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मौत का इन्तज़ार

बाबू राज के नायर
हमेशा की तरह आज भी सुबह से ही अपनी इमारत की बाहरी चारदिवारी के फाटक पर नज़र गडाए खडे शवदाह गृह की आँखों की बेचैनी शाम होते-होते गहरी हो गई। न जाने क्यों हर महीने के अन्तिम दिनों की ओर अग्रसर होते समयचक्र के साथ उसकी आँखों में परेशानी के भाव गहराए जाते हैं।
मौत न दीवाली देखती है न ही होली, उसे त्योहार से कोई परहेज नहीं है। जब कभी भी उसे किसी से मिलने की इच्छा होती है, तो वह बेहिचक आ जाती है। ऐसे ही एक दिन, रामनवमी की सुबह मेरे पडोसी शर्माजी को वह अपने साथ ले गई। हम दोनों के परिवारों के बीच बहुत ही गहरा आत्मीय सम्बन्ध था इसलिए त्योहार के दिन की परवाह किए बिना मुझे भी सुबह से ही उनके घर में रहना पडा। कोविड-19 महामारी के फैलने के चलते नियन्त्रित संख्या में ही लोग वहाँ एकत्र हो सकते थे। शाम को उनके पार्थिव शरीर को शहर के सरकारी शवदाह गृह ले जाया गया, तो मैं भी जनाजे में शामिल था। वहाँ के माहौल में मैंने गहरी उदासी छाई हुई-सी महसूस की।
अन्य लोगों के साथ मैं भी शर्माजी के ज्एष्ठ पुत्र राहुल को अपने पिता के पार्थिव शरीर की अन्त्एष्टि संस्कार के सारे पूजा कर्मों को विधि प्रकार करते हुए देख रहा था। उस समय मेरा ध्यान, राहुल के साथ उस अधेड व्यक्ति पर भी केन्द्रित था जो राहुल को समझाते हुए सारे कर्म करवा रहे थे। वो उस शवदाह गृह के पुरोहित थे। बहुत ही एकाग्रता श्रद्धा और समर्पित मनोभाव के साथ एक-एक कर्म करवा रहे थे। कोरोना फैलने से रोकने के नियमानुसार सब लोग एक-दूसरे से सुनिश्चित दूरी बनाकर खडे थे और आँखों को छोडकर सबके चेहरे मास्क से ढँके हुए थे ।
कहते हैं कि दिल में कोई बात हो तो आँखें बोलने लगतीं हैं। यद्यपि पुरोहितजी के चेहरे पर मास्क लगा था, मैंने गौर किया कि उनकी आँखों में शोक के ऐसे भाव झलक रहे थे, जैसे उनके किसी अपने की मौत हुई हो और वह पूरी लगन के साथ उनके प्रति अपना कर्म निभा रहे हों। आज के इस आधुनिक काल में जहाँ अन्य संस्कारों की तरह अन्त्एष्टि संस्कार भी दिखावा बनकर रह गया था, वहाँ उस व्यक्ति का समर्पित मनोभाव वास्तव में सराहनीय था।
उनके निर्देशन में विधिपूर्वक सारे पूजा कर्म सम्पन्न होने के बाद चिता को अग्नि के सुपुर्द करने की बारी आई, तो मैं चौक गया। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि अब तक एक दक्ष पुरोहित का किरदार बखूबी निभाते रहने वाले व्यक्ति का कायाकल्प कैसे हो गया और एकाएक वह चाण्डाल कैसे बन गया।
चिता को अग्नि के सुपुर्द किए जाने के बाद जब वहाँ उपस्थित लोग एक-एक करके वहाँ से निकलने लगे, तो पुरोहितजी ने राहुल से कहा- आप लोगों को चिता के पूरी तरह जल चुकने तक यहाँ इन्तज़ार करने की आवश्यकता नहीं है, चाहें तो घर जा सकते हैं। वैसे भी चिता के पूरी तरह शांत होने में पाँच दिन तो लगेंगे। आज से पाँचवे दिन आजाइएगा, चिता बिल्कुल शाँत मिलेगी, उस दिन अस्थि निकाली जाएगी और फिर चिताभस्म आप को सौंप देंगे।
