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समर्पण का सौंदर्य

कृष्ण बिहारी पाठक
बीज होते हुए शीर्षक अपने आप में सृजन, संभावना और समर्पण की तलाश, तैयारी, और तत्परता का मुहावरा है जो इस लम्बी कविता की उर्वर भूमि में परत- दर- परत खुलता जाता है।
यह कृति, चक्रवर्ती गति से बढते, हृदयहीन भौतिकवाद से सिमटती, मानवीयता की समस्या को चीन्हते हुए, उसके संभावित समाधानों की तलाश के समानान्तर, स्त्री के समर्पण के बरक्स पुरुष की कृतघ्नता के निवारण की शिवकामना है, जिसे बीज होते हुए ही प्राप्त किया जा सकता है।
बीज होते हुए ही सम्बन्धों की उस निश्छल उदारता को समझा जा सकता है जो सृष्टि में पुरुष के बीज को धारण कर, पोषित कर जन्मने वाली माता और पुत्र के बीच होना चाहिए। क्योंकि बीज होना समर्पित होना भी है, और समर्पण के प्रति कृतज्ञ होना भी।
होता हुआ बीज ही जान सकता है कि उसकी निरवलम्ब अवस्था में भी केवल और केवल धरती ही देती है उसे सम्बल, सहेजकर कर। संबलन और समर्पण के इस कृतज्ञ आत्मसाक्षात्कार को कवयित्री ने रेखांकित किया है-
बीज!..
ढूंढ ही लेता है अपना अस्तित्व..
माटी में
बिना धूप हवा के
जल के सहारे
कभी-कभी अजल होकर भी
पर एक गोद है न
उसके पास
ममता का परस लिए
बीज निश्चिंत है
सौंपकर स्वयं को
होता हुआ बीज धरती के समर्पण पर अपनी कृतज्ञता की सीमा जान सकता है, किन्तु समस्या यह है कि विसंवादी प्रवृत्तियों ने मानव की शुभ्रतम, कोमलतम बीज भावनाओं को कुन्द कर दिया है, जिसके चलते वह अपने आत्म के संप्रत्यय को भूल चुका है। मानव में अन्तर्निहित सद्वृत्तियों के संज्ञान और संवरण के लिए ही यह कविता कवयित्री ने पृष्ठों पर उतारी है। मानव के बीज बोध या आत्मबोध में बाधक तत्त्वों जैसे - हिंसा, स्वार्थ, अतिचार, संवेदनहीनता और संवेगहीनता की आक्रामक नकारात्मकता के निषेध का स्वर इस कविता में बहुत स्पष्ट है -
सावधान!
समय है
खरपतवारों और
कुकुरमुत्तों को
समाप्त करने का
यह लम्बी कविता मानव में बीज होने की संभावनाओं को उभारने का भाव पुरुषार्थ है, ऐसे समय और स्थितियों के बीच, जबकि विश्व की सम्पूर्ण ऊर्जा मानवीयता के बीज को नष्ट करने को उद्यत है। अन्धकार जैसे उजास को लीलना चाहता हो-
यह कैसा समय है
छीन ली गई
हाथ से कलम
आँखों से किताबें

वस्त्रों की जगह
पहना दी गई गुलामी
ओढा दी गई लाचारी
आभा - उजास, शुचिता और सडांध की द्विधा में किंकर्तव्यविमूढ, पथभ्रमित मानवता को बीज होने का मार्ग दिखाने का कविसंकल्पित कर्म कवयित्री ने निभाया है। इसीलिए वह एक ओर बीज को होने से रोकने वाली वृत्तियों को चिह्नित कर उनसे सावचेत करती है, तो दूसरी ओर बीज को उसके मौलिक आभिजात्य, रचनात्मक आत्म-विसर्जन, अदम्य जिजीविषा, और आत्मत्याग के संकल्पों का प्रबोध कराती है।
बीज द्वारा पल्लवन के लिए अपने अस्तित्व का विलीनीकरण सही अर्थों में अस्तित्व की बहुगुणात्मकता की प्राप्ति है। यह आत्मत्याग, आत्म की गुणात्मक उपलब्धि का माध्यम है। एक का विलय अनेक के सृजन का हेतु है। बीज होने की इस संघटना के युगपत प्रज्ञावान कवयित्री ने दीपक के विलीनीकरण का सजीव और भास्वर बिम्ब प्रस्तुत किया है।
दीपक जैसे बाती के राख होने तक आत्मदान को तत्पर रहता है ठीक वैसे ही बीज भी अपने अस्तित्व के खाक होने तक आत्मदान करता है। राख और खाक होने की इस संघटना की परमाण्विक स्तर पर कवयित्री ने पडताल की है कि राख होकर भी दीप का अस्तित्व नहीं मिटता वह प्रकाश के अनेक- अनेक कणों में प्रकीर्णित हो दिग्दिगंत में आभा फैलाता है। बीज भी मिटकर मिट नहीं जाता, बस रूपांतरित होता है। यह रूपांतरण ही समर्पण है -
क्या स्वयं को
खो देना
समर्पित होना नहीं..
