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बाज़ी उलट गई

भगवान अटलानी
नाना-नानी इसी शहर में अकेले रहते हैं। अपनी बेटी के घर हमेशा के लिए रहना उन्हें मंज़ूर नहीं है और बेटा है नहीं उनका। वैसे अकेले रहने के कारण उनको कोई तकलीफ नहीं होती। नाना बडे पद से रिटायर हुए हैं। भरपूर पेन्शन मिलती है। बैंक से फिक्सड डिपाज़ट पर अच्छा-खासा ब्याज मिलता है। कई दूकानें, मकान किराए पर चलते हैं। गाडी, बंगला, नौकर-चाकर सब कुछ हैं उनके पास। वैसे बीच-बीच में पापा दोनों को ले आते हैं। जब तक नाना-नानी चाहते हैं या मम्मी-पापा रोक सकते हैं,घर पर साथ रहते हैं।
कुछ दिनों से नाना-नानी हमारे घर पर हैं। सब लोग लन्च के लिए मेज़ पर बैठ चुके हैं। सदा खुश रहने और मुस्कराने वाले नाना ने जेब से निकालकर नानी को गोली दी है, पानी दूँ?
नहीं, ले लूंगी।
सच बताना नाना, आप यह सब हमें दिखाने के लिए तो नहीं करते हैं? आगा-पीछा सोचे बिना मैं अचानक नाना से पूछती हूँ। नाना के चेहरे से मुस्कराहट गायब हो गई। वे खामोश से मुझे देखते रहे, कुछ बोले नहीं।
बुरा तो नहीं लगा नाना?
हाँ, बुरा लगा।
क्यों? क्या बुरा लगा?
इतने सालों से देखते रहने के बाद भी तू हमारे बारे में इस तरह सोचती है?
शुरू से मुँहफट हूँ। इसका नुकसान और फायदा मुझे मिलता रहता है। हूँ अभी तेईस की। क्यों है ऐसा? इकलौती सन्तान होने के कारण? मूल स्वभाव के चलते? कुछ भी हो मगर मनमर्जी करना मेरी आदत बन गई है। मालूम है कि मम्मी-पापा को पसन्द नहीं है। फिर भी कपडे-लत्ते, खाना-पीना, सैर-सपाटा, सोना-जागना, यारी-दोस्ती, मौज-मस्ती और बिन्दास ज़न्दगी के मामले में उनकी परवाह बिल्कुल नहीं करती हूँ। मम्मी-पापा ने पहले समझाया, ऐतराज़ किया, बहस की, नाराज़ हुए। जब लगा कि यह लडकी वही करेगी जो इसे भाएगा तो चुप हो गए। आज भी कई बार हाव-भाव देखकर उनकी कुढन को साफ तौर पर महसूस करती हूँ। मगर मैं हूँ कि न परवाह करती हूँ और न चिन्ता। उसी तरह जीती हूँ, जैसा मुझे अच्छा लगता है।
सॉरी नाना, पता नहीं क्यों मुझे नानी के ऊपर छलकता आपका प्यार अजीब लगता है।
नाना के होंठों पर मुस्कान लौट आई है। आँखों में प्यार उतर आया है। इन्होंने पहले नानी को और फिर मुझे उन प्यार-पगी नज़रों से निहारा है। बोले कुछ नहीं हैं।
चल, नानी-नाना की प्लेट में खाना लगा दे। यह मम्मी है।
सवाल कीडा बनकर मेरे दिमाग में रेंग रहा है। आज भले ही औरत अपने हकों की बात करती हो मगर नाना की जवानी में तो बाकायदा घूंघट निकालती थीं। नाना पोंगा-पंथी नहीं हैं। आज तक मेरे उठने-बैठने या पहनने को लेकर कभी कुछ नहीं कहा है उन्होंने। नानी ज़रूर बीच-बीच में उल्टा-सीधा बोल देती हैं। मगर जब वे मेरे ऊपर झल्लाती हैं तब भी नाना मुस्कराते रहते हैं। कुछ कहते नहीं हैं। न मुझे और न नानी को। कई बार मेरी बहस से लाजवाब नानी उनकी तरफ देखकर कहती भी हैं, आप इसे समझाते क्यों नहीं हैं?
