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संवाद निरन्तर

वीणा जैसी निरन्तरता, सरस्वती जैसा गांभीर्य और मतवाला जैसे वैविध्य का संगम है मधुमती - नर्मदाप्रसाद उपाध्याय
समाज के मुखर अनुभव जब शब्दों में गूँथ दिए जाएँ, लोक जब शब्दों में वाचाल हो उठे और सब को समेट कर, सबके सहित होकर जब अनुभूति अभिव्यक्ति में परिणत हो, तब जो मूर्त हमारे समक्ष उपस्थित होता है हम उसे ही साहित्य के रूप में पहचानते हैं। जाने कितनी परिभाषाएँ हैं साहित्य की और उनके रूप भी समय के साथ बदलते रहे, लेकिन सच्चे साहित्य का मर्म कभी नहीं बदला भले उसे व्यक्त करने की भंगिमा बदली हो और इस कसौटी पर मधुमती ने अपने आपको सदैव खरा सिद्ध किया है।
मैं लम्बे समय से इसके अंकों से रूबरू होता रहा हूँ और उन्हें पढकर विस्मित भी। साहित्यिक पत्रकारिता मेरे अध्ययन का भी विषय है। साहित्यिक पत्रकारिता के उदबोधन काल का आरम्भ सन् 1826 से सन् 1884 के बीच का माना जाता है। इसके बाद का समय जागरण काल तथा क्रांति काल के नाम से जाना जाता है। यह समय स्वतंत्रता काल के पूर्व का है तथा इसके बाद का समय जो सन् 1948 से सन् 1974 के बीच का है वह नवनिर्माण काल कहा जाता है। उसके बाद का काल आज का आधुनिक काल है।
आरम्भिक युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कविवचन सुधा सन् 1867 में प्रकाशित की तथा उसके बाद एक निरन्तर क्रम आरम्भ हुआ। भारतेन्दु मण्डली के निबन्धकार पण्डित बालकृष्ण भट्ट ने हिन्दी प्रदीप सन् 1881 में निकाली और बाद में बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन तथा प्रतापनारायण मिश्र ने क्रमशः आनन्द कादिम्बिनी, नागरी नीरद और ब्राम्हण नामक पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं। सन् 1889 में जब सारसुधा निधि नामक पत्रिका का प्रकाशन हुआ, तो भारतेन्दु ने लिखा कि हिन्दी नई चाल में ढली। उनका यह कथन हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नई आहट की तरह था। उनका यह उद्घोष कुछ इस तरह गूँजा कि हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता की पदचाप आने वाले समय में निरन्तर गूँजती रही।
इस साहित्यिक पत्रकारिता ने सरस्वती के रूप में एक नए युग का सूत्रपात किया जिसके सम्पादक आचार्य महावीरप्रसाद दिवेदी थे। यह परम्परा निरन्तर रही। वर्ष 1907 में पण्डित मदनमोहन मालवीय ने अभ्युदय नामक पत्रिका निकाली तथा इसके पूर्व गुलेरीजी ने वर्ष 1901 में समालोचन नामक पत्र निकाला। वर्ष 1905 में भारतेन्दु की स्मृति में भारतेन्दु पत्र का प्रकाशन हुआ। प्रताप के प्रकाशन के साथ जो वर्ष 1910 में कानपुर से प्रकाशित हुआ साहित्य में क्रांति की गूँज सुनाई देने लगी। वर्ष 1913 में खण्डवा से कालूराम गंगराडे ने प्रभा नामक पत्रिका निकाली जिसने एक भारतीय आत्मा के नाम से विख्यात प्रख्यात साहित्यकार पण्डित माखनलाल चतुर्वेदी जैसे सर्जक को गढा। वर्ष 1923 में निराला के संपादन में मतवाला निकला और वर्ष 1927 से वीणा इण्दौर से प्रकाशित होनी आरम्भ हुई जिसकी निरन्तरता आज भी है तथा जो आज भारत की सबसे पुरानी निरन्तर प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका है। बाद के समय में इन्द्र, चान्द और माधुरी जैसी साहित्यिक पत्रिकाएँ भी निकलीं।