कुछ देर और रुकने के बाद जब शर्माजी के परिवार के अन्य सदस्य वहाँ से निकलने लगे तो राहुल मेरे करीब आया और साथ चलने का इशारा किया। राहुल और मेरी उम्र में पाँच साल का अन्तर था। अर्थात् वह मुझसे 5 साल छोटा था, फिर भी हम दोनों में दोस्तों जैसी घनिष्ठता थी।
उन पुरोहित के समर्पित मनोभाव एवं चाण्डाल रूपी कायाकल्प ने उनके प्रति मेरी जिज्ञासा बढा दी थी, इसलिए मैंने राहुल से रुकने के लिए कहा। वह शोक ग्रस्त था फिर भी मेरी बात मानते हुए मेरे साथ उनकी ओर बढा। वे एक लम्बे बाँस से चिता की लकडियों को उलट-पलट रहे थे, जिससे चिता की आग हर लकडी तक ठीक से पहुँच सके और चिता पूरी तरह जलकर भस्म हो जाए।
अपने पीछे कदमों की आहट पाकर उन्होंने मुडकर देखा। राहुल को देखकर मुस्कुाते हुए पूछा। आप गए नहीं? मैंने कहा था न कि यहाँ के बाकी सारे काम मैं पूरा कर लूँगा! मैंने गौर किया कि उनकी आखों में झलक रही मुस्कराहट बहुत ही फीकी थी। जिसके पीछे कोई दर्द छिपा हुआ था।
यह मेरे रिश्तेदार राजजी हैं, आपसे कुछ बात करना चाहते हैं। इन्हें आप से कुछ जानकारी हासिल करनी है। राहुल ने मुडकर अपने पीछे खडे मेरी ओर इशारा करते हुए कहा।
राहुल की बात सुनकर उन्होंने मेरी तरफ देखा, तो भी उनकी आखों में वही फीकी मुस्कराहट झलक रही थी। आप मुझ गरीब से मिलकर क्या कीजिएगा बाबू जी?! मैं इस लायक तो बिल्कुल भी नहीं हूँ कि आपको कुछ बता सकूँ। मैंने उनकी आवाज़ में सारे ज़माने के प्रति अपने घोर प्रतिशोध को महसूस किया।
आप नहीं जानते हैं कि आप इस श्मशान घाट पर रहते कैसे कर्म कर रहे हैं! आफ इस पवित्र कर्म की तो मिसाल भी नहीं दी जा सकती। आप का कर्म तो बहुत ही सराहनीय है। मैं इसी सन्दर्भ में आपसे कुछ जानना चाहता हूँ। मैंने अपनेपन के भाव झलकाते हुए कहा।
उन्होंने मेरी तरफ कुछ देर तक अचरज के साथ देखते रहने के बाद कहा- बाहर बरामदे के कोने में एक कमरा है न, आप वहाँ जाकर बैठिए मैं थोडी देर में पहुँचता हूँ। मैं जानता था कि मेरे अपनत्व-भरे व्यवहार ने उन पर जादू-सा असर किया था, जिसकी बदौलत उन्होंने मुझसे बात करने की मंज़ूरी दी थी।
वह कमरा जिसका जिक्र पुरोहितजी ने किया था, वहाँ का दफ्तर था। उस छोटे-से कमरे में एक तरफ एक पुरानी मेज़ पडी थी, जिसके इस ओर प्लास्टिक की दो पुरानी कुर्सियाँ और उस ओर उसी तरह की एक और कुर्सी पडी हुई थी। हम दोनों उन दोनों कुर्सियों पर बैठ गए।
हमें वहाँ बैठे दस मिनट हुए होंगे कि पुरोहितजी ने कमरे में प्रवेश किया। मेज़ की उस तरफ हमारे सामने की कुर्सी पर बैठते हुए पूछा, हाँ, जी कहिए मैं आपकी और क्या सेवा कर सकता हूँ?
