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महागाथा की महाव्याख्या

अभिषेक मुखर्जी
इस कविता संग्रह में, महाभारत की कथा को एक सम्पूर्ण भिन्न एवं नवीन दृष्टि से, एक नूतन गहन-गम्भीर विचारधारा से और वर्तमान युग की तार्किकता और वास्तविकता के आलोक में प्रस्तुत किया गया है। कवयित्री के गहन अध्ययन का सुफल है यह पुस्तक।
महाभारत की कथा में जिन स्त्रियों को केवल निमित्त मात्र समझा व दर्शाया गया है, उन्हीं स्त्रियों को सशक्त वाणी प्रदान की है लेखिका ने। ऐसा प्रतीत होता है जैसे इस भीषण युद्ध के लिए, एकच्छत्र साम्राज्य की स्थापना के लिए, इन स्त्रियों को उपलक्ष्य मात्र ही माना गया है, इनके बलिदानों की कथा को वाणी नहीं प्रदान की गयी, उनके दुःखों का, उनके नैराश्य का, उनकी पीडित-आहत ममता की कथा किसी ने न कही।
एक बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने रखा गया है इस पुस्तक में- युगों से जिस चातुर्य से इस महाकाव्य को केवल क्षत्रिय कुल या भरत वंश की गाथा का नाम दिया गया है, वह वास्तव में शान्तनु-भरत वंश की न होकर सत्यवती-द्वैपायन कुल की गाथा अधिक है। इस पक्ष को कवयित्री ने बहुत अच्छे से प्रस्तुत किया है।
सशक्त पंक्तियों में कवयित्री लिखती हैं- अपने राजपुत्रों की मृत्यु के बाद पुकारा रानी (सत्यवती) ने अपनी पहली सन्तान को (द्वैपायन), राजपुत्र उत्पन्न करने के लिए....
जिस सत्यवती को केवल निमित्त मान, प्रायः यवनिका के पीछे ही धकेल दिया गया है, उसे उसको स्वमहिमा में पुनः प्रतिष्ठित किया है कवियत्री ने।
सब देखते हैं
शांतनु का मेरे प्रति अनुराग
कितने जानते हैं,
मत्स्यगन्धा से योजनगन्धा तक मेरी यात्रा
जिस सत्यवती को महाकाव्य में दासेयी रानी कहा गया है, वही मत्स्यगंधा अपनी कामना और इच्छा की कथा कहती है.
कौन जानता है नाव का काम कि नदी में डूबना
वर माँगना तभी सीखा मैंने
केवट जाति में कुछ था कहाँ कि माँग सकता कोई मनचीती
वस्तु या वचन ही !
वृद्ध पराशर की देह में यौवन भरती सत्यवती ने
कामना की थी सुगंधित देह की और अप्रतिम सन्तान की।
वर्णभेद से त्रस्त उस युग के समाज में भी यह केवट कन्या, निडर हो, अपना पक्ष सामने रखती है, अपनी इच्छा, अपनी कामना को स्पष्ट प्रकट करती है।
जिस हिडिम्बा के प्रति भी महाकाव्य ने मौनव्रत ही धारण कर लिया है- उसी वनचारिणी की कामना, व्याकुलता और विवशता को बहुत ही गहराई से दर्शाया गया है इस पुस्तक में। हिडिम्बा अपने पुत्र घटोत्कच से कहती है-
मैं नहीं थी राजकुल की कन्या
जिसके स्वयंवर में आते कुमार देश भर से....
सुनो पुत्र मैंने तुम्हारे पिता को वरा युक्ति और बल के कौशल पर।
... आज, हिडिम्बा जानती है
भीम लौट जाएँगे नगर
वक्त आने पर
.....हिडिम्बा जानती है
उसके पुत्र-पौत्र सब
नागर-यज्ञ की समिधा भर हैं।
मूल महाभारत में जिस भानुमती (दुर्योधन की पत्नी) का उल्लेख केवल दो या तीन बार ही है, उसी भानुमती के दुःख, व्यथा, व्याकुलता को भी बहुत विचक्षणता से दर्शाया गया है-
सुन्दरी भानुमती पति से विमुख है उस पल से ही जब से उसने देखा है द्रौपदी कि लिए पति की आसक्ति ....भानुमती हर्षित है, द्रौपदी के दुःख से
उसके क्रोध से, उसके वनगमन से
भानुमती माता भी है। कवयित्री ने माता भानुमती के डर को, निज पुत्र के भविष्य के प्रति चिन्ता को और युद्ध की विभीषिका से त्रस्त उसके व्याकुल अन्तस की बहुत ही सटीक छवि प्रस्तुत की है इन पंक्तियों द्वारा-
वह (भानुमती) लक्ष्मण को रोकती है
पासे खेलने से
उसे डर लगता है दुःशासन और शकुनि से
कहती कुछ नहीं
बुला लेती है लक्ष्मण को किसी बहाने .....
