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फुरसत / -डॉ. मदन सैनी

रामस्वरूप माली
बासठ बर्षीय वृद्ध मघजी अभी तक यह नहीं समझ पाए थे कि जिस बात को वे समझते हैं, उसे दूसरे लोग क्यों नहीं समझते ? न समझे तो ना समझो। उनके नाम पर कौनसा बट्टा लगता है ? पर फिर भी, यह बात समझने की तो है ही। वैसे मघजी को अपनी खरी समझ पर पूरा भरोसा है। इस समझ के कई प्रामाणिक सबूत हैं उनके पास।
माता-पिता के बडे पुत्र थे मघजी। मघजी के पिता को व्यापार की समझ नहीं थी, सेठों की चाकरी करते रहे उम्र भर। कई बार संकट आए, घर में चूल्हा नहीं जला। पर मघजी ने जबसे समझ पकडी, घर में फाके की नौबत नहीं आई। उनके व्यापार में वृद्धि हुई तो होती ही गई। उनकी समझ रंग लाने लगी। समझ-अनुरूप उनकी कीर्ति-पताका घर, गाँव और गाँव से बाहर तक फहराने लगी। बडी बेटी दुर्गा और मँझले मोहन के जन्म और विवाह के समय गाँव में जिस प्रकार उत्सव हुए, बाजे बजे, वैसे न तो कभी पहले हुए थे और न ही कभी होंगे। और यदि कभी होंगे भी तो उनके छोटे पुत्र का विवाह अभी बाकी है। मघजी के घर में आज कौन ऐसा है, जो सज-धज कर बाहर निकले और उसकी वाहवाही न हो। दुर्गा की माँ तो स्वर्णाभूषणों से सजी-सँवरी स्वर्णपरी-सी जान पडती है, कौन नहीं सराहता ?
और ए सब गाजे-बाजे किसके बलबूते पर? सीधी-सी बात है- मघजी की समझ के बलबूते पर।
फलों-फूलों से हरे-भरे बगीचे की भाँति ही है मघजी का घर-बार और इसके बागवान हैं अभी तक खुद मघजी।
मघजी को पता ही न चला और धीरे-धीरे उनके कारोबार की बागडोर उनके पुत्र मोहन ने संभाल ली। उन्हें तो तब पता चला, जब उनसे मोहन ने विनती की कि अब आप साठ पार कर चुके हो, आपकी उम्र आराम करने की है- आप घर सँभालो, कुछ ध्यान-धूप, पूजा-पाठ में मन लगाओ।
बडे-बडे व्यापारियों को सलाह देने वाले मघजी को एक बार तो लगा कि उनकी समझ पंगु हो गई है। जिस समझ पर उम्र भर गर्व किया, उसे आज उनका ही सुपुत्र मटियामेट कर रहा है। पर मघजी समझदार व्यक्ति थे। सोच-समझ कर घर रहना ही अच्छा मान, मंदिर-देवालय जाने और पूजा-पाठ में मन लगाने का निश्चय कर वे घर आ गए।
ऐसा निश्चय करना तो सरल था, पर उस पर अमल करते हुए समय बिताना बहुत ही कठिन था। सूर्योदय हो तो सूर्यास्त होना कठिन और सूर्यास्त हो जाए, तो सूर्योदय होना कठिन।
दिन बीते चाहे रात, मघजी को लगता जैसे युग बीते हों।
ऐसे तो पार नहीं पडेगी दुर्गा की माँ! उन्होंने एक दिन अपनी पत्नी से कहा।
ऐसे कैसे?
मंदिर-देवालयोँ में फिरने से समय नहीं कटता। मोहन ने क्या सोच कर मुझे दूकान से अलग किया है, पता नहीं। उस बेवकूफ को कौन समझाए कि मेरे अनुभव के समक्ष उसकी नई अक्ल पानी भरती है..... उम्र भर की यही तो असल पूंजी है मेरी, और इसी की उसने कद्र नहीं की।
नहीं की तो न सही। आप क्यों अपना खून जलाते हो, मन्दिर-देवालयों में मन नहीं लगता, तो घूम-फिर कर मन बहला लिया करो। घर में सिनेटरी के पाखाने होने के बाद आप कभी दिशा-मैदान के लिए बाहर धोरों (रेतीलो टीलों) की ओर गए ही नहीं। आपको तो धोरे देखे हुए भी युग बीत गए होंगे।
तो तुम भी ज्ञान सिखाने लगी ?