मुझे इसी परम्परा में मधुमती दिखाई देती है जिसमें जहाँ एक ओर वीणा जैसी निरन्तरता है वहीं दूसरी ओर सरस्वती जैसा गांभीर्य और मतवाला जैसा वैविध्य है।
आधुनिक युग की धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, और नवनीत से लेकर वागर्थ, समास और पाखी सहित अन्य पत्रिकाओं से इसकी आंशिक तुलना ही की जा सकती है क्योंकि इसके अपने तेवर हैं।
मेरे सामने जुलाई 2022 का मधुमती का समृद्ध अंक है। यह बासठवें वर्ष का अंक है जिसका अपना विशिष्ट वैविध्य है।
इसमें जहाँ एक ओर नामवरसिंह का विशेष स्मरण है वहीं दूसरी ओर मेवाड के नाहर नृत्य के बारे में विशद जानकारी है। अज्ञातवास का सफर जैसे प्रयोग से भरपूर राजेंद्रमोहन भटनागर के उपन्यास का अंश जहाँ एक ओर हमें उद्वेलित करता है, तो रमेशचन्द्र शाह के वे अछूते संस्मरण जो उनके व्यक्तित्व की परतों को खोलते हैं, डॉक्टर श्यामसुन्दर दुबे की कलम से तथा अनिरुद्ध उमट की कलम से प्रसूत हुए हैं। इस अंक के चारों लेख भी विविधता का सौंदर्य रचते हैं। इनमें हिंसा और अहिंसा तथा सुभद्रा कुमारी चौहान की नारी स्वातंत्र्य को लेकर लिखी गई कहानियों पर चर्चा है, साथ ही अपने-अपने अज्ञेय जैसा विस्तृत आलेख भी है जिसमें अज्ञेय जैसे अभिजात और अपने खोल में सिमटे समझे जाने वाले साहित्यकार का व्यक्तित्व और कृतित्व समझ में आता है और यह भी समझ में आता है कि बडे-बडे तथाकथित साहित्यकार वास्तव में कितने छोटे भी हो जाते हैं।
मुझे लगा कि इस इतने बडे ग्रन्थ में उनके कृतित्व को लेकर शायद ही कुछ महत्त्वपूर्ण कहा गया हो। समस्त सामग्री उनके व्यक्ति पर केंद्रित है और इस बात का गहरा मलाल है कि कपिलाजी ने और विद्यानिवासजी ने जिनके साथ उन्होंने अपना लम्बा जीवन काल साझा किया, क्यों नहीं उनके व्यक्ति को अनावृत्त किया ? ऐसे विवरण पढकर शिद्दत से इस बात को लेकर वितृष्णा होती है कि क्या साहित्य सृजन के यही सीमित और संकुचित आशय रह गए हैं और क्या यही कारण है कि हमारा सृजन विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित नहीं हो पाता क्योंकि उस सृजन के मूल में कहीं न कहीं यही कुण्ठा,राजनीति और ओछेपन की दम्भपूर्ण मानसिकता रहती है। मुझे वास्तव में इस समीक्षा को पढकर पीडा हुई। कैसे हैं ए तथाकथित बडे लोग! जिन्होंने अतीत से कुछ सीखा नहीं और भविष्य की पीढियों के लिए कुछ ऐसा नहीं छोडा जो उनके लिए सीखने लायक हो सके। मुझे इस अवसर पर अज्ञेयजी पर स्वर्गीय कृष्णदत्तजी पालीवाल के द्वारा किए गए कार्य की याद आती है जिसमें उनके कृतित्व पर बडे परिश्रम के साथ विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सामग्री के आधार पर प्रकाश डाला गया है। मैं ब्रजरतन जोशीजी को इस आँख खोलने वाली समीक्षा को प्रकाशित करने के लिए साधुवाद देता हूँ।
