैसी ही वेशभूषा यहाँ की स्त्रियों की होती है। अन्य प्रदेश की स्त्रियाँ अपनी छाती का एहसास लेकर जीती हैं। साडी पहनने वाली स्त्री बार-बार अपने आँचल की तरफ ध्यान देगी, तो पंजाबी ड्रेस वाली अपनी ओढनी पर। परन्तु यहाँ ऐसी कोई बात ही नहीं है। दूसरी बात वह कहीं पर भी खद को असुरक्षित नहीं समझती। पद्मिनी मुझे बता रही थी कि रात के 2:30 बजे भी यहाँ अकेली स्त्री सडक पर चल सकती है। कहीं कोई शराबी दिखलाई देता है, परन्तु वह तकलीफ नहीं देता। उल्टे वह स्त्री शराबी को उसके घर तक पहुँचा आती है। आर्थिक दृष्टि से वह आत्मनिर्भर है। इसलिए घर के किसी भी निर्णय में उसका हस्तक्षेप होता ही है। और पुरुष उसकी राय लेना जरूरी भी समझता है ।
इंफाल की एक और विशेषता यहाँ की स्त्रियों का भव्य बाजार है। 17वीं सदी से यह मार्केट है। पहले उनका यह बाजार सडक पर लगता था। अब सरकार ने इंफाल शहर के बीच तीन भव्य भवन खडे किए हैं। अत्याधुनिक साधनों के साथ। इन तीनों भवनों में केवल और केवल स्त्रियाँ ही दूकानें लगा सकती हैं। प्रत्येक भवन में 300 से अधिक स्त्रियों की दूकानें हैं। तीनों भवनों में करीब 1000 स्त्रियों ने अपनी दूकानें लगाई हैं। 18 वर्ष की युवती से 80 वर्ष तक की बुढिया ए दुकानें सँभालती हैं। पुरुष यहाँ दूकान लगा नहीं सकता। अलबत्ता खरीददार पुरुष होता है। अर्थात् ग्राहकों में स्त्रियों की संख्या ही मुझे अधिक दिखी।
मणिपुर राज्य को, वहाँ के निवासियों को मैंने जितना और जैसा देखा, उससे एक बात मेरे समझ में आई कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में यह राज्य तथाकथित विकास से कोसों दूर है। प्रकृति के बीच प्राकृतिक जिन्दगी वह जी रहा है। यहाँ न मॉल हैं, न फैशनेबल कपडों की ढेरों दूकानें। लोग अपनी-अपनी जगह पर पूरी क्षमता के साथ जी रहे हैं। यहाँ न अपनी अमीरी का प्रदर्शन है और न देह का। न कोई तडक-भडक कत्रिम जीवन है। मैंने सुना कि पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बाहर का कोई भी पूँजीपति अपना पैसा लगा नहीं सकता। न ही यहाँ की जमीन खरीद सकता है। असम में राजस्थानी, बिहारी, बंगाली लोग काफी मिलेंगे। परंतु मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैण्ड, मिजोरम राज्य में इसकी अनुमति नहीं है। हम जिस पाँच सितारा होटल में रुके थे, वह होटल भी स्थानीय नेता का था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यहाँ के नागरिक जैविक रूप से म्याँमार या चीन के अधिक निकट के लगते हैं। परन्तु अब वे भारत के निवासी हैं। केन्द्र सरकार पूर्वोत्तर राज्यों पर अधिक पैसा खर्च करती है। प्रत्येक राज्य में केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं, अत्याधुनिक अस्पताल हैं। क्योंकि ए सीमावर्ती राज्य हैं। चीन की दृष्टि इन पर है। इसलिए उनकी जरूरतों को पूरा करना जरूरी है। किसी भी प्रकार का असतोष देश के लिए बहुत महंगा साबित हो सकता है। इन दिनों की केन्द्रीय सरकार विकास का मॉडल यहाँ भी कार्यान्वित करना चाहती है। जिस तथाकथित विकास के शिकार हम सब लोग हो चुके हैं। खासकर आपसी स्पर्धा, स्वार्थांधता, आत्म केंद्रित वृत्ति, रासायनिक खेती और प्रकृति का विनाश। बहुमंजिला इमारतें और बेरोजगारी। ऐसा विकास इन राज्यों में अभी तक तो नहीं हुआ है। भविष्य में भी न हो। पर पता नहीं, भविष्य में क्या होगा?

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