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मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा- वैसे आप पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने मुझसे मिलने और बात करने की इच्छा जताई है। यहाँ जो भी आते हैं, वे यहाँ इस कमरे में आकर मुर्दा जलाने की पर्ची कटवाते हैं और केवल इसी से सम्बन्धित बात करते हैं। इससे पहले किसी ने मेरे काम की सराहना भी नहीं की।
मेरा नाम राज वर्मा है। इनको तो आप जानते ही होंगे, राहुल शर्मा! आप का नाम क्या है? मैंने बात शुरू करने के मकसद से औपचारिकता निभाते हुए पूछा।
जी, मेरा नाम यतीन्द्र शर्मा है। इनको मैं मृतक के ज्एष्ट पुत्र के रूप में जानता हूँ। इन्हीं से तो सारे कर्म करवाए थे न। पुरोहितजी ने तुरन्त जवाब दिया।
शर्माजी! मैंने आप के काम की जो सराहना की थी, वह मात्र आपका मन रखने के लिए नहीं था। अपने बहुत ही करीबी रिश्तेदार के शवदाह संस्कार में शरीक होते हुए कोई व्यक्ति जिस तन्मयता के साथ क्रिया-कर्म करते हैं, उसी लगन और श्रद्धा के साथ मैंने आपको शर्माजी के शवदाह संस्कार के दौरान देखा था। मैंने कहा।
इसे मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ। यह काम मेरी रोजी है। इसी से मेरे घर में चूल्हा जलता है। अपनी रोटी के ज़रिए के साथ धोखा करना तो मैं रोटी को लात मारने के समान मानता हूँ साहब। शर्माजी ने गंभीरता के साथ कहा।
तब मैंने उनकी आँखों में बदलते भावों को पढते हुए पूछा। पुरोहित बनकर अन्त्एष्टि के कर्म राहुल से कराने के बाद आप चाण्डाल बनकर चिता को आग के सुपुर्द करवाने के कर्म में लग गए। ऐसा क्यों ?! आफ अलावा इस श्मशान घाट पर और कोई कर्मचारी नियुक्त नहीं है क्या?!
आपकी सोच बिल्कुल सही है। मैं अकेला ही यहाँ का सारा काम करता हूँ। यह कहते हुए उनके स्वर में ज़माने भर का दर्द छिपा हुआ-सा मैंने महसूस किया।
यह तो सरकारी श्मशान घाट है और भी कर्मचारियों की नियुक्ति हो सकती है न तो फिर आप ही सारे काम क्यों करते हैं?! वैसे आफ एक ब्राह्मण और यहाँ के पुरोहित होने के नाते चाण्डाल का काम करना भी तो शोभा नहीं देता है! मैंने कुछ आश्चर्य जताते हुए पूछा।
कुछ देर तक सोचते रहने के साथ ही उनकी आँखों में झलक रही उदासी और गहरी हो गई। फिर बारी-बारी से हम दोनों की आखों में झाँकते हुए उन्होंने कहा- मैं पिछले पच्चीस वर्षों से यहाँ काम कर रहा हूँ। एक पुरोहित की हैसियत से ही मैंने यहाँ काम करना शुरू किया था। उस समय एक चाण्डाल भी यहाँ कार्यरत था। उसके किसी कारणवश काम छोडकर जाने के बाद पिछले पन्द्रह सालों से मैंने ही दोनों कामों को एक साथ सम्भाल रखा है।
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आपने इनके पूछने पर भी इसका कारण नहीं बताया! मुझे लगता है कि आप कुछ बताने से झिझक रहे हैं। श्मशान घाट के प्रबन्धन समिति के लोगों ने क्या पहले के चाण्डाल के जाने के बाद आप पर ज़ोर डाला था कि आपको उसका काम भी सम्भालना होगा?! राहुल ने मेरी ओर इशारा करके कुछ रूखे स्वर में पूछा।