इसके बावजूद नाना की चुप्पी और मुस्कान की जुगलबन्दी टूटती नहीं है। *यादा से *यादा, स्नेह भरी आवाज में मुझे कहते हैं, क्यों तंग कर रही है नानी को? आ, मेरे पास आ। तेरी कनपटियाँ सहला दूं।
जवानी में नाना ने नानी को अपने ढंग से ज़रूर चलाना चाहा होगा। नाना-नानी में झगडे भी हुए होंगे। उस समय के अनुसार जीत नाना की ही हुई होगी। न मैंने कभी पूछा है और न मम्मी ने या नानी ने कभी बताया है। गुज़रे ज़माने का ज़क्रउनकी बातों में आता हैं तो ऐसा लगता है, नाना-नानी की ज़न्दगी फूलों की सेज रही है हमेशा। भले ही अभी छोटी हूँ, मगर मुझे अच्छी तरह मालूम है कि दुख-दर्द, उतार-चढाव हरएक ने अपनी ज़न्दगी में देखे होते हैं। नाना-नानी के दिन सदा सुख भरे रहे होंगे, कैसे मान लूं?
माँ-बाप, रिश्तेदार दोनों के होंगे। मर्दों की दादागिरी और औरतों की मजबूरी खूब देखी होगी दोनों ने।
लडकों को लडकियों से पहले हर सहूलिएत देने के उस दौर में नाना ने भी म*ो किए होंगे। दिमाग इसी तरह सोचने लगा होगा। कुछ ठोक-पीटकर, कुछ सिखा-पढाकर बचपन से जवान होने तक नानी को संाचे में ढालने के लिए क्या नहीं हुआ होगा? नानी के ऊपर असर तो ज़रूर हुआ होगा, मगर नाना कैसे बच गए? वातावरण ने अछूता कैसे छोड दिया उन्हें? जितना ध्यान वे नानी का रखते हैं उसे देखकर बिल्कुल नहीं लगता है कि काजल की कोठरी में रहते हुए भी नाना के कपडों पर कोई दाग लगा है।
मम्मी बताती हैं कि पापा से उनकी शादी का फैसला अकेले नाना ने लिया था। नानी समेत सब लोग खिलाफथे। हों भी क्यों नहीं? पापा की लम्बाई है पाँच फुट दस इन्च। मम्मी की लम्बाई है पाँच फुट।
देखकर जमती ही नहीं है जोडी। मगर नाना थे कि सुनी ही नहीं किसी की। पापा को देखा, परखा, पसन्द किया, मम्मी-पापा की मुलाकात कराई। फिर सीधा पापा से पूछा, क्या विचार है?
मुझे सब कुछ ठीक लगता है।
लम्बाई देखी है?
मेरे विचार से, बाहर से देखने पर कौन कैसा लगता है इससे *यादा जरूरी यह देखना है कि अन्दर से कौन कैसा है?
देख लिया?
जी।
बस, फैसला कर लिया नाना ने। अकेली बेटी की शादी एकतरफा तरीके से करने का फैसला आसान नहीं रहा होगा नाना के लिए। मगर यह मुश्किल काम उन्होंने किया। अब अगर नानी की ज़रूरतों की इतनी चिन्ता नाना करते हैं, तो कोई बात होगी, जरूर होगी। जो नाना, नानी सहित किसी की परवाह
किए बिना बेटी की शादी करने का फैसला करते हैं, वे बेशक अन्दर से मज़बूत हैं। मज़बूत नहीं, बहुत मज़बूत हैं। उम्र के आखिरी पडाव पर खडे नाना का, नानी के लिए खुले आम बिछ जाना कुछ कहता है। क्या कहता है? चुप नहीं बैठूंगी। पता लगा कर रहूँगी।
रात को नानी को आसानी से नींद नहीं आती है। गोली लेकर सोती हैं, तो अगले दिन बेचैनी होती है।