बीज के इस निश्छल समर्पण का धरती स्वागत करती है, अपना सर्वत्र न्योछावर करके। धरती के इस आश्वासन से बीज निर्भय हो जाता है -
प्रकृति
निछावर करती है
अपने सभी रंग
उस पर
वह मिटने लगता है
अभय होकर
बीज और धरती के इस पारस्परिक निश्छल अवदान को सामने रखकर ही कवयित्री ने वर्तमान मानव समाज की एक ज्वलंत समस्या को कविता के केन्द्र में रखा है। धरती और बीज को क्रमशः स्त्री-पुरुष की प्रतीकात्मकता देकर सामयिक संदर्भों को उभारा गया है।
स्त्री ने धरती के धर्म को नहीं छोडा है, किन्तु पुरुष ने बीज का धर्म विस्मृत कर दिया है। त्याग, समर्पण, अहं का विसर्जन बीज के वे धर्म हैं जिन्हें पुरुष ने उस रूप में संवरित नहीं किया है। सम्यक सन्तुलन के निर्वहन के लिए उसे बीज के धर्म को ओढना होगा। यह प्रक्रिया वह बीज होते हुए ही संपन्न कर सकता है। कविता का ध्एय भी यही है कि वह बीज होते हुए अपनी भूमिका का निर्वाह करे।
इस भूमिका के सम्यक निर्वहन के लिए कवयित्री ने मानवता के विकास क्रम के समानांतर चिन्तन की दिशाएँ खोलने के लिए, स्त्री की दशा और दिशा का विशद चित्र सामने रखा है-
युद्ध हो या शान्ति
मित्रता हो या
दुश्मनी

वही क्यों
अनेक अनेक रूपों में
छली गई
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते वाले इस महादेश में एक नहीं दो दो मात्राएँ, नर से भारी नारी कहकर भले ही नारी को अपेक्षाकृत उच्च स्थानीय होने का यूटोपिया निर्मित किया गया है, परन्तु धरातलीय वास्तविकता यह है कि पुरुष की समानता में अपना स्थान खोजती नारी समस्थानिकता के पायदान से भी नीचे आँचल में दूध और आँखों में पानी लिए विवश कर्तव्य पालन की कभी न खत्म होने वाली यात्रा की धीर पंथिनी बनी हुई है।
समाज के द्वारा निर्मित स्त्री की गरिमा के छद्म वातावरण की तह को भेदकर कवयित्री ने उस महिमामण्डन और वस्तुस्थिति के बीच के अवकाश को दिखाया है-
वह सम्पत्ति थी तो
सहेजा क्यूं नहीं
जरूरत थी तो
समझा क्यूं नहीं
सम्मान थी तो
रक्षा तक न कर सके
अरमान थी तो
दिल में न रख सके
वक्तव्य और व्यवहार में यह अवकाश न रहे इसलिए बीज होने की आवश्यकता को कवयित्री ने उभारा है। धरा के समर्पण, महत्त्व और अनिवार्यता को बीज होकर ही समझा जा सकता है -
पर बीज जानता है
क्योंकि वह
धरा को पहचानता है...
वह माटी पुत्र
जानता है
उसका होना
स्त्री के महत्त्व की स्वीकृति का जिनको संज्ञान नहीं है, उन्हें कवयित्री ने बीज विहीन कहा है। बीज विहीन होना दिशाहीन होना है, मूल्य विहीन होना है। स्त्री के महत्त्व की स्वीकृति और अनिवार्यता को कवयित्री ने शिव-शक्ति के सनातन प्रतीक से दर्शाया है -
शिव भी न
सह सके वह
पद भार
तभी जाना
उन्होंने भी
अर्द्धनारीश्वर होना
शिव- शक्ति को पूजने वाला समाज स्त्री की क्षमताओं को नष्ट करके, उसका शोषण करके स्त्रीविहीन, शक्तिविहीन संसार में अपने अस्तित्व को कितने दिन बचाए रख सकेगा -
ए समाज कैसा है..