नहीं-नहीं किसी ने मुझ पर कोई ज़ोर नहीं डाला था। मैंने अपनी इच्छा से ही दोनों कामों को एक साथ अपनाया है। पुरोहितजी ने हडबडाते हुए कहा। ऐसा लग रहा था कि जैसे उन्हें डर हो कि कहीं किसी ने हम लोगों की बात सुन ली तो उनकी नौकरी खतरे में पड जाएगी।
वही तो हम जानना चाहते हैं शर्माजी कि एक ब्राह्मण होते हुए भी आपने शूद्रों वाला काम करने की ज़म्मेदारी क्यों ले रखी है!? चाण्डालों को हमारा समाज शूद्र मानता है न?! मैंने अपनी बात पर कुछ जोर देते हुए पूछा।
मेरी बात का जवाब देने से पहले वे थोडी देर तक नज़रें झुकाए कुछ सोचते रहे, फिर कुछ गंभीर होकर उन्होंने बोलना शुरू किया- मैं जन्म से ब्राह्मण हूँ क्यों कि मेरे माता-पिता ब्राह्मण जाति के थे। लेकिन मैं जन्म से नहीं बल्कि कर्म से ब्राह्मण होने में विश्वास रखता हूँ और ईश्वर की कृपा से मैं कर्म से भी ब्राह्मण हूँ।
कर्म से ब्राह्मण होने से आपका क्या तात्पर्य है?! शर्माजी की बात सुनकर कुछ न समझ पाने के अन्दाज़ में राहुल ने पहले मेरी ओर, फिर शर्माजी की ओर देखते हुए पूछा।
राहुल की बात सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई लेकिन शर्माजी राहुल को गम्भीरता से देखते रहने के बाद बोले। सामान्यतौर पर हम जाति के आधार पर ही किसी को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र मानते हैं। परन्तु हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार किसी के जन्म से अधिक महत्त्व उसके कर्मों का होता है। कर्मों के अनुसार ही उसे ब्राह्मण या कोई अन्य कहा जा सकता है। शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण होने की कुछ योग्यताएँ होती हैं।
वो सब क्या है शर्माजी? उन्हें बीच में टोकते हुए राहुल ने पूछा।
ब्राह्मण शब्द उन्हीं के लिए प्रयुक्त होते हैं जिनमें ब्रह्मचेतना और धर्मधारणा जीवित और जागृत हो, भले ही वो किसी भी वंश में क्यों न जन्मे हों। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जो ब्रह्मज्ञानी हैं वो ब्राह्मण हैं। यह ज्ञान कर्म से मिलता है। जन्म से ही कोई भी ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी नहीं होता है। अपने कर्म से शूद्र भी ब्रह्मज्ञानी बन सकता है और तब वह भी ब्राह्मण कहलाया जाता है। शर्माजी ने समझाया।
अगर ऐसा है तो फिर आप अभी पुरोहिताई और चाण्डालवृत्ति दोनों से जुडे हुए हैं! आपने ही कहा है कि जन्म से नहीं अपने कर्म से ही कोई ब्राह्मण कहलाया जाता है। इस प्रकार दो विभिन्न प्रकार के कर्म करने से क्या आप ब्राह्मण कहलाए जा सकते हैं ? राहुल ने अपनी जिज्ञासा जताई।
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राहुल की बात सुनकर पहली बार शर्माजी की आखों में मुस्कराहट के भाव नज़र आए। उन्होंने वैसी ही मुस्कराहट लिए हम दोनों की आँखों में बारी-बारी से झाँकने के बाद कहा- हाँ, मैने कहा था कि जन्म से नहीं अपने कर्म से ही कोई ब्राह्मण कहलाया जा सकता है, लेकिन इसके साथ ही मैंने ब्रह्मज्ञान की बात भी कही थी। याद है न? राहुल की तरफ देखकर पूछा।