भानुमती जानती है
लक्ष्मण वीर है
धैर्यवान नहीं
उसे बोध है अपने राजपुत्र होने का
उसी के उन्माद में इतराता है वह
भानुमती डरती है इस अभिमान से ....
घबराती है वह
इन दिनों एक -एक आहट से
संजय की आवाज़ तक से .....
कितने आश्चर्य की बात है, कि जिन स्त्रियों को प्रायः निमित्त मात्र मान उन्हें मूल महाकाव्य में दर्शाया गया है उन्हीं स्त्रियों ने उस भीषण युद्ध की होमाग्नि में सर्वाधिक आहुतियाँ दीं- आहुति अपने सुहाग की, आहुति अपने ममत्व की, अपने प्रेम की। युगपुरुष कृष्ण के भारतवर्ष को एकच्छत्र साम्राज्य के सूत्र में बाँधने के स्वप्न को साकार करने में इन स्त्रियों का सबसे बडा अवदान रहा था। पुरुष तो अपनी वीरता के गर्व में रणभूमि में सिंह-पराक्रम दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, परन्तु इन निमित्त मात्र स्त्रियों की क्या गति हुई? क्या कोई गति हो भी पाई सिवाय इसके कि मृत्युपर्यन्त दुःख, विषाद और विरह की अग्नि में झुलसती रहीं।
कवयित्री ने उस दासी को, विदुर की अनामकुलगोत्र माता को भी वाणी प्रदान करते हुए कमाल कर दिया है। उस अनामिका, कुलगोत्रविहीना दासी ने ही लगता है समाज से सही रूप में अपना बदला लिया। वह दासी थी, उसका कुछ भी उसका अपना न था। अतः वह सतीत्व और सुचिता के बँधनों से मुक्त थी, यदि उसे भोग्या बनाया गया है तो वह भी उस तेजस्वी, ओजस्वी पुरुष को अवश्य भोगेगी।
वह दासी कहती है-यूं तो पुरुष भोग सकता है
किसी भी नारी को निर्भ्रांत
पर वह भोग नहीं
नियोग का पल था
जो मुझ दासी को मिल गया था अयाचित ही
उस ललाट की तेज में कामना नहीं
कर्तव्य निर्वाह का दर्प था
जिसे मैंने कामना में बदल दिया
क्षण भर में
तब दमके थे कई तारे
मेरी आँखों में
और जल गया था समय के प्रांगण में एक दीप
निमित्त बनी यह दासी, क्या सच में निमित्त मात्र ही थी? उसी की कोख ने तो सम्पूर्ण राजकाज सम्भाला, हस्तिनापुर को सम्भाला महामंत्री के रूप में....ऋणी है हस्तिनापुर और भारतवर्ष उस दासी का।
युगों से धृतराष्ट्र के अन्धत्व के लिए उसकी माता अम्बिका को ही उत्तरदायी ठहराया गया है। यदि ऋषि श्रेष्ठ केवल निर्लिप्त रूप से अपना कर्तव्य पालन करने आए थे, जैसा कि उन्होंने कहा था, तब क्या अम्बिका और अम्बालिका को निर्लिप्त रह कर्तव्य पालन करने का अधिकार नहीं। वे क्यों ऋषि श्रेष्ठ को पूर्ण तृप्ति प्रदान करें? नेत्र बन्द हों या रंग पाण्डु पड जाए, पराशर पुत्र, महर्षि द्वैपायन को तो केवल कर्तव्य पालन से सरोकार होना चाहिए था। कवयित्री ने बहुत ही सशक्त पंक्तियों द्वारा इन दोनों स्त्रियों के प्रतिवाद को दर्शाया है।
सुनो पुत्र!