इस अंक में दूसरी महत्त्वपूर्ण समीक्षा रंजना अरगडे की है, सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास सेई समय पर, जिसके शब्दों में इतिहास की पदचाप गूँजती है। इस उपन्यास का काल प्लासी के युद्ध के समय का वह काल है जो उस समय के बंगाल की घटनाओं से लेकर 1857 की क्रांति के काल तक को अपने कथ्य में पिरोता है। इसमें उस काल की वह चेतना भी मुखर हुई है, जिसके परिणामस्वरूप बौद्धिक जागरण की लहर उत्पन्न हुई जिसने शान्ति निकेतन जैसी संस्थाओं को जन्म देकर भारत के सांस्कृतिक तट पर छोड दिया।
इस अंक में चार कविताएँ भी हैं। ए सभी उल्लेखनीय हैं विशेष रूप से आँधी, जिसकी पंक्तियाँ हैं कविताएँ कवि मन में चलने वाली आँधी की बेटियाँ हैं।
इसी तरह चाबी और पक्षी कविताएँ भी अपनी ओर आकृष्ट करती हैं। भटकाव, प्रतीक्षा तथा अलग पाठ भी बेहतर कविताएँ हैं। सभी कृतियों की समीक्षाएँ भी पाठक को समृद्ध करती हैं विशेष रूप से अरुण कमलजी की समीक्षा जिसमें नदीघर की कविताओं की सच्ची पडताल की गई है। कैलाश वाजपेयी के कृतित्व पर लिखे आलेख में भी ओम निश्छलजी ने उनके साथ न्याय किया है। कैलाश वाजपेयी जैसे रहस्यवादी और दार्शनिक कविताओं के रचनाकार के कृतित्व की इतनी सहज पडताल हमें मानसिक तृप्ति प्रदान करती है।
आज जितने उत्साह से पत्रिकाएँ निकल रही हैं, उतनी ही निराशाजनक परिस्थितियों के बीच उन्हें बन्द भी करना पड रहा है। इसके अनेक कारण हैं और सबसे बडा कारण गैर-सम्प्रेषणीयता का है। सम्पादकों के अपने आग्रह हैं और अनेक सम्पादक ऐसे हैं जो स्वयं भी इन पत्रिकाओं के माध्यम से अपने आपको स्थापित करने का यत्न करते हैं भले ही उनका लेखन स्वभाव और स्तर के लिहाज से पाठकों को रुचिकर प्रतीत न होता हो। विज्ञापनों की आशा में पत्रिकाएँ निकलती हैं, किन्तु विज्ञापन नहीं मिलते। सरकारों की ओर से भी विज्ञापन देने की नीति में परिवर्तन होता रहता है। जो पत्रिकाएँ शासन के संस्कृति विभाग के द्वारा प्रकाशित की जाती हैं, उनमें से कुछेक पत्रिकाओं को यदि अलग कर दें, तो अनेक पत्रिकाएँ अपने-अपने दृष्टिकोण से रचनाओं का चयन कर उन्हें प्रकाशित करती हैं। अनेक कारणों से पत्रिकाओं के संयुक्तांक निकालने पडते हैं या उनके प्रकाशन में अत्यन्त विलम्ब होता है और अच्छे लेखक इन पत्रिकाओं में प्रायः लिखने से बचते भी हैं। शासकीय पत्रिकाओं के माध्यम से शासन का चूँकि कोई उद्देश्य लाभार्जन का नहीं होता इसलिए भी यदि सम्पादक में उत्साह न हो तो ऐसी पत्रिकाएँ अपना स्तर कायम नहीं रख पातीं।
इस तरह अनेक कारण आज के समकालीन परिदृश्य में ऐसे हैं जिनके कारण साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन और उनके स्तर को लेकर अनेक प्रश्न उपस्थित होते हैं। ऐसी स्थिति में यह नितान्त आवश्यक है कि पत्रिका की दिशा रचनात्मक तो हो ही, सकारात्मक भी हो व वह किसी विशिष्ट वाद से प्रभावित भी न हो।
यह कोई अतिरंजना नहीं होगी अगर मैं यह कहूँ कि ब्रजरतनजी के सम्पादन में मधुमती की सार्थक यात्रा निरन्तर उचित दिशा में अग्रसर हो रही है। वे अन्तरानुशासिक दृष्टि से सम्पादन करते हैं, जिसके कारण विधागत और अनुशासनगत सीमाएँ अपने बन्धनों से मुक्त होकर एक-दूसरे से संवाद करती हैं। उनमें आवाजाही होती है, जिसका परिणाम ऐसे मधुमय सृजन में होता है जो पाठक और सर्जक दोनों को सम्पन्न करता है।
- नर्मदाप्रसाद उपाध्याय
लेखक साहित्य एवं कलाओं के मर्मी अध्एता एवं विचारक हैं।