इसलिए घूमती रहेंगी, करवटें बदलेंगी, खुद को कोसेंगी। मगर नींद की गोली नहीं लेंगी। तीन-चार-पाँच जितने बजे भी नींद आएगी, आएगी। ग्यारह-बारह जितने बजे भी नींद खुले, उठेंगी, तभी जब उठने की तबीयत होगी। नाना उन्हें उठाते नहीं हैं। मम्मी-पापा ने कहा भी, मम्मी, कुछ दिन ज़द करके जल्दी उठो। देखो, रात को कैसे जल्दी नींद आती है? नानी ने अनिच्छा से दो-एक दिन उनकी बात मानी।
फिर हाथ डाल दिए। ऊपर से नाना की शह, सोने दो। नौकर हैं न? काम तो हो ही जाते हैं घर के। इस तरह नानी जागती रहती हैं और म*ो की बात यह है कि नाना हमेशा चैन की नींद सोते हैं। ऐसे सोते हैं कि घोडे बेचकर सोने वाली वह कहावत याद आती है जो मुझे कई बार सुना कर मम्मी टोकती हैं।
नाना के सोने के बाद मैंने नानी को पकडा। अपने साथ ले आई। नानी खुश कि रात गुज़ारने के लिए मुर्गी फँसी। मैं खुश कि आज फुर्सत से नानी के अन्दर घुसूँगी।
यों तो नानी और मम्मी को पता है। मम्मी ने पापा को बताया हुआ है। फिर भी मैंने जान-बूझकर अपने प्रेम-प्रसंग को छेड दिया। हमेशा की तरह नानी ने बुरा-भला कहा। मैं न बिदकी, न भडकी। धीरज से सुनती रही। नानी बोल चुकीं, तो मैंने कहा, नानी, शादी तो मैं उसी से करूंगी। आप लोग नहीं मानेंगे तो कोर्ट में करूँगी। मैं फैशन डिज़ाइनर हूँ। दो बार लंदन फैशन वीक स्काउट में शामिल होने के लिए इंग्लैण्ड जा कर आई हूँ। निखिल बी.टेक. कर चुका है। एम.बी.ए. कर रहा है। करले। फिर जॉब और इसके बाद शादी। जहाँ जॉब, वहाँ हम। आप बता सकती हो, तो सुखी जीवन कैसे गुज़ारा जा सकता है, यह बताओ।
जा मर! मुझसे बात मत कर। मैं जा रही हूँ। नानी ने उठने की एक्ंटग की है।
आप जाओगी तो तब न, जब मैं जाने दूंगी। बताइए, शादी के बाद आफ साथ नाना का व्यवहार कैसा था?
अरी छोड! हमारे जमाने कुछ और थे।
फिर भी नानी, बताओ न? मैं नानी को लिटाकर उनसे लिपट जाती हूँ, बताओ, नानी।
नानी पिघल चुकी हैं। उनके चेहरे पर परछाइयाँ ही परछाइयाँ हैं।
कभी खाना-वाना खिलाने नाना बाहर ले जाते थे या नहीं?
हाँ, ले जाते थे।
पिक्चर दिखाते थे?
नानी को याद आ जाता है जैसे, शादी के बाद पहली बार सिनेमा ले गए। लौटे तो वहीं पास के एक रेस्टारेन्ट में कॉफी पीने चले गए। तेरे नाना ने कॉफी के साथ आमलेट मंगाया। मैं शाकाहारी थी। इसलिए उन्हें बताया कि अंडा नहीं खाऊँगी। कुछ और मँगाएं।
नाना को मालूम नहीं था क्या कि आप शाकाहारी हैं?
नहीं।
फिर, क्या मँगाया उन्होंने? जो आपने कहा या अपनी मज़ीर् चलाई?
अरी, सुन तो! पूछा, क्यों? अंडा क्यों नहीं खाएंगी आप?
फिर?
मैंने दोबारा बताया तो कहने लगे, आए दिन पार्टियों में जाना पडता है। डिनर के इन्वीटेशन होते हैं।
वहाँ डिं्रक्स और नानवेज होता है। कई लेडीज़ ड्रिंक्स नहीं लेतीं। आप भी न लें, तो चलेगा। मगर नानवेज सोशल ऐटीकेट का हिस्सा है।
आप मान गईं, नानी?
मैंने मना किया, तो पूछने लगे कि कभी तो खाया होगा? मैंने फिर मना किया, तो हँसकर बोले, आज अंडे से शुरू करिए। धीरे-धीरे नानवेज पर आ जाइएगा।

अच्छा बताओ नानी, क्या तब भी नाना आपको आप कहते थे?