तुम्हारे अन्धत्व में
मेरे भय से अधिक ऋषि-श्रेष्ठ का अहंकार है
पूछना उनसे
क्या उन्होंने मेरी मूंदी आँखों के पार
एक स्त्री का सौन्दर्य देखा था?
अम्बालिका कहती है-
हे पुत्र
कहते तो यही है कि
कृष्ण द्वैपायन के तेज से
डर कर पीली पडी मेरी देह के चलते
तुम पाण्डु रोग से ग्रस्त हुए
पर यह कोई नहीं बताता
क्षय मुझे महाराज ने दिया था
मेरी क्षीण देह
कहाँ तक सहती
भार उस अनजान पुरुष का ....
अम्बा, शिखण्डी और गंगा- इन तीनों स्त्रियों की मनोदशा को एक ही प्रसंग द्वारा अद्भुत रूप से प्रस्तुत किया गया है।
तीर से घायल भीष्म के कलेजे
से गिरने वाले रक्त की पहली बूँद में
अम्बा के आँसू की चमक देख
शिखण्डी के अवसन्न चित्त से फूटा चीत्कार
गंगा के हृदय में लावा-सा फटा है
और
जाने कितनी धाराओं में फूट
माँ का मन दौड पडा है
पुत्र को थामने
लेखिका तो उस वनचारिणी भीलनी और उसके पाँच पुत्रों को भी न भूली, जिनको बिना किसी दोष के ही, हस्तिनापुर की राजनीति के हविर्दान रूपी उस लाक्षागृह में स्वाहा होना पडा। जिनकी बात शायद किसी ने न की हो, उनका स्मरण भी लेखिका ने पाठकों को करवाया है, कुंती के अनुताप के माध्यम से ।
बहुत ही महत्त्वपूर्ण है यह पंक्तियाँ-
द्रौपदी के पाँचों बेटों के सिरविहीन देह को देख
कुंती को लाक्षागृह में वो भीलनी याद आती है
जो अपने पाँच बेटों के संग जल मरी थी .....
आज पहली बार उनकी चीत्कार सुनाई पडती है
सुनाई पडता है उनका श्राप
और दिखाई देता है
चक्रव्यूह से निकलने को
छटपटाता अभिमन्यु .....
सच में, दोष कोई करता है, भुगतना किसी और को पडता है।
प्रतिवादिनी द्रौपदी का कितना तेजस्वी, प्रखर और वास्तविक रूप प्रस्तुत किया है कवयित्री ने। स्वयं पतिव्रता होते हुए भी, द्यूतसभा में मूक दर्शक बने काष्ठपुतलों के समान अपने पतियों के आचरण को देख, विद्रोहिणी, साहसिनी द्रौपदी स्वयं को पुंश्चली और कृष्णा कहती है।
मैं पाँचाली पुंश्चली
आज स्वयं को कृष्णा कहती हूँ
डंके की चोट !
कभी न भूलेगी मुझे
कुरुसभा की अपनी कातर पुकार ...
ओह ! वे क्षण बदल गयी मैं ....
.......सुनो कृष्ण मैंने तुम्ही से प्रेम किया है
दोस्ती की है!
इस पुस्तक में वर्णित माधवी का प्रसंग पढ, तत्कालीन सामाजिक नियमों के प्रति मन विद्रोह-सा कर उठता है। गुरुदक्षिणा की तत्कालीन प्रथा पर करारा व्यंग्य किया गया है इन पंक्तियों द्वारा-
आठ सौ श्यामकर्ण अश्वमेधी घोडे माँग लिए
विश्वामित्र ने बेहिचक
आखिर यह भी तो शिक्षा का ही एक हिस्सा था
कि विद्यार्थी सम्भव करे असम्भव को
किसी भी नीति से
सच ही तो है- द्रोणाचार्य की गुरुदक्षिणा का फल भी तो देश आज तक भुगत रहा है- उस आदिवासी, वनचारी भीलबालक एकलव्य के कटे अंगूठे से आज भी ऊष्ण शोणित बह रहा है, -उसी का तो नतीजा है जातिवाद और और जातिगत आरक्षण प्रथा।
कितने आश्चर्य की बात है कि विश्वामित्र द्वारा माँगी गुरुदक्षिणा का मोल चुकाना पडा एक स्त्री को, राजा ययाति की पुत्री, माधवी को, अपने शरीर और अपनी अस्मिता बार-बार समर्पित कर, बहुपुरुषभोग्या बन। क्या तीव्र व्यंग्य किया है कवयित्री ने प्राचीन दान प्रथा पर-
फिर यह तो अतिथि ब्राह्मण की सेवा थी
ब्राह्मण जो नीतियों का निर्माता है
यह दान नीतिपूर्ण भी था
और
राजा को अमर भी करता था
क्या हुआ अगर बेटी ब्राह्मण की साधना के लिए
कई-कई पुरुषों से संसर्ग करे
क्या किसी ने धरती से पूछा
यह किसके बीज को धारण करेगी?