कैसे अपने ही
अर्द्धांग को
नष्ट करता है
स्त्री को केवल देह मानते हुए भोगवादी दृष्टि से देखने वालों पर यह एक बडा प्रश्नचिह्न है।
सही मायने में यह कविता, लम्बी कविता के रचनाविधान पर पहली बार यहीं आकर खुलती है। किसी लम्बी कविता में, सामयिक सन्दर्भों और उनसे उत्पन्न समस्याओं के समवर्ती जैसे रचनात्मक तनाव और पारदर्शी संप्रेषण की उपस्थिति होनी चाहिए, वह इस कविता में यहाँ आकर पूर्ण उत्कर्ष पर दिखता है। भावों की टकराहट के माध्यम से पाठक के विचारों को उद्वेलित करना लम्बी कविता की एक महत्त्वपूर्ण अनिवार्यता है,कवयित्री वत्सला पाण्डेय ने इस अनिवार्यता का बडी सहज स्वाभाविकता से समावेश किया है।
किसी विधा विशेष के रचना विधान में अन्तर्निहित विशेषांकों का समावेश जितना स्वाभाविक होता है, वह रचना उतनी ही अधिक संप्रेषणशील, सफल और दीर्घजीवी सिद्ध होती है। इस दृष्टि से यह लम्बी कविता बीज होते हुए एक सफल रचना है।
मानव में अन्तर्निहित बीजत्व का सन्धान इस लम्बी कविता का प्रधान उद्देश्य है। मनुष्य में बीजत्व सुप्त है, शून्य नहीं इसलिए आशा की किरण अभी भी शेष है। मनुष्य जिस प्रकाश की खोज में लगा है वह बीज होकर ही देखा जा सकता है, किन्तु बीज होने के लिए अन्धकार से गुजरना और उस अन्धकार पर विजय पाना भी वांछनीय है। बीज होने की चेतना को उदात्त करना होगा, अहं का विसर्जन और सम्पूर्ण समर्पण करना होगा-
पी लिया था
सारा अन्धकार
जिसने
हलाहल की तरह...
वही अधिकारी है
उस रोशनी का
और सिर उठाकर
कह सकता है
कोई अँधेरा
इतना बुरा भी
नहीं होता
उसके बिना
प्रकाश का
कोई अस्तित्व
नहीं होता..
बीजविहीन मानवता के बीच कवयित्री उदात्त चेतना से युक्त मानवीय विभूतियों की समृद्ध परम्परा को याद करती है। जिनके अनुकरण से बीज हुआ जा सकता है, स्व में अन्तर्निहित बीजत्व की संभावनाओं पर विश्वास किया जा सकता है। उदात्त जीवन मूल्यों, आभिजात्य जीवन शैली, त्याग तपस्या और समर्पण की प्रतिकृतियों से कवयित्री आह्वानपरक प्रार्थना करती है -
हे मेरे पूर्वजों!..
बीज होना
सिखा जाते अगर
दुःख जीवन का
पर्याय न हो पाता
पौराणिक पात्रों, ऐतिहासिक प्रसंगों और मिथकीय प्रतीकों के माध्यम से सामयिक समस्याओं और उनके समाधान को इंगित करने की प्रवृत्ति कमोबेश रूप से प्रायः संपूर्ण लम्बी कविता के इतिहास को काटती-छूती चलती है। कवयित्री वत्सला पांडेय ने भी इस परम्परा का स्पर्श किया है। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि यह परम्पराशीलता केवल निर्वहन के रूप में नहीं है बल्कि बीज जैसे अर्थवान प्रतीक की सभी विभाओं को परिभाषित करने के लिए स्वाभाविक रूप में समाविष्ट है। बीज के प्रतीक में अन्तर्निहित विभिन्न अर्थ संदर्भों को ए पौराणिक, ऐतिहासिक, मिथकीय प्रसंग और अधिक विस्तृत करते हैं।
इन्द्र हमारी मान्यताओं में अच्छे, बुरे दोनों रूपों में प्रचलित है। अच्छे रूप में वह सृष्टि का पोषक है तो बुरे रूप में अपनी सत्ता की सुरक्षा में लिए धर्म, नियम, नैतिकता को ताक पर रखकर कुछ भी कर गुजरने वाला सत्ता-लोलुप नायक है। कवयित्री ने इन दोनों रूपों को सामने रखते हुए इन्द्र के माध्यम से देश तथा विश्व में नेतृत्व के प्रजापालक, पोषक और संरक्षक रूप की कामना की है। यह कामना नेतृत्व की शुचिता की कामना है और नेतृत्व की ऐसी ही शुचिता प्राणियों को बीज होने का आश्वासन दे सकती है।
इंद्र के रूप में नेतृत्व के गर्हित रूप की निर्भीक व्यंजना इस कविता में कवयित्री ने की है -
ए कौनसा इन्द्र है...