हाँ, बेटा, यह उनके स्वभाव में है। घर के नौकर-नौकरानी को भी तेरे नाना आप कहकर बुलाते हैं।
मगर नानी, मुझे तो आप कहकर नहीं बुलाते हैं नाना?
अब तुझे भी आप कहें नाना?
मैं खिलखिलाकर हँसी, क्या बात कही है नानी।
आगे क्या हुआ?
हुआ क्या? मैं नहीं मानी तो वे नाराज हो गए और कुछ खाए-पीए बिना मुझे वहीं छोडकर रवाना हो गए।
रवाना ही हो गए, आपको छोडकर?
अब तेरे नाना आगे और मैं दौडती-दौडती पीछे। क्या बताऊँ, किस तरह कार में बैठी?
अच्छा?
कई दिनों तक तेरे नाना ने मुझसे बात नहीं की। समझौता तब हुआ जब मैंने नानवेज खाने के लिए हाँ कहा।
बडे ज़ालिम हैं नाना, लगते तो नहीं हैं ऐसे!
पूछ मत, अच्छे हैं तो अच्छे हैं। गुस्सा आता है, तो किसी की नहीं सुनते।
आपकी भी नहीं?
मैं तो क्या हूँ री, भगवान की भी नहीं सुनते।
मगर अब तो आपकी हर बात मानते हैं। आपका इतना ध्यान रखते हैं।
हाँ, ध्यान रखते हैं। मगर शादी के बाद शुरू के सालों में बात-बात पर नाराज़ हो जाते थे।
ऐसा ही कोई दूसरा किस्सा बताओ न नानी!
नानी चुप हो गई हैं और जैसे यादों के तूफान से घिर गई हैं। मैं ही टोकती हूँ, बताओ न, नानी?
पहली बार खाने पर गए तो मेरे मायके में सब्ज़ी में मिर्च *यादा थी। इसमें गलती उन लोगों की नहीं थी, क्योंकि वहाँ मिर्च बहुत तेज़ खाते हैं। तेरे नाना ने एक ग्रास लिया और उठ गए। मेरे भाई ने पूछा तो गुस्से में जवाब दिया, आप लोग खाना खिलाना ही नहीं चाहते।
छोड दिया खाना?
कारण पता लगा तो मेरे भाई ने माहौल हल्का करने के लिए कह दिया, मिर्च के बहाने हम लोग आफ मिजाज की तल्खी नापना चाहते थे।
अच्छा, यह कह दिया आफ भाई ने?
5
उस बेचारे ने तो मज़ाक में कहा था मगर ए आग-बबूला हो गए। मुझसे कहने लगे, मैं जा रहा हूँ।
आप चलेंगी या यहीं रहेंगी?
आपने क्या कहा?
मैं तुरन्त खडी हो गई और तेरे नाना के साथ चल दी।
नाना ठण्डे हुए?
रास्ते में मुझसे बोले कि आगे से मैं आफ मायके नहीं जाऊँगा। मैंने कहा, आप नहीं जाएँगे तो मैं भी नहीं जाऊँगी।
फिर नहीं गईं आप मायके, नानी?
पूरे दो साल नहीं गई। जब मेरे भाई ने मेरे पापा के साथ मेरे ससुराल आकर इनसे सबके सामने माफी माँगी तो तेरे नाना मेरे मायके गए।
इसके बाद प्यार से जाते हैं वहाँ?
नहीं, बेमन से जाते हैं।
क्यों?
शायद मेरा दिल दुखाना नहीं चाहते हैं।
पसन्द नहीं है तो न जाएँ!
नानी मुस्कराती हैं। उनके चेहरे पर शर्मीलापन है। यह सवाल कभी अपने नाना से पूछना।
रात के दो बज गए हैं। नानी उठकर अपने कमरे में चली गई हैं। नींद आई है या नहीं, मुझे नहीं मालूम।
यों तो मैं सुबह जब मन करता है, उठती हूँ। कभी छह बजे, तो कभी बारह बजे। पहले सात-साढे सात बजे मम्मी उठाने आ जाती थीं। मेरे तौर-तरीके और तेवर देखकर अब वे नहीं आती हैं। मेरे म*ो हैं।
जब चाहती हूँ, उठती हूँ। कोई रोकने वाला नहीं, कोई टोकने वाला नहीं। मगर आज जल्दी उठ गई हूँ।
नाना पाँच बजे उठकर हल्का व्यायाम करते हैं और सैर के लिए निकल जाते हैं। मैं भी तैयार होकर नाना के साथ सैर के बहाने नानी की बताई बात को पूरा करने की टोह में बाहर लॉन में कुर्सी पर बैठ गई हूँ। जैसे ही नाना आएंगे, साथ हो लूँगी।
मुझे कुर्सी पर बैठा देख नाना, चौंक गए हैं, तू?