श्यामकर्ण अश्वों की कमी की पूर्ति हुई, माधवी के सतीत्व से- अश्वों के बदले अक्षत-यौवना स्त्री को कई राजाओं ने भोगा और सन्तान प्राप्ति भी हुई!
शकुन्तला का प्रसंग भी बहुत अच्छा लगा पढ कर। सच में ऋषि दुर्वासा के अभिशाप ने शकुन्तला को विरह और दुःख सहने पर विवश कर दिया और इसी महर्षि के वरदान ने कुंती के जीवन को अभिशप्त कर दिया। पर सच तो यह है कि दुर्वासा का शाप, मछली और अँगूठी सब उपलक्ष्य मात्र थे ....साधन मात्र थे पतिसत्तात्मक समाज के- राजा दुष्यन्त कुछ भी न भूला था।
शकुन्तला कहती है-
विरह की ज्वाला से *यादा
तीखी थी अपमान की ज्वाला !
मेनका और विश्वामित्र की पुत्री
तापसी बनी खडी थी दरबार में...
तो सखी वह अँगूठी न थी
जिससे मैं पहचानी गयी
वह ज्ञान और मान की शक्ति थी
जिससे मैं जानी गयी!
इस पुस्तक में गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी के साथ-साथ कवयित्री ने सुभद्रा, उलूपी, चित्रांगदा, माद्री आदि सभी स्त्रियों को वाणी प्रदान की है। एक साथ एक ही पुस्तक में महाकाव्य की सभी स्त्रियों की गाथा कहना सच में बहुत सराहनीय है, एक अद्भुत नूतन प्रयास है।
यह सत्य है कि चित्रांगदा और उलूपी जानती थीं कि वे कभी भी हस्तिनापुर की राजरानी न बन सकेंगी तथा उन्हें अर्जुन का साथ केवल उनकी सन्तानोत्पत्ति तक ही प्राप्त होगा, फिर भी इन दोनों ने ही अर्जुन से प्रेम किया, अर्जुन को बाँधा कभी भी नहीं।
बिन पति के ही चित्रांगदा अपनी सन्तान का पालन पोषण करती....
बभ्रूवाहन,
सुनते हुए कथाएँ पिता की
कितने ही प्रश्न करता है माता से
उन प्रश्नों से कभी डरी नहीं चित्रांगदा....
......किसी से न डरना
न गुरु से
न पिता से
न मृत्यु से
योद्धा हो तुम अद्वितीय हे! बभू*वाहन
इस पुस्तक में एक और बहुत महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है- वह यह है कि राजपरिवार की स्त्रियाँ, या सवर्ण कुल की स्त्रियाँ, या यूँ कहे कि सवर्ण आर्य कन्याएँ ही अधिक श्ाृ*खलाबद्ध थीं, विवश थीं, सामाजिक रूढि-नियमों में अधिक जकडी हुई थीं। अतः उन्हें दुःख भी अधिक झेलना पडा। इसके विपरीत आएर्तर जाति की कन्याएँ जैसे हिडिम्बा, उलूपी या केवट कन्या मत्स्यगन्धा अधिक स्वतन्त्र थी। अपनी कामना, अपनी इच्छा वे डट कर प्रकट करतीं।
उसके काम-प्रस्ताव को जब अर्जुन ने, अपने द्वादश वर्षों तक ब्रह्मचर्य के प्रण हेतु अस्वीकारा, तब-
कुछ पल मौन रह
पूछती है उलूपी अर्जुन से
पूछा था द्रौपदी से उसकी चाह .....उसकी कामना
या फिर विवाह की तरह
यह भी केवल भाइयों के बीच की बात थी ?