पथभ्रष्ट होते हुए
दूसरों के तप पर
प्रहार करते हुए
राग रंग में लीन
ऐसे राजा का हम क्या करें..
इसी के साथ नेतृत्व की शुचिता और दायित्व बोध के आह्वान में कवयित्री की शुभकामना सामने आती है -
हमें चाहिए
वही इन्द्र जो
सहेजता था प्रजा

हर बीज का दायित्व था जिस पर
कभी खोने न दिया
किसी का भी बीज..
इन्द्र का प्रतीक यहाँ बीज के संदर्भों में तिहरी अर्थवत्ता के साथ प्रतिफलित होता है। इन्द्र बादलों का, वर्षा का नियंत्रक, नियामक है और बीज उसकी प्रजा है। दूसरे इन्द्र नेतृत्व के रूप में सत्ताधारी वर्ग का प्रतीक है। तीसरे अमूर्त रूप से इन्द्र हमारी ज्ञानेन्द्रियों का स्वामी है और इस अर्थ में मानव में अन्तर्निहित बीज गुणों के शोधन और मार्गान्तीकरण में इसकी महती भूमिका है। अपने दायित्वों के प्रति संवेदनशील तथा शुचितापूर्ण नेतृत्व के रूप में इन्द्र की मनोकामना कविता को सात्त्विकता और आभिजात्य प्रदान करती है।
बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण की संघटना में , बीज होते हुए बुद्ध से बुद्ध के पुत्र के माध्यम से कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को कवयित्री ने उठाया है। सिद्धार्थ की बुद्ध में परिणति बीज होने या उससे भी अधिक होने की घटना है क्योंकि बुद्ध अद्वितीय हैं और इस अद्वितीयता का मूल्य अकेले बुद्ध को ही नहीं उनकी पत्नी तथा पुत्र को भी चुकाना पडता है। बुद्ध के परिजन इस मूल्य को चुकाने के लिए सहर्ष प्रस्तुत हैं, किन्तु उनकी व्यथा इस रूप में है कि उनकी इस सहर्ष प्रस्तुति को बुद्ध ने उपेक्षित क्यों कर दिया।
उपेक्षा की व्यंजना जो मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा में केवल यशोधरा पर आकर चुक गई थी, इस लम्बी कविता में एक कदम आगे बढकर बुद्ध के पुत्र में कवयित्री ने मुखरित की है -
हे तात!..
एक बार रुककर
सूँघते मेरा माथ
सहलाते मुझे और
पश्चात्ताप की उंगलियाँ
फिरा जाते देह पर..
मैं भी उस हवन में
अपनी आहुति
हँसते हुए दे पाता

बीज तो
तुम्हारा ही था न!
यशोधरा की व्यथा को भी कवयित्री ने राहुल के माध्यम से व्यक्त किया है, यह बात ध्यान देने योग्य है। यशोधरा एक नारी है और धरती स्वरूपा है इसलिए उसकी उदार चेतना उसे अपनी ही उपेक्षा को भी मुखरित करने की अनुमति नहीं देती। वह व्यथित है, किन्तु मौन है, उसकी व्यथा उसका पुत्र कहता है -
अपनी ही
जीवन संगिनी को भी
बता देते
स्वप्न अपना..
जरा सा गर्व
डाल देते
उसकी झोली में भी..