हाँ, जी आपने यह बात कही थी, लेकिन आपने यह नहीं बताया कि किस प्रकार के कर्म से कोई ब्रह्मज्ञानी बन सकता है। राहुल ने एक बालक की कुतुहलता के साथ कहा।
शर्माजी की आँखों में फिर से गंभीरता झलकने लगी, उन्होंने कहा- शरीर और मन से शुद्ध-पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से वंचित कोई भी व्यक्ति, जिसके मन में हमेशा सेवा की भावना रहती हो, वह ब्रह्मज्ञानी होता है।
क्या आफ कहने का तात्पर्य यह है कि इन स्वभावों से वंचित व्यक्ति भले ही ब्राह्मण माता-पिता के पुत्र के रूप में ही क्यों नहीं जन्मा हो, वह ब्राह्मण नहीं कहलाया जा सकता है! राहुल के प्रश्न में आश्चर्य के भाव स्पष्ट झलक रहे थे।
इस पर शर्माजी की आँखों में फिर से एक हल्की-सी मुस्कराहट की रेखा खिंच गई। उन्होंने कहा-आपने बिल्कुल सही सोचा है राहुल बाबू। मनुस्मृति में यह बात बिल्कुल स्पष्ट रूप से कही गई है।
वह कैसे ?! जैसे-जैसे राहुल को बात समझ में आ रही थी, और जानने की उसकी जिज्ञासा भी बढती जा रही थी।
मनु की वर्ण व्यवस्था जन्म से ही कोई वर्ण नहीं मानती। मनुस्मृति के अनुसार माता-पिता को बच्चों के बाल्यकाल में ही उनकी रूचि और प्रवृत्ति को पहचान कर ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण का ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेज देना चाहिए। शर्माजी ने राहुल को समझाया।
राहुल के आगे कुछ और पूछने से पहले ही मैंने शर्माजी से पूछा- आप जन्म और कर्म दोनों से ब्राह्मण हैं। जन्म से ब्राह्मण रहते हुए ही आपने कर्म से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति की और कर्म से भी ब्राह्मण बन गए, तो फिर आपने केवल पुरोहिताई को ही अपना पेशा क्यों नहीं बनाए रखा, साथ में चाण्डालवृत्ति को भी क्यों अपनाए हुए हैं?
नज़र झुकाए कुछ सोचते हुए मौन धारण किए रहने के बाद शर्माजी ने हमारी तरफ देखा जरूर, लेकिन उन्होंने अपना मौन नहीं तोडा।
मैं मानता हूँ कि आप अपनी मर्जी से ही पुरोहिताई और चाण्डालवृत्ति के दोनों काम एक साथ कर रहे हैं फिर आपकी आँखों में विषाद का एक स्थाई भाव क्यों विद्यमान रहता है? उनकी आखों में उलझन के भाव देखकर मैंने अपने प्रश्न को कुछ बदलते हुए पूछा।
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इस पर भी उन्होंने मेरे प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया तो मैंने कहा। जब मैंने आपको अन्त्एष्टि संस्कार के सारे कर्म करवाते हुए देखा था, तब ही आपकी आँखों में यह भाव स्पष्ट रूप में महसूस किया था। अब आप यह मत कहिएगा कि मेरी सोच गलत है। आपसे मुलाकात करके आफ बारे में *यादा जानने की मेरी उत्सुकता का मुख्य कारण ही आपकी आँखों का यह विषाद भाव है, जो कि अब भी मुझे साफ दिखाई दे रहा है। वैसे आप कुछ बताना नहीं चाहते हैं, तो फिर मैं आप पर कोई ज़ोर भी नहीं डालना चाहता हूँ।