कितनी महत्त्वपूर्ण हैं ए पंक्तियाँ। सच में क्या किसी ने पाँचाल कुमारी से पूछा था उसकी इच्छाएँ उसकी चाह के बारे में। वह स्वयंवर सभा में मन, कर्म और वचन से अर्जुन की हो चुकी थी- परन्तु प्रथम सहवास वह न कर पाई अर्जुन के साथ।
स्वाधीनचेता नागकन्या पुनः कहती है .
हे वीर!
कामाग्नि से दीप्त
रति को व्याकुल
मैं नागकन्या उलूपी
माँगती हूँ तुम्हारा साथ
कह कर मुस्काती उलूपी हाथ थाम अर्जुन का
ले जाती है उन्हें मायालोक में
अपनी देह का ताप हरने
कोख भरने
इसके विपरीत राजकन्या पृथा या कुन्ती जकडी हुई है श्रृंखलाओं में। पति अक्षम, अतः उसी पति की आज्ञा से सन्तानोत्पत्ति हेतु जब कुन्ती बहुपुरुषभोग्या बनी तब उसकी सन्तानों को पाण्डु का ही नाम मिला, वे सब पाण्डव कहलाए, परन्तु विवाह से पूर्व हुई सन्तान, कर्ण को वह सामाजिक बन्धनों के कारण कभी अपना न सकी।
पथ से विरथ
लुण्ठित-मरणासन्न
कर्ण के लहू पर लौटती है कुन्ती
अपमानित-लांछित माँ !

राजकुमारी माद्री भी कितनी परतन्त्र थी। प्रश्न करती हैं कवयित्री-
पिता ने धन-स्वर्ण के लिए
ब्याह दिया माद्री को पाण्डु संग
क्या पिता जानते न थे
पाण्डु का रोग
या जानते हुए भी अनजान बने रहे
भीष्म के सामने
बेटी को नहीं
अपने प्राणों को बचाया था पिता ने और
झोली फैला दी थी उनके सम्मुख...
राजकन्या कुन्ती, द्रौपदी, माद्री से कहीं अधिक स्वतन्त्र, स्वछन्द है वनचारिणी हिडिम्बा-
प्रेम में कातर वह
निशंक छलती है भाई हिडिम्ब को
जीतती भीम का तन-मन
अपनी वीरता से
चातुर्य से
प्रेम से
धैर्य से और उत्सर्ग से .....
राजपुत्री होते हुए भी चित्रांगदा कहीं अधिक स्वछन्द थी ...सम्भवतः इसका कारण मणिपुर राज्य का अवस्थान तत्कालीन आर्यावर्त की भौगोलिक सीमा से दूर होना था।
महाभारत की कथा अति प्राचीन है। इस कथा को बचपन से पढते, सुनते, टी.वी पर देखते हुए बडे हुए हैं, परन्तु इसकी प्रासंगिकता कभी भी क्षीण होती नहीं दिखती। जैसा कि कवयित्री ने भी कहा है कि युग कोई भी हो युद्ध तो होते ही हैं, लाक्षागृह भी बनते ही हैं, द्यूतसभा का आयोजन भी होता ही है। केवल इन सबका रूप बदलता रहता है, समय के साथ-साथ। अतीत और इतिहास को जान समझ कर ही हम शिक्षा ले सकते हैं- उज्ज्वल भविष्य निर्माण करने की। अतः इन महाकाव्यों को सटीक रूप में जानना, समझना बहुत आवश्यक है। आज ऐसा समय है जब इन महागाथाओं की अपव्याख्या ज़ोर पकड चुकी है- राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए। ऐसे समय ऐसी पुस्तकों की, ऐसी रचनाओं की बहुत आवश्यकता है जिससे आज की पीढी को सही दृष्टिकोण प्राप्त हो और वह संकीर्णता से बच सके।
पुस्तक का नाम - निमित्त नहीं
लेखक - सुमन केशरी
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली-110041
संस्करण - 2022
विधा - कविता
पृष्ठ - 147
मूल्य - 299 रुपए
सम्पर्क - गुरु गोविन्द सिंह अपार्टमेंट, ब्लॉक- बी
50 बी.एल.घोष रोड, बेलघडिया, कोलकाता- 700057
पश्चिम बंगाल
मो. 8902226567