अब इसे कुछ भी समझो। मैंने तो आफ भले के लिए ही कहा है। जब से आपने काम छोडा है, आफ चेहरे की उदासी मुझसे देखी नहीं जाती।
वा-वा....... मैं अभी धोरों की ओर निकलता हूँ। कहते हुए मघजी ने पानी से भरा हुआ लोटा हाथ में लिया ओर चल पडे।
शरद ऋतु के सूर्य की तिरछी किरणें बालू रेत की लहरों पर स्नेहभरा हाथ फेरती सरकती जा रही थीं।

मघजी एक धोरे के शिखर पर बैठे बालू रेत और किरणों की बिछुडती प्रीत को निहारने लगे। उन्होंने सोचा, समुद्र और बालू की लहरों में कैसा अन्तर ? हवा हेत जताए, तो दोनों राजी और क्रोध जताए तो तूफान का ताण्डव भी दोनों जगह एक समान! इस धरती के आंचल में अपना-अपना हिस्सा लिए बालू और पानी कितने मनमौजी, कितने आनन्दित और कितने स्नेहिल.... मानो दोनों को अपने रूप का जरा भी अभिमान नहीं है।
सुदूर फैली हुई बालू रेत की लहरों में मघजी अपने मन की नाव चला रहे थे कि अचानक उन्हें अपने पाँव की अँगुलियों में सरसराहट-सी महसूस हुई। उन्होंने देखा, एक टीटण (गुबरैले के आकार का एक रेगिस्तानी जीव, जिसके पंख नहीं होते और अपने हठ के लिए जाना जाता है) थी। मघजी ने उसे हाथ में लिया और दूर फेंक दिया। पर वह तो कुछ ही देर बाद पुनः पाँव की अँगुलियोँ के पास आ पहुँची। मघजी ने तीन-चार बार उसे इधर-उधर फेंका पर बार-बार वहीं लौट आती। आती क्यों नहीं, असल टीटण जो थी-धोरा धरती का हटीला जीव। हठी हम्मीर ने अपना हठ छोडा हो तो यह भी छोडे।
मघजी परेशान हो गए। उन्होंने लोटे का पानी गटागट पी लिया और टीटण को उस लोटे में डाल दिया। फिर उन्होंने टीटण को नजदीक से निहारना शुरू कर दिया। अरे! इसका चेहरा तो भँवरे से मिलता है। भँवरा इतना पसंदीदा जीव और बेचारी टीटण की कोई कीमत ही नहीं! मघजी ने चिन्तन किया, इसे ही कहते हैं संगति का फल.... यह भँवरा भिनभिन करता गीत गाता तितलियोँ और फूलों के पास जा पहुँचा और कवियों की नजरों में चढ गया। पर बेचारी टीटण को कौन पूछे ?

मघजी के मन में टीटण के साथ हुए अन्याय की बात उठने लगी। उन्हें लगा जैसे उनके मन में एक नए ज्ञान का प्रकाश फैल रहा है। उन्होंने टीटण को लोटे से निकाल कर हथेली में ले लिया। टीटण तिरमिर-तिरमिर चली और हथेली की सीमा से कूद कर नीचे जा पडी। मघजी पसीज उठे, बेचारी के चोट तो नहीं लगी ? उन्होंने उसे उठाकर पुनः हथेली में रखा और उसके मुँह को देखने लगे। अरे! यह नन्हा-सा मुँह तो प्रत्यक्ष रेल के दानवी इंजिन जैसा लग रहा है! उसी की भाँति काला-कलूटा और भयंकर.... क्या पता किसी ने इस ओर ध्यान दिया भी है या नहीं ? जाकर बताने से दुर्गा की माँ को अपार खुशी होगी। उन्होंने टीटण को पुनः लोटे में डाल लिया और घर की तरफ लौट पडे।
दुर्गा की माँ माला फेर रही थी। मघजी को देख कर बोली, जा आए क्या ?