थोडी देर और चुप रहने के बाद शर्माजी ने मौन तोडा- नहीं-नहीं साहब ऐसी कोई बात नहीं है। आपने मुझ गरीब में रुचि ली और मेरा हमदर्द बनना चाहा, तो फिर यह मेरा भी तो फर्ज बनता है कि मैं आपको सब कुछ बता दूँ। लेकिन साहब यह सब बताने के लिए मुझे अपनी ज़न्दगी के कुछ ऐसे पहलुओं पर रोशनी डालनी पडेगी, जोकि आफ लिए किसी भी तरह से रुचिकर नहीं होगी।
जब आप स्वयं यह मानते हैं कि मैं आपका हमदर्द हूँ तो फिर आपका दर्द जानने में मुझे रुचि क्यों नहीं होगी?! आप बेहिचक बताइए, मैं इसके लिए ही तो आफ पास आया हूँ। मैंने मुस्कराते हुए शर्माजी की हिम्मत बंधाई।
जन्म से ब्राह्मण जैसी ऊँची जातियों के लोग चाण्डाल के बारे में सोचते हैं कि वे अछूत हैं। शवों से उतारे गए चिथडे पहनते हैं। शवों को जलाना उनका मुख्य पेशा है। अधिकारियों के आदेश पर अपराधियों को फाँसी पर चढाना भी उनके पेशे में आता है। इसलिए मेरी बिरादरी के लोगों ने मुझसे चाण्डालवृत्ति को छोड देने की माँग की। शर्माजी ने कहा।
आपको अपने समाज में अपनी बिरादरी के लोगों के साथ रहना है न, तो फिर आपने उनका कहना मानकर अछूतों वाला काम क्यों नहीं छोडा? मैंने उन्हें परखने के मकसद से पूछा।
मेरे इस प्रश्न का उत्तर देने में वे बार-बार हिचकिचा रहे थे तो मैंने उनकी हिम्मत बढाते हुए कहा- आप अपने कर्म के प्रति कर्तव्यनिष्ठ हैं, यह तो मैं मानता हूँ। लेकिन मैंने आपकी आँखों में दुःख और दर्द के जो गहरे भाव देखे हैं, वो तो किसी अपने की मृत्यु के शोक में ही देखे जा सकते हैं !
मेरी बात सुनकर उनकी आँखों में ऐसे भाव झलके, जैसे उन्हें मेरी बात सुनकर आश्चर्य हो रहा हो। फिर वे अत्यधिक गंभीर होकर कहने लगे- साहब! मुझे पिछले 15 सालों से दो कामों की दोहरी तनख्वाह मिल रही है। जब मैं केवल पुरोहिताई ही किया करता था तो घर में सिर्फ एक वक्त ही चूल्हा जलता था। यह दोहरी तनख्वाह भी इतनी पर्याप्त नहीं है कि मैं ठीक से अपने परिवार का पालन पोषण कर सकूँ। हाँ, इतना अवश्य है कि अब रसोई में तीन वक्त के लिए खाना बनता है। किसी को भूखा नहीं सोना पडता है। सरकारी स्कूल में ही सही बच्चों की पढाई भी चल रही है।
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आप जन्म और कर्म दोनों से ब्राह्मण हैं। आपको ब्राह्मण्य के सारे कर्मों का ज्ञान है। आप वेद-मंत्रों के ज्ञाता हैं। सनातन धर्मशील लोग अपने घरों में पूजा-पाठ के लिए ब्राह्मणों को ही आमन्त्रित करते हैं और उन्हें अच्छी दक्षिणा भी देते हैं। यहाँ के काम के बाद के बचे हुए वक्त में आप दूसरों के घरों में जजमान बनकर पूजा-यज्ञ करके धन कमा सकते हैं। उससे चाण्डालवृत्ति जैसे शूद्रों वाले कर्म से आप मुक्त भी हो जाएँगे! मैंने उन्हें ढाढस बधाँते हुए कहा।
मेरी बात सुनकर उनके चेहरे की उदासी और ज्यादा गहराई। उनकी आँखें नम हो गईं। बडी मुश्किल से अपने आप को सम्भालते हुए उन्होंने कहा- दो कारणों से यह सम्भव नहीं है साहब। शवदाह के बाद भी मुझे यहाँ से जाने की अनुमति नहीं है। शव आए या न आए, शव के इन्तज़ार में मुझे यहीं रहना पडता है।