सम्बन्धों की राह में
माँग लेते क्षमा तो
बढ जाता उसका मन
इस पूरे प्रसंग में सूक्ष्म रूप से बीज का चरित्र गढा हुआ है। सर्वहित में सहर्ष आत्मत्याग, समर्पण और अवदान बीज का असल बीजत्व है और यह बीजत्व गौतम बुद्ध के साथ-साथ कमोबेश रूप में यशोधरा और राहुल में भी वर्तमान है, इसीलिए ए दोनों पात्र सर्वहित में गृहत्याग करते सिद्धार्थ द्वारा अपनी उपेक्षा से व्यथित हैं और प्रश्नमुखी हैं। कवयित्री ने इसी व्यथा को रेखांकित किया है।
संघर्षों के बीच, अविचल मुस्कराहट के साथ, विश्व-कल्याण की कामना में, धर्म और सद्वृत्तियों की स्थापना में आमरण आत्मदान करने वाले नायक नीलवर्णी कृष्ण को कवयित्री ने बीज के गुणों से जोडकर देखा है।
आक्रमण, आरोप, असफलता, वियोग, और आत्मीय जनों से छूटने - टूटने की अविरत संघटनाओं के बीच निर्बाध कर्मरत रहे नीलवर्णी कृष्ण.. निर्बाध सृजनरत है बीज। दर्शन की मनोभूमि पर उतरकर यह कविता दो भावों के बीजत्व के बीज भाव ठहराती है। करुणा और प्रेम ही वे दो मंगलविधायक भाव हैं जिनसे मानव का बीजत्व पूर्ण हो सकता है-
सृष्टि का दुख
उतर आया बीज में
और रास के रंग से
सराबोर होकर
समा गया
दुख और प्रेम लेकर
सदा के लिए...
अन्ततः यह कविता करुणा और प्रेम पर आकर अपना गंतव्य पाती है। बुद्ध करुणावतार हैं तो कृष्ण प्रेमावतार। यह बहुत सांयोगिक है कि इन दोनों के जीवन के महत्त्वपूर्ण पडावों, परिवर्तनों में वटवृक्ष उपस्थित है । बुद्ध का बोधिसत्त्व और कृष्ण का करुण मरण, दोनों में अश्वत्थ। अश्वत्थ! सत्य का साक्षी, शरण्य, तात, गुरु, महच्छाय.. शीतलता, विश्रांति का प्रतीक, अमरत्व का मूल, बीज के विराट वैभव का प्रतीक।
करुणा और प्रेम को अपना लेना ही बीज हो जाना है, युगपुरुष हो जाना है।
बीज होते हुए एक विचार प्रधान लम्बी कविता है। विचार प्रधान लम्बी कविताओं में प्रायः कथा तत्त्व की रेखा क्षीणता के साथ हुआ करती है, यहाँ भी है। परंतु वैचारिकता को प्रधान रखते हुए भी लम्बी कविता में रचनाकार कथा को पूरे कलेवर में अखण्ड एकाग्रता के साथ बनाए रखता है, इस दृष्टि से इस लम्बी कविता में अखण्ड एकाग्रता का यह आदर्श उस रूप में नहीं निभ सका है।
कविता के भाषिक अभिनिवेश में जो बात सर्वाधिक आकर्षित करती है वह है, मुहावरेदार भाषा। मुहावरों की प्रसंगानुकूल अर्थ सम्पृक्ति इस लम्बी कविता को विलक्षण बनाती है। बीज हो जाना, बीजविहीन होना, विश्वास की कलई खुलना, धरा का अन्तरिक्ष होना, नीलवर्णी होना, पाँव अंगार होना, राख होना, धुँआ होना, माटी होना, इतिहास होना, अर्धनारीश्वर होना, और गूँगे का गुड होना आदि ऐसे ही कुछ प्रयोग हैं।
सब मिलाकर बीज होते हुए उदात्त चेतनागत कर्म सौंदर्य के संधान की कविता है, जिसमें भिन्न-भिन्न अर्थ, सन्दर्भ और प्रसंगों के माध्यम से कवयित्री ने कविता की केन्द्रीय प्रवृत्ति को पूरे सामर्थ्य से उभारा है।
पुस्तक का नाम - बीज होते हुए
लेखक - वत्सला पाण्डे
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, जयपुर-
संस्करण - 2021
विधा - कविता
पृष्ठ - 100
मूल्य - 120 रुपए

सम्पर्क :- तिरुपति नगर, झारेडा रोड के पास, हिंडौन सिटी
जिला-करौली राजस्थान -पिन 322230
मोबाइल 9887202097
मेल kpathakhnd6@gmail.com