एक बार माला छोड कर मेरे पास आ.... देख, मैं क्या लाया हूँ- रेल का इंजिन!
रेल का इंजिन! कहती हुई दुर्गा की माँ उठी और आश्चर्य से बोली, कहाँ है ?
मघजी ने दुर्गा की माँ की हथेली पकडी और उसमें लोटा औंधाते हुए कहा, लो,देखो....
यह तो टीटण है, इससे कैसी प्रीत? दुर्गा की माँ ने हथेली उलटते हुए कहा, हाथ में मूत दिया तो तीन दिन तक गंध नहीं जाएगी।
मघजी ने झुककर टीटण को अपनी हथेली पर रखा और उसे दुर्गा की माँ के आगे करते हुए कहा, अरी भागवान, एक बार इसे ध्यान से देख कर बता तो सही, यह कैसी लगती है ?
वाह, लग गई कैसी.... फेंको इसे बाहर। बैठे-ठाले यह क्या कौतुक ले आए, लोग हँसेंगे। कुछ तो बुढापे की मर्यादा रखो।
वा-वा, रहने दे, बहुत ज्ञानी हो गई लगती है। सामने पडी चीज भी दिखाई नहीं देती। पर गाँव में तो समझदारों की कमी नहीं है। कहते-कहते मघजी ने टीटण को पुनः लोटे में डाला और उलटे पाँव बाहर निकल गए।
सर्वप्रथम मुकना दिखाई दिया। मघजी ने उसे पुकारा, मुकना.....!
क्या है काका..... पीछे मुडते हुए मुकना बोला।
ठहर, एक बार..... देख, मेरे लोटे में क्या है ? पास आते हुए उन्होंने लोटा मुकना के मुँह के सामने कर दिया।
मुकना ने संध्या के मन्द उजाले में लोटे में झाँक कर देखा और बोला, यह तो टीटण है, और क्या ?
टीटण तो है, पर इसका मुँह कैसा है ?
मुँह, इस बेचारी का कैसा मुँह, एक दम भद्दा और गंदा।
रेल के इंजिन जैसा नहीं लगता? मघजी ने पूछा।
सुनकर मुकना मुस्कराया, क्या बात है काका? तबीयत तो ठीक है न ? भांग-गाँजे की गिरफ्त में तो नहीं आ गए कहीं ?
जा-जा.... कुछ देखना नहीं आता, तो भांग-गाँजे की बात करने लगा। मैं तो तुझे दूसरों से अधिक सयाना समझता था, पर तेरे तो खुद के सिर में भुस भरा है। कह कर मघजी ने आगे की राह पकडी।
मुकना से मुलाकात के पश्चात् मघजी काफी देर तक गाँव की गलियों में फिरते रहे, पर उन्हें किसी पर भरोसा नहीं हुआ। फिर कोई उलटा-सुलटा बोलेगा। मास्टर दीनदयाल के अलावा अन्य किसी से बात करना ही व्यर्थ है, पर मास्टर जी के घर इस समय जाना उचित नहीं होगा। ऐसा सोचकर मघजी घर आ गए और सूर्योदय की प्रतीक्षा करने लगे।
सूर्योदय हुआ। स्नान-ध्यान के बाद मघजी ने अपना लोटा उठाया और मास्टरजी के स्कूल जाने से पहले ही उनके घर पहुँच गए।
मास्टर जी एक पलंग पर बैठे कोई पुस्तक पढ रहे थे। उनकी घर वाली पशुओं की देख-भाल के लिए घर के पिछवाडे में गई हुई थी।
जय राम जी की! मघजी ने लोटा हथेलियों में लिए हुए ही अभिवादन किया।
आओ, मघजी!...आज किधर सूरज उगा? कहते हुए मास्टर दीनदयाल ने पुस्तक एक ओर रख दी।
क्या बताऊँ मास्टर जी.... मघजी पलंग पर बैठते हुए बोले, गाँव में कोई समझदार आदमी ही नहीं है।
क्यों, क्या बात हुई ?