ऐसा है तो आप शवदाह गृह की नौकरी त्यागकर पूर्णरूप से जजमान बनकर पूजा-यज्ञ के काम में तल्लीन हो जाइए। मैंने तुरन्त कहा।
दूसरा कारण आपने अभी जाना नहीं है साहब! मंत्रों के उच्चारण के साथ अन्त्एष्टि कर्म करने से ही आत्मा को शान्ति मिलती है। मेरे द्वारा यदि किसी आत्मा को शान्ति मिलती है तो, उससे बढकर पुण्यकर्म और क्या हो सकता है?! फिर यहाँ नौकरी करते कुछ दिन बीत जाने के बाद से ही मेरे मन में एक पापी विचार ने जन्म लेना शुरू कर दिया था। चाहते हुए भी उस पापी विचार को अपने मन में आने से मैं अब भी नहीं रोक पाता हूँ। अपने पापी विचार के लिए मैं हर शव और उस में से पलायन कर चुकी आत्मा से मन ही मन बार-बार क्षमा माँगते हुए पूरी तनमयता के साथ अपना कर्म करता हूँ। इसलिए कर्म करते हुए मेरे अन्दर बहुत ही एकाग्रता, श्रद्धा और समर्पित मनोभाव जागृत हो जाते हैं, फिर भी मेरे अन्दर के दुःख को चेहरे पर प्रकट होने से नहीं रोक पाता हूँ। मैंने ठान लिया है कि शवों के प्रति अपने पापी विचार के लिए प्रायश्चित स्वरूप ज़न्दगी भर यहाँ रहकर ए दोनों काम करता रहूँगा।
प्रत्येक शव के प्रति भला आफ मन में ऐसे क्या पापी विचार उत्पन्न हो सकते हैं, जिसके लिए आप मन ही मन क्षमा माँगते हुए दाह-संस्कार में भाग लेते हैं?! हमारी बातों पर गौर करते हुए मेरे साथ बैठे राहुल ने अचंभित होकर पूछा।
मैं तो बस उस मनुष्य की आँखों में कुछ खोजने की कोशिश किए जा रहा था, जो पल-पल मेरे लिए एक पहेली बनता जा रहा था। उनके साथ संवाद शुरू करने से लेकर अब तक के दौरान मैंने उनकी आँखों में कईं भाव बदलते हुए देखा है, इसलिए मुझे उनकी कही बात पर कोई विशेष आश्चर्य तो नहीं हुआ, लेकिन राहुल जैसी शंका मेरे दिमाग में भी उठ रही थी।
राहुल की बात सुनकर उन्होंने हम दोनों की आँखों में मन के भाव पढने की कोशिश करते हुए कहा- आपकी शंका दूर करने से पहले मैं किसी बात पर रोशनी डालना चाहूँगा।

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हाँ जी! कहिए। मैंने कहा।
अन्त्एष्टि संस्कार भी आजकल एक दिखावा मात्र बनकर रह गया है। इस संस्कार की भी अपनी गरिमा होनी चाहिए। मृतात्मा की सद्गति के लिए किए जाने वाले कर्मकाण्ड के समय, उसे कराने वाले पुरोहित, करने वाले सम्बन्धी तथा उपस्थित हितैषी आदि सभी का भावनात्मक एकीकरण होना आवश्यक होता है। इतना कहने के बाद शर्माजी चुप हो गए।
बोलते-बोलते बात को पूरी किए बिना इस प्रकार अचानक रुक जाने की उनकी प्रवणता पर मुझे कुछ आश्चर्य तो हो रहा था, लेकिन मैं समझ गया कि वो किसी बात से डर रहे थे और जिसकी वजह से मुझसे खुलकर बात नहीं कर पा रहे थे।
मैंने उनसे कहा- आप हम पर भरोसा कर सकते हैं शर्माजी, आपकी कही बात हम तक ही सीमित रहेगी, किसी अन्य के कानों तक वह नहीं पहुँचेगी।