हाँ नाना, मैं। मैं भी चलूँगी आफ साथ सैर करने।
नाना खुश हो जाते हैं, चल।
रास्ते चलते पहले मैं नाना को कुछ जोक्स सुनाती हूँ। मुझे सुबह-सुबह अपने साथ देखकर खुश नाना जोक्स सुनने के बाद और *यादा खुश हैं। उन्होंने भी एक रिटर्न जोक मारा है। जितना ज़ोर से मेरा सुनाया जोक सुनकर नाना हँसे थे, उससे बहुत *यादा ज़ोर से बाकायदा कईं ठहाके लगाकर मैं हँस रही हूँ। मेरी आवाज़ और अन्दाज़ दूसरों को घूर कर देखने के लिए उकसा रहा है। मगर मैं बेपरवाह हूँ। हमेशा की तरह बेफिक्र।
मेरी सैर हो गई। लौटें?
नाना, कुछ मज़ा नहीं आया। आओ, थोडी देर कहीं बैठकर बातें करते हैं।
घर चल। वहीं बातें करना।
नहीं नाना, यहीं बैठेंगे।
हम बैंच पर बैठ गए हैं।
मैं ज़मीन तैयार करती हूँ, आप इतने बडे पद से रिटायर हुए हैं। रिश्वत-विश्वत तो खूब ली होगी।
नहीं, मैंने कभी रिश्वत नहीं ली। नाना मुस्करा रहे हैं।
लोगों के काम करते होंगे, तो कोई गिफ्ट, दूसरे तरह का कोई फेवर तो ज़रूर लेते होंगे। मैं फिर कुरेदती हूँ।
समाज में उठते-बैठते हैं। यह सब तो चलता है।
नानी बताती हैं, आपको गुस्सा बहुत आता है। गुस्सा करते हैं तो रिश्ते बिगडते नहीं हैं? मैं मुद्दे पर आ गई हूँ।
नाना हँसे, पहले बहुत आता था। अब कम आता है।
रिश्तों पर बुरा असर पडता था, इसलिए अब गुस्सा कम करते हैं?
सचमुच ऐसा नहीं है। मेरा गुस्सा तेरी नानी ने कम किया है।
हो ही नहीं सकता नाना, आप झूठ बोलते हैं।
कभी अपनी नानी से पूछकर देखना। शादी के बाद कितना गुस्सा करता था मैं तेरी नानी और उसके मायके वालों पर?
मगर अब आप नानी का कितना ध्यान रखते हैं, नाना!
रखता हूँ। लेकिन यह सब तेरी नानी के कारण है।
कैसे? नानी के कारण कैसे, नाना?
मुझ जैसे गुस्सैल और तुनकमिज़ाज के साथ निभाना हर औरत के बूते की बात नहीं है।
नानी ने क्या किया ऐसा?
इस बात को छोड। सच यह है कि मैं तेरी नानी का कज़र् दार हूँ। बस, कर्ज उतारने की कोशिश कर रहा हूँ।
बताओ न नाना? मैंने मचलकर नाना की बांह पकड ली है।
तालमेल! एडजस्टमेंट! तेरी नानी ने अपने आप को एक तरह से सपर्पित कर दिया था, ठान लिया था कि एक दिन लोहे को ठण्डा करके ही मानेगी।
और कर दिया ठण्डा! थ्री चीयर्स टु नानी!! मैंने हाथ ऊँचे करके हुंकार भरी है।
पहले सोचती थी, निखिल को नाना से मिलाऊंगी। कहूँगी कि बीवी का ध्यान कैसे रखना चाहिए, नाना से सीख। अब सोचती हूँ, सीखना निखिल को नाना से नहीं है। सीखना मुझे नानी से है।

सम्पर्क डी-183, मालवीय नगर, जयपुर-302017