किसी को फुरसत ही नहीं है, कोई नई बात सोचने की, कहने की, समझने की। मैं तो कल से एक बात कहने के लिए फिर रहा हूँ, कोई समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं!
ऐसी क्या बात है? मास्टरजी ने हँस कर पूछा।
मघजी की मानो मुराद पूरी हुई, बोले, लोग फूलों को निहारते हैं, भँवरो के गीत गाते हैं- पर इसमें नई बात क्या हुई ? सब देखा-देखी। आप देखो, इस टीटण का नया रूप, सबसे श्रेष्ठ न दिखाई दे, तो मुझे कहना। कहते हुए मघजी ने लोटा मास्टरजी के मुँह के आगे ही पलंग पर औंधा कर दिया।
एक हलकी-सी तड की आवाज के साथ ही अपने पैर ऊपर किए टीटण पलंग पर आ पडी। पडते ही उसके मुँह का एरियल और छहों पैर हवा से हाथापाई करते तिरमिर-तिरमिर हिल रहे थे।
मास्टर जी को जैसे बिजली का करन्ट लगा हो, वे उछल कर खडे हो गए। कुछ समय उन्होंने इस अनहोनी को समझने में लगाया, फिर नाराज होकर बोले, यह क्या तमाशा है, गाँव में तो एक भी समझदार नहीं मिला, पर आपकी अक्ल पर पानी फिर गया लगता है, टीटण ही मिली ज्ञान बघारने के लिए.... मैंने सोचा, भले आदमी हैं, सवेरे-सवेरे कोई काम की बात करने आए होंगे। अब आप घर जाइए.... नहीं तो बच्चे कंकर मारने शुरू कर देंगे।
मघजी को लगा कि वे पहाड के नीचे आ गए हैं। डगमगाते पाँवों से वे कब मास्टरजी के घर से निकले और कब अपने घर पहुँचे, उन्हें पता ही नहीं चला। घर पहुँच कर वे अपने कमरे में चले गए। कुछ कहा न सुना, किसी से बोले-चाले भी नहीं। उन्हें पता नहीं था कि उनकी दशा अभी उस मोर जैसी है, जो अपने पाँवों को देख कर टप-टप आँसू बहाया करता है।
आखिर दुर्गा की माँ ने आकर मघजी से कहा, क्या हुआ, आफ कुछ दुख तो नहीं रहा?
दुख रहा है, तेरा सिर! मघजी ने झिडकी देते हुए कहा।
ओ जी, ऐसा क्यों कहते हो। कहते हुए दुर्गा की माँ की आँखें डबडबा आईं।
मैं समझदार नहीं हूँ दुर्गा की माँ.... मैं साफ डफर हूँ, मूर्ख हूँ। मैं अब क्या करूँ ?

मघजी की आँखें छलछला आईं। वे अपनी धोती के पल्ले को आँखों पर रख कर सिसकने लगे।
दुर्गा की माँ मनौती मना रही थी, हे महाराज बालाजी.... यह इन्हें क्या हो गया बाबा, ऐसे सयाने-समझदार भले आदमी का सिर कैसे फिर गया! आपका जागरण बोल रही हूँ बाबा..... इनकी आँखों के आँसू पौंछ दीजिए....।
इतने में कुण्डी बजी। दुर्गा की माँ पल्ले से आँसू पौंछती दरवाजे पर पहुंची। देखा-एक लडका चमचमाता लोटा लिए खडा था। बोला, मास्टर जी ने यह लोटा भिजवाया है, सवेरे मघजी उनके घर छोडकर आ गए थे। मास्टरजी ने कहा है कि टीटण मिली नहीं, मिलने पर उसे भी भिजवा देंगे।
दुर्गा की माँ ने झट से लडके के हाथ से लोटा लिया और दरवाजा बन्द करके अर्गला चढा दी।


सम्पर्क- चिमनाराम माली का कुआ,कालूबास,
श्रीडूंगरगढ -331803 बीकानेर (राजस्थान)
मो. 9782229926