शर्माजी की आँखों के भाव से मुझे लगा कि मेरी बात सुनकर वे कुछ आश्वस्त हुए हैं। मेज़ पर अपनी दोनों कोहनियाँ टिकाए वे आगे की ओर थोडा झुक आए और कानाफूसी के स्वर में कहना आरंभ किया- बाबू जी! इस शवदाहगृह में लाए जाने वाले शवों की गिनती करके प्रति शव के हिसाब से ही यहाँ दाह संस्कार का मेहनताना तय किया जाता है। एक महीने में जितने शवदाह होते हैं, नगर निगम के बाबू उनकी गिनती रखते हैं। अगले महीने के आरंभ में उसका हिसाब करके पुरोहिताई तथा चाण्डालवृत्ति का अलग-अलग मेहनताना देते हैं। जिस दिन यहाँ कोई शव नहीं लाया जाता है, उस दिन का कुछ भी नहीं मिलता है, लेकिन शव के इन्तज़ार में यहीं रहना पडता है।
इतना कहने के बाद शर्माजी ने बहुत ही दयनीय भाव से मेरी तरफ देखा। मेरी आँखों में उनके लिए सहानुभूति की झलक पाकर उन्होंने आगे कहना शुरू किया- जैसे कि मैंने आपको बताया है, पहले मैं मात्र पुरोहिताई का काम ही किया करता था, उससे घर की ज़रूरत पूरी नहीं हो पाती थी, तो अवसर मिलते ही समाज की परवाह किए बिना चाण्डालवृत्ति के रूप में आमदनी का एक और मार्ग भी अपना लिया।
ठीक है शर्माजी, आपकी बातों से मुझे यह तो मालूम हो गया है कि आप पुरोहिताई के साथ चाण्डालवृत्ति भी क्यों करते हैं! लेकिन आफ पापी विचार की बात अब तक मेरी समझ में नहीं आई है! मैंने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा।
कुछ कहने से पहले नज़रें उठाकर हमारे पीछे, बाहरी दरवाजे की तरफ कुछ परखने के अन्दाज़ में देखने के बाद वे हम से मुखातिब हुए- वही बताने की कोशिश कर रहा हूँ साहब! यहाँ नित्य के प्रति शव दाह नहीं होते हैं। कभी-कभी तो एक ही महीने में पूरे हफ्ते भर कोई शव नहीं लाया जाता। नगर निगम के बाबू के साथ-साथ मैं भी शवों की गिनती रखता हूँ, इसलिए खाली बैठे हुए उस महीने के मेहनताने का हिसाब लगाता रहता हूँ।
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जैसे-जैसे महीने के दिन बीतते जाते हैं, शवों की संख्या कम पाकर मैं विचलित और परेशान हो जाता हूँ। इसलिए किसी न किसी की मृत्यु की कामना करते हुए मैं शव की प्रतीक्षा में बाहरी दरवा*ो की तरफ ताक लगाए बैठा रहता हूँ और जैसे ही बाहर, जनाजे की आहट पाता हूँ, तो मेरी आँखों में एक विचित्र चमक पैदा हो जाती है। आज सारी दुनिया जहाँ रामलला के जन्म की खुशी मना रही है, वहाँ मुझे सुबह से ही मौत का इन्तज़ार था, क्योकि जब यहाँ चिता जलती है, तब ही मेरे घर में चूल्हा जलता है। इतना कुछ कहते हुए शर्माजी की आँखें भर आईं।
शर्माजी के मन में उठने वाले पापी विचार की जानकारी पाकर मेरी आँखें भी नम हो गईं, लेकिन मेरे आँसू उनके पापी विचार के प्रति नहीं थे। वो अश्रुकण उनकी दयनीयता एवं मजबूरी के लिए समर्पित थे। अब जाकर मैंने महसूस किया कि बेजबान शवदाह गृह की आँखों में परेशानी के भाव क्यों गहराए जाते हैं। शर्माजी की उदासी से वह क्यों उदास हो जाता है, वह बेजुबान है तो क्या मेरी भी तो जबान है न! हाँ, मेरी जबान है....।

सम्पर्क - बाबू राज के नायर, गीता भवन,नारनगानम वेस्ट (पोस